मंगलवार, 23 मई 2017

देवेन्द्र पाठक 'महरूम'की गज़लें-

देवेन्द्र पाठक 'महरूम'

जीने का यहाँ हर किसी का ढब जुदा-जुदा.
शामो-सहर जुदा-जुदा है शब् जुदा-जुदा.

तू जिस तरह जिए न उस तरह मैं जी सकूँ,
जीने के हैं तेरे-मेरे सबब जुदा-जुदा.

ये ज़िन्दगी भी गोया जादूगरनी है कोई,
इंसान को दिखला रही करतब जुदा-जुदा.

मर-मर के कोई जी रहा कोई जीते जी मरा,
जीने की हर किसी की है तलब जुदा-जुदा.

क्यूँ रास्तों के नाम पे लड़ते हैं मुसाफ़िर,
'महरूम' सबकी राह-ए-मंजिल जुदा-जुदा.

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अच्छा नहीं किया तो बुरा भी नहीं किया.
जो की नहीं वफ़ा तो जफ़ा भी नहीं किया.

मुमकिन नहीं याँ हर किसी रख सकें खुश हम,
लेकिन कभी किसी को ख़फ़ा भी नहीं किया.

क़ाबिल तेरे यकीं के कभी हो न सके हम,
यूँ मैंने कभी तुझसे दगा भी नहीं किया.

तुझे अपने 'आज' से न जोड़ पाये है सच ये,
मेरे 'माज़ी' तुझे ख़ुद से जुदा भी नहीं किया.

ताउम्र मेहरबां न हुई मुझ पे ज़िन्दगी,
'महरूम' से भी शिक़वा नहीं किया.

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देवेन्द्र कुमार पाठक 'महरूम'; 1315,साँई पुरम् कालोनी,रोशननगर,कटनी;483501(म.प्र.)दिनांक-22/05/2017; 11.45 a.m.(devendrakpathak.dp@gmail.com)

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