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रमेशराज के विरोधरस के दोहे

विपिन सिंह राजपूत की कलाकृति
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पीते आये आज तक जो जनता का रक्त
  वही अधम इस दौर में बनें देश के भक्त |
  

“ तेरी रक्षा मैं करूं हो मत नारि अधीर “
   चीर खींचते वो कहे “ बढ़ा रहा मैं चीर ” |
  

जिसके मन-भीतर बसा अहंकार छल द्वेश
  दुष्ट आज धारण किये गुरु नानक का वेश |
  

भगतसिंह-आज़ाद की कुर्बानी कर याद
  धीरे-धीरे जाल को बिछा रहा जल्लाद |
  

कभी खत्म होती नहीं वीरों की तादाद
भगतसिंह हैं और भी भगतसिंह के बाद |
  

खल के सम्मुख क्यों करे बन याचक सम्वाद
  खरबूजे की कब सुनी चाक़ू ने फरियाद |
  +

हर सहमति मुझसे बने कहता है प्रतिकार
“ मैं  जल का भण्डार हूँ “ बोल रहा अंगार |
  

बाँट रहा वो आजकल केवल ख्वाब हसीन
वो रोटी देता नहीं, रोटी लेता छीन |
  

उसने ऐसे कर दिया ‘सही सोच’ का अंत
पतझर को हम देखकर बोलें आज ‘ वसंत ‘ |
  

चिन्तन को कुछ भी नहीं आज हमारे पास
  धीरे-धीरे आ रही हमें गुलामी रास |
  

आमों की चाहत लिए बोने लगे बबूल
  अंधभक्त हम कह रहे अब काँटों को फूल |
    
   

धर्मग्रन्थ कोई उठा इतना-सा है मर्म
ऊंचनीच के भेद को नहीं जानता धर्म |
    

अंधकार अब कह रहा-“मुझसे सुखद प्रभात”
करता छँटना आजकल जल-संचय की बात |
       


मरुथल कहे-“समुद्र हूँ“ अति इतराकर आज
  गड्ढे का ‘उपनाम‘ है यारो अब ‘गिर्राज‘ |
   

“इसी नीति से सुख मिले“, ऐसी बातें छोड़
  क्यों जनता के घाव पर नीबू रहा निचोड़ |
   


  ढाई आखर प्रेम की बदल रही तासीर
  सम्प्रदाय की बात अब करने लगा कबीर |
   

इस युग के जगदीश कब रह पाए जगदीश
  जैसे ही सत्ता मिली उग आये दश शीश |
   

शब्द-जाल नूतन लिए मुस्काता सैयाद
  रखकर अपना नाम अब “ देशभक्त आज़ाद “ |
   

यही सत्य है मानिए “मरता नहीं विचार”
सभी दमित चिंगारियाँ बन जातीं अंगार |
   

इससे ज्यादा और क्या होगा देश महान
  आज मछलियाँ कर रहीं बगुलों का गुणगान |
  

दृश्य आज का देख कवि शोक न कर तू व्यक्त
  अब जब सारी मछलियाँ बगुले की हैं भक्त |
  

जिसमें प्यारी मछलियाँ भरती मिलें उछाल
  मगरमच्छ उस ताल में रही सियासत डाल |
  

दृश्य आज का देखकर हुआ कबीरा दंग
  नाच रही हैं मछलियाँ मगरमच्छ के संग |
  

मछली के काँटा फँसा, कतर कबूतर-पंख
  फूँक रहा वो आजकल विश्व-शांति के शंख |
  

कोयल कागा का करे मंच-मंच सम्मान
  धीरे-धीरे हो रहा अपना देश महान |
  

चले उजाला खोजने, उसकी मिली न थाह
  घना अँधेरा देखकर बोल रहे हम ‘वाह’ |
  

दो देशों के बीच है आज मुनाफा शुद्ध
  बातें होंगी युद्ध की, कभी न होगा युद्ध |
   

बल पा ख़ूनी शेर का शेर बनें खरगोश
  यही शेर ठंडा करे कल को इनका जोश |
  

चीर बढ़ाने के लिए नहीं उठेगा हाथ
  दुर्योधन के साथ है अब का दीनानाथ |
  

क्रन्दन चीख-पुकार पर दूर-दूर तक मौन
  आज जटायू कह रहा ‘सीता मेरी कौन‘?
   

करता खल की वन्दना, सज्जन को गरियाय
  कौरव-कुल का साथ ही अब तो कवि को भाय |
   


अन्जाने भय से ग्रसित रहा निरंतर काँप
  लगता आज विपक्ष को सूँघ गया है सांप |
   

लोकतंत्र में लोक की कर दी हालत दीन
  पत्रकार बगुला बने, जनता जैसे मीन |
    

एक सुलगते प्रश्न को पूछ रहा है यक्ष
  दुबक गया किस लोक में जाकर आज विपक्ष |
    

उत्पीड़न-अन्याय लखि नहीं खौलता रक्त
  हम सब होते जा रहे रक्तबीज के भक्त |
    

देव-सरीखे ‘सोच’ की आफत में है जान
  छल भोले को पा गया भस्मासुर वरदान |
    
    


होगी लघु उद्योग पर माना  भीषण चोट
  रोजगार देगा मगर, कल सबको  रोबोट |
    

सदियों से जिसको मिली “ भाट “ नाम से ख्याति
न्यूज़-चैनलों पर दिखे इस युग वही प्रजाति |
    


अब तो अति मजबूत हैं कौरव-दल के हाथ
चक्रब्यूह को मिल गया पत्रकार का साथ |
   


  जुटे यज्ञ करने यहाँ कुछ चैनल-अख़बार
  बस जनता की दे रहे आहुतियाँ मक्कार |
   

जन-सेवक तेरे लिए लाये दारू-भाँग
  इनसे कपड़े-रोटियां ओ जनता मत मांग |
   

अपनी कटती ज़ेब पर ये रहता है मौन
  इस गूंगे युग को जुबां बोलो देगा कौन ?
   

सूरदास जैसे नयन हमको हैं बेकार
  हम अंधे धृतराष्ट्र हैं , संजय ज्यों अख़बार |
   

शब्द-शक्तियों को किया अब सत्ता ने अंध
  सम्प्रदाय की आ रही अब कविता से गंध |
   


  युग-युग से लोकोक्ति यह होती आयी सिद्ध
  लाश बिछी हों हर तरफ यही चाहता गिद्ध |
   

बना किसानों के लिए इतना आज विधान
  रोये अपनी नियति पर अब हर साल किसान |
  

सोचे सुस्त विपक्ष अब-“ लूं मैं माखन लूट
  यदि बिल्ली के भाग से छींका जाये टूट |
   

अब शासन में कंस के कान्हा का है साथ
  मिला रही है रौशनी अंधकार से हाथ |
   

वानर-सेना हो गयी अब रावण के संग
  बहुत कठिन है जीतना रघुनंदन को जंग |
   

बिना विचारे सत-असत चुनना अपना काम
  फर्क नहीं पड़ता हमें रावण हो या राम |
   

हर कोई हैरान है लखि सत्ता का रूप
  और अँधेरा हो गया जब से आयी धूप |
   


  नित अबलाएँ छेड़ते गुंडे रहे दहाड़
  डर के मारे हम रखें अपनी बंद किबाड़ |
   
  

भीषण गर्मी में जगे मन में फीलिंग कूल
  चमत्कार यह कर रहा आज कमल का फूल |
   


  बल पा ख़ूनी शेर का शेर बनें खरगोश
  यही शेर ठंडा करे कल को इनका जोश |
  

चीर बढ़ाने के लिए नहीं उठेगा हाथ
  दुर्योधन के साथ है अब का दीनानाथ |
  

क्रन्दन चीख-पुकार पर दूर-दूर तक मौन
  आज जटायू कह रहा ‘सीता मेरी कौन‘?
   

करता खल की वन्दना, सज्जन को गरियाय
  कौरव-कुल का साथ ही अब तो कवि को भाय |
   


अन्जाने भय से ग्रसित रहा निरंतर काँप
  लगता आज विपक्ष को सूँघ गया है सांप |
   

लोकतंत्र में लोक की कर दी हालत दीन
पत्रकार बगुला बने, जनता जैसे मीन |
    

एक सुलगते प्रश्न को पूछ रहा है यक्ष
  दुबक गया किस लोक में जाकर आज विपक्ष |
    

उत्पीड़न-अन्याय लखि नहीं खौलता रक्त
  हम सब होते जा रहे रक्तबीज के भक्त |
    

देव-सरीखे ‘सोच’ की आफत में है जान
  छल भोले को पा गया भस्मासुर वरदान |
    
    


होगी लघु उद्योग पर माना  भीषण चोट
  रोजगार देगा मगर, कल सबको  रोबोट |
    

सदियों से जिसको मिली “ भाट “ नाम से ख्याति
न्यूज़-चैनलों पर दिखे इस युग वही प्रजाति |
    


अब तो अति मजबूत हैं कौरव-दल के हाथ
चक्रब्यूह को मिल गया पत्रकार का साथ |
   


  जुटे यज्ञ करने यहाँ कुछ चैनल-अख़बार
  बस जनता की दे रहे आहुतियाँ मक्कार |
   

जन-सेवक तेरे लिए लाये दारू-भाँग
  इनसे कपड़े-रोटियां ओ जनता मत मांग |
   

अपनी कटती ज़ेब पर ये रहता है मौन
  इस गूंगे युग को जुबां बोलो देगा कौन ?
   

सूरदास जैसे नयन हमको हैं बेकार
  हम अंधे धृतराष्ट्र हैं , संजय ज्यों अख़बार |
   

शब्द-शक्तियों को किया अब सत्ता ने अंध
  सम्प्रदाय की आ रही अब कविता से गंध |
   


धर्म-जाति की सब लिए हाथों में शमशीर
  महंगाई से जो लड़े , दिखे न ऐसा वीर |
  

गोरे बन्दर की जगह काले बन्दर आज
  इस आज़ादी पर करें कैसे भैया नाज़ |
    


चाल हमारे हाथ पर उसके हाथ रिमोट
  गिरनी है अब सांप के मुँह में ही हर गोट |
   


  सत्ता के उपहास को जनता जाती भूल
  रोज मनाते आ रहे नेता अप्रिल-फूल |
   


  दिए सियासी फैसले मुंसिफ ने इस बार
सुबकन-सिसकन से भरे जनता के अधिकार |
   


  अब क्या होगा बोलिए शंकर भोलेनाथ
नेताजी को मिल गया पत्रकार का साथ |
   

तूने जो वादे किये मुकर गयी हर बार
  राजनीति तेरा बता मुंह है या मलद्वार |
   

गुब्बारों से आलपिन जता रही है प्यार
  क्यों न समझ आता तुझे सत्ता का व्यवहार |
    


हुआ आज सद्भाव का ज़हरीला मकरंद
  देशभक्त कहने लगा अपने को जयचंद |
   

मीरजाफरों के लिए वक़्त हुआ अनुकूल
  इनके हाथों में दिखें देशभक्ति के फूल |
   

पेट्रोल का साथ ले कहता है अंगार
  मैं लाऊँगा मुल्क में अमन-चैन इस बार |
   


भक्तो लड्डू बांटिए प्रगट न कीजे खेद
  हर नेता की हो गयी काली भैंस सफेद |
   

रक्तसनी तलवार सँग जिनके हैं अब ठाठ
  सहनशीलता का हमें सिखा रहे हैं पाठ |
  

देशभक्ति के नाम पर प्रचलन में यह राग
  सहनशील अब जल नहीं, सहनशील है आग |
  

हर गर्दन इस दौर में घोषित है गद्दार
  सहनशील अब बन गये बस चाकू-तलवार |
     

पत्रकार का हो गया नेता से गठजोड़
  दोनों मिलकर देश की बाँहें रहे मरोड़ |
  
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रमेशराज, 15/109, ईसानगर, अलीगढ़-202001
Mo.-9634551630

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