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एक कन्या भ्रूण की पीड़ा - मैं जीना चाहती हूं मां ! / दीनदयाल शर्मा


-‘माँ, मुझे मत मरवाना। मैं भी दुनिया देखना चाहती हूं। तू किसी की बातों में मत आना माँ। मेरी हत्या मत करवाना। मैं दुनिया में आकर कुछ करना चाहती हूं। तुम सबका नाम रोशन करना चाहती हूं माँ। मैं अपने शहर का, राजस्थान का और भारत देश का नाम रोशन करना चाहती हूं माँ। माँ प्लीज, मुझे मत मरवाना। मैं जीना चाहती हूं माँ। माँ प्लीज।’ एक माँ के गर्भ से कन्या भ्रूण की ये फरियाद बार-बार आ रही थी।

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-‘मैं बेबस हूं बेटी। तेरे पापा कह रहे हैं कि पहले भी लड़की है। एक लड़की की तो कोई बात नहीं। दूसरी लड़की वे नहीं चाहते बेटा। अब तुम्हीं बताओ मैं क्या करूं?’ माँ अपने पेट पर हाथ फेरते हुए धीरे-धीरे बुदबुदाई।

-‘ऐसा मत करो माँ। पापा यदि मुझे मरवाना चाहते हैं तो क्या तू उनका सामना नहीं कर सकती?तुम भी तो किसी की बेटी हो माँ। प्लीज, माँ....मेरे बारे में कुछ तो सोचो। मैंने अभी तक बाहर की दुनिया नहीं देखी है। मैं तो अभी केवल माँ की संवेदना को ही महसूस कर सकती हूं। माँ, तुम कितनी संवेदनशील हो। इतनी निर्दयी तो मत बनो। क्या पापा तुम्हारा बिलकुल भी कहा नहीं मानते?’

-‘तू नहीं जानती बेटी। तेरे पापा कितने जिद्दी हैं। वे एक बार कोई बात सोच लेते हैं तो उसे पूरी करके ही छोड़ते हैं।’

-‘माँ प्लीज...... मेरी कुछ तो मदद करो। मैं अपने जीवन की तुमसे भीख मांग रही हूं। मैं दुनिया में आकर बहुत कुछ करना चाहती हूं माँ। तुम देखना माँ। मैं देश के लिए कुछ ऐसा करूंगी कि जिससे पापा का और तुम्हारा सिर गर्व से ऊंचा हो जाएगा।’

-‘पर मैं क्या करूं बेटा। मैंने कहा न मैं बेबस हूं। एक औरत आँसू बहाने के अलावा और कर भी क्या सकती है!’

-‘ऐसा क्यों सोचती हो माँ। तुम औरत को इतनी कमजोर क्यूं समझती हो? औरत तो शक्ति का पर्याय होती है माँ। जितने पुरुषों ने भी दुनिया में अपना नाम कमाया है, उनके पीछे किसी औरत का ही हाथ रहा है माँ।’

-‘तू कैसे जानती है ये सब? तेरा तो अभी जन्म ही नहीं हुआ! फिर तूने कैसे जान लिया कि प्रत्येक पुरुष की सफलता के पीछे किसी औरत का ही हाथ होता है!’ माँ ने आश्चर्य करते हुए सवाल किया।

-‘मेरी यही तो विशेषता है माँ। मैंने कहा न कि मैं कोई ऐसा काम करूंगी, जिससे तुम सबका सिर गर्व से ऊंचा हो जाएगा। बस तुम तो इतना करो कि मुझे एक बार दुनिया दिखा दो। यह वादा करो माँ।’

-‘वादा कैसे करूं बेटी! तेरे पापा सरकारी कर्मचारी हैं और दो बच्चों के बाद फिर तीसरे बच्चे के जन्म पर पाबंदी है। फिर बेटे की इच्छा भी उनकी अधूरी रह जाएगी।’

-‘भीतर ही भीतर तू भी तो बेटा चाहती है माँ। तुम्हारी इच्छा अधूरी नहीं रहेगी। मैं तुम्हें राह बता सकती हूं माँ। अगर तुम और पापा स्वीकार करो तो? बोलो माँ, बताऊं कोई रास्ता?’

-‘बताओ बेटी, ऐसा कोई रास्ता है तो बताओ। बेटे की इच्छा कैसे पूरी हो सकती है?’

-‘बेटा गोद ले लो माँ। अनाथ आश्रमों में अनेक बच्चे हैं। जो अपने माँ -बाप के प्यार के लिए तरस रहे हैं। उनकी भी इच्छा पूरी हो जाएगी माँ। मैं तेरे फैसले का इन्तजार कर रही हूं माँ। अब तो बचा लो मुझे। फिर अपने सभी मिलकर अनाथ आश्रम चलेंगे और एक भैया गोद ले लेंगे माँ। हमें भैया मिल जाएगा और उसे मम्मी-पापा और दो बहनें। क्यों माँ, मैं ठीक कह रहीं हूं न?’

-‘हां बेटा, तुम जीत गई हो। अब मैं तेरा कहना मानूंगी। चाहे कुछ भी हो जाए!’ इतना कह कर माँ ने अपने पेट पर हौले से हाथ फिराया तो भीतर से उसे राहत की एक लम्बी सी सांस सुनाई दी।


-दीनदयाल शर्मा

‘टाबर टोल़ी’, 10/22 आर. एच. बी. कॉलोनी,

हनुमानगढ़ जं. 335512, राजस्थान

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