सोमवार, 19 जून 2017

कल की एक उम्मीद / कहानी / राजन कुमार

तीर्थराज झाला की कलाकृति

जिंदगी में मुझे तकलीफों का सामना बहुत ही कम करना पड़ा। अब तक मैं यही सोचता था कि मेरा परिवार पहले से ही खुशहाल रहा है। पर आज माँ से उसकी आपबीती सुनकर मैं सन्न रह गया। बात कुछ दिनों पहले की है, किसी विषय को लेकर माँ और पिताजी के बीच कहा-सुनी हो गई थी। मैं पापा के साथ रहता था, इसलिए उनकी बातें सुनकर माँ को फोन पर ही डाँटने लगा, मेरी बातें सुनकर वह सिसकते हुए बोली, “बेटा तुम्हारे पापा ने जो कहा उनकी बातें सुनकर तू भी मुझसे लड़ने-झगड़ने लगा।” पर सुन, ‘आज मैं तुम्हें वह सच्चाई बताने जा रही हूँ, जिससे तू अब तक अनजान है।’

पहले तो मैं थोड़ा घबराया, फिर माँ की बातें गौर से सुनने लगा। माँ ने बताना शुरू किया, ‘बेटा! तुम्हारे पापा ने मेरे दर्द को कभी समझा ही नहीं बल्कि उसने मुझे हमेशा दुःख ही दिए। शादी के बाद से अब तक खुशी मुझे शायद ही नसीब हुई हो। वह दिन मुझे आज भी याद है जब तुम्हारी बड़ी बहन पैदा हुई थी, मैं खुश थी कि मेरे घर लक्ष्मी आई है। पर तुम्हारे पापा और दादी के चेहरे मुरझाए हुए थे, क्योंकि उन्होंने लड़के की उम्मीद जो पाल रखी थी।’

समय यूँ ही गुजरता रहा, फिर दूसरी बेटी का जन्म हुआ। इस बार से तो घरवाले और आक्रामक हो गए। कभी ताने देते तो कभी गालियाँ। क्या करती मैं, सिवाय अपने भाग्य पर आँसू बहाने के? घरवालों को कैसे समझाती कि इसमें मेरा कोई कसूर नहीं। मुसीबतों का पहाड़ तो तब टूटा जब तीसरी संतान भी लड़की के रूप में हो गई। इस बार तो मुझे घर से ही निकाल दिया गया। आश्चर्य इस बात का कि तुम्हारे पिता बिना कुछ बोले सब कुछ देखते रहे। बेटा ! उस समय कल की एक उम्मीद के सिवाय कुछ भी नहीं था मेरे साथ।

मैं तुम्हारी तीनों बहनों को लेकर मायके चली गई। पर माँ-बाप के घर में कितने दिन गुजारती, यही सोचकर मैंने ससुराल वापस आने की ठान ली। माँ-बाप को बिना कुछ कहे ही घर से निकल गई। बस का किराया तक नहीं था मेरे पास। ठेले पर तीनों बेटियों को बिठाकर चिलचिलाती धूप में पच्चीस-तीस किलोमीटर तक चली। रास्ते में जहाँ भी नल दिखता, वहीं रूककर बच्चों को पानी पिलाती, खुद पीती और आगे बढ़ जाती।

शाम होने तक मैं तुम्हारे पिता के घर पहुँच गई, मेरे लिए उनके घर के दरवाजे सदा के लिए बंद थे। मुझे घर में जाने से रोक दिया गया। फिर क्या करती? जबरदस्ती घर के अंदर गई। कई दिनों तक भूखी-प्यासी रही। एक-एक दिन इस उम्मीद में काटने लगी कि शायद हालात सुधर जाए, पर ऐसा हुआ नहीं। तुम्हारे पापा ने कभी मेरा साथ नहीं दिया। पर मैंने भी तय कर लिया था कि कुछ भी हो जाए पर घर नहीं छोड़ूंगी।

समय ने कुछ यूँ करवट लिया। तुम उम्मीद की किरण बनकर मेरी जिंदगी में आए। तीन बेटियों के बाद तुम्हारे आगमन से घर गुलज़ार हो गया। शायद उस दिन तुम्हारी दादी और पिता के दिल में मेरे लिए थोड़ी-सी जगह बन सकी थी।

माँ अपनी राम कहानी सुनाकर फूट-फूटकर रो पड़ी फिर बोली, “बेटा! तुम जब पिता बनना तो  लड़का हो या लड़की उसे ईश्वर की इच्छा समझकर स्वीकार करना, उसे पालना-पोसना, पढ़ा-लिखाकर उसे आत्मनिर्भर बनाना, लड़का-लड़की में भेद करना ईश्वर की इच्छा के खिलाफ है।”

माँ की बातें सुनकर मैं भी रो पड़ा। मुझे मेरी गलती का एहसास हो गया। मैं सोचने लगा कि इतनी तकलीफ सहकर माँ अपने बच्चे को पालती है। एक दिन वही बच्चा बड़ा होकर माँ से सवाल करता है- क्या किया है तूने मेरे लिए और लड़ता-झगड़ता है। न जाने क्या-क्या बोल जाता है माँ को। उन्हीं में से एक अभागा मैं भी हूँ जो बात-बात पर माँ को डाँट दिया करता था। जिसका अफसोस मुझे जिंदगी भर रहेगा।              

इस घटना ने मुझे हिलाकर रख दिया। आखिर कब तक हमारी माँ-बहनें इस निर्मम सोच की शिकार होती रहेंगी? ऐसी मानसिकता से कब मुक्त होंगे हम? सरकार ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का नारा तो जोरों से लगवा रही है। पर इस पर अमल करने वाले कितने लोग हैं? आखिर ऐसे कब तक चलता रहेगा? कब खत्म होगा यह भेद-भाव? महिलाएँ अपने आप को कब महफ़ूज समझेंगी? आखिर कब तक.....? जैसे नारी स्वायत्तता से जुड़े सवाल मेरे मन-मस्तिष्क में देर तक कौंधते रहे। 

राजन कुमार

पत्र व्यवहार का पता-

ग्राम :  केवटसा

पोस्ट : केवटसा, गायघाट

जिला : मुजफ्फरपुर- 847107 (बिहार)

मो. 8792759778, 9771382290

Email- rajankumar.lado143@gmail.com

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