मंगलवार, 27 जून 2017

समीक्षा ओम वर्मा : आपके कर कमलों से (व्यंग्य संग्रह)

snip_20170626111253

समीक्षा

ओम वर्मा : आपके कर कमलों से (व्यंग्य संग्रह) / वनिका पब्लिकेशन्स, नई दिल्ली / २०१७ / पृष्ठ, ११२ / मूल्य, रु.१७०/-

सुविचारित और सुसंस्कृत व्यंग्य

डा. सुरेन्द्र वर्मा

मध्य-प्रदेश व्यंग्य लेखन के लिए एक उर्वरा भूमि साबित हुई है | व्यंग्य लेखन के दो दिग्गज – शरद जोशी और हरिशंकर परसाई – मध्य-प्रदेश की ही देन हैं | ज्ञान चतुर्वेदी और हरि जोशी जैसे सुप्रसिद्ध व्यंग्य कार भी इसी धरती से आए हैं | इसके अतिरिक्त भी आज यहाँ के कई अन्य लेखकों ने व्यंग्य के क्षेत्र में अपना नाम रोशन किया है | ओम वर्मा (पूरा नाम, ओमप्रकाश वर्मा) का जन्म विदिशा, म. प्र, में ही हुआ है | और उनकी पहली पुस्तक – “आपके कर कमलों से” - व्यंग्य आलेखों का ही एक संग्रह है |

ओम वर्मा के व्यंग्य-आलेखों के साथ सैर करते समय जो बात सबसे पहले सामने आती है वह यह है कि ये व्यंग्य अत्यंत सुविचारित और सुसंस्कृत व्यंग्य हैं | आज व्यंग्य लेखन की एक बाड़ सी आई हुई है, और लगभग हर हिन्दी दैनिक समाचार पत्र में प्राय: फूहड़ और अश्लील, गाली गलौज से भरे हुए, राजनीति के प्रतिदिन के कार्य कलापों से सम्बंधित व्यंग्य कालम देखे जा सकते हैं | और इसके लिए एक सुविधा जनक दलील यह दी जाती है कि वर्तमान में जब राजनीति में ही इतनी कीचड उछाली जा रही हो तो व्यंग्य लेखक स्वयं को भला कैसे बचा कर रख सकता है ! ओम वर्मा को राजनीति से कोई परहेज़ नहीं है, बल्कि उन्हें व्यंग्य लेखन के लिए अधिकतर मसाला राजनीति से ही प्राप्त होता है | लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि उनके व्यंग्य आलेखों में राजनीति में आजकल जो फूहड़ भाषा बोली जा रही है, वह छू तक नहीं गई है | वे अपने शब्दों पर विशेष ध्यान देते हैं और लगभग एक शब्द-शास्त्री के रूप में उनका विश्लेषण करते हैं और तब धीरे से उन्हें व्यंग्य को सौंप देते हैं | यह काम सही अर्थों में एक अत्यंत शिक्षित व्यक्ति ही कर सकता है |

बड़ी हस्तियों के हाथ, हाथ नहीं कहलाते | वे कर-कमल होते हैं | लेकिन कर-कमल समास के दोनों पदों को, जैसा कि ओम वर्मा कहते हैं, हम अलग करके देखें तो पावेंगे कि “देश पर कभी कर हावी था, अब कमल हावी है|” कर-कमल की बात तो अब केवल काव्य में सीमित रह गई है | अब तो ‘कर’ कमल मुक्त सरोवर तथा कमल, भारत माँ की ‘कर-मुक्त’ तस्वीर बनाना चाहता है | लिहाजा दोनों एक दूसरे को उखाड़ फेंकने में जी जान से भिड़े हैं | और तो और, राजनैतिक गलियारों में कई जगह ‘करों’ का ‘कमलीकरण” तक हो चुका है | (आलेख २४)

ओम वर्मा इसी तरह ‘राजनीति’ को भी एक समास बताते हैं, जिसका पहला पद ‘राज’ कुछ गिने-चुने लोग या घराने हथिया चुके हैं | बचा दूसरा पद, ‘नीति’ | इसे कुछेक लोगों ने कुछ ऐसा जकड या पकड़ रखा है कि किसी कीमत पर छोड़ने को तैयार नहीं हैं | वे शायद गांधी या जे पी बनाना चाहते हैं | और शासन को बस तंग करने में जुटे हैं | अत: वर्मा जी कहते हैं कि राजनीति में अब दो तरह के लोग हो गए हैं “एक वे जो सिर्फ राज करना चाहते हैं, नीति चाहे कोई भी हो | और दूसरे वे जो सिर्फ नीति पर चलना चाहते हैं, चाहे राज करने को मिले या न मिले |” (आ, ३४)

एक अन्य आलेख में ओम वर्मा ने अपेक्षित और उपेक्षित में अंतर समझाया है | कहते हैं, “देश और समाज को उनसे बहुत कुछ अपेक्षित है | मगर वे हैं कि देश-सेवा से किनारा किए हुए हैं | इसकी वजह बड़ी सीरिअस हैं | उन्हें मलाल है कि वे आज पूरी तरह से उपेक्षित हैं |” वे आगे कहते हैं कि राजनीति में तो सारा खेल ही अपेक्षा और उपेक्षा के बीच खेला जा रहा है | कई उदीयमान व संभावनाशील नेताओं का राजनैतक करियर अपेक्षा से शुरू होकर उपेक्षा पर आकर ख़त्म हो गया | पर इतना ही नहीं, उन्होंने एक टिप्पणी यह भी की कि बिहार के युवा नेता के मुख से शपथ ग्रहण में मुंह से अपेक्षित की बजाय उपेक्षित निकल गया तो उनपर हंसने, झुंझलाने या तंज कसने की कोई आवश्यकता नहीं है | सही बात है | समरथ को नहिं दोष गुंसाई!

बड़े बड़े विद्वान आज तक कुछ समस्याएँ नहीं सुलझा पाए हैं | जैसे, मुर्गी पहले आई या अंडा? अथवा, गिलास आधा खाली है कि आधा भरा हुआ ? ओम वर्मा बड़ी चतुराई के साथ इन समस्याओं का हल करते हैं | मुर्गी और अंडे की समस्या को वे पुनर्परिभाषित करते हुए कहते हैं कि आज के प्रसंग में समस्या तो वस्तुत: यह है कि किस पक्ष को पहले खत्म किया जाए? – मुर्गी को या अंडे को! अंडे पक्ष वाले मुर्गी को और मुर्गी पक्ष वाले अंडे को खत्म करने की बात करते हैं | पर दोनों को ही यह समझ में क्यों नहीं आता कि अंतत: उदारस्त तो दोनों को ही किया जाना है | और फिर, बड़े शातिराना अंदाज़ से वर्मा जी बताते हैं कि आज ये संसद इसलिए ठप कर रहे है कि कल उन्होंने की थी | या अगली बार सत्ता में ये आ गए तो कल वे करेंगे | ये उनको इसलिए मार रहे हैं कि कल जब उनकी सरकार थी तो उन्होंने इनको मारा था | कल अगर उनके दिन फिर गए तो इनकी खैर नहीं | मरना तो बारी बारी से दोनों को ही है ! पर असली प्रश्न तो यही है कि क्या दोनों में से कोई एक कभी समझदारी दिखा पाएगा? (आ.४३)

आधे खाली और आधे भरे गिलास के लिए तो ओम वर्मा ने पूरी एक जांच कमिटी ही बैठा दी है | क्या करे? नाम लिए बगैर वे कहते हैं कि एक योग-गुरु ने आरोप लगाया है कि पूरे भरे गिलास का आधा पानी विदेशी बैंकों में जमा है और इसे वापस लाकर ही उसे पूरा भरा जा सकता है | तगड़ी फीस लेकर जीवन जीने की कला सिखाने वाले एक अन्य आध्यात्मिक गुरू ने ‘गहन गंभीर’ बात यह बताई की गिलास को खाली मत कहो | उसमे आधा पानी है तो बाक़ी जगह में हवा भी तो है ! समस्या वस्तुत: उलझती ही जा रही थी } और ऐसी समस्याओं से पिंड छुडाने के लिए सरकार जांच कमीशन बैठा देती है | अगर ऐसा कोई जांच कमीशन बैठाया गया तो निश्चित ही वह निम्न बिन्दुओं की जांच करेगा –

(१) गिलास को आधा भरा हुआ कहा जाए या आधा खाली कहा जाए ?

(२) गिलास को पूरा भर देने में फ़ायदा है या बचा हुआ भी ढोल देने में ?

(३) इस गिलास को फिर से भरवा लिया जाए या नया गिलास भरवाया जाए ?

(४) गिलास की सुरक्षा में कहाँ कमी थी ? आयोग सुरक्षा के लिए अपने सुझाव भी दे |

(५) आयोग यह भी पता लगाएगा कि गिलास भरते समय आधा रह गया था या भरे हुए से खाली करते समय अधूरा छूट गया था | (आ १७)

जय हो |

आज का व्यंग्यकार चारों और से इतने विरोधाभासों और विसंगतियों से घिरा हुआ है की वह समझ नी नहीं पा रहा है किस पर लिखे और किसे छोड़ दे | एक अंग्रेज़ी निबंधकार को उद्धृत करते हुए ओम वर्मा कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि विषय बहुत कम हैं, बल्कि दिक्कत यह है कि विषय बहुत ज्यादह हैं | यह दिक्कत बहुत कुछ, बकौल एक अन्य दार्शनिक के, उस गधे की तरह हो गई है जो इसलिए भूखा मर गया था की सामने पडी घास की ढेरियों में से कौन सी पहले खाए, यह फैसला नहीं कर पाया | (आ. २१) लेकिन ओम वर्मा हार मानने वालों में से नहीं हैं | उन्होंने एक अच्छी तरकीब ढूँढ़ निकाली है | वे विरोधाभासी और विसंगत स्थितियों पर अलग अलग व्यंग्य न लिखकर अनेकों को एक ही आलेख में, उनपर कटाक्ष करते हुए, समेट लेते हैं | उनके “पास्ट परफेक्ट टेन्स का फेर” और “जो जहां होने थे” इसी प्रकार के आलेख हैं |

मुझे याद है कि हमें भी अपने स्कूल में अंग्रेज़ी की कक्षा में पास्ट परफेक्ट टेन्स क्या होता है, बताया गया था | उन दिनों अंग्रेज़ी की ग्रामर पर बड़ा ध्यान दिया जाता है | समझें न समझें बात अलग है | मैंने भी इस टेन्स के कुछ उदाहरण रट लिए थे | ओम वर्मा खुश किस्मत हैं कि उन्हें अपने अंग्रेज़ी अध्यापक के बताए कुछ उदाहरण याद रह गए और उन्होंने उनका व्यंग्यात्मक इस्तेमाल अपने पास्ट परफेक टेन्स वाले आलेख में करके अन्य तमाम और उदाहरण भी उसमें जोड़ दिए जिनपर वे चाहते तो स्वतन्त्र व्यंग्य आलेख तक लिख सकते थे | कुछ उदाहरणों पर गौर करें | हर उदाहरण व्यंग्य का नायाब नमूना है | “पुलिस के आने से पहले चोर भाग चुका था |” “कन्या पक्ष के यहाँ बरात के पहुँचाने के पूर्व दुल्हन अपने प्रेमी के संग भाग चुकी थी |” “इससे पहले कि बी जे पी जम्मू कश्मीर में सरकार से समर्थन वापसी पर विचार करती, वे खौफनाक आतंकी को रिहा कर चुके थे |” “ नोटबंदी के बाद गुलाबी नोट की शक्ल में लक्ष्मी साहूकारों की तिजोरियों में कैद हो चुकी थी |” कहाँ तक गिनाएं, ऐसे ४०-५० पास्ट परफेक्ट टेन्स के व्यंग्य-वाक्य आपको इस आलेख में एक साथ मिल सकते हैं | सारे समाज को टेन्स करने के लिए ये काफी होने चाहिए | (आ.०२)

लेखक की मनोवैज्ञानिक सूझ-बूझ देखिए | हर असंतुष्ट की उसने सही ‘रग’ पकड़ ली है | “जो जहां होने थे” वे वहां नहीं हैं | “किसे कहाँ होना था और वो कहाँ है |” बड़ी गड्ड-बड्ड वाली स्थिति है | ऐसी स्थितियों के भी ओम वर्मा जी ने बीसियों उदाहरण दे दिए हैं | और हर उदाहरण एक कटाक्ष है | साहित्य और पत्रिकारिता के ही क्षेत्र को ले लें | कौन पत्रकार है और कौन साहित्यकार, पता ही नहीं चलता | जिन्होंने राजनीतिशास्त्र में प्रथम श्रेणी में एम ए किया है वे राजनीति के शिकार हो रहे हैं और राजनीतिज्ञों को मलाल है कि उन्होंने राजनीति शास्त्र नहीं पढ़ा | डाक्टर चूना लगाते हैं, और पान बेचने वाले मुंह के छालों के लिए मुफ्त दवा तजबीज़ करते है | अटल जी के लिए तो अक्सर कहा ही जाता था कि सही व्यक्ति गलत जगह पर है | ओम वर्मा को पूरा विश्वास है कि पूर्व चुनाव आयुक्त शेषन यदि सर्कस के रिंग मास्टर होते तो भी वे उतने ही प्रसिद्ध होते | शेषन जी तो खुद ही यह कहने में नहीं झिझकते थे कि वे शेषन नहीं अल्सेशन हैं ! (आ.०३)

पत्रकार को जब समाचार नहीं मिलता तो वह बॉडी-लैंगुएज (शारीरिक हाव-भाव) पर ध्यान देता है | लेकिन क्या यह इतना आसान है ? कई लोग “अन्दर से कुछ और बाहर से कुछ और नज़र आते हैं |” कुछ हैं कि बड़ा से बड़ा ज़ख्म छिपाकर भी जोकर की तरह हंसते मुस्कराते हैं, तो कुछ कवि सुरेन्द्र शर्मा की तरह हंसाने के लिए भी मनहूसियत ओढ़ लेते हैं | आखिर अभिनेता ठहरे | पर ओम वर्मा के अनुसार कुछ की बौडी-लैंगुएज किन्हीं समानताओं के कारण आसानी से पड़ी जा सकती है | वे उदाहरण देते हैं, गौर फरमाइए, कि व्यंग्य में संवेदनशीलता का निर्वाह कैसे हुआ है | “जवान बेटियों के लिए विवाह की मंडी में ‘योग्य-वर’ ढूँढ़ते बाप और नौकरी की तलाश में चप्पलें घिसते युवा की बौडी-लेंगुएज एक सी होती है |” “कवि, पागल और प्रेमियों की बौडी-लैगुएज में भी समानता देखी जा सकती है |” नवजात बच्चे की बौडी-लैंगुएज को माँ से बेहतर कौन जान सकता है ?” (आ.४२) क्या आप ऐसा कोई इंसान तलाश कर सकते हैं जो एक साथ कायर भी हो तथा चतुर और बहादुर भी | बीरबल के मार्फ़त ऐसा ही एक शख्स तलाश किया जा चुका है | जी हाँ, ‘असंतुष्ट; एक ऐसा ही शख्स है | यह अपने ही दल के मुख्य मंत्री के खिलाफ सरे आम बगावत कर चुका है इसलिए हम उसे बहादुर कह सकते है | यही शख्स आला कमान की झिड़की सुनकर तुरंत ही मुख्यमंत्री के प्रति बफादारी का बयान जारी भी कर चुका है – यह इसकी कायरता है और रहा सवाल चतुराई का तो हुजूर, जब से यह शख्स राजनीति में आया है, चाहे किसी की भी सरकार बनी हो, सदा खिले रहने वाले किसी बारहमासी फूल की तरह तरह सदा कुरसी पर लाभ के पद पर विराजित रहता आया है | चतुराई का इससे बड़ा प्रमाण और क्या हो सकता ई ? (आ.१५)

ओम वर्मा की शैक्षणिक पृष्ठभूमि बड़ी उत्साहवर्धक है | उनके पिताश्री एक सेवानिवृत्त शिक्षक हैं | वे स्वयं विज्ञान के परास्नातक होने के साथ साथ अंग्रेज़ी साहित्य में भी एम ए हैं | हिन्दी उनकी मातृभाषा है और कि जिससे उन्हें नैसर्गिक प्रेम है | वे हिन्दी साहित्य के पाठक होने के साथ साथ,व्यंग्य आलेखों के अलावा दोहे और गज़लें भी लिखते हैं | विलास गुप्ते की एक नाट्य-कृति (१९८४) का शीर्षक था, “आपके कर कमलों से” | संभवत: वर्माजी ने भी अपने इस व्यंग्य-संग्रह का शीर्षक वहीं से लिया होगा | इस संग्रह में आपको तमाम लेखक और अपने अपने क्षेत्र के दिग्गज टहलते हुए मिल जाएंगे | कहीं प्रसिद्ध अंग्रेज़ी निबंधकार फ्रांसिस बेकन, कहीं एजी गार्डिनर तो कहीं टीएस ईलियट से आपकी मुलाक़ात हो जाएगी | नील आर्मस्ट्रांग चंद्रमा पर पाई जाने वाली ख़ाक हाथ में लिए आपको धरती पर दिखाई दे जाएंगे | इन आलेखों में आप आसानी से जार्ज बर्नार्ड शा और एनीबिसेंट का विवाह जो नहीं हो पाया का सन्दर्भ खोज निकालेंगे | भारतीय साहित्यकारों में महादेवी वर्मा, धूमिल, कमलेश्वर, बच्चन, माखनलाल चतुर्वेदी, रघुवीर सहाय, इत्यादि, भी विचरते हुए दिखाई दे सकते हैं |

ओम वर्मा का यह पहला व्यंग्य संग्रह है | यह एक सुशिक्षित व्यक्ति की सुसंस्कृत कृति है | वर्मा जी के व्यंग्य आलेखों में न तो कटुता का समावेश है न हास्य का | वे केवल व्यंग्य स्थितियों को वाणी देते हैं और उनके पीछे छिपे व्यंग्य को पाठक के हवाले कर देते हैं | वर्मा जी के व्यंग्य-पाठकों से यह अपेक्षा की जानी चाहिए कि वह स्वयं भी सुशिक्षित और सुसंस्कृत हो, अन्यथा व्यंग्य उनकी पकड़ से छूट सकता है | मैं ओम वर्मा के इस व्यंग्य संग्रह में एक महान व्यंग्यकार के “चीकने-पात” देखता हूँ |

- डा. सुरेन्द्र वर्मा (मो. ९६२१२२२७७८)

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड

इलाहाबाद – २११००१

1 blogger-facebook:

  1. शुक्रिया डॉ सुरेंद्र वर्मा जी, शुक्रिया रवि रतलामी जी !

    उत्तर देंहटाएं

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------