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पुस्तक-समीक्षा सजग पत्रकार की दृष्टि में मोदी-युग -रमेश नैयर

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पुस्तक ‘मोदी युग’ का शीर्षक देखकर प्रथम दृष्टया लगा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की स्तुति में धड़ाधड़ प्रकाशित हो रही पुस्तकों में एक कड़ी और जुड़ गई। अल्पजीवी पत्र-पत्रिकाओं के लेखों के साथ ही एक के बाद एक सामने आ रही पुस्तकों में मोदी सरकार की जो अखंड वंदना चल रही है, वो अब उबाऊ लगने लगी है। परंतु पुस्तक को जब ध्यान से पढ़ना शुरू किया तो मेरा भ्रम बिखरता गया कि ये पुस्तक भी मोदी वंदना में एक और पुष्प का अर्पण है। वैसे भी संजय द्विवेदी की पत्रकारिता की तासीर से परिचित होने के कारण मेरे सामने यह तथ्य खुलने में ज्यादा देर नहीं लगी कि पुस्तक में यथार्थ का यथासंभव तटस्थ मूल्यांकन किया गया है। वरिष्ठ पत्रकार संपादक और विचारक प्रोफेसर कमल दीक्षित का आमुख पढ़कर स्थिति और भी स्पष्ट हो गई। वस्तुत: प्रोफेसर कमल दीक्षित द्वारा लिखा गया आमुख पुस्तक की निष्पक्ष, दो टूक और सांगोपांग समीक्षा है। उसके बाद किसी के भी लिए संजय द्विवेदी की इस कृति की सामालोचना की गुंजाइश बचती नहीं है। यह स्वयं में सम्यक नीर-क्षीर विवेचन है। भाजपा विरोधी समझे जाते रहे उर्दू के अखबारों और रिसालों को भी यह खुली आंखों से देखना …

पुरुष सत्तात्मक समाज में स्त्री विमर्श / सुशील शर्मा

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हिंदी में विमर्श शब्द अंग्रेजी के ‘डिस्कोर्स’ का पर्याय है और ‘डिस्कोर्स’ लेटिन शब्द ‘Discursus (डिस्कर्सस) का, जिसका अर्थ है बहस, संवाद, वार्तालाप और विचारों का आदान-प्रदान ।किसी भी सभ्य समाज अथवा संस्कृति की अवस्था का सही आकलन उस समाज में स्त्रियों की स्थिति का आकलन कर के ज्ञात किया जा सकता है। विशेष रूप ये पुरुष सत्तात्मक समाज में स्त्रियों की स्थिति सदैव एक-सी नहीं रही। वैदिक युग में स्त्रियों को उच्च शिक्षा पाने का अधिकार था, वे याज्ञिक अनुष्ठानों में पुरुषों की भांति सम्मिलित होती थीं। किन्तु स्मृति काल में स्त्रियों की स्थिति वैदिक युग की भांति नहीं थी। पुत्री के रूप में तथा पत्नी के रूप में स्त्री समाज का अभिन्न भाग रही लेकिन विधवा स्त्री के प्रति समाज का दृष्टिकोण कालानुसार परिवर्तित होता गया।जब महिलाओं ने अपनी सामाजिक भूमिका को लेकर सोचना-विचारना आरंभ किया , वहीं  से स्त्री आंदोलन, स्त्री विमर्श और स्त्री अस्मिता जैसे संदर्भों पर बहस शुरु हुई ।नारीवाद की सर्वमान्य कोई परिभाषा देना मुश्किल काम है, यह सवाल है राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक संस्थाओं के सोचने के तरीके और उन विच…

समीक्षा : श्रीराम महिमा

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बुजुर्ग दंपति ने फुर्सत के क्षणों में हिंदी गद्य में लिखी श्रीराम महिमा पुस्तक
भोपाल। राजधानी के बुजुर्ग दंपति ने अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाई करने वाले बच्चों की समस्या को समझा और जीवन की सांझ में कुछ समय निकालकर हिंदी गद्य में श्रीराम महिमा पुस्तक लिख डाली। अब ये पुस्तक प्रकाशित हो चुकी है और बच्चे पढ़कर आनंदित हो रहे हैं।
आमतौर पर श्रीराम चरित मानस अथवा रामायण पद्य में मिलता है जिसे नई पीढ़ी के बच्चे ठीक से पूरी तरह नहीं समझ पाते हैं, इस समस्या का समाधान करते हुए गद्य में ''श्रीराम महिमा'' पुस्तक का प्रकाशन किया गया है। पुस्तक में सामान्य बोलचाल की भाषा में रामायण पढ़ी और समझी जा सकती है। इस पुस्तक के लेखक श्री रघुवीर सहॉय श्रीवास्तव हैं, जिन्होंने सेवानिवृत्ति के बाद अपने लेखन के शौक को पूरा करने के लिए पहले हाथ से पूरी रामायण लिखी और फिर उसे प्रकाशित कराया। इस नेक कार्य में उनकी पत्नी श्रीमती राधा श्रीवास्तव ने भी पूरा सहयोग प्रदान किया। पति-पत्नी ने मिलकर यह पुस्तक तैयार की।
कई बार देखा गया कि अंग्रेजी माध्यम के बच्चों की कमजोर हिन्दी के कारण वे तुकबंदी में लिखी गई धार्…

श्यामबाबू की 2 लघुकथाएँ - चिंता, उपहार

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चिंताअश्विनी की मां का बुखार जब शहर के डॉक्टर ठीक न कर सके तो उन्हें दिल्ली के बड़े अस्पताल में भर्ती कराया गया। तमाम चैक अप, इन्वेस्टिगेशन और ब्लड रिपोर्टस् के पश्चात डाक्टरों के पैनल ने अश्विनी को अपने चैम्बर में बुलाया। 'मिस्टर अश्विनी आपकी मां को ब्लड कैंसर कन्फर्म हुआ है। मेडिकल लैंग्वेज में इसे ए पी एम एल एम फाइव कहा जाता है। शुरूआत के 15 दिन रोगी के लिए बेहद खतरनाक होते हैं। अचानक शरीर की नसों से रक्त स्त्राव हो सकता है। मोशन यूरीन के साथ भी खून निकलने की संभावनाएं होती हैं। बॉडी के किसी भी पार्ट से ब्लास्ट होकर ब्लड का निकलना तब तक जारी रहेगा.......। देखने में पेशेन्ट नार्मल रहेगा। प्लेटलेट्स डाउन होते ही तेज बुखार और.......।''आई मीन ऐट एनी टाईम एनी थिंग मे हेपेन....।'विश्वास कैसे होता। सब कुछ घूम रहा था। अभी पंद्रह दिन भी तो नहीं बीते थे। अम्मा के मोतियाबिंद का सफल ऑपरेशन करवाकर वह दीपावली की छुट्टियों में घर आया था। जब से नौकरी की थी दीपावली में घर आना निश्चित था। कोई साल अन्झा न गया था। दूज के दिन वापस गया तो मां को कुछ बुखार था, सामान्य समझकर छुट्टियां न बढ़ा…

शब्द संधान / गुंडा / डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

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आजकल राजनीति में अपशब्द और गाली-गलौज एक फैशन की तरह चलन में आ गया है। पात्र और प्रकरण कोई भी हो, आव देखा न ताव, बस जड़ दी कोई एक मोटी सी गाली। बाद में वही गाली चर्चा का एक विषय बन जाती है। क्या सचमुच उसे गाली कहा जा सकता है ? वह गाली है भी या नहीं। क्या वह पूरी तरह से नकारात्मक है ? क्या उसका कोई सकारात्मक पहलू नहीं है ? बुद्धिजीवी ऐसी चर्चाओं में खूब रस लेते हैं। बाल की खाल निकालते हैं।‘गुंडा’ भी एक गाली है। इसे आजकल किसी के ऊपर भी बड़ी सहजता से चस्पां कर दिया जाता है। और तो और हमारे आर्मी चीफ, जनरल रावत, तक को “सड़क का गुंडा” बता दिया गया। बेनी प्रसाद वर्मा ने मोदी जी के प्रधान-मंत्री बनने से पहले उन्हें आर एस एस के “सबसे बड़े गुंडे” कहकर सम्मानित (?) किया था।अजब नहीं तुक्का जो तीर हो जाए / दूध फट जाए कभी तो पनीर हो जाए मवालियों को न देखा करो हिकारत से / न जाने कौन सा गुंडा वजीर हो जाए .. पुलिस को तो “वर्दी वाला गुंडा” कहना आम बात है। छोटे-मोटे अपराधी गली-छाप गुंडे कहलाते हैं। कुछ टेक्स सरकार लगाती है, कुछ गुंडे वसूल करते हैं। इसे ‘गुंडा-टेक्स’ कहा जाता है। गुंडों से बचने के लिए हमारे य…

वृक्षों पर कहर का असर / कहानी / सर्वेश कुमार मारुत

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एक घना जंगल था। जंगल में अनेक तरह के पेड़-पौधे जीव जन्तु रहते थे। उन्हीं में बोलने वाले तीन वृक्ष रहते थे। तीन वृक्ष आपस में बात कर रहे थे।पहला पेड़ :- आज इंसान कितना स्वार्थी हो गया है ,वह हम सभी को काटता जा रहा है ।दूसरा पेड़ :- हाँ भई , हम इन्हें इनकी आवश्यकता की हर चीज़ देते हैं फ़िर भी नहीं मान रहे हैं।तीसरा पेड़ :- हाँ ,भई आख़िर हम इनसे लेते ही क्या हैं? बल्कि उल्टा हम इनको देते ही हैं।पहला वृक्ष :- अब देखो हमारी बारी कब आ जाए ।   (जंगल में अचानक आवाज़ आती सुनाई दी)दूसरा वृक्ष:-  भैया लगता है कोई आ रहा है, शायद इंसान- उन्सान आ रहा होगा ।तीसरा वृक्ष:-  भैया, आज तो हमारी हड्डियां -पसलियाँ तोड़ी जाएंगी; अब हमें कौन बचाएगा?तीनों वृक्ष :- अलविदा ,मेरे दोस्तों यह हमारा अंतिम समय है (तीन लकड़हारा जंगल में जाते हैं ) यह लो भाई जंगल आ गया। चलो अब कोई अच्छा सा वृक्ष ढूंढते हैं । मालिक ने कहा है कि आज काम पूरा निबटाना है। चलो ठीक है, चलो देखते हैं।पहला लकड़हारा:- यह रहा मेरा पेड़ ।दूसरा लकड़हारा:- अरे! पीछे हटो, इसे पहले मैंने देखा था।पहला लकड़हारा:- नहीं! इसे पहले मैंने देखा था।दूसरा लकड़हारा:- नहीं! प…

सुशील शर्मा की कविताएँ, गीत, दोहे, हाइकु

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एक थी आस्था
जो बहुत प्यारी थी।
सबकी दुलारी थी।
बहुत शैतान थी।
करती सबको परेशान थी।
बोलने में बहुत प्यारी।
लगती थी सबसे न्यारी।
सबकी थी मन भावन।
झरती जैसे सावन।
मन के बहुत समीप सी।
दीपावली की दीप सी।
फिर एक अंतराल।
लंबा सूना सा काल।
फिर एक दिन प्रकट हुई आस्था।
निश्छल मुस्कान लिए।
सौंदर्य की शान लिए।
मन मे प्रतिबिंबित।
जीवन आनंदित।
कर्तव्यों के पथ पर।
कर्म से अभिसिंचित।
शुभ्र धवल सौंदर्य सिक्त
पुष्पगन्ध देह युक्त।
सभी संबंधों का निर्वहन।
प्रेमयुक्त संवहन।
स्नेहसिक्त प्रेमयुक्त आस्था
सबकी स्नेहमयी आस्था
श्री राम विवाह
            सुशील शर्माश्री जनक जी बने घराती।
पूरा अवध बना है बाराती।चारों भाई बने हैं दूल्हे।
सबके नुते हैं चूल्हे।जनक जी करें अगवानी।
सुन्दर सजी राजधानी।चारों बहनें बनी है बन्नी।
दावत में बनी है सिन्नी।जनकपुरी में मचो है हल्ला।
दूल्हा बन के आये राम लल्ला।समधी गले मिल रहे हैं।
खुशी से सब खिल रहे हैं।सीता मैया को हल्दी चढ़ी है।
शुभलग्न में भाँवर पड़ी है।अब आयी विदा की बेला।
बहा देखो आंसुओं का रेला।रो रही है मैया प्यारी।
रोवें चारों जनक दुलारी।बेटियाँ जनक जी तुम्हारी।
बहु नहीं …

पुस्तक समीक्षा- पुस्तक- कुर्सी बिन सब सून

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पुस्तक समीक्षा- पुस्तक- कुर्सी बिन सब सून , व्यंग्यकार- डॉ0गोपाल बाबू शर्मा , पृष्ठ-64, मूल्य-70रु प्रकाशन वर्ष-2013ई0 समीक्षक- डॉ.दिनेश पाठक'शशि'निरन्तर गिरते जा रहे सामाजिक मूल्यों तथा बढ़ती महत्वाकांक्षाओं के इस दौर में व्यंग्य लेखन एक चुनौती से कम नहीं। व्यंग्य स्वयं नहीं जन्मता बल्कि विरोधाभासों का तांडव, व्यंग्य को जन्म देता है। व्यंग्यकार के मन में किसी व्यक्ति की भावनाओं को आहत करने का विचार नहीं होता किन्तु सामाजिक बुराइयों पर भरपूर चोट करने की छटपटाहट उस लेखन को प्रेरित करती है ऐसे में अभिधा व लक्षणा से बात नहीं बनती तो वह व्यंजना का सहारा लेता है। ़व्यंग्य विधा की मुख्य विशेषता, परोक्ष रूप से मीठी मार के द्वारा समाज को सजगता प्रदान करना होता है जिसका निर्वाह व्यंग्यकार को चुनौतीपूर्ण होता है। हिन्दी साहित्य में व्यंग्य लेखन की एक सुदीर्घ परम्परा रही है। भारतेन्दु काल से ही हास्य-व्यंग्य की रचनाएँ होने लगी थीं। द्विवेदी काल में व्यंग्यपूर्ण लेखों की परम्परा का खूब विकास हुआ जो उत्तरोत्तर उन्नयन की ओर बढ़ते हुए आज पूर्ण विकास कर चुका है। आज का व्यंग्यकार समाज में व्याप्…

योग से जुड़ रही है दुनिया -संजय द्विवेदी

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विश्व योग दिवस 21 जून पर विशेष  भारतीय ज्ञान परंपरा में योग एक अद्भुत अनुभव है। योग भारतीय ज्ञान का एक ऐसा वरदान है, जिससे मनुष्य की चेतना को वैश्विक चेतना से जुड़ने का अवसर मिलता है। वह स्वयं को जानता है और अपने परिवेश के साथ एकाकार होता है। विश्व योग दिवस, 21 जून के बहाने भारत को विश्व से जुड़ने और अपनी एक पहचान का मौका मिला है। दुनिया के तमाम देश जब योग के बहाने भारत के साथ जुड़ते हैं तो उन्हें भारतबोध होता है, वे एक ऐसी संस्कृति के प्रति आकर्षित होते हैं जो वैश्विक शांति और सद्भाव की प्रचारक है।   योग दरअसल भारत की शान है, योग करते हुए  हम सिर्फ स्वास्थ्य का विचार नहीं करते बल्कि मन का भी विचार करते हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ ने विश्व योग दिवस को मान्यता देकर भारत के एक अद्भुत ज्ञान का लोकव्यापीकरण और अंतराष्ट्रीयकरण करने में बड़ी भूमिका निभाई है। इसके लिए 21 जून का चयन इसलिए किया गया क्योंकि इस दिन सबसे बड़ा दिन होता है। योग  कोई धार्मिक कर्मकाण्ड नहीं है यह मन और जीवन को स्वस्थ रखने का विज्ञान है। यह पूर्णतः वैज्ञानिक पद्धति है जिससे व्यक्ति की जीवंतता बनी रहती है। भारत सरकार के प…

प्रदेश के प्रथम योग गुरु : गजानंद प्रसाद देवांगन

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21 जून योग दिवस पर विशेष                                        योग केवल शारीरिक क्रिया नहीं है । यह सिर्फ अंगों को नहीं बल्कि मन को भी साधने की एक प्रक्रिया है । योग का व्यावहारिक और परमार्थिक अर्थ है – स्वार्थ का परमार्थ से , मैं का तू से , व्यष्टि का समष्टि से , अहम का परम से , इड़ा का पिंगला से , शक्ति  का शिव से , विज्ञान का धर्म से और आत्मा का परमात्मा से मिलना । अर्थात एक - दूसरे को आपस में जोड़ते हुये परमात्मा तक जोड़ को सुदृढ़ बनाने की क्रिया योग है – यह कथन है प्रदेश के प्रथम योग गुरु स्व.श्री गजानंद प्रसाद देवांगन जी का ।                     स्वामी धीरेंद्र ब्रह्मचारी के विश्वायतन योगाश्रम से सन 1971 में योग में डिप्लोमा प्राप्त श्री देवांगन जी  , छत्तीसगढ़ साहित्य का एक जाना पहचाना नाम है  । 1972-1973 से अध्यापनरत स्कूल में , योग की विधिवत शिक्षा देने वाले प्रथम योग गुरु के योगदान को  , प्रत्येक वर्ष मनाये जा रहे अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस 21 जून को स्मरण किया जाना समीचीन होगा , साथ ही  प्रदेश वासियों को बताना और जताना  , उतना जरूरी कि , वर्तमान युग का पहला प्रादेशिक योग गुरु बाहर…

"सतनाम संस्कृति में योग" / अनिल भतपहरी

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गुरु घासीदास प्रवर्तित सतनाम संस्कृति में योग एक अभिन्न अंग है। या यूं कहें - अनुयायी और साधक सहज कर्म योग में प्रवृत्त रहते हैं।सतनाम सुमरन ध्यान और समाधि यहाँ विशिष्ट संस्कृति है। गुरु घासीदास के पूर्वज मेदनीराय गोसाई संत प्रवृत्ति के थे। वे गिरौदपुरी परिछेत्र में ख्याति नाम नाडी वैद्य रहे। मानव के साथ- साथ अवाक पशुओं के चिकित्सा कर उनकी दुख और पीड़ा का शमन करते थे। वे  अपना नित्य कर्म सतनाम सुमरन और सहज ध्यान योग से आरंभ करके कर्मयोग में निरत हो जाया करते थे।मेदनीदास /महगूदास के यहाँ अनेक सिद्ध साधु महात्माओं निरन्तर आगमन होते रहते और मानव कल्याण के साथ साथ जीवन के मुक्ति के संदर्भ में साधु संगत समय समय पर होते रहते।बाल्यावस्था में ही शिशु घासी को विरासत से मानव और पशुओं की पीडा दुख का शमन करने की कला कौशल मिल गये थे। और साधु महात्माओं के दर्शन व सत्संग भी। अनेक सहजयान- ब्रजयान के साथ साथ गोरख पंथी साधुओं का सान्निध्य मिलते रहे हैं।जन्म के तत्क्षण बाद एक साधु का नवजात शिशु का दर्शन करने आना और बालक को गोद में लेकर आंगन में नाचना तथा उनके चरणों में शीश नवाना एक विलक्षण बालक के शुभागम…

“नजरें बदलो नजारे बदल जायेंगे” / पंकज "प्रखर"

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आपकी सोच जीवन बना भी सकती है बिगाड़ भी सकती है सकारात्मक सोच व्यक्ति को उस लक्ष्य तक पहुंचा देती है जिसे वो वास्तव में प्राप्त करना चाहता है लेकिन उसके लिए एक दृढ़ सकारात्मक सोच की आवश्यकता होती है| जब जीवन रुपी सागर में समस्या रूपी लहरें हमें डराने का प्रयत्न तो हमें सकारात्मकता का चप्पू दृढ़ निश्चय के साथ उठाना चाहिए | यदि आप ऐसा करते है तो निश्चित रूप से मानकर चलिए आप की नैया किनारे लग ही जाएगी | लेकिन ये निर्भर करता है की उस समय समस्या के प्रति आपका दृष्टिकोण क्या है ,आप उन परिस्थितियों पर हावी होते है या परिस्थितियाँ आप पर  दो पंक्तियाँ याद आती है नजरें बदली तो नजारे बदले ,कश्ती ने बदला रुख तो किनारे बदले| सोच का बदलना जीवन का बदलना है जी हाँ आप जब चाहे अपने जीवन को बदल सकते है|समाज में कई बार देखने को मिलता है की एक व्यक्ति जो पूरी मेहनत से काम करता है वो उस व्यक्ति से पीछे रह जाता है जो कम समय में मेहनत करता है और अधिक सफल दिखता है| यह प्रायः: विद्यार्थियों के साथ भी देखा जाता है कम मेहनत करने वाला  छात्र ज्यादा अंक अर्जित करने में सफल होता है| जबकि पूरे वर्ष लगन से पढ़ने वाला छात्…

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रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

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