शनिवार, 3 जून 2017

मेरा भी सहयोग हो जाए / राजेन्द्र ओझा

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       शहर, नहीं, यह तो राजधानी है। लेकिन इसे राजधानी भी कहा जा सकता है। धुल है, धुआं है, भीड़ है, यातायात का अनादर है, तमाम असामान्य हरकतें है और गंदगी- उसका तो एक तरह से स्थायी निवास है ये शहर, ओह क्षमा, राजधानी ।


       कुछ लोग है जिन्हें ये तस्वीर अच्छी नहीं लगती। वे अपनी क्षमता और सीमा से भी परिचित है । उन्हें अपने श्रोतों की भी जानकारी है और यह भी कि इसे किस हद तक बढाया जा सकता है। इन सबके बाद भी वे लगे हैं कि पुरी तस्वीर न सही एक कोना तो कम से कम बदल जाए इस तरह कि उसे देखकर आंखों को कुछ सुकून मिले।

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        तस्वीर बदलने की इसी प्रक्रिया में वे शहर, हां भाई, अब इसे शहर ही कहूँगा, तब तक जब तक राजधानी के अनुरूप ये बदल न जाये, के एक प्रसिद्ध तालाब की चहारदीवारी पर उद्देश्यपूर्ण स्लोगन और चित्रकारी करने एकत्रित हुए थे।
       उनकी मेहनत को देखो तो लगता नहीं कि इनमें उद्योगपति भी है, व्यापारी भी है, डाक्टर भी है, अधिकारी भी है, उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे विद्यार्थी भी है, महिला- पुरुष- बच्चे- बूढे सब लगे हैं-- एक अभियान में - बदरंग हो चुके शहर को खूबसूरत रंग देने में।


         पहले उन्होंने कचरा साफ किया, नाली भी साफ की। कचरा, गंदगी सब एक तरफ इकट्ठा की। बताया गया पहले तो ऐसा कचरा ये लोग ही ठेले में भरकर दूर फेंका करते थे, अब गनीमत है कि यह काम निगम के सफाई मित्र कर लेते हैं। फिर उन्होंने ने चहारदीवारी पर लगे पोस्टर, विज्ञापन आदि साफ किये। और फिर शुरू हुआ पूरी दीवार को सफेद रंग से रंगने का कार्य।


     यहीं पर इस कथा के नायक का प्रवेश होता है। सुबह का वक्त था और  सड़क पर चहल- पहल प्रारंभ हो चुकी थी। दतौन बुखारी करते और आपस में बतियाते दो लोग वहाँ आकर रूक गये। कुछ देर देखने के बाद एक ने पूछा- इ का करत हो बाबू। ये पूछने वाला था- नरेश साहू। उनमें से एक ने कहा- इस पूरी दीवार पर चित्र बनाने है, कुछ अच्छा- अच्छा लिखना है। रोज मेहनत मजदूरी कर कमाने खाने वाले उन दोनों के चेहरे यूँ तो झुर्रीदार थे लेकिन ऐसा लगा कि इन बातों ने उनकी झुर्रियों को कुछ कम कर दिया। हल्की सी चमक उनके चेहरों पर उतर आयी थी।


नरेश ने पूछा- का लिखबे, का बनाबे। फिर उनमें से   एक ने कहा- शहर को साफ रखो, खुले में शौच मत करो, पानी बचाओ, बेटी पढाओ और ऐसे ही चित्र जो प्रेरणा दें ।


नरेश ने कहा- मैं भी कर हूं । उनको लगा पैसे मिलने की चाह में नरेश ऐसा कह रहा है। उन्होंने कहा- हम लोग ये सब काम अपने शौक से करते हैं, हमको इसका पैसा नहीं मिलता। उन्होंने  सोचा था कि यह सुनकर वे दोनों आगे बढ़ जायेंगे। लेकिन नरेश ने जो कहा वह न केवल अप्रत्याशित था उसकी बात ने उसका कद बहुत ऊंचा कर दिया था। उसके मैले कपड़े एकाएक उजले लगने लगे थे। उसने कहा था- मय पइसा कहां मांगत हउ ददा। मोर बेटी ह गरीबी के मारे पढ़ नई सके। 'बेटी ला पढाओ' अईसने मंय ह लिखहू, अउ ओला पढ़ के कोनो अपन बेटी ला पढाही, त मोला अब्बड खुशी हो ही।


        वे सब अपना काम छोड़कर, नरेश के पास पहुंच गए। नरेश, आज के रियल हीरो, के साथ उन्होंने सेल्फी  ली और खुद के प्रति आभार व्यक्त किया।
        हम में से कितने लोग नरेश है। क्या हम कभी नरेश बन भी  पायेंगे। भूख की लड़ाई तो थी ही, बेटियों के लिए भी लड़ाई लडनी धी ।
नरेश मैदान में उतर चुका था ।


राजेंद्र ओझा

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