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सामाजिक सरोकारों के गाँधीवादी कवि -भवानी प्रसाद मिश्र / सुशील कुमार शर्मा

भवानी प्रसाद मिश्र की जीवनी -

भवानीप्रसाद मिश्र का जन्म गाँव टिगरिया, तहसील सिवनी मालवा, जिला होशंगाबाद (मध्य प्रदेश) में हुआ था। क्रमश: सोहागपुर, होशंगाबाद, नरसिंहपुर और जबलपुर में उनकी प्रारम्भिक शिक्षा हुई। इनके पिता पंडित सीताराम मिश्र शिक्षा विभाग में अधिकारी थे एवं साहित्यिक अभिरुचि के व्यक्ति थे। इनकी माता श्रीमती गोमती देवी बहुत संस्कार शील महिला थीं। अतः हम कह सकते हैं कि साहित्य और संस्कार इन्हें विरासत में मिले थे। भवानी मिश्र जी गांधीजी के श्रेष्ठ अनुयायी थे।

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गाँधीवाद की स्वच्छता, पावनता और नैतिकता का प्रभाव तथा उसकी झलक उनकी कविताओं में और आचरण में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है। अंग्रेजी हुकूमत ने उन्हें 1942 में गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया था 1949 में छूटे वो जेल से रिहा हुए उसी वर्ष महिलाश्रम वर्धा में शिक्षक की तरह चले गए और चार पाँच साल वर्धा में बिताए।सन १९३२-३३ में वे माखनलाल चतुर्वेदी के संपर्क में आए और वे आग्रहपूर्वक कर्मवीर में भवानी प्रसाद मिश्र की कविताएँ प्रकाशित करते रहे। हंस में काफी कविताएँ छपीं और फिर अज्ञेय जी ने दूसरे सप्तक में इन्हें प्रकाशित किया। दूसरे सप्तक के प्रकाशन के बाद प्रकाशन क्रम ज्यादा नियमित होता गया। उन्होंने चित्रपट के लिए संवाद लिखे और मद्रास के ए०बी०एम० में संवाद निर्देशन भी किया। मद्रास से बम्बई आकाशवाणी का प्रोड्यूसर होकर गए और आकाशवाणी केन्द्र दिल्ली पर भी काम किया। जीवन के ३३वें वर्ष से खादी पहनने लगे।

भवानी प्रसाद मिश्र -हिंदी साहित्य के पुरोधा

प्रथम तार सप्तक से पहले सन् 1953 या सन् 1954 या सन् 1955 से नई कविता ने जन्म ग्रहण कर लिया था। नई कविता का बीजांकुर तो सन् 1943 में ‘तार सप्तक’ के प्रकाशन से हो गया था। अज्ञेय के सम्पादकत्व में प्रकाशित “तार सप्तक” के सातों कवियों ( 1. गजानन माधव मुक्तिबोध 2. नेमिचन्द्र जैन 3. भारत भूषण अग्रवाल 4. गिरिजा कुमार माथुर 5. प्रभाकर माचवे 6. डा. राम विलास शर्मा 7. अज्ञेय ) की संकलित काव्य रचनाओं में नई कविता की प्रवृत्तियों के लक्षण पहचाने जा सकते हैं। द्वितीय तार सप्तक के सातों कवियों ( 1. भवानी प्रसाद मिश्र 2. शकुंतला माथुर 3. हरि नारायण व्यास 4. शमशेर बहादुर सिंह 5. नरेश कुमार मेहता 6. रघुवीर सहाय 7. धर्मवीर भारती ) की कविताओं पर प्रयोग का मोह हावी नहीं है। इनमें गाँधीवादी भवानी प्रसाद मिश्र हैं तो मार्सवादी शमशेर भी हैं मगर ये सभी प्रयोगवादी अथवा प्रगतिवादी की आग्रहमूलक भूमिका को त्यागकर जीवन की प्रकृत भूमिका पर संचरण करते दिखाई देते हैं।

महात्मा गांधी जी के दर्शन से प्रभावित यह रचनाकार हिन्दी काव्य जगत् में गीत का अलबेला हस्ताक्षर था। भवानी दादा ने सृजन की भावुकता और जीवन की व्यवहारिकता के बीच की पसो-पेश को इस बेबाक़ी से अभिव्यक्त किया कि श्रोता और पाठक दाँतों तले उंगलियाँ दबा लेते थे।

गांधीवाद की ईमानदारी भवानी दादा के व्यक्तित्व का विशेष अंग थी। इसी ईमानदारी की साफ़-साफ़ अभिव्यक्ति आपके पहले संग्रह ‘गीत-फ़रोश’ में हुई है। प्रभावपूर्ण शैली, निष्कपट बेबाक़ी, सत्योद्धाटन की अदम्य क्षमता तथा काव्य की मर्यादा का अनुपालन इस संग्रह की रचनाओं में स्पष्ट दिखाई देता है।

शैली -भवानी प्रसाद मिश्र उन गिने चुने कवियों में थे जो कविता को ही अपना धर्म मानते थे और आमजनों की बात उनकी भाषा में ही रखते थे। वे 'कवियों के कवि' थे। मिश्र जी की कविताओं का प्रमुख गुण कथन की सादगी है। बहुत हल्के-फुलके ढंग से वे बहुत गहरी बात कह देते हैं जिससे उनकी निश्छल अनुभव संपन्नता का आभास मिलता है। भवानीप्रसाद मिश्र की कविता गहरी रागधर्मिता और सौंदर्य बोध ही नहीं कराती, उनके कथा काव्य में जनमानस की पीड़ाओं को भी रेखांकित करती है। मिश्र जी एक आंदोलनकारी कवि ही नहीं थे, राष्ट्रीय आंदोलन के साथ-साथ उनके रचनाकर्म में लोक जीवन की छाप भी झलकती है। भवानी प्रसाद मिश्रजी की कविता आज के सन्दर्भ में कुछ ज्यादा ही प्रासंगिक हो गई है, क्योंकि उनकी कवितायेँ भूखे, गरीबों की ही आवाज नहीं उठाती बल्कि आर्थिक साम्राज्यवाद और पूंजीवाद से संघर्ष करना भी सिखाती है।

दूसरे कवियों या साहित्यकारों का उनके साहित्य सृजन पर क्या प्रभाव था इस सम्बन्ध में उन्होंने तारसप्तक में एक वक्तव्य में लिखा है "मुझ पर किन कवियों का प्रभाव पड़ा ये कहना कठिन है। पुराने कवि मैंने ज्यादा पढ़े नहीं ,नए कवि मुझे जंचे नहीं। जब मैंने लिखना प्रारम्भ किया तो निराला ,पंत और गुप्तजी बहुत प्रसिद्द थे। ये तीनो ही कवि मुझे लकीरों में अच्छे लगते थे। किसी एक की पूरी कविता नहीं भायी .....

भवानी प्रसाद मिश्र की कविताओं की समीक्षा करते हुए प्रोफेसर महावीर सरन जैन का कथन है कि, "हिन्दी की नई कविता पर सबसे बड़ा आक्षेप यह है कि उसमें अतिरिक्त अनास्था, निराशा, विषाद, हताशा, कुंठा और मरणधर्मिता है। उसको पढ़ने के बाद जीने की ललक समाप्त हो जाती है, व्यक्ति हतोत्साहित हो जाता है, मन निराशावादी और मरणासन्न हो जाता है। यह कि नई कविता ने पीड़ा, वेदना, शोक और निराशा को ही जीवन का सत्य मान लिया है। नई कविता भारत की जमीन से प्रेरणा प्राप्त नहीं करती। इसके विपरीत यह पश्चिम की नकल से पैदा हुई है। भवानी प्रसाद मिश्र की कविताएँ इन सारे आरोपों को ध्वस्त कर देती हैं।

भवानी प्रसाद मिश्र के पुत्र ने अपने संस्मरण में लिखा है। "उन्हें एक दौर में गांधी का कवि तक तो ठीक, बनिए का कवि भी कहा गया तो ऐसे अप्रिय प्रसंग उनके संग जुड़ ही गए एकाध। फिर उनकी एक कविता में उन्होंने लिखा है कि ‘दूध किसी का धोबी नहीं है। किसी की भी जिंदगी दूध की धोई नहीं है। आदमकद कोई नहीं है।’ कवि के नाते उनका कद क्या था- यह तो उनके पाठक, आलोचक ही जानें। हम बच्चों के लिए तो वे एक ठीक आदमकद पिता थे। उनकी स्नेह भरी उंगली हमें आज भी गिरने से बचाती है।

कविता संग्रह- गीत फरोश, चकित है दुख, गान्धी पंचशती, बुनी हुई रस्सी, खुशबू के शिलालेख, त्रिकाल सन्ध्या, व्यक्तिगत, परिवर्तन जिए, तुम आते हो, इदम् न मम्, शरीर कविता: फसलें और फूल, मानसरोवर दिन, सम्प्रति, अँधेरी कविताएँ, तूस की आग, कालजयी, अनाम और नीली रेखा तक।

बाल कविताएँ - तुकों के खेल,

संस्मरण - जिन्होंने मुझे रचा

निबन्ध संग्रह - कुछ नीति कुछ राजनीति।

सम्मान और पुरस्कार-

सन् 1972 में आपकी कृति ‘बुनी हुई रस्सी’ के लिए आपको साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। इसके अतिरिक्त अन्य अनेक पुरस्कारों के साथ-साथ आपने भारत सरकार का पद्म श्री अलंकार भी प्राप्त किया। 1981-82 में उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के संस्थान सम्मान से सम्मानित हुए और 1983 में उन्हें मध्य प्रदेश शासन के शिखर सम्मान से अलंकृत किया गया।

20 फरवरी सन् 1985 को हिन्दी काव्य-जगत् का यह पुरोधा ब्रह्मलीन हो गया। सन्दर्भ -1. प्रोफेसर महावीर सरन जैन : गाँधी दर्शन की प्रासंगिकता

2. प्रोफेसर महावीर सरन जैन का आलेख - भवानी प्रसाद मिश्र : सामान्य से दिखने वाले असाधारण कवि

3. भाषा के सहज संगीत के कवि – भवानी प्रसाद मिश्र

भवानी प्रसाद मिश्र की कालजयी रचनाएँ -

1. सतपुड़ा के घने जंगल।
नींद में डूबे हुए से
ऊँघते अनमने जंगल।
झाड़ ऊँचे और नीचे,
चुप खड़े हैं आँख मीचे,
घास चुप है, कास चुप है
मूक शाल, पलाश चुप है।
बन सके तो धँसो इनमें,
धँस न पाती हवा जिनमें,
सतपुड़ा के घने जंगल
ऊँघते अनमने जंगल।
सड़े पत्ते, गले पत्ते,
हरे पत्ते, जले पत्ते,
वन्य पथ को ढँक रहे-से
पंक-दल में पले पत्ते।
चलो इन पर चल सको तो,
दलो इनको दल सको तो,
ये घिनौने, घने जंगल
नींद में डूबे हुए से
ऊँघते अनमने जंगल।

अटपटी-उलझी लताऐं,
डालियों को खींच खाऐं,
पैर को पकड़ें अचानक,
प्राण को कस लें कपाऐं।
सांप सी काली लताऐं
बला की पाली लताऐं
लताओं के बने जंगल
नींद में डूबे हुए से
ऊँघते अनमने जंगल।
मकड़ियों के जाल मुँह पर,
और सर के बाल मुँह पर
मच्छरों के दंश वाले,
दाग काले-लाल मुँह पर,
वात- झन्झा वहन करते,
चलो इतना सहन करते,
कष्ट से ये सने जंगल,
नींद में डूबे हुए से
ऊँघते अनमने जंगल|
अजगरों से भरे जंगल।
अगम, गति से परे जंगल
सात-सात पहाड़ वाले,
बड़े छोटे झाड़ वाले,

शेर वाले बाघ वाले,
गरज और दहाड़ वाले,
कम्प से कनकने जंगल,
नींद मे डूबे हुए से
ऊँघते अनमने जंगल।

इन वनों के खूब भीतर,
चार मुर्गे, चार तीतर
पाल कर निश्चिन्त बैठे,
विजनवन के बीच बैठे,
झोंपडी पर फ़ूंस डाले
गोंड तगड़े और काले।
जब कि होली पास आती,
सरसराती घास गाती,
और महुए से लपकती,
मत्त करती बास आती,
गूंज उठते ढोल इनके,
गीत इनके, बोल इनके
सतपुड़ा के घने जंगल
नींद मे डूबे हुए से
उँघते अनमने जंगल।

जागते अँगड़ाइयों में,
खोह-खड्डों खाइयों में,
घास पागल, कास पागल,
शाल और पलाश पागल,
    

लता पागल, वात पागल,
डाल पागल, पात पागल
मत्त मुर्गे और तीतर,
इन वनों के खूब भीतर।
क्षितिज तक फ़ैला हुआ सा,
मृत्यु तक मैला हुआ सा,
क्षुब्ध, काली लहर वाला
मथित, उत्थित जहर वाला,
मेरु वाला, शेष वाला
शम्भु और सुरेश वाला
एक सागर जानते हो,
उसे कैसा मानते हो?
ठीक वैसे घने जंगल,
नींद में डूबे हुए से
ऊँघते अनमने जंगल|।

धँसो इनमें डर नहीं है,
मौत का यह घर नहीं है,
उतर कर बहते अनेकों,
कल-कथा कहते अनेकों,
नदी, निर्झर और नाले,
इन वनों ने गोद पाले।
लाख पंछी सौ हिरन-दल,
चाँद के कितने किरन दल,
झूमते बन-फ़ूल, फ़लियाँ,
खिल रहीं अज्ञात कलियाँ,
हरित दूर्वा, रक्त किसलय,
पूत, पावन, पूर्ण रसमय
सतपुड़ा के घने जंगल,
लताओं के बने जंगल।

2.चार कौए उर्फ चार हौए

बहुत नहीं थे सिर्फ चार कौए थे काले
  उन्होंने यह तय किया कि सारे उड़ने वाले
  उनके ढंग से उड़ें, रुकें, खायें और गायें
  वे जिसको त्योहार कहें सब उसे मनायें ।

कभी-कभी जादू हो जाता है दुनिया में
  दुनिया भर के गुण दिखते हैं औगुनिया में
  ये औगुनिए चार बड़े सरताज हो गये
  इनके नौकर चील, गरूड़ और बाज हो गये ।

हंस मोर चातक गौरैयें किस गिनती में
  हाथ बांधकर खड़े हो गए सब विनती में
  हुक्म हुआ, चातक पंछी रट नहीं लगायें
  पिऊ-पिऊ को छोड़ें कौए-कौए गायॆं ।

बीस तरह के काम दे दिए गौरैयों को
  खाना-पीना मौज उड़ाना छुटभैयों को

कौओं की ऐसी बन आयी पांचों घी में
  बड़े-बड़े मनसूबे आये उनके जी में
  उड़ने तक के नियम बदल कर ऐसे ढाले
  उड़ने वाले सिर्फ रह गये बैठे ठाले ।

आगे क्या कुछ हुआ सुनाना बहुत कठिन है
  यह दिन कवि का नहीं चार कौओं का दिन है
  उत्सुकता जग जाये तो मेरे घर आ जाना
  लंबा किस्सा थोड़े में किस तरह सुनाना ।


3. गीत-फरोश

जी हाँ हुजूर, मैं गीत बेचता हूँ,
मैं तरह-तरह के गीत बेचता हूँ,
मैं किसिम-किसिम के गीत बेचता हूँ!

जी, माल देखिए, दाम बताऊँगा,
बेकाम नहीं हैं, काम बताऊँगा,
कुछ गीत लिखे हैं मस्ती में मैंने,
कुछ गीत लिखे हैं पस्ती में मैंने,
यह गीत सख्त सर-दर्द भुलाएगा,
यह गीत पिया को पास बुलाएगा!

जी, पहले कुछ दिन शर्म लगी मुझको,
पर बाद-बाद में अक्ल जगी मुझको,
जी, लोगों ने तो बेच दिए ईमान,
जी, आप न हों सुन कर ज़्यादा हैरान-
मैं सोच समझ कर आखिर
अपने गीत बेचता हूँ,
जी हाँ हुजूर, मैं गीत बेचता हूँ,
मैं तरह-तरह के गीत बेचता हूँ,
मैं किसिम-किसिम के गीत बेचता हूँ!

यह गीत सुबह का है, गा कर देखें,
यह गीत गज़ब का है, ढा कर देखें,
यह गीत ज़रा सूने में लिक्खा था,
यह गीत वहाँ पूने में लिक्खा था,
यह गीत पहाड़ी पर चढ़ जाता है,
यह गीत बढ़ाए से बढ़ जाता है!

यह गीत भूख और प्यास भगाता है,
जी, यह मसान में भूख जगाता है,
यह गीत भुवाली की है हवा हुजूर,
यह गीत तपेदिक की है दवा है हुजूर,
जी, और गीत भी हैं दिखलाता हूँ,
जी, सुनना चाहें आप तो गाता हूँ।

जी, छंद और बेछंद पसंद करें,
जी अमर गीत और वे जो तुरत मरें!
ना, बुरा मानने की इसमें बात,
मैं ले आता हूँ, कलम और दवात,
इनमें से भाये नहीं, नये लिख दूँ,
जी, नए चाहिए नहीं, गए लिख दूँ!
मैं नए, पुराने सभी तरह के
गीत बेचता हूँ,
जी हाँ, हुजूर मैं गीत बेचता हूँ
मैं तरह-तरह के गीत बेचता हूँ।

मैं किसिम-किसिम के गीत बेचता हूँ!
जी, गीत जनम का लिखूँ मरण का लिखूँ,
जी, गीत जीत का लिखूँ, शरण का लिखूँ,
यह गीत रेशमी है, यह खादी का,
यह गीत पित्त का है, यह बादी का!
कुछ और डिजाइन भी हैं, यह इलमी,
यह लीजे चलती चीज़, नई फ़िल्मी,
यह सोच-सोच कर मर जाने का गीत,
यह दुकान से घर जाने का गीत!

जी नहीं, दिल्लगी की इसमें क्या बात,
मैं लिखता ही तो रहता हूँ दिन-रात,
तो तरह-तरह के बन जाते हैं गीत,
जी, रूठ-रूठ कर मन जाते हैं गीत!
जी, बहुत ढेर लग गया, हटाता हूँ,
गाहक की मर्ज़ी, अच्छा जाता हूँ,
या भीतर जाकर पूछ आइए आप,
है गीत बेचना वैसे बिलकुल पाप,
क्या करूँ मगर लाचार
हार कर गीत बेचता हूँ!
जी हाँ, हुजूर मैं गीत बेचता हूँ,
मैं किसिम-किसिम के गीत बेचता हूँ!


4. सुबह हो गई है

सुबह हो गई है
मैं कह रहा हूँ सुबह हो गई है
मगर क्या हो गया है तुम्हें कि तुम सुनते नहीं हो
अपनी दरिद्र लालटेनें बार-बार उकसाते हुए
मुस्काते चल रहे हो
मानो क्षितिज पर सूरज नहीं तुम जल रहे हो
और प्रकाश लोगों को तुमसे मिल रहा है
यह तो तालाब का कमल है
वह तुम्हारे हाथ की क्षुद्र लालटेन से खिल रहा है
बदतमीज़ी बन्द करो
लालटेनें मन्द करो
बल्कि बुझा दो इन्हें एकबारगी
शाम तक लालटेनों में मत फँसाए रखो अपने हाथ
बल्कि उनसे कुछ गढ़ो हमारे साथ-साथ
हम जिन्हें सुबह होने की सुबह होने से पहले
खबर लग जाती है
हम जिनकी आत्मा नसीमे-सहर की आहट से
रात के तीसरे पहर जग जाती है
हम कहते हैं सुबह हो गई है।


5. दरिंदा

दरिंदा
आदमी की आवाज़ में
बोला

स्वागत में मैंने
अपना दरवाज़ा
खोला

और दरवाज़ा
खोलते ही समझा
कि देर हो गई!

मानवता
थोड़ी बहुत जितनी भी थी
ढेर हो गई!

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