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विश्व में विकास की अंधी दौड़ से प्रकृति बढ़ रही विनाश की ओर / ब्रह्मानंद राजपूत

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विश्व में विकास की अंधी दौड़ से प्रकृति बढ़ रही विनाश की ओर (विश्व पर्यावरण दिवस 05 जून 2017 पर विशेष) हर साल पूरे विश्व में पांच जून को पर्या...

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विश्व में विकास की अंधी दौड़ से प्रकृति बढ़ रही विनाश की ओर (विश्व पर्यावरण दिवस 05 जून 2017 पर विशेष)

हर साल पूरे विश्व में पांच जून को पर्यावरण दिवस के रूप में मनाया जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित यह दिवस पर्यावरण के प्रति अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर राजनैतिक और सामाजिक जागृति लाने के लिए मनाया जाता है। जब से इस दिवस को सिर्फ मनाया जा रहा है तबसे इसके मनाए जाने को दिखाया या जताया जा रहा है तभी से लगातार पूरे विश्व में पर्यावरण की खुद की सेहत बिगड़ती जा रही है। इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है कि आज जब ये विश्व पर्यावरण दिवस को मनाए जाने की खानापूर्ति की जा रही है। तो प्रकृति भी पिछले कुछ दिनों से धरती के अलग अलग भूभाग पर, कहीं ज्वालामुखी फटने के रूप में, तो कहीं सुनामी, कहीं भूकंप और कहीं ऐसे ही किसी प्रलय के रूप में इस बात का इशारा भी कर रही है कि अब विश्व समाज को इन पर्यावरण दिवस को मनाए जाने जैसे दिखावे से आगे बढ़ कर कुछ सार्थक करना होगा। विश्व के बड़े-बड़े विकसित देश और उनका विकसित समाज जहां प्रकृति के हर संताप से दूर इसके प्रति घोर संवेदनहीन होकर मानव जनित वो तमाम सुविधाएं उठाते हुए स्वार्थी और उपभोगी होकर जीवन बिता रहा है जो पर्यावरण के लिए घातक साबित हो रहे हैं। वहीं विकासशील देश भी विकसित बनने की होड़ में कुछ-कुछ उसी रास्ते पर चलते हुए दिख रहे हैं। जो कि पर्यावरण और धरती के लिए लिए घातक सिद्ध हो रहा है।

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2015 में 30 नवंबर से 12 दिसंबर के बीच फ्रांस के पेरिस में संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन हुआ था। इस सम्मेलन में विश्व के सभी देशों ने हिस्सा लिया था। पेरिस समझौता प्रमुख रूप से वैश्विक तापमान में बढ़ोत्तरी को 2 डिग्री सेल्सियस से नीचे रखने से जुड़ा हुआ है। पेरिस समझौता दुनिया के सभी देशों को वैश्विक तापमान में बढ़ोत्तरी को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने की कोशिश करने के लिए भी कहता है। पेरिस समझौते को दुनिया के करीब 55 फीसदी कार्बन उत्सर्जन करने वाले देशों को मानना है। पेरिस संधि पर शुरूआत में ही 177 सदस्यों ने हस्ताक्षर कर दिये थे और अक्टूबर 2016 तक इस समझौते पर अमेरिका, चीन और भारत सहित विश्व के 191 देश हस्ताक्षर कर चुके हैं। यानी विश्व के अधिकांश देश ग्लोबल वार्मिंग पर काबू पाने के लिये जरूरी तौर-तरीके अपनाने पर राजी हो गए हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार अगर धरती का तापमान 2 डिग्री से ऊपर बढ़ता है तो धरती की जलवायु में बड़ा परिवर्तन हो सकता है। जिसके असर से समुद्र तल की ऊंचाई बढ़ना, बाढ़, जमीन धंसने, सूखा, जंगलों में आग जैसी आपदाएं बढ़ सकती हैं। वैज्ञानिक इसके लिए ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को जिम्मेदार मानते हैं। ये गैस बिजली उत्पादन, गाड़ियाँ, फैक्टरी और बाकी कई वजहों से पैदा होती हैं। चीन दुनिया में सबसे ज्यादा कार्बन उत्सर्जन करने वाला देश है, चीन के बाद दूसरे नंबर पर अमेरिका विश्व में कार्बन का उत्सर्जन करता है, जबकि भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कार्बन उत्सर्जन करने वाला देश है।

अगर विश्व के ज्यादा कार्बन उत्सर्जन करने वाले देश कार्बन उत्सर्जन में आने वाले समय में कटौती करते हैं तो यह विश्व के पर्यावरण और जलवायु के लिए निश्चित ही सुखद होगा। लेकिन अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के नेतृत्व में हुए जलवायु परिवर्तन पर पेरिस समझौते से अमेरिका को अलग करने की घोषणा की है, जो कि निश्चित ही पेरिस समझौते को बहुत बड़ा झटका है। ट्रम्प ने अपने वक्तव्य में कहा है कि पूर्ववर्ती ओबामा प्रशासन के दौरान 191 देशों के साथ किए गए इस समझौते पर फिर से बातचीत करने की जरूरत है। चीन और भारत जैसे देशों को पेरिस समझौते से सबसे ज्यादा फायदा होने की दलील देते हुए ट्रंप ने कहा कि जलवायु परिवर्तन पर समझौता अमेरिका के लिए अनुचित है क्योंकि इससे उद्योगों और रोजगार पर बुरा असर पड़ रहा है। ट्रम्प ने कहा है कि भारत को पेरिस समझौते के तहत अपनी प्रतिबद्धताएं पूरी करने के लिए अरबों डॉलर मिलेंगे और चीन के साथ वह आने वाले कुछ वर्षों में कोयले से संचालित बिजली संयंत्रों को दोगुना कर लेगा और अमेरिका पर वित्तीय बढ़त हासिल कर लेगा। प्रधानमंत्री मोदी ने ट्रम्प के जवाब में रूस में भारत को पर्यावरण हितैषी बताते हुए कहा कि भारत देश प्राचीन काल से ही इस जिम्मेदारी को निभाता आ रहा है। इसके लिए उन्होंने वेदों का उदाहरण दिया। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की मौजूदगी में मोदी ने कहा कि, भारत की सांस्कृतिक विरासत रही है। 5 हजार साल पुराने शास्त्र हमारे यहां मौजूद हैं, जिन्हें वेद के नाम से जाना जाता है। इनमें से एक वेद अथर्ववेद पूरी तरह नेचर को समर्पित है। हम उन आदर्शों को लेकर चल रहे हैं। हम यह मानकर चलते हैं कि प्रकृति का शोषण क्राइम है। यह हमारे चिंतन का हिस्सा है।

हम नेचर के शोषण को स्वीकार नहीं करते हैं। इसलिए हम अपने मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में जीरो डिफेक्ट, जीरो इफेक्ट पर चलता है।  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पेरिस समझौते  का जिक्र करते हुए कहा कि,  आपको जानकर खुशी होगी कि हिंदुस्तान में आज पारंपरिक से ज्यादा रिन्युअल एनर्जी के क्षेत्र में काम हो रहा है। हम पर्यावरण की रक्षा को लेकर एक जिम्मेवारी वाले देश के साथ आगे बढ़ रहे हैं। इसको लेकर हमारा पुराना कमिटमेंट है। जब ग्लोबल वार्मिंग की इतनी चर्चा नहीं थी और पेरिस अग्रीमेंट नहीं हुआ था। वास्तव में अमेरिका का पेरिस समझौते से अपने पैर खींच लेना पर्यावरण के लिए काफी घातक साबित हो सकता है। अगर विश्व के बड़े-बड़े देश पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन को रोकने कि प्रतिबद्धता से पीछे हटेंगे तो यह निश्चित ही भविष्य की पीढ़ियों के लिए खतरनाक साबित होगा। इसलिए जरूरत है कि अमेरिका जैसे बड़े जिम्मेदार देश को पर्यावरण और जलवायु के लिए अपनी प्रतिबद्धता दिखानी चाहिए। अगर पेरिस समझौते जैसे फैसलों पर विश्व के सभी देशों ने मिलकर अभी कदम नहीं उठाया तो इसके गंभीर और दुःखद परिणाम हमारी आने वाली पीढ़ियों को उठाने होंगे।   

अगर बात भारत के वायु प्रदूषण करी जाये तो आज भारत देश के बड़े-बड़े शहरों में अनगिनत जनरेटर धुंआ उगल रहे हैं, वाहनों से निकलने वाली गैस, कारखानों और विद्युत गृह की चिमनियों तथा स्वचालित मोटरगाड़ियों में विभिन्न ईंधनों के पूर्ण और अपूर्ण दहन भी प्रदूषण को बढ़ावा दे रहे हैं, और पर्यावरण की सेहत को नुकसान पहुंचा रहे हैं। लगातार जहरीली गैसों कार्बन डाई ऑक्साइड, कार्बन मोनो ऑक्साइड, नाइट्रोजन आक्साइड, सल्फर डाइआक्साइड और अन्य गैसों सहित एसपीएम, आरपीएम, सीसा, बेंजीन और अन्य खतरनाक जहरीले तत्त्वों का उत्सर्जन लगातार बढ़ रहा है। जो कि मुख्य कारण है वायु प्रदूषण का। कई राज्यों में इस समस्या का कारण किसानों द्वारा फसल जलाना भी है। साथ ही साथ अधिक पटाखों का जलाना भी वायु प्रदूषण को बढ़ावा देता है। आज जरूरत है केंद्र और प्रदेश सरकारों को वायु-प्रदूषण से होने वाले स्वास्थ्य-जोखिम के बारे में जागरूकता बढ़ानी चाहिए। और लोगों को विज्ञापन या अन्य माध्यम से वायु प्रदूषण व अन्य प्रदूषण के बारे में जागरूक किया जाना चाहिए। लेकिन विडंबना है कि इस पर अमल नहीं हो रहा है। सरकार को किसानों को फसलों को न जलाने के लिए जागरूक करना चाहिए। किसानों को फसलों (तूरियों) को जलाने की जगह चारे, खाद बनाने या अन्य प्रयोग के लिए जागरूक करना चाहिए। ज्यादा प्रदूषण करने वाले पटाखों पर भी सरकार को प्रतिबन्ध लगाना चाहिए।  हमारी सरकार को ईधन की गुणवत्ता को बढ़ाकर पॉल्यूशन को काफी हद तक कंट्रोल करने पर जोर देना चाहिए। जिससे उसमें उपलब्ध जरूरी तत्त्वों की मात्रा आवश्यकता से अधिक न हो तथा उत्सर्जन निर्धारित मानक अनुसार रहे। ईंधन से ज्यादा प्रदूषण करने वाले तत्त्वों की कमी कैसे की जाए इस पर भी सरकारों को मिलकर काम करना चाहिए। कम पॉल्यूशन करने वाले ईधन जैसे सीएनजी, एलपीजी इत्यादि का अधिक प्रयोग करने लिए लोगों में जागरूकता बढ़ानी चाहिए।  साथ ही साथ यातायात प्रणाली में सुधर करना चाहिए। आज सरकारों को उत्सर्जन मानकों का भी सुदृढ़ीकरण करने की जरूरत है। अगर लोग साइलेंसर पर केटालिक कनवर्टर लगाएं तो भी वाहन द्वारा होने वाले वायु प्रदूषण को कम किया जा सकता है। सरकार को लोगों को वाहनों का समय पर मेंटीनेंस कराने के लिए जागरूक करना चाहिए। जागरूक लोगों को स्वतः ही अपने वाहनों का मेंटीनेंस करना चाहिए।  जब प्रदूषण स्तर बहुत ज्यादा बढ़ जाता है तो स्वास्थ्य के लिए घातक हो जाता है, और तमाम तरह की स्वास्थ्य समस्याएं जैसे कि फेफड़ों में संक्रमण व आंख, नाक व गले में कई तरह की बीमारियों और ब्लड कैंसर जैसी तमाम घातक बीमारियों को जन्म देता है। अगर क्षेत्र में वायु प्रदूषण मानकों से ज्यादा है तो लोगों को मास्क का इस्तेमाल करना चाहिए। जिससे कि वायु में मिले हुए घातक तत्त्वों और गैसों से काफी हद तक बचा जा सके। आज प्रदूषण को कम करने के लिए हमारी सरकारों को सम-विषम फॉर्मूला के अलावा अन्य कई उपाय करने पड़ेंगे।  सम-विषम फाॅर्मूला में बाइक और सिंगल महिला वाले वाहनों को भी शामिल करना होगा। साथ ही साथ नियमों को सख्ती से लागू करना होगा। अगर लोग देश में निजी वाहनों कि जगह सार्वजनिक वाहनों का प्रयोग करें तो सम-विषम जैसे फॉर्मूले कि जरूरत ही नहीं पड़ेगी और वायु प्रदूषण में भी कमी आएगी, इसके लिए लोगों को खुद सोचना होगा। अगर कोई नियम तोड़ता है तो उस पर जुर्माने का प्रावधान हो। तभी देश में वायु प्रदूषण से निपटा जा सकता है। अगर देश में वायु प्रदूषण से जुड़े हुये कानूनों का सख्ती से पालन हो तो वायु प्रदूषण जैसी समस्या से आसानी से निपटा जा सकता है। इससे पर्यावरण को भी सुरक्षित रखने में भी मदद मिलेगी।

आज यदि धरती के स्वरूप को गौर से देखा जाए तो साफ पता चल जाता है कि आज नदियां , पर्वत, समुद्र, पेड़, और भूमि तक लगातार क्षरण की अवस्था में हैं। और ये भी अब सबको स्पष्ट दिख रहा है कि आज कोई भी देश, कोई भी सरकार, कोई भी समाज इनके लिए उतना गंभीर नहीं है जितने की जरूरत है। बेशक लंदन की टेम्स नदी को साफ करके उसे पुनर्जीवन प्रदान करने जैसे प्रशंसनीय और अनुकरणीय प्रयास भी हो रहे हैं मगर ये ऊंट के मुंह में जीरे के समान हैं। ऐसे अनुकरणीय प्रयास भारत में भी हो सकते हैं जिसके द्वारा भारत की प्रदूषित नदियों को निर्मल और अविरल बनाया जा सकता है। चाहे वो गंगा नदी हो या यमुना नदी इस सबके लिए जरूरी है दृढ़ इच्छा शक्ति की जो कि भारतीय सरकार के साथ-साथ भारत के हर इंसान में होनी चाहिए। भारत में गंगा की स्वच्छता को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जल संसाधन और गंगा संरक्षण मंत्री उमा भारती ने प्रतिबद्धता जतायी है। अब देखना होगा कि नमामि गंगे योजना धरातल पर कब तक उतर पायेगी। हालांकि जल संसाधन और गंगा संरक्षण मंत्री उमा भारती ने गंगा में सुखद परिणाम दिखाने की समयसीमा अक्टूबर 2018 तय की है। अब देखना होगा कि निर्धारित समयसीमा तक गंगा निर्मल हो पाती है या नहीं। आज जलवायु परिवर्तन, वैश्विक तापमान में वृद्धि के कारण पृथ्वी के ऊपर से हरा आवरण लगातार घटता जा रहा है जो पर्यावरणीय असंतुलन को जन्म दे रहा है। पर्यावरणीय संतुलन के लिए वनों का संरक्षण और नदियों का विकास अत्यंत महत्वपूर्ण है।

अब समय आ गया है कि धरती को बचाने की मुहिम को इंसान को बचाने के मिशन के रूप में बदलना होगा क्योंकि मनुष्य और पर्यावरण का परस्पर गहरा संबंध है। पर्यावरण यदि प्रदूषित हुआ, तो इसका प्रभाव मनुष्य पर पड़ेगा और मनुष्य का स्वास्थ्य बिगड़ेगा और जनस्वास्थ्य को शत-प्रतिशत उपलब्ध कर सकना किसी भी प्रकार संभव न हो सकेगा।  सभी जानते हैं कि इंसान बड़े बड़े पर्वत नहीं खड़े कर सकता, बेशक चाह कर भी नए साफ समुद्र नहीं बनाए जा सकते और, किंतु ये प्रयास तो किया ही जा सकता है कि इन्हें दोबारा से जीवन प्रदान करने के लिए संजीदगी से प्रयास किया जाए। भारत में तो हाल और भी बुरा है। जिस देश को प्रकृति ने अपने हर अनमोल रत्न, पेड़, जंगल, धूप, बारिश, नदी, पहाड़, उर्वर मिट्टी से नवाजा हो, और उसको मुकुट के सामान हिमालय पर्वत दिया हो और हार के समान गंगा, यमुना, नर्मदा जैसी नदियाँ दी हों यदि वो भी इसका महत्व न समझते हुए इसके नाश में लीन हो जाए तो इससे अधिक अफसोस की बात और क्या हो सकती है। आज ये सब पर्यावरणीय समस्याएं विश्व के सामने मुंह बाए खड़ी हैं। विकास की अंधी दौड़ के पीछे मानव प्रकृति का नाश करने लगा है। सब कुछ पाने की लालसा में वह प्रकृति के नियमों को तोड़ने लगा है। प्रकृति तभी तक साथ देती है, जब तक उसके नियमों के मुताबिक उससे लिया जाए। इसके लिए सबसे सरल उपाय है कि पूरी धरती को हरा भरा कर दिया जाए। इतनी अधिक मात्रा में धरती पर पेड़ों को लगाया जाए कि धरती पर इंसान द्वारा किया जा रहा सारा विष वमन वे वृक्ष अपने भीतर सोख सकें और पर्यावरण को भी सबल बनने के ऊर्जा प्रदान कर सकें । क्या अच्छा हो यदि कुछ छोटे छोटे कदम उठा कर लोगों को धरती के प्रति, पेड़ पौधे लगाने के लिए प्रोत्साहित किया जाए। बड़े बड़े सम्मेलनों , आशावादी समझौतों आदि से अच्छा तो ये होगा कि इन उपायों पर काम किया जाए। लोगों को बताया समझाया और महसूस कराया जाए कि पेड़ बचेंगे, तो धरती बचेगी, धरती बचेगी, तो इंसान बचेगा। सरकार यदि ऐसे कुछ उपाय अपनाए तो परिणाम सुखद आएंगे।

आज विवाह, जन्मदिन, पार्टी और अन्य ऐसे समारोहों पर उपहार स्वरूप पौधों को देने की परंपरा शुरू की जाए। फिर चाहे वो पौधा, तुलसी का हो या गुलाब का, नीम का हो या गेंदे का। इससे कम से कम लोगों में पेड़ पौधों के प्रति एक लगाव की शुरूआत तो होगी। और लोगों में पर्यावरण के प्रति जागरूकता आएगी और ईको फ्रेंडली फैशन की भी शुरूआत होगी। और सभी शिक्षण संस्थानों, स्कूल कालेज आदि में विद्यार्थियों को, उनके प्रोजेक्ट के रूप में विद्यालय प्रांगण में, घर के आसपास, और अन्य परिसरों में पेड पौधों को लगाने का कार्य दिया जाए। यदि इन छोटे छोटे उपायों पर ही संजीदगी से काम किया जाए तो ये निःसंदेह कम से कम उन बड़े-बड़े अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलनों से ज्यादा ही परिणामदायक होगा। और इससे अपने पर्यावरण और अपनी धरती को बचाने की दिशा में एक मजबूत पहल होगी। अब सोचना छोड़िये और खुद से कहिए कि चलो ज्यादा नहीं पर हम एक शुरूआत तो कर सकते हैं। सच पूछें तो पर्यावरण की सुरक्षा के लिए हमें कुछ ज्यादा करना भी नहीं है। सिर्फ एक पहल करनी है यानी खुद को एक मौका देना है। हमारी छोटी-छोटी, समझदारी भरी पहल पर्यावरण को बेहद साफ-सुथरा और तरो-ताजा कर सकती है।

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लेखक

- ब्रह्मानंद राजपूत, दहतोरा, आगरा, (लेखक पर्यावरण प्रेमी और पर्यावरण जागरूक समिति के संयोजक हैं) (Brahmanand Rajput) Dehtora, Agra

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कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,226,लघुकथा,808,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,18,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,306,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,57,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,1882,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र 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रचनाकार: विश्व में विकास की अंधी दौड़ से प्रकृति बढ़ रही विनाश की ओर / ब्रह्मानंद राजपूत
विश्व में विकास की अंधी दौड़ से प्रकृति बढ़ रही विनाश की ओर / ब्रह्मानंद राजपूत
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