June 2017

मन की अनभूतियों की कवितायेँ -मेरी तुम / (पुस्तक समीक्षा ) / सुशील शर्मा

विजय नामदेव की पुस्तक "मेरी तुम" जब मुझे समीक्षार्थ मिली तो उसके शीर्षक "मेरी तुम" पढ़ कर कुछ अजीब सा लगा। मुझे लगा के इस...

कविता-पथ / सर्जक : महेन्द्र भटनागर / समीक्षक : उमाशंकर सिंह परमार

किसी भी बड़े कवि की पहचान होती है कि वह अपने समय के कितना अनुकूल रहता है। समय की अनुकूलता से आशय समय के प्रति संवेदनशीलता व समय के प्रति सजग...

शब्द संधान / टर का मेला / डा. सुरेन्द्र वर्मा

बरसात आते ही दादुर मोर और पपीहों की बोली सुनाई देने लगती है। मेढकों का टर्राना शुरू हो जाता है। उनकी टर टर की कर्कश आवाज़ हमारा ध्यान खासतौर ...

उमड़ती घुमड़ती गरजती बरसती - बरसात की कविताएँ

  बरसात की कविताएँ मंजुल भटनागर    मेघा कब बरसोगे नदी व्याकुल सी झील मंद सी मौन खेत ,आँगन ,मोर नभ निहारे कब भरेंगे सुखन मनस सारे कब म...