बुधवार, 7 जून 2017

परिवार बच्चों की प्रथम पाठशाला / गीता दुबे

माँ बच्चों की प्रथम शिक्षिका और परिवार बच्चों की प्रथम पाठशाला होती है. परिवार में बच्चे जो देखते हैं, जो सुनते हैं उससे ही उनका संस्कार बनता है. देखा गया है कि संस्कारी परिवार के बच्चे संस्कारी ही होते हैं. बच्चे कुम्हार की  गीली मिट्टी की तरह होते हैं, जैसे कुम्हार गीली मिट्टी को सांचे में डालकर जैसा रूप देना चाहता है वैसा रूप दे देता है, उसी तरह बच्चे को भी जिस तरह के सांचे में ढालेंगे वैसा ही उनका व्यक्तित्व होगा.

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यदि माता पिता झूठ बोलते हैं और बच्चों से कहते हैं कि झूठ नहीं बोलना चाहिए  तो बच्चा झूठ बोलेगा ही. बच्चों में अच्छे संस्कार देने के लिए माता पिता को पहले  स्वयं को संस्कारित करना अति आवश्यक है. बचपन में जो संस्कार पड़ जाते हैं वह जीवन भर साथ रहते हैं. लेकिन बदलते परिवेश में परिवार का मतलब सिर्फ पति, पत्नी और बच्चे तक ही सीमित रह गया है. पति पत्नी दोनों ही रेस में भाग रहे हैं और बच्चे  नौकरों और दाईयों के सहारे पल रहे हैं. नौकरों और दाईयों के सहारे पले हुए बच्चे अपनी सारी भावनाओं को दबाने के अभ्यस्त हो जाते हैं . नतीजा बच्चे  मानसिक विकृतियों के शिकार होते पाए जा रहे हैं,  सातवीं या आठवीं कक्षा  के बच्चों द्वारा आत्महत्या  की खबरें भी अब नई नहीं लगती. आपराधिक गतिविधियों का  शिकार होना ,नशा करना  टूटते पारिवारिक सरोकार का ही नतीजा है. यह घोर चिंतन का विषय है.

       बच्चे देश का भविष्य होते हैं. भविष्य में इन्हीं बच्चों पर देश का भार होगा. यह माता पिता का कर्तव्य है कि चाहे जैसा भी माहौल हो वह अपने बच्चों के साथ समय बिताए, घर के बुजुर्गों का सम्मान करे, बच्चे से हर विषय पर खुल कर बातें करें, चर्चा करें, ऐसा करने से बच्चे अपने माता पिता से खुलते हैं, अपनी बातें कहते हैं, अपनी परेशानी बताते है. माता पिता को बच्चे की छोटी से छोटी उपलब्धियों पर खुश होना चाहिए, उनका हौसला बढ़ाना चाहिए, ऐसा करने से बच्चों  का आत्मविश्वास बढ़ता है और वे भविष्य में और बेहतर करने के लिए प्रेरित होते हैं. बच्चों में अच्छे संस्कार रहेंगे तब ही हमारे देश का भविष्य भी उज्ज्वल होगा.

गीता दुबे

जमशेदपुर, झारखण्ड   

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