गुरुवार, 1 जून 2017

रमेशराज के शृंगाररस के दोहे


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नैन मिले ऐसे दिखी मुदित कपोलों लाज
खिलें कमल की पाँखुरी धीरे-बेआवाज़ |
 

दियौ निमन्त्रण प्रेम का गोरी ने मुसकाय
और लियौ मुख फिर तुरत घूँघट-बीच छुपाय |
 

भेजा जो खत में उसे मिलने का पैग़ाम
मुख पर अंकित हो गयी सुबह-दोपहर-शाम |
 

मिलत नारि लाजियाय यूं दिखें स्वेद के कोष
ज्यों गुलाब के फूल पर चमक रही हो ओस |
 

नैननु के संकेत पर प्रियतम यूं लजियाय
ज्यों गेंदा के फूल की डाल सखी झुक जाय |  
 

लजियाना कुछ बोलना फिर हो जाना मौन
इसी अदा पर आपकी भला न रीझे कौन |
 

हरजाई की एक से क्या निभती सौगंध
नदी-नदी को पी गये सागर के अनुबंध |
 

वह ऐसे घुल-मिल गयी पल दो पल के बीच
एक बताशा ज्यों घुले झट से जल के बीच |
 

झेल रहा है जबकि मन मंहगाई की मार
मुल्तानी मिटटी लगें तेरे शिष्टाचार |
 

लज्जा से जल-जल भयी गोरी नैन मिलाय
जैसे सिल्ली बर्फ़ की पाकर ताप विलाय |
 

धीरे-धीरे इसतरह उसने त्यागी लाज
छिलका-छिलका उतरती जैसे गीली प्याज |
 

अपने में ही बारहा और सिमटती जाय
हल्के-से स्पर्श पर लाजवान्ति लाजियाय |
 

हिम पिघली लज्जा गयी कुछ बतियाये नैन
सागर के आगोश को हुई नदी बेचैन |
 

हर गीले स्पर्श पर वही एक अंदाज
गोरी के मुख पर दिखे ‘चटकफली’-सी लाज |
 

प्रथम मिलन में थी झिझक क़दम-क़दम लाजियाय
अमरबेल अब विटप से लिपट  खूब हर्षाय |
 
   
इक मासूम सवाल पर , उसका था यह हाल
एक इंच ही जल छुआ , हुआ तरंगित ताल |
  

उस संकोच स्वभाव ने यूं बरसाया मेह
मन तो सूखा रह गया , केवल भीगी देह |
 

अति सिहरन-सी गात में , बात-बात में लाज
बहुत मधुर उर बीच है सुर सहमति का आज |
  

वज्रपात मत कीजिये , ले नैनों की ओट
खड़िया क्या सह पायगी , प्रियवर घन की चोट |
 


खिली धूप के रूप-सा , प्रियवर देता भास
संगति-स्वीकृत सांझ-सी , सहज कहाँ सितप्रास |
  

पढ़े प्रीति की रीति वह बढ़े सुमति-गति और
प्राण देखना चाहते उन्नति में रति और |
 


मृग-सी भटकन में नयन मन में मरु-आनन्द
कस्तूरी बनना हुआ कहाँ हृदय में बंद |
   

अक्सर अंतर में मुखर रहे रात-भर पीर
कभी भोग का योग था , अब वियोग के तीर |
 


फूल बिना हर डाल है , ताल हुआ बेहाल
हरे- भरे सपने मरे , सावन करे कमाल !
 


सुखद समय की लय बना , तुझसे परिचय यार
संदल से पल हों सफल , महके अविरल प्यार |
 

सूख गये मन के सुमन , टूट गया जब सब्र
झिलमिल - झिलमिल दिल सलिल लेकर आये अब्र |
  

तरल-सजल कुछ प्राण हों , जीवन का हल मेह
बादल का जल छल बना , सूखा मन का गेह |
 


कली कोपलें केलि बिन , अब कोयल कूकी न
कलरव के उत्सव गये , मन है पल्लव-हीन |
+ रमेशराज     

 
करती वह छवि गाँव की अब भी मन बेचैन
झट घूँघट पट में गये बेहद नटखट नैन |
 

रैन दर्द का गुणनफल सुख का योग बनै न
नींद नहीं अब नैन में कहाँ चैन में बैन |  
   

झुलसन में मन के सुमन , तपन जलन आबाद
तनिक सलिल मिल जाय तो दिल हो तिल-तिल शाद |
 


दुःख की तीखी धूप में जब गुम हो मुस्कान
ममता की छतरी तुरत माँ देती है तान |
 

कुटिल चाल के खेल में माँ थी बेहद दक्ष
दो बेटों के बीच झट लिया धींग का पक्ष | 
   


यही हमारी ज़िन्दगी , यही मिलन का सार
गुब्बारे के भाग में आलपिनें हर बार |
 

दुविधा , गहन उदासियाँ , आज हमारे पास
हमें मोड़ पर छोडकर भाग गया विश्वास | 
 

ताप सहे लेकिन कहे अली-अली दिन-रात
भली पली मन बेकली जली कली दिन-रात |
 

आँख अश्रुमय आह अति , अंतर और अज़ाब
ख्वाब आब-बिन आजकल , सूखे हुए गुलाब | 
 

पंकज-से मन में चुभन , नयन-बीच तम-रोग
फाग-राग में आग अब , लिखे भाग दुर्योग |
 

टहनी-टहनी पर मुखर वर सुवास-मधुप्रास
फल का पीलापन कहे -मुझ में मधु का वास |  
 


नसल नसल सलगा नसल , नसल नसल ताराज
सुखद-सुखद अब तो विलग अलग-थलग है प्यार |  
 


नसल नसल सलगा नसल , नसल नसल ताराज
चुभन जलन मन में अगन घुटन तपन अंगार |
 

नसल नसल सलगा नसल , नसल नसल ताराज
महंक-महंक मन दे चहक, किशन किशन आवाज़ |
  

सलगा सलगा राजभा नसल नसल ताराज
इस दोहे में री सखी मुखरित यह अंदाज़ |
 

भानस भानस राजभा भानस भानस खेल
या मन में नित राधिका मोहन की रति-रेल |
 

मनमोहन की प्रीति से जुड़े नयन के तार
अब हरि बसते प्राण में गया नयन का प्यार |


सुखद-सुखद जबसे विलग अलग-थलग है प्यार
चुभन जलन मन में अगन, घुटन तपन अंगार |
 

मनमोहन की प्रीति से जुड़े नयन के तार
अब हरि बसते प्राण में , गया नयन का प्यार |  
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रमेशराज, 15/109, ईसानगर, अलीगढ़-202001
मो.-9634551630   

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