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शब्द संधान (व्यंग्य) / तड़ी का खेल / डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

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याद करता हूँ तो अब हंसी आती है। बचपन में, बल्कि कालेज के दिनों तक तड़ी वाले कितने ही खेल खेलता था। क्लास में हाज़री देकर चुपके से तड़ी लगा जाता था। अंग्रेज़ी की क्लास में तो बहुत ही बोर होता था। तीन दिन से सर, पास्ट परफेक्ट टेन्स, पढ़ा रहे थे। किसी के समझ में नहीं आया कि आखिर यह है क्या बला ! एक सामान्य सहमति बनी कि आज सर की क्लास से में कोई जाएगा ही नहीं। ‘जीटी’ मार दी गई। जीटी, समझ ही गए होंगें, यानी ‘जनरल तड़ी’। कोई क्लास में नहीं गया। और मैदान में सब तड़ी खेलने लगे, अरे वही, खेल जिसमें लड़के एक दूसरे को गेंद मारते हैं ! बड़ा मज़ा आया था। मज़ा तो क्लास में अगर कोई लड़का अपना कोई पेन या परकाल आदि भूल जाता था तो उसे भी तड़ी करने में खूब आता था। क्या दिन थे वे ! बस ध्यान इतना भर रखना पड़ता था की कहीं तड़ी करते हुए पकड़ न लिए जाएं।

तड़ी भी अपने क्या क्या करतब दिखाती है ! तड़ी मारी जाती है। तड़ी लगाई जाती है। तड़ी खेली जाती है। तड़ी कर दी जाती है। इनमें (किसी चीज़ को) तड़ी कर देना सबसे खतरनाक खेल होता है। पकड़े गए तो तड़ातड़ थप्पड़ पड़ते थे। तड़ी में तड़ाक है। तड़ाक वह आवाज़ है जो गाल पर चांटा पड़ने पर आती है। थप्पड तड़ से पड़ता है। जैसे कांच का गिलास तड़ से टूट जाए। या तड़क जाए।

बादल गरजते हैं और बिजली तड़कती है। आकाशीय विद्युत् को संस्कृत में ‘तड़ित्’ कहते हैं। विद्युत् की यह चमक अप्रत्याशित होती है। इस कौंध में तेज़ आवाज़ भी होती है। तड़ी शब्द ठेठ हिन्दी का शब्द है लेकिन अगर आप खोज पर उतारू ही हैं तो संभावना इसी की है कि “तड़ी” की व्युत्पत्ति संस्कृत के ‘तड़ित्’ से ही हुई होगी। तड़ी भी सदैव अप्रत्याशित ही होती है और उसमें भी एक ‘चमक’ और ‘आवाज़’ होती है। आपका क्लास रूम से गायब हो जाना अप्रत्याशित होता है। तड़ी के खेल में जब आपकी पीठ पर गेंद पड़ती है तो अचानक ही तड़ से पड़ती है और आवाज़ भी करती है। ‘तड़’ और ‘तड़ी’ ये दोनों ही शब्द संस्कृत के ‘तड़ित्” की ही संतानें हैं। कम से कम मुझे तो ऐसा ही प्रतीत होता है !

किसी भी चीज़ को आँख बचाकर तड़ी कर देना, वस्तुत: उसे चुरा लेना ही है। चुराने के इस काम को तड़ी-विद्या कहा जा सकता है। बड़े बड़े लेखक, साहित्यकार, कलाकार इस विद्या में माहिर देखे गए हैं। बस थोड़ा सा हेर-फेर करके, राम नाम जपते हुए वे दूसरे के मार को अपना बना लेते हैं। पकड़े जाएं तो भी साफ़ बच जाते हैं। जो भी मिलता-जुलता है, ज़ाहिर है, वह वही नहीं होता। लेकिन इस कलाकारी में दक्षता ज़रूरी है। माल अगर ज्यों का त्यों तड़ी कर लिया तो खैर नहीं। पकड़े जाने की पूरी संभावनाएं है। गूगल की आँख से आप बच नहीं सकते।

हिन्दुस्तान के विश्वविद्यालयों में, ख़ास तौर पर हिंदी में, जो शोध-कार्य होता है, उसकी विषय सामग्री अधिकतर दूसरे किताबों से तड़ी कर ली जाती है। कहा भी गया है शोध कार्य में एक किताब से नक़ल मारना चोरी है किन्तु यदि कई किताबों से थोड़ी थोड़ी तड़ी मार ली जाए तो वही शोध कार्य बन जाता है।

शायद ही कोई ऐसी जीवंत भाषा हो जिसने दूसरी भाषाओं के शब्दों को तड़ी करके अपनी भाषा में शामिल न कर लिया हो। हिन्दी ने ही संस्कृत के शब्दों को तो साधिकार तड़ी किया ही है अरबी, फारसी, पश्तो और अंग्रेज़ी के शब्द भी इस धड़ल्ले से अपना लिए हैं की पता ही नहीं चलता की वे हिन्दी के न हों। अब तो स्थिति यहाँ तक पहुँच गई है उन शब्दों के बारे में कोई यदि बताए कि यह हिन्दी का नहीं है तो स्वाभिमानी (?) हिन्दी वाले यह मानने को तैयार ही नहीं होंगे। ‘तड़याने’ का यही कमाल है। जुगाड़-लगाने की तरह तड़ी-मारने में भी हम हिदुस्तानियों ने विशेषज्ञता प्राप्त कर ली है।

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- डा. सुरेन्द्र वर्मा (मो.- ९६२१२२२७७८)

- १०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड / इलाहाबाद -२११००१

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बहुत खूब।तड़ी पार की बात भी बहुत होती है।बधाई।

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