शनिवार, 3 जून 2017

चौराहे का भगवान तथा अन्य कविताएँ / अमिताभ वर्मा

अमिताभ वर्मा

सच और सपना


कुछ सपने सच हो जाते हैं
कुछ सच सपने-से लगते हैं।

जब राह नई मिल जाए तो
मिलते हैं साथी नए-नए
कुछ मिल कर भी न मिलते हैं
कुछ न मिल कर भी मिलते हैं।

कुछ होंठ नहीं कुछ कह पाते
बस आँखें ही मिल पाती हैं
यूँ कह कर भी सारी बातें
अनकही सदा रह जाती हैं।

यादों की धूप चमकने पर
साए पड़ जाते हैं गहरे
सायों में साए हैं छुपते
कुछ छुप कर भी न छुपते हैं।

आख़िर वक़्त गुज़रता है
यादें पड़ जाती हैं धुँधली
कुछ यादें बस दुःख देती हैं
कुछ दुःख में सुख दे जाती हैं।
 

चौराहे का भगवान



चौराहे पर नज़र घुमाई कल, तो देखा
इक कोने में सहमा-सा भगवान खड़ा था!

इक मुद्दत के बाद मिले थे, डर लगता था
भगवान समझ कर उसे ठगा न जाऊँ
एक अज़ीज़ ने जैसे पिछली बार ठगा था!
 
मैंने हाथ बढ़ाया - हाथ मिलाने को
गले लगाना उसको उचित नहीं लगता था
उसने दो पैकेट मेरी ओर बढ़ाए
बोला, पूजा की सामग्री है
बाज़ार में मँहगी मिलती है
पर सस्ते में दूँगा, क्योंकि मुझको
अपनी बिटिया की शादी करनी है।

मँहगी चीज़ को सस्ता बेचोगे?
क्या पाओगे, क्या खाओगे?
बिटिया की शादी कैसे कर पाओगे?

कितने सुख से थे तुम उस सुंदर मंदिर में
खूब चढ़ावे आते थे
खूब भजन सुन पाते थे
कपड़े, ज़ेवर, छप्पन व्यंजन
जो चाहो कर पाते थे
क्या अब तुमने मंदिर का घर छोड़ दिया है?

कभी किन्हीं काली आँखों के सपनों में दिख जाते हो
कभी किसी बच्चे के नन्हे हाथों में छुप जाते हो
शबनम के इक कतरे में दीखे थे तुम मुझको उस दिन
तो आज नमी में आँसू की बरबस तुम घुल जाते हो।

क्यों जाऊँ मंदिर मैं तुमको शीश नवाने को
तुम मुझको हर माँ के आँचल में दिख जाते हो। 
 

काश, तुम्हें कुछ दे पाता


काश, तुम्हें कुछ दे पाता!

कुछ ख़ास नहीं, कुछ नया नहीं, पर कुछ ऐसा
जिसे सामने पाकर तुम खुश हो जातीं
आँखों-ही-आँखों में तुम मुस्कातीं
मेरी तरफ़ ज़रा झुकतीं
और तुम्हारे अधरों से शायद
इक चुंबन-सा उड़ कर
मेरे अधरों पर सहसा बिछ जाता।
काश, तुम्हें कुछ दे पाता!

वैसे तो देखो, तुमको
क्या कुछ नहीं दिया है
अमृतपान किया जब मैंने
तब तुमको ज़हर मिला है
कितनी सूनी शामें दी हैं, कितनी सूनी रातें
इन सुंदर आँखों को दी हैं कितनी ही बरसातें
दर्द तुम्हारा अगर समझ मैं पाता
काश, तुम्हें कुछ दे पाता!

जो चाहे मानव हो वैसा
कहाँ ये हो पाता है
सुख देने की कोशिश में
दुःख गहरा जाता है
दुःख और सुख की इस उलझन में
मन और भटक जाता है
दुःख हरना और सुख देना, ये बस में जो हो जाता!
काश, तुम्हें कुछ दे पाता!

आह एक जो दिल में दबी पड़ी है
टीस एक जो अब तक कहीं छुपी है
कुछ आँसू जो पलकों पर ही सूख गए हैं
मीत जो मुझसे जीवनभर को रूठ गए हैं
और भला है क्या इस सुख के सागर में
इस सागर की मदिरा पीता
मैं अक्सर पछताता!
काश, तुम्हें कुछ दे पाता!
 

ख्वाब की हक़ीक़त

 

एक दरख्त पर फँसी टँगी थी एक पतंग
बड़ी उम्मीद से एक बच्चा उसे निहार रहा था।
कब गिरे पतंग, आ जाए मेरे हाथों में!

ज़रा-सी हवा उसका दिल दहलाती थी
शाखें पतंग के और क़रीब आ जाती थीं
- ओह! कहीं फट न जाए।
कोई चिड़िया उस पर चोंच न मारे
कोई उससे घोंसला न बना डाले
- मेरी पतंग रहे सलामत हज़ारों साल।

बच्चा तो आख़िर बच्चा था
उकता गया, थक भी गया शायद
चला गया!

न जाने क्या हुआ पतंग को
टँगी रही, फट गई
या मिली किसी किस्मतवाले को!

एक ख्वाब घर बनाए है पलकों पर
कई दिनों से मन भरमाता है
अब तो दिल में भी उतर चुका है। 
 

होली


होली फिर आने वाली है।

पिछली होली पर तुमने पकवान बनाए थे
उदास पलकों पर स्वप्न सजाए थे
मुझ पर रंग डाला था
दिल को संभाला था
ढाँढस दी थी
- पिछली होली पर कुछ ख़ास नहीं किया था न
शायद इसीलिए बेकार गया साल!
उम्मीदें टूट गईं
और उम्मीदों के साथ-साथ
हम दोनों भी टूट गए
इस बार झूठी ही सही, खुशी मनाएँगे
तो साल शायद खुशी से गुज़रे!

बच्चों जैसी बात थी!
खुशियां क्या, अब तो
रिश्ते भी सूख चले।

उससे पहले, दीवाली पर तुमने सोचा
खाली हाथ न जाएँ, कुछ ले कर जाना ठीक है
और हुआ कुछ ऐसा
कि हाथ अब तक खाली हैं, आँचल अब तक है तार-तार!

होली फिर आने वाली है
एक बार फिर हम बचपना करेंगे!



जीवन की हाला


मनुष्य क्या है, इक प्याला है
छलकती जिसमें जीवन की हाला है।

काल बारी-बारी से हमें पीता है
जब तक जाने की बारी न आए
हर कोई जीता है!

न जाने क्या-क्या मसाले हैं उसके पास
जो वह महज स्वाद के लिए मिलाता है
थोड़ी-थोड़ी पीता है
थोड़ा मुस्कुराता है।

जो उसके लिए मसाले हैं
वो हमारे लिए कई अर्थ पाले हैं
कोई दुःख है, कोई सुख
हमने उन्हें और भी कई नाम दे डाले हैं।

कैसी विडंबना है!
हर प्याला खाली होने पर
बाक़ी प्याले पछताते हैं
पर एक दिन खुद खाली हो जाते हैं।

नए प्याले आते हैं
फिर भरती है उनमें हाला
शुरू हो जाता है एक नया दौर
जिसे हम नई पीढ़ी कह दुलराते हैं!



अब ऐसी ही सुबह होगी

 

नन्हे-नन्हे कन्धों पर जब
काम का बोझ न होगा
प्यास से फटते होंठ और
जब भूख का बोध न होगा
दिनरात थकान से टूटे दिल,
हिम्मत, और जान न होंगी
ऐ दोस्त बता कर जा मुझको
कब ऐसी सुबह होगी?

छोटे-छोटे डग इक दिन
स्कूल की ओर भरेंगे
प्यास बुझेगी, भूख मिटेगी
ग़म के गर्द छटेंगे
हम सब अपनी उम्र जिएँ
घर-घर में कलह न होगी
ऐ दोस्त, अगर तू ठान ले तो
अब ऐसी-ही सुबह होगी!
 

दुःख-मुक्ति


मैं जब रोया, समझा सबने
क्रंदन को मेरे मुस्काना
मन तक पहुँच सका न कोई
दर्द रह गया अनजाना।

सबने अपनी परिभाषा दी
बाँधी दुःख की सीमाएँ
जो दुःख है निस्सीम साथ में
उसे नहीं पर पहचाना।

कितनी मुश्किल, पर है कितनी
इस दुःख से मुक्ति आसान
ज्यों ढलता सूरज, बढ़ती छाया
हो जाता है दिन का अवसान।
 

विदाई



कई दिनों से पलकें भारी-सी हैं
कई दिनों से इक लाचारी-सी है।

कितने ख्वाब दफ़न कर डाले क्या बतलाएँ
मायूसी को हमसे यारी-सी है।

अंतिम साथी को कर डाला रुखसत हमने
साँसों में अब बस तनहाई-सी है।

क्या जाएँ महफ़िल में उनकी जश्न मनाने
दुनिया ने क्या कम रुसवाई दी है।



साँझ की लाली


साँझ की लाली में क्यों
हर जख्म हरा दिखता है
बेहद ग़मगीन-सा अब क्यों
हर ओर समाँ लगता है?

तू तो मत पूछ सितमगर
क्यों हाल बना है ऐसा
तूने ही दर्द दिया और
तुझको ही बुरा लगता है?

वो आग लगाई तूने
शोखी है जिसमें तुझ-सी
गर इधर बुझाएँ शोले
तो धुंआ उधर उठता है।

पर शुक्र मना ऐ हमदम
जो मिले तो बस हम तुझसे
वरना अब इस दुनिया में
हम जैसा कहाँ मिलता है!

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कवि – परिचय :

अमिताभ वर्मा काशी हिन्दू विश्वविद्यालय तकनीकी संस्थान से खनन अभियांत्रिकी में स्नातक हैं। उन्होंने निजी क्षेत्र की विभिन्न कम्पनियों में पैंतीस वर्ष कार्यरत रहने के बाद 2016 में अवकाश ग्रहण किया। इस दौरान वे आकाशवाणी से बतौर समाचार सम्पादक और समाचार वाचक सम्बद्ध रहे। वे सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के टेलिविज़न तथा रेडियो कार्यक्रमों में अभिनय तथा पटकथा लेखन द्धारा योगदान करते रहे है।  

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