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व्यंग्य- धन्य हैं बाल हठ ! / दीनदयाल शर्मा

समाज में तीन हठ विश्व प्रसिद्ध हैं -राज हठ, तिरिया हठ और बाल हठ। वैसे आज के इस बदलते परिवेश में और भी अनेक हठ शामिल किए जा सकते हैं। मसलन- अफसर हठ, कर्मचारी हठ, दुकानदार हठ, ग्राहक हठ, अतिथि हठ, मेजबान हठ, पड़ोसी हठ, प्रेमी हठ, प्रेमिका हठ, मकान मालिक हठ, किरायेदार हठ, संपादक हठ, लेखक हठ, पाठक हठ आदि-आदि।

इन सभी हठों में बाल हठ सर्वोपरि है। हठ की प्रवृत्ति जन्मजात होती है और यही प्रवृत्ति उम्र के साथ-साथ बढ़ती रहती है। हठ की इस प्रवृत्ति को खत्म तो नहीं किया जा सकता, लेकिन मनोवैज्ञानिक इसे अपने तरीके से कम करने के उपाय जरूर बता सकते हैं।

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‘दिल तो बच्चा है .....’ किसी ने यूं ही थोड़े ही लिखा था। बच्चा यदि हठ कर लेता है तो उसके सामने तिरिया हठ और राज हठ भी पानी भरते हैं। एक बार क्या हुआ कि एक बच्चे ने हठ कर लिया कि उसे पढ़ना ही नहीं है, चाहे कोई कितनी ही कोशिश कर ले। उस बच्चे के अभिभावकों ने लाड़, प्यार, मार, दुलार आदि सभी प्रयास किए, लेकिन बच्चा था कि पढ़ने का नाम ही नहीं लेता। आखिर परेशान होकर अभिभावकों ने अखबार में विज्ञापन दिया कि यदि उसके बच्चे को कोई पढ़ा देगा तो उसे मुंह मांगी राशि दी जाएगी।

विज्ञापन पढ़कर कई ट्यूशनधारी गुरुजी पहुंच गए। एक गुरुजी से पांच हजार रुपये मासिक पर बच्चे की ट्यूशन तय हो गई। लेकिन अभिभावकों ने गुरुजी के सामने यह शर्त रखी कि बच्चे को भले ही किसी तरीके से पढ़ाया जाए लेकिन उसे पढ़ाया जाना चाहिए। गुरुजी बोले, ‘ठीक है, मैं ट्यूशन आज से ही शुरू करता हूं।’ फिर गुरुजी बोले, ‘मैं इसे अपने तरीके पढ़ाऊंगा। आप मेरे द्वारा पढ़ाये गए तरीके पर किसी प्रकार की टिप्पणी नहीं करेंगे!’

दोनों पक्षों की सहमति के बाद बच्चे को बुलाया गया। लगभग आधे घण्टे के अथक प्रयासों के बाद बच्चे को गुरुजी के सामने पेश किया गया। गुरुजी बच्चे के सिर पर बड़े प्यार से हाथ फेरते हुए बोले, ‘बेटा, क्या नाम है आपका?’

‘नहीं बताता।’ बच्चा कंधे उचकाते हुए बोला। तभी बच्चे की मम्मी बोली, ‘ जी, इसका नाम राजकुमार है लेकिन घर पर प्यार से इसे राजू कहते हैं।’

बहुत प्यारा नाम है। हां तो राजू बेटा, पढ़ाई में तुम्हारा मन भी नहीं लगता और मेरा भी मन पढ़ने में नहीं लगता। क्या पढ़ें, कुछ समझ में ही नहीं आता। गुरुजी और मेडमें भी तो प्यार से नहीं पढ़ाती। और फिर कोर्स भी बोर सा है। कुछ नया तो है नहीं। सब कुछ बासी-बासी सा....। है ना राजू। गुरुजी ने उसकी नजरें पढ़ते हुए पूछा।

राजू गुस्से से बोला, ‘मेरे सामने पढ़ाई का नाम मत लो।’

‘पढ़ाई में मन क्यों नहीं लगता राजू बेटा?’ गुरुजी ने पूछा।

‘नहीं लगता, मैंने बोल दिया न। आप जाओ, मुझे नहीं पढ़ना।’ राजू फिर गुस्से से बोला।

‘बेटा, मैं पढ़ाने नहीं आया हूं।’

‘फिर?’

‘मैं तो यूं ही आ गया बस मिलने। तुम्हें पढ़ाई बिलकुल भी अच्छी नहीं लगती तो कोई बात नहीं। अब तुम्हारी क्या इच्छा है? कुछ खाने को मन कर रहा है?’ गुरुजी ने बड़े प्यार से राजू से पूछा।

‘हां, संतरे खाने का मन कर रहा है, पास वाले बाग से।’  राजू मुस्कुराते हुए बोला।

तभी गुरुजी खड़े होते हुए बोले, ‘तो चलो, मैं तुम्हें खूब सारे संतरे खिलाऊंगा....ताजे-ताजे, मीठे-मीठे...।’

‘मम्मी मैं अंकल के साथ बाग में जाऊं?’  राजू ने अपनी मम्मी से पूछा।

मम्मी बोली, ‘जाओ बेटा, खूब सारे संतरे खाकर आओ।’

और फिर गुरुजी और राजू बाग की ओर चल पड़े। पांच मिनट में ही वे बाग में पहुंच गए। तब गुरुजी बोले, ‘मैं पेड़ पर चढ़कर तुम्हें संतरे देता रहूंगा और तुम खाते रहना।’

‘ठीक है।’  राजू खुश होकर बोला।

गुरुजी पेड़ पर चढ़ गए। उन्होंने 15-20 संतरे नीचे गिराए। राजू ने कई संतरे खाए। गुरुजी कुछ देर बाद पेड़ से नीचे उतर गए। फिर उन्होंने राजू से पूछा, बेटा राजू, तुमने अभी कितने संतरे खा लिए? और शेष कितने संतरे बच गए?

राजू संतरा खाता हुआ मुस्कुरा कर बोला, ‘जाओ मैं नहीं बताता.....आप तो मुझे पढ़ा रहे हो!’

राजू का जवाब सुनकर गुरुजी ने अपना माथा पीट लिया और बोले- ‘धन्य हैं बाल हठ !’


-दीनदयाल शर्मा

‘टाबर टोल़ी’, 10/22 आर. एच. बी. कॉलोनी,

हनुमानगढ़ जं. 335512, राजस्थान

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