रविवार, 21 मई 2017

कहानी / जंग / ललन तिवारी

मनोज अग्रवाल की कलाकृति

जीवनलाल का पूरा जीवन संघर्षमय रहा। जब भी पूछिए जंग लड़ने की बात कहते। छोटी-सी आमदनी, दुनिया भर का खर्च। तीन-तीन बाल-बच्चे। सबको पढ़ाने-लिखाने, ऊँची शिक्षा दिलाने में अपने शौक-श्रृंगार की आहुति देते रहे। किन्तु अपने त्याग-तपस्या और तकलीफ की कभी चिंता नहीं की। जब बेटे अपने-अपने पाँवों पर खड़े हो गए। उन पर आर्थिक भार थमा। वर्ग-बिरादरी और मुहल्ले में सिर उठाकर चलने की कूवत आ गयी। नौकरी की जंग पार कर रिटायर्ड हुए तो मकान की चिंता। अब वे मकान बनवाने की जंग में लग गए। आगे नाथ न पीछे पगहा वाली बात तो नहीं थी क्यों कि घर भरा-पूरा था। पर, घर बनवाते समय अकेला थे। अकेला ही जंग लड़ते रहे लेबर-मजदूर और भाँति-भाँति के कारीगर व मिस्त्रियों से। बिल्डिंग-मेटेरियल के सप्लायर के साथ की जंग भी परेशान करनी वाली थी। देते एक नंबर के मेटेरियल की कीमत, मिलते तीन नंबर के। मकान बनवाने में डेढ़ साल की मशक्कत। लू-गर्मी में देह तपानी पड़ी थी और ठंड में हडि्डयाँ कँपाने। शाम को थके-मांदे आवास लौटते तो मित्रों से जंग। नौ बजे रात से पहले वाक्युद्ध नहीं थमता। विषय रोज का घिसा-पिटा उबाऊ दंत-कीर्त्तन। मित्र होने के नाते न तो कुछ कहते बनता न ही उन्हें झेलते। पत्नी के हाथ न बँटाने पर पत्नी से जंग। मकान बनना पूरा भी नहीं हुआ कि बेटा-बहू की पुकार। चले आइए चंडीगढ़ बहू की सेवा में। भारी पाँव को हलका करवाने। वह भी दिसंबर महीने में। तीन माह का चक्कर। जाने का टिकट भी भेज दिया।

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माघ-पूस का महीना। एक नयी जंग। प्रेमचंद की कहानी 'पूस की रात'। प्रेमचंद ने यूपी-बिहार में पूस की रात देखी थी। दस पेज की ही कहानी लिखी। चंडीगढ़, शिमला में पूस की रात देखी होती तो बीस पेज।

जीवनलाल पत्नी के साथ वहाँ पहुँचे तो शरद्ऋतु के शारदीय चरण पड़ चुके थे। कोल्ड- प्रूफ कोट-कंबल बक्से से बाहर आ गए थे। हिमधारी होने के कारण ही पर्वतराज हिमालय कहलाता और उसके प्रांतर में फैला हिमाचल प्रदेश। इस चंडीगढ़ से बीस किलोमीटर दूरी पर ही हिमाचलप्रदेश के मुख्यमंत्री स्वागत करते मिलेंगे पर्यटन एवं संस्कृति मंत्रालय के पोस्टर पर। इसका मतलब शिमला भी दूर नहीं। वहाँ की शीतलहर को चण्डीगढ़ आने में दस-बीस दिन नहीं, दस-बीस घंटे लगते हैं। उन दिनों जम्मू-काश्मीर सहित शिमला में बर्फबारी हो रही थी। मसलन जीवनलाल की मुश्किलें बढ़ गयी। जितने भी गर्म कपड़े उनके पास थे, देह पर चढ़ा लिए।

जीवनलाल को पता नहीं था कि यह पूरा प्रदेश जंग के लिए कुख्यात या विख्यात है। कुरुक्षेत्र पास ही है जहाँ महाभारत की जंग हुई थी, केवल पाँच गाँवों के लिए। और वे पाँचों गाँव पांडवप्रस्थ, सोनाप्रस्थ, इन्द्रप्रस्थ, बाहकप्रस्थ, और तिलप्रस्थ थे। जिसका आधुनिक नाम पानीपत, सोनीपत, दिल्ली, बागपत और तिलपत है। समझिए पूरा हरियाणा। कई पत तो दिल्ली से चंडीगढ़ के रास्ते में ही पड़े। अब इतना बड़ा लड़ाकू इलाका दुर्योधन पांडवों को भीख (दान) में कैसे दे देता? इसलिए महाजंग हुई थी महाभारत के नाम से। और पानीपत तो अपना गौरव अट्ठारहवीं शताब्दी तक कायम रखा तीन-तीन महाजंग का आतिथ्य स्वीकार कर। और आज भी यह थका नहीं है। अपनी कमर कस कर खड़ा है जाटों के आरक्षण को लेकर। जीवनलाल घबड़ा गए। उन्हें याद आया यह वही दिल्ली है जो कभी हस्तिनापुर के नाम से विख्यात थी। जिसका राजा धृतराष्ट्र था-अंधा। आज वही हस्तिनापुर दूसरा महाभारत की पृष्ठभूमि गढ़ता दिखा।

सुबह-शाम टहलने वाले जीवनलाल पार्क में वैसे उतरे जैसे कोई क्रिकेट खिलाड़ी पहली बार मोहाली स्टैडियम में उतरा हो। और उचक-उचक कर दर्शकों को देख रहा हो जिनके हाथ में तिरंगा झंडा के अलावा ईंट-पत्थर भी हों। खेल जमा तो झंडा, वरना डंडा।

उनके वय के बहुतेरे स्त्री-पुरुष उस पार्क के मैराथन दौड़ में शामिल थे। स्त्रियाँ सलवार-सूट में तो पुरुष सर पर पगड़ी उठाए। संतोष हुआ कि वहाँ सबके सब पगड़ी उठाए हुए नहीं थे बल्कि बिना कलंगी वाले मुंडा सरदार और उसके जैसा बेचारे मेहमान भी थे जो यूपी बिहार से आए थे। कुछ तो बेटा-बेटी की शरण में थे। और अपने मुल्क में जाने के लिए छटपटा रहे थे। हिमाचल प्रदेश के लोग भी अच्छी संख्या में थे। जिनसे बातचीत की जा सकती थी। यानी मौनी व्रत कीं नौबत नहीं आ सकती।

उसने भर सप्ताह उस पार्क में उतरने वाले बूढ़े-अधेड़ जांबाजों का आचार-व्यवहार के अध्ययन में बिताया। औपचारिकता में दंड-प्रणाम, सत् श्री अकाल, राम-राम दुआ-सलाम करने का अभ्यास ताकि दूध-पानी मिल सके। फिर परिचय। उसने देखा कि तीस प्रतिशत लोग अष्ट्रावक्र की स्थिति में पार्क के किनारे-किनारे की बनी पगडंडी पर कोल्हू के बैल भांति घूम रहे हैं। शाम को पार्क में घुसे तो मर्दों से अधिक महिलाएँ, जो उसी पगडंडी पर घुड़दौड़ कर रही थीं। पगडंडी ईंट-टाइल्स की नहीं होतीं तो धूल उड़ा कर छोड़तीं और एक फीट गड्ढ़ा कर देंती। वहाँ की महिलाएँ बिना देशी घी, खाना नहीं खातीं। गले में जो अँटकने लगता। और मोटी होने पर जीम जातीं और कमर की चर्बी घटाने के लिए पार्क का चक्कर। मोटी हो रही लड़कियों को शाम होते ही पार्क में ठेल देतीं--जाओ सेहत बनाओ। कुंवारी होतीं तो विवाह की चिंता उन्हें स्वयं होती और पार्क में जाकर बछेड़ी-सी कूदतीं-माँकतीं। बच्चे तो खैर बच्चे ही होते हैं। उनके लिए खेलने-कूदने की अलग व्यवस्था थी। इस तरह वह पार्क शाम से देर रात तक आबाल-बूढ़ों से जगमग रहता।

वैसा पार्क प्रत्येक नेबर-हूड में बनाया गया था। और उसके चारों तरफ फायरवाल। यानी लाल ईंटों वाली लाल रंग की दीवारें। एनसीडी को लाल रंग ही पसंद है। जयपुर पिंकी टाऊन है तो चंडीगढ़ लाल क्यों नहीं। इसलिए पूरे चंडीगढ़ को दहकता हुआ पलाशवन में बदल डाला।

जीवनलाल यह जानकर सन्न रह गए कि उन बूढ़ों में अधिकांश लंकवा ग्रस्त थे। उन्हें चिंता हुई कि वे पहले से लकवाग्रस्त थे कि वहाँ बसने के कारण। बूढे और रिटायर्ड व्यक्तियों की अधिकता के कारण ही चंडीगढ को वरिष्ठ नागरिकों का शहर कहा गया। 'प्रथम्ग्रासे मच्छिका पातम्'। पहला परिचित पुरुष मस्तिष्क का लकवाग्रस्त निकला। यानी अर्द्ध-चेतन। वह केवल अपना ही दुख रोता। वह बेचारा दिनभर पार्क में टहलने के लिए अभिशप्त था। दूसरा परिचित व्यक्ति अस्ट्रेलिया में कम्पाउंडर था जो अभी लंकवा की बीमारी सौगात में लेकर आया था। यानी शरीर का दाहिना अंग क्षतिग्रस्त। वह दिन भर पार्क में बैठा रहता। तीसरा व्यक्ति सत्तर वर्ष का रिटायर्ड मेजर था जो उन्नीस सौ एकहत्तर से लेकर रिटायर्ड होने तक कई जंग लड़ चुका था। वह अपना अनुभव सुनाता रहा और जीवनलाल हर दस मिनट पर बहादुरी से दो चौकी पीछे हटते गए। जब बेंच का आखिरी किनारा आया तो खुद को सरैंडर कर उठ खड़ा हुए। दो-चार और व्यक्तियों से टकराये जो विभिन्न संस्थानों से रिटायर्ड हो चुके थे। वहाँ कई दूसरे धंधा वाले भी मिले। पर मन किसी से नहीं जंचा। न मन जँचता था न ही मन लायक बात होती। वे सामाजिक- राजनैतिक वार्ताओं से दूर केवल डीए बढ़ने के समाचार तक ही सीमित थे।

जीवनलाल ने अपने परिचय का दायरा बढ़ाया। ढूँढ़ते-ढूँढ़ते एक रिटायर्ड प्रोफेसर तक जा पहुँचे। उस रिटायर्ड प्रोफेसर को भी पता नहीं था कि किस वरिष्ठ विद्यार्थी से पाला पड़ने वाला है। दूसरे सप्ताह वह एकांत में बैठा था। जीवनलाल ने धर-दबोचा। दण्ड-प्रणाम के बाद विशेष परिचय-पाती। निश्चय ही वे अन्य लोगों से विशिष्ट लगे। वे हिन्दी में आनर्स और समाजशास्त्र में एम.ए. कर पंजाब यूनिवर्सिटी में समाजशास्त्र के रिटायर्ड प्रोफेसर थे। वे पाँच वर्षों तक आई.ए.एस. करनेवाले विद्यार्थियों को पढ़ा भी चुके थे। बातचीत के क्रम में लिखने-पढ़ने की बात आयी। जीवनलाल लिखने-पढ़ने में रुचि रखते थे। प्रोफेसर के अनुसार पुस्तक लिखने और उसे प्रकाशित कराने की आवश्यकता ही नहीं रह गयी थी। जीवनलाल भड़क गए।

कुछ दिन पहले ही पंचकूला के साहित्यिक मित्रों ने वर्तमान में कागज-कलम का उपयोग करने वाले लेखकों को पिछड़ा बताया था। यानी जीवनलाल पिछड़ा लेखक घोषित हो गए। मित्रों ने उनको मोडर्न बनाने के लिए (उस उम्र में) लैपटॉप खरीदवाकर ही दम लिया। साठा पर पाठा। लैपटॉप देख कर पत्नी ने कहा था और पोती उस कहावत का अर्थ जाने बिना ठठाकर हँसी थी। और जीवनलाल मुस्करा कर रह गए थे। यह प्रोफेसर तो लेखन और लेखकों की उपयोगिता को ही खतम कर दिया। यानी न लेखक की जरूरत है न ही लेखन की। न पुस्तक की न ही नए प्रकाशन की। जो कुछ लिखा जा चुका है पर्याप्त है। यहाँ पर जंग का एक नया मोर्चा नजर आया। वह मोर्चा बन्दूक-तलवार से भी भयंकर और खतरनाक था। वह था वैचारिक मोर्चा। इस मुद्दे पर पढ़े-लिखे ब्यूरोक्रेट से लेकर डॉक्टर-इंजीनियर, प्रोफेसर-वकील, व्यापारी और उच्च-वर्ग या तो खामोश थे या दिग्भ्रमित। वह प्रोफेसर भी उसी पंक्ति का लगा। यानी यथास्थितिवाद के पोषक।

जीवनलाल उस प्रोफेसर साहब को इतनी आसानी से कैसे छोड़ देते, तुरत जवाब देने के लिए कमर कस ली।

''प्रोफेसर साहब, आप अपनी बात को थोड़ा स्पष्ट करने की कृपा करेंगे?''

''क्यों नहीं। असल में जब से कम्प्युटर सिस्टम का विकास हुआ, सारा एजुकेशन गूगल में डाल दिया गया। दुनिया की सारी महत्त्वपूर्ण पुस्तकें, महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों के विचार गूगल में हैं। उसे खोलिए और पढ़ लीजिए। बच्चों को पढ़ा दीजिए। लिखने-पढ़ने की क्या जरूरत है अब? मुझे तो जो कुछ पढ़ाना होता था उसका रेडिमेड स्लाईड लेकर प्रोजेक्टर से स्क्रीन पर दिखाकर समझा देता था। विद्यार्थी पढ़ लेते थे। समझ जाते थे। आज भी वही हो रहा है।'' प्रोफेसर ने कहा।

''आप ठीक करते हैं। परन्तु पढ़ाने का एकमात्र तरीका यही नहीं है। और भी तरीके हैं जो परंपरा से चले आ रहे है। अभी तक मैंने कॉपी-किताब, पेंसिल-कलम और सिलेट-चॉक से ही पढ़ाई की है। और इन्हीं साधनों से पढ़ाया भी है। मैं भी मिडिल स्कूल का हेडमास्टर रह चुका हूँ। वही है जमीनी पढ़ाई। क्या आपके समय में कम्प्यूटर था?'' जीवनलाल ने पूछा।

''नहीं। मेरे जमाने में नहीं था।''

''रहा होगा। किन्तु आपकी पहुँच के बाहर होगा। इसके बावजूद आपने उसी पुराने तरीके व साधन से पढ़ाई कर प्रोफेसर बने होंगे।''

''मैं आपकी बात से सहमत हूँ। किन्तु आज तो है न?.... क्यों नहीं हम आज की सुविधाओं का लाभ उठावें? आज के विद्यार्थियों को अप-टू-डेट करें। और आज के विद्यार्थी भी अपटूडेट हो गए हैं। कम्प्यूटर से ही पढ़ना पसंद करते हैं। बिना कंप्यूटर एक कदम आगे नहीं बढ़ सकते।'' प्रोफेसर साहब बोले।

''किन्तु, आज भी यह सुविधा कितने भारतीय बच्चों के पास उपलब्ध है? कितनों के पास कम्प्यूटर-लैपटॉप है? कितने बच्चे पढ़ते हैं इस सिस्टम से?''

''इसका आंकड़ा जानना मेरा काम नहीं न ही सर्वे करना। न ही मैं इसका अधिकारी हूँ। न ही कर सकता हूँ।''

''मुझे मालूम है। इसका आंकड़ा आपके पास नहीं होगा। किन्तु आपके अनुसार वैज्ञानिक खोज पर्याप्त है और सामाजिक-आर्थिक विकास भी?''

''मैं यह नहीं कह रहा हूँ।''

''आपके कहने का आशय तो यही हुआ कि सबकुछ रोक दिया जाय। यानी यथास्थिति। और, यह तभी संभव होगा जब सूर्य का चक्का रुक जाएगा यानी समय जड़। सोचना, पढ़ना-लिखना और उसे प्रकाशित करवाना सब जड़ रहेगा। क्या यह संभव है? फिर ज्ञान का विस्तार कैसे होगा? अगर समाज बदलेगा तो उसका दर्पण साहित्य को भी बदलना चाहिए। उसके आगे लिखा जाना चाहिए। जिसके लिए लेखक छटपटाएँगे।'' जीवनलाल ने कहा।

''मेरा मतलब पुराने पड़ चुके साधनों को छोड़कर नए साधन अपनाने से है।''

''बिल्कुल आप सच कह रहे हैं। किन्तु इसका मतलब तो यह नहीं कि पुराने को बिल्कुल खारिज कर दिया जाए। एटम बम और मिसाइल के इस दौर में क्या लाठी-डंडे की जरूरत नहीं कि तोप-तलवार की?''

प्रोफेसर साहब को ऐसे प्रश्नों की उम्मीद नहीं थी। वे घबड़ा गए। वे जीवनलाल से बचने के लिए अपने कथन पर पॉलिश चढ़ाने लगे।

''मैं बिल्कुल ही उन्हें खारिज नहीं कर रहा। पर, हाशिए पर वे स्वयं हो गए हैं।...... एक समय था जब लिखने का साधन नहीं था लोग कंठस्थ करते थे। हजारों वर्षों तक ऐसे ही अपना ज्ञान बांटते रहे गुरू-शिष्य की परंपरा के अन्तर्गत। जब साधन बढ़ा। लिखने के लिए भोजपत्र सरीखे पत्रों का उपयोग शुरू हुआ। भाषा का विकास हुआ। और कंठस्थ को सहेजकर लिखना शुरू हुआ। किन्तु आज वह समय नहीं रहा ।'' प्रोफेसर साहब बोले।

''आपके गूगल बाबा भी तो वही कर रहे हैं। लिखे हुए को सहेज रहे हैं। संग्रह कर रहे हैं। किन्तु उस गूगल में डालने वाला भी तो चाहिए। आप आगे की शिक्षा को- चाहे जिस किसी क्षेत्र की हो,ं जोड़ना चाहेंगे तो उसके लिए तो लिखना ही पड़ेगा वरना क्या जोड़िएगा? आप सभ्यता-संस्कृति को तो समझते होंगे?''

''वही तो मेरा विषय रहा हैं उसे ही नहीं समझूँगा?''

''ठीक है सर। और विज्ञान को?''

''बिल्कुल। विज्ञान से ही हम यहाँ तक पहुँचे हैं।''

''यानी विज्ञान आगे-आगे और उसके कारण सभ्यता का विकास पीछे-पीछे।''

''बिल्कुल। हमने अपनी जरूरत के अनुसार विज्ञान की खोज की।''

''यानी विज्ञान के कारण सभ्यता बदली और उसके पीछे संस्कृति में परिवर्त्तन। यही न?''

''हाँ।''

''यानी वर्त्तमान सभ्यता-संस्कृति से आप संतुष्ट हैं और इसमें किसी परिवर्तन की जरूरत नहीं।''

''मैं ऐसा नहीं कहता कि परिवर्त्तन की जरूरत नहीं है।''

''बस यही सुनना था।'' जीवनलाल ने कहा।

उस दिन जीवनलाल प्रोफेसर साहब को चित करके माने। प्रोफेसर भी लहूलुहान होकर लौटे थे बिहारी विषखोपड़े से टकराकर। जीवनलाल भी कम नहीं थे। दिन भर टीवी में आँखें धँसाकर समाचार देखते। बाकी समय में पेपर-पत्रिका, महत्त्वपूर्ण साहित्य-कला की पुस्तकों को चाटते। कम्युनिज्म की पुस्तकें मिल गयीं तो बल्ले-बल्ले। सामाजिक कार्यों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते। सादगी की मूरत। कुर्ता-पैजामें में ही पैंसठ की उम्र पार कर लिए थे जीवनलाल। फिर भी आँखों पर चश्मा नहीं चढ़ा था। आज भी बिना किसी बीमारी के स्वस्थ। खट्-खट् पैदल चलते। युवाओं को चिढ़ाने वाली गति। लोहा, लोहे को काटता है। प्रोफेसर की काट हेडमास्टर। वह भी तो उसी वय के थे।

घर आये तो एक दूसरी जंग छिड़ी हुई थी। उनकी पत्नी उदास होकर मुँह फुलाए बैठी थी। बहू से दो-दो हाथ हो चुके थे। कौन किसको पछाड़ा पता नहीं। हार-थक कर वह उनकी प्रतीक्षा कर रही थी। यानी सास-बहू का सिरियल था। वह क्या करते। किसका पक्ष लेते। न तो पत्नी को छोड़ सकते, न ही बेटा-बहू को। दोनों को अपने-अपने वर्चस्व की लड़ाई थी। जहाँ उनकी पत्नी को रिटायर्ड पति को मिले रुपए और पेंशन पर गुमान था वहीं बहू को अपने कामासुत पति पर।

''क्या बात है?'' उन्हें पूछना पड़ा।

''अब मैं एक दिन भी यहाँ नहीं रहूँगी।'' वह विफर पड़ी।

''वापसी का टिकट तो ले ही लिया है--26 फरवरी। थोड़े दिनों की बात है शांति से रहो। ऐसे झगड़े घर-घर में है। कहाँ भागकर जाओगी? किससे कहोगी? जो सुनेगा हँसेगा। बेटा जनमाया है तो बहू का नखरा बर्दाश्त करना ही पड़ेगा।' उनके बहुत समझाने पर पत्नी शांत हुई थी।

शाम को टीवी खुलवाया तो जेएनयू विवाद पूरे देश में फैल चुका था। स्टुडेंट फेड्रेशन का नेता कन्हैया गिरफ्तार होकर पुलिस कस्टडी में था। और उसके समर्थन में बंगाल के यादवपुर यूनिवर्सिटी के छात्र आगे आ चुके थे। देखा-देखी पटना-मगध विश्वविद्यालय के छात्र भी। जैसे नारे जेएनयू कैंपस में लगे थे वैसे नारे देश के कई दूसरे विश्वविद्यालयों में लगने लगे। गैर बीजेपी नेताओं ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए देश भर में पसर गए थे। छात्रों के समर्थन में खड़े हो गए थे। उसी बीच रोहित बेमूला कांड भी गरमा गया। कुछ दिनों पहले ही रोहित बेमूला जो हैदराबाद सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी का दलित शोधछात्र था। फेलोशिप में सत्रह फीसदी की कटौती के विरोध में प्रशासन के समक्ष आंदोलन किया था। और, फिर सस्पेंड होने पर आत्महत्या। जीवनलाल सन्न रह गये। तीन-तीन दुखद समाचार--इण्डिया शाइनिंग कर रहा है। शिक्षा के सवाल पर विदेशों में भी भारत की किरकिरी। अमेरिका-इंग्लैंड के विश्वविद्यालयों में रोहित बेमूला की आत्महत्या के विरोध में जुलूस तो छात्रनेता कन्हैया को जेल से रिहा करने की मांग। दिल दहल गया, क्या हो गया इस देश को? देश में सरकार है भी कि नहीं? कहाँ हैं वजीरे आलम? कहाँ है सुशासन देने का वादा? जेएनयू तो आज का नहीं है न ही हैदराबाद सेंट्रल युनिवर्सिटी, न ही बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू)। इन्हें स्थापित करने पर देश का नाम गौरवान्वित ही हुआ। स्थापना के पीछे यही तर्क था कि यहाँ से निकले छात्र राजनेता बनें। दुनिया को समझें। महापुरुषों के दर्शन को जाने। विद्यार्थियों को विभिन्न विचार-धाराओं पर बहस करने, सोचने व तर्क करने की आजादी दी विश्वविद्यालयों ने। वहाँ कभी भी राष्ट्रविरोधी नारे नहीं लगे। अब क्या हो गया? संसद हमले का गुनहगार आतंकी अफजलगुरू को शहीद घोषित करने की मांग क्यों उठने लगी? आदि-आदि सवाल उन्हें परेशान कर दिए। मामला जरूर कहीं न कहीं गड़बड़ है। क्या मीडिया तथ्यों को तोड़मरोड़ कर परोस रही है? वे पूछें तो किससे? किस पर विश्वास करें ?

जीवनलाल की वह रात बहुत कष्ट से बीती। उनके विचारधारा का कोई व्यक्ति राष्ट्रविरोधी नारा लगा ही नहीं सकता। जरूर कहीं से षड्यंत्र हो रहा है। अगर सही हुआ तो किस साहस से समाज के सामने खड़ा होगा? सुबह उठते ही समाचार के लिए छटपटाने लगे। वे टीवी की ओर दौड़े। सात वर्षीया पोती कार्टून देख रही थी। उसने पोती से न्यूज लगाने को कहा। वह रिमोट लेकर बैठ गयी। लाख समझाने पर भी रिमोट नहीं दिया। फिर दोनों में छीना-झपटी शुरू हो गयी। वह रोने लगी तो रिमोट की मांग छोड़ दी। उसके स्कूल जाने के बाद ही दस बजे न्यूज देख सके। न्यूज सुनने के दौरान ही बाप-बेटे में बहस छिड़ गयी। उसके अनुसार विश्वविद्यालयों को दिया जानेवाला अनुदान और छात्रों का स्कॉलरशिप बंद कर दिए जाने चाहिए क्यों कि वहाँ आतंकवादी और विरोधी विचारधारा के युवक पैदा होते हैं। वे उद्विग्न हो उठे।

''तुम्हें कुछ पता है? उसी युनिवर्सिटी के प्रोड्क्ट छात्र देश की विभिन्न पार्टियों के प्रमुख-प्रमुख पद पर काबिज हैं। आजतक उसका विरोध किसी ने नहीं किया। फिर आज क्यो?''

''क्योंकि अब वहाँ देशद्रोही पैदा हो रहे हैं। महिषासुर महोत्सव मनाते हैं।''

बेटे के सोच से वे आहत ही हुए। किन्तु वह भी जीवट के आदमी थे। तुरत मोर्चा संभाल लिया।

''यह तो अपनी-अपनी विचारधारा है। देव-दानव-दैत्य तो एक ही पिता कश्यप ऋषि की संतान थे। उस ऋषि की पत्नियों के नाम पर ही उनकी संतान का नामकरण हुआ। उनके धर्म-कर्म के अनुसार नहीं। उनकी लड़ाई अच्छाई-बुराई के पक्ष-विपक्ष में नहीं, वर्चस्व के लिए थी। और, तत्कालीन प्रजा दोनों पक्ष में विभक्त थी । वे अलग-अलग विचारधाराएँ क्या आज समाप्त हो गई हैं?''

बेटे के पास इसका कोई जवाब नहीं था। इसलिए खामोश रहा। किन्तु, जीवनलाल चुप नहीं रहे।

''तुम इस सुर-असुर को आर्य-अनार्य के रूप में भी देख सकते हो। देवगुरू-पत्नी तारा को चन्द्र भगाकर ले गया और उससे बुध को पैदा किया। क्या यह प्रशंसनीय कार्य है कि हम उसी चन्द्र की पूजा करते हैं? यह विचारधारा का ही तो दोष है अथवा अंधश्रद्धा का। उस हिसाब से कुछ छात्र दुर्गा के बजाय 'महिषासुर महोत्सव' मनाते हैं दशहरा में तो उस पर आपत्ति क्यों?''

अंत में जीवनलाल ने बेटे के रोजगार पर ही सवाल उठा दिया।

''तुम किसके लिए काम करते हो? सेठ-मरवाड़ियों और कारपरेट घरानों की समृद्धि के लिए ही न? पब्लिक का पैसा जमा कर उन्हें मुहैया कराते हो कम ब्याज में। टैक्स की चोरी करवाते हो। दिवाले की स्थिति दिखाकर सरकार से कर्जा माफ करवाते हो। अब बताओ, कालाधन की बदौलत प्रतिवर्ष एक खरबपति हिन्दुस्तान में जो पैदा होता हैं वही राष्ट्रप्रेमी है? महात्मा का चोला पहनकर, जनता को मूर्ख बनाकर खरबपति बनना यही देशप्रेम है? और उदाहरण सुनना है?''

बाप से तकरार के भय से बेटा भाग खड़ा हुआ। यह भी सच था कि उसके पास पर्याप्त उत्तर नहीं था। इतने बड़े विशाल फलक में नहीं उड़ सका था। अभी उम्र ही कितनी थी।

बहुत पीड़ा और बेचैनी से रात भी काटी थी। भागे-भागे पार्क पहुँचे जीवनलाल। शायद उनके प्रश्नों का जवाब मिले।

चंडीगढ़ में बूढ़ों के लिए सुबह होती है ग्यारह बजे। उसी वक्त वे नाश्ता कर निकलते हैं। बूढ़ी हडि्डयों में धूप की गर्माहट भरते हैं। और, युवा निकलते हैं प्रेम की पेंगे मारने। जब जीवनलाल पार्क पहुँचे एक बेंच पर युवा लड़की-लड़का बैठे थे। बीच में नाश्ते की टिफिन खुली हुई थी। लड़की के मुँह में लड़का पराठे का कौर डाल रहा था और लड़की नजाकत के साथ खा रही थी। निश्चय ही वे दूसरे मुहल्ले के थे। वहाँ किसी के हस्तक्षेप की शंका जो नहीं थी। पार्क में बने सेड के अन्दर दृष्टि गयी तो वहाँ भी मनोहारी दृश्य था। लड़का- लड़की के कई जोड़े बैठे थे। एक लड़की जंघे पर लैपटॉप खोलकर बैठी थी। पास का लड़का मगन होकर अपना सिर उसमें घुसाए हुए था। पता नहीं कौन किसको पढ़ा रहा था कि दोनों कम्प्यूटर मास्टर होकर फोटो-फिल्म देख रहे थे। आजकल गूगल बाबा अबालबृद्ध सबकी रुचि की सामग्री जुटाकर जो रखने लगे हैं। जिसकी जो इच्छा हो डाल दो। जिसकी जो जरूरत हो डाउनलोड कर लो। जीवनलाल को इससे क्या लेना-देना था। वे तो अपनी ही पीड़ा से ग्रसित थे।

आगे बढ़े तो रोज की तरह तास फेंटनेवाले टाट बिछाकर जमे हुए थे। वे सबसे निरपेक्ष एक खाली बेंच पर बैठ गए। अभी तक उनके दोस्त नहीं पहुँचे थे। मस्तिष्क में कुलबुलाता कीड़ा उन्हें बैठने नहीं दे रहा था। उन्होंने देखा सभी अपनी-अपनी दुनिया में मस्त हैं। किसी को न समाज से मतलब है न समाचार से। न मोदी से न ही कन्हैया से। न जाट से न ही जिरह से। किसे फुर्सत है राष्ट्रप्रेम-बनाम-राष्ट्रद्रोह पर सोचने की। एक बार मीडिया जो कह दिया, लकीर का फकीर। साधु को चोर कह दिया तो चोर। अब साधु की जिम्मेवारी हो गई कि अपने को साधु सिद्ध करे। इतना विश्लेषण करने की क्या जरूरत? न ही भगत सिंह बनने की। पन्द्रह मिनट बाद प्रोफेसर साहब के मित्र जुटे। अंत में प्रोफेसर साहब। उनके हिसाब से एकमात्र प्रोफेसर ही था जो उनका दुख-दर्द सुन सकता था। और देश दुनिया के संबंध में तर्क-वितर्क कर सकता था। क्योंकि तर्क करने का भी एक स्तर होता है। अगर विद्वान शत्रु भी है तो उससे तर्क करने में मजा आता है।

''बोलिए जीवनलाल जी! कुशल-मंगल है न? आप तो आज जानेवाले थे?''

''जाट आरक्षण आंदोलन जाने दे तब न। चारों तरफ कर्फ्यू लगा हुआ है। हरियाणा के नौ जिला सेना के हवाले है। सप्ताह भर से पाँच सौ ट्रेन रद्द हैं। अब तक तीस की जान जा चुकी। कितने ट्रक-जीप फूँके जा चुके और महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार। दिल्ली की वाटर-सप्लाई और राजमार्ग बंद। यह जंग जारी ही थी कि दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) का प्रकरण शुरू हो गया।''

''आपको तो ट्रेन से जाना था।''

''ट्रेन कैंसिल हो गया।''

''बहुत अफसोस की बात हैं। जाने दीजिए इसी बहाने कुछ दिन और भेंट -मुलाकात होगी।''

''सो तो है। मेरे मन में एक प्रश्न तूफान मचाए हुए है।''

''हाँ-हाँ बोलिए।''

''क्या कम्प्यूटर में बिना सबूत छोड़े किसी शब्द, वाक्य या पाराग्राफ को जोड़ा घटाया जा सकता है?''

''हाँ। अरे यार, पेज पन्ना चेप्टर सब कुछ बदला जा सकता है बिना किसी खरोंच लगाए और सबूत छोड़े।'' प्रोफेसर साहब ने कहा।

जीवनलाल को कंप्यूटर की जानकारी नहीं थी। सो पूछ बैठे।

''और आवाज?''

''उसको भी। किसी की आवाज को किसी के बयान में जोड़ देना। किसी के सिर पर किसी का सिर। पुरुष की मूँछ उखाड़कर स्त्री के होंठ पर टांक देना और लड़की के बदन से लहँगा-चोली उड़ाकर लड़के को पहना देना बहुत सरल हो गया हैं। कैमरा को नहीं देखते, नाटे को लंबा और लंबे को नाटा करते हुए और काले-कुरूप को गोरा-सुन्दर बनाते?''

प्रोफेसर साहब ने अपना कंप्यूटर ज्ञान साझा किया।

''मैंने उस तरफ कभी गंभीरता से नहीं सोचा। तब तो इलॉक्ट्रॉनिक मीडिया और कंप्यूटर साइंस बहुत खतरनाक है कागज-कलम से। और उसी की आप प्रशसा करते हैं।''

प्रोफेसर साहब हँस पड़े। जीवनलाल चिढ़ कर चढ़ गए।

''पूरा देश इसी फरेबी टेकनिक से उबल रहा है। राष्ट्रद्रोह बनाम राष्ट्रप्रेम में बँट गया है। और, आपको हँसी आ रही है। सुना है आज का न्यूज?''

''नहीं।''

''सुनने लायक भी नहीं है। कहने के लिए वह केन्द्रीय सूचना और प्रसारण मंत्री है। उस पर भी उम्दा किस्म की टीवी कलाकार। उस पर भी सौम्य-सुशील कोमल हृदय वाली महिला। अपने कारनामों से देश में आग लगा दी।''

''हुआ क्या, यह तो बतलाइए?'' प्रोफेसर साहब ने पूछा।

''अपनी एक कम्प्यूटर इंजिनीयर दोस्त से न जाने कब का रिकार्ड किया हुआ राष्ट्रविरोधी नारे को कन्हैया के भाषण में जोड़ दिया और उस बेचारे को राष्ट्रद्रोह के केस में फँसाकर जेल के हवाले कर दिया कि बहुत वह लाल झंडा जिंदाबाद बोलता था।''

''देखिए, ऐसा काम सोच-समझकर प्लानिंग बनाकर बड़े स्तर से किया जाता है। उसमें केवल एक मंत्री नहीं, पूरा ग्रूप होता है। उनके आकाओं के सरोकार होते हैं। उन्हें नियंत्रण करने वाली संघीय शक्तियाँ होंती हैं। पर आप उस लड़के को लेकर इतना परेशान क्यों हैं? इतना बड़ा देश है कहीं न कहीं, कुछ न कुछ होता ही रहता है।''

''आप शिव के भक्त हैं। यानी आस्तिक। यानी यथास्थिति के पोषक। जो कुछ हो रहा है या होने वाला है उससे निरपेक्ष। वैसे में एक बच्चे पर क्या बीत रही होगी जेल में--उससे आप को क्या मतलब? और नारा लगाने वालों में और भी तो थे। आप बता सकते हैं कि वे कौन लोग थे जिसे पुलिस आजतक नहीं ढूँढ़ पायी है?

''नहीं।'' प्रोफेसर साहब ने कहा।

''किन्तु, सरकार को मालूम है कि वे कौन थे। और किस प्रयोजन से नारे लगा रहे थे। रही उस लड़के की बात तो वह मेरे ही गाँव का लड़का है। सरकारी पार्टी के कार्यकर्त्ताओं ने कोर्ट परिसर में भी वकील का काला वर्दी पहन कर जानलेवा हमला किया। और अपने को देशभक्तों की पंक्ति में बैठाने का जुगाड़।''

''इसीलिए आप इतना तड़प रहे हैं?''

''लेकिन जो हो रहा है वह देश के लिए खतरनाक है। देशद्रोह का मुकदमा तो उन पर चलना चाहिए जिसने पूरे देश में आग लगायी है। पता है यह सुनियोजित षड्यंत्र है वरना मीडिया वाले पहले से ही घटनास्थल पर मौजूद नहीं होते न ही उनके कार्यकर्त्ता छद्म रूप से सभा में शामिल होकर राष्ट्रविरोधी नारों से विरोधी छात्रों को बदनाम करते। यही उनकी परंपरा रही होगी।'' जीवनलाल ने कहा।

''कौन सरकार अपनी आलोचना सुनती है? ऐसे आलोचकों का मुँह बंद करने के लिए ही संविधान में ऐसी व्यवस्था की है।''

''और उसी संविधान में मानवाधिकार भी आता है जिसमें बोलने की स्वतंत्रता है। अगर इस व्यवस्था से कोई नाखुश है तो आलोचना करेगा ही। उसने संघ और मनुवाद का विरोध ही तो किया था और उनसे आजादी की बात कही थी।''

''वास्तव में सरकार का विरोध उस व्यक्ति से नहीं उसकी विचारधारा से है।''

''यानी कि सरकार सिर्फ अपनी और पार्टी की विचारधारा वाले को ही देश में रहने देगी और बाकी को राष्ट्रद्रोही घोषित कर.....? यही है लोकतंत्र?''

प्रोफेसर साहब को कोई जवाब नहीं सूझा। जीवनलाल चढ़ गए।

''चुप हो गए न। आप करोड़ों की जुबान नहीं सिल सकते। सबकी परिभाषा संविधान व शास्त्रों में नियत है। अपने पक्ष में नया गढ़ने की जरूरत नहीं है।''

''आप भी राष्ट्रद्रोहियों की तरह बात करते हैं।'' प्रोफेसर साहब बोले।

जीवनलाल का पारा चढ़ गया। शरीर काँपने लगा। उसने प्रोफेसर की आँखों में अपनी सुलगती आँखें घुसा दी।

''मैं आपको राष्ट्रद्रोही लगता हूँ? क्या मुझे महाराष्ट्र के नरेंद्र दाभोलकर, गोबिन्द पंसारे, और कर्नाटक के एम.एम कलबुर्गी की तरह सजा देंगे? नियम-कानून और मानवाधिकार की बात करना ही राष्ट्रद्रोह है तो वही सही। किन्तु आप भी उनके दलाल से कम नहीं हैं। आपकी आस्तिकता मुझे समझ में आ रही है।''

प्रोफेसर साहब ने चुप होकर जलती आँखों से जीवनलाल को देखा और घर की राह ली। किन्तु, वे बीच-बीच में पीछे मुड़कर देख भी रहे थे कि जीवनलाल उसका पीछा तो नहीं कर रहा।

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        परिचय
           
            ललन तिवारी
जन्म-      1जुलाई 1954, ग्राम+पो0 सदोखर जिला- रोहतास (बिहार)
प्रकाशन-   1. यही सच नहीं है, 2. आई हेट यू पापा, 3.योद्धा नहीं मरते।             (सभी कहानी संग्रह) 4. मिथ्यामेव जयते, 5. डंकल चाचा, 6.             सोच, 7. चन्द्रवामा ,(सभी पूर्णकालिक नाटक)
        8.कैसे हँसोगे हरसिंगार 9. विकल्प 10. मल्लिका 11. यौवन के             पच्चीस वसंत, वनबाला (कवितासंग्रह)
अन्य -
        पत्र-पत्रिकाओं यथा- हंस, वर्त्तमान साहित्य, कथाक्रम,                 परिकथा, प्राची, संवेद वाराणसी, आजकल, साहित्य-अमृत,             नयापथ, अक्षरपर्व, कतार, उत्तरा, विपाशा, निशांत, पल प्रति पल             आदि में रचनाएँ प्रकाशित।
        आकाशवाणी के राँची केन्द्र से कहानियाँ प्रसारित।
सम्मान--1. साहित्य कला परिषद, दिल्ली प्रशासन द्वारा 1993 में नाटक 'सोच'              पुरस्कृत।
          2. नागपुरी कला संगम, राँची द्वारा 1997 में  झारखण्ड के                     श्रेष्ठ कहानीकार के लिए 'कामायनी' पुरस्कार।
          3. वर्ष 2017 में पुस्तक 'आई हेट यू पापा' (कहानी-संग्रह) के               लिए सतीस चन्द्र झा स्मृति पुरस्कार।
 
संपर्कसूत्र--ललन तिवारी, विमर्श, स्ट्रीट-16, ए-बी रोड, बी-ब्लॉक, रामनगर             कॉलोनी, चास, बोकारो, झारखंड- 827013
        मोबाईल-9470972093
        ई मेल- l.tiwari.bokaro@gmail.com

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