शनिवार, 6 मई 2017

व्यंग्य / अमित शर्मा (CA) / तुच्छता से स्वच्छ्ता की ओर

स्वच्छ भारत अभियान के सर्वे में सबसे स्वच्छ शहरो में इंदौर पहले और भोपाल दूसरे नंबर पर आया है, ये दोनों शहर बीजेपी शासित राज्य मध्यप्रदेश में आते है, वैसे 2014 में सरकार बनने के बाद बीजेपी नेताओं ने अपने बयानों से जैसी गंदगी फैलाई है उसे देखते हुए ये काफी अप्रत्याशित लगता है। यह ज़्यादा अप्रत्याशित इसलिए भी है क्योंकि एमसीडी चुनावो में आप की हार के बाद ज़्यादातर लोग दिल्ली को सबसे ज़्यादा स्वच्छ मान रहे थे। इस सूची में उत्तरप्रदेश का गोंडा शहर सबसे भोंडा मतलब गंदा पाया गया है हालांकि अभी तक ये पता नहीं  चल पाया है की ये शहर कचरे की वजह से गंदा हुआ है या फिर हाल ही में समाप्त हुए विधानसभा चुनावों में नेताओ के बयानों द्वारा फैले कीचड़ से।


कांग्रेस का कहना है कि स्वच्छ भारत अभियान का श्रेय सबसे ज़्यादा उनके नेता राहुल गांधी को मिलना चाहिए क्योंकि पूरे देश को कांग्रेसमुक्त बनाकर वो ही सबसे ज़्यादा सफाई कर रहे हैँ । सरकार बता रही है कि मेरा देश बदल रहा है इसलिए कम गंदे शहरों को ही सबसे स्वच्छ शहर घोषित किया जा रहा है। स्वच्छ भारत सेस लगाने के बाद स्वच्छता सर्वे करवाना वाकई सरकार की स्वच्छ्ता के प्रति गंभीरता को दर्शाता है ,अब स्वच्छता भी अच्छे दिनों की सहयात्री बन जल्द ही दबे पांव आ जाएगी। मोदी सरकार चाहे  तन और मन से कितने भी जतन कर ले लेकिन वो स्वच्छ्ता के मामले में पिछली यूपीए सरकार को पीछे नही छोड़ पाएगी क्योंकि यूपीए सरकार ने "हाथ की सफाई" दिखाकर जिस तरीके से सरकारी ख़ज़ानों को खाली किया था उसने स्वच्छ्ता के क्षेत्र में नए और अभूतपूर्व प्रतिमान स्थापित किए थे। स्वच्छ्ता एक आदत होनी चाहिए और यूपीए सरकार ने इस आदत को 10 साल तक निर्बाध बनाए रखा था। 


वर्तमान सरकार सार्वजनिक स्थलो की सफाई जैसी तुच्छ स्वच्छता में समय और धन का अपव्यय कर रही है जो सरकार की सोच और विजन के "दिव्यांग" होने का आभास करवा रही है क्योंकि पिछली सरकारो ने तो "एस्केप वेलोसिटी" की गति से मेहनत करके ख़ज़ाने खाली किए (जिससे देश और जनता को जीरो लॉस हुआ) और ये सरकार सफाई के नाम पर जनता से टैक्स लेकर फिर से साफ़ हुए ख़ज़ानो को भर रही है जिन्हें फिर से खाली करने में मनरेगा के कितने "श्रम घण्टे" व्यर्थ होंगे इसकी हानि का अनुमान लगाने के लिए फिर से किसी अर्थशास्त्री को ही प्रधानसेवक बन कर सेवा करके "मेक इन इंडिया" के तहत मेवा उत्पादित करना होगा।


स्वच्छ्ता के क्षेत्र में देशवासियों को अभी बहुत जागरूक करने की ज़रूरत है और इस दिशा में रूढ़िवादी सोच भी आड़े आती है जैसे ज़्यादातर लोग पैसे को हाथ का मैल मानते हैं इसी वजह से खाना खाने से पहले या और कोई कार्य करते समय हाथ ठीक से नहीं धोते हैं । केवल जगह जगह शौचालय बनाकर और कचरापत्र (डस्टबिन) लगाकर सफाई सुनिश्चित नहीं की जा सकती है, भारत जैसे विविधताओं भरे देश में जहाँ लोग नाक और मुँह में अंगुली करके , हथेली पर खैनी कूट कर भाँति भाँति के नए तरीको से मल विसर्जन करते हो वहाँ सरकार को साफ़- सफाई के नए रचनात्मक तरीके इज़ाद करने चाहिए।


इन सबके अलावा मेरी राय में स्वच्छ भारत अभियान तब तक सफल नहीं हो सकता है जब तक हम अपने जवानो की शहादत से उपजे गुस्से को थूकना बंद ना कर दे। सोच की तुच्छता त्याग कर ही स्वछता संभव है।

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