शब्द संधान / टर का मेला / डा. सुरेन्द्र वर्मा

सौम्य रंजन लेंका की कलाकृति

बरसात आते ही दादुर मोर और पपीहों की बोली सुनाई देने लगती है। मेढकों का टर्राना शुरू हो जाता है। उनकी टर टर की कर्कश आवाज़ हमारा ध्यान खासतौर पर आकर्षित करती है। जब भी कोई इंसान अनावश्यक रूप से लगातार अशोभनीय बात करता चला जाता है तो भी हम इसे ‘टर टर लगाना’ या ‘टर टर करना’ ही कहते है। टर से हमारा आशय अच्छी न लगाने वाली आवाज़ से होता है। टर का एक अर्थ जिद भी है। हम बच्चों को अक्सर डांटते हुए कहते हैं कि क्या एक ही बात की टर लगा रखी है ? टर इस प्रकार, मेंढकों की आवाज़ है, लगातार की जाने वाली कोई भी अशोभनीय बात है, बच्चों की (और शायद बड़ों की भी) जिद भी है जिसका स्वागत नहीं किया जा सकता।

शहरों में तरह तरह के मेले लगते हैं जहां लोग खरीद-फरोक्त के बहाने और मनोरंजन के लिए मिलते, इकट्ठे होते हैं। पुस्तकों के मेले में आप अपनी पसंद की किताबे देख सकते हैं, खरीद सकते हैं। हस्त-शिल्प मेले में हाथ की बनी चीजों की दूकानें सजाई जाती हैं। इलेक्ट्रोनिक वस्तुओं से लेकर खादी के वस्त्रों तक के मेले आयोजित किए जाते हैं। कुछ मेले विशिष्ट पर्वों से सम्बंधित होते हैं। ऐसा ही एक मेला ईदुलफित्र के दूसरे दिन मुस्लिम बहुल इलाकों में लगता है और उसे “टर का मेला” कहा जाता है। कई शहरों में सालों साल से यह परम्परा चली जा रही है।

मन में अक्सर यह सवाल उठाता है कि आखिर इसे टर का मेला क्यों कहते हैं। वस्तुत: यह मेला सिर्फ बच्चों के लिए होता है। ईद के दिन बच्चों को जो उपहार स्वरूप ईदी मिलती है, बच्चे इस मेले में उसे खर्च करना पसंद करते हैं। इस मेले में खिलौनों की दूकाने होती हैं, खाने-पीने की लज़ीज़ चीजें होती हैं, बच्चों को झुलाने के लिए झूले होते हैं। बहरहाल बच्चे यहाँ आकर खूब धमाल करते हैं, और अपनी मन पसंद चीजें खाते खरीदते हैं। यह मेला बच्चों की ‘जिद’ पूरी करता है। उन्हें आज़ादी से चहकने, टर्राने का मौक़ा देता है। कुछ भी “सटर-पटर” करने के लिए उन्हें अवसर प्रदान करता है। लगता है कि शायद इसीलिए इसे “टर का मेला” कहा जाता है। ‘टर’ बच्चों की जिद है, उनकी टर्रेबाज़ी है। उनकी अनगढ़ बोली और उनकी आज़ाद अभिव्यक्ति है। बच्चों की टर इस मेले को और भी विशिष्ट बनाती है, जिसका आनंद उनके साथ आए उनके अविभावक भी खूब उठाते हैं।

एक कहावत है, “ईद पीछे टर, बारात पीछे धौंसा”। जिस तरह बरात के पीछे बड़ा नगाड़ा (बाजे-ताशे) होते हैं, उसी तरह ईद के बाद टर (का मेला) लगता है। क्या इसका एक अर्थ यह भी लगाया जा सकता है कि जिस तरह बाराती लोग अपनी धौंस जमाने के लिए मशहूर हैं उसी तरह बच्चे ईद के बाद मेले जाने की ‘टर’ लगाते हैं। दोनों को ही रोका नही जा सकता।

एक कहावत यह भी है, “शेखों की शेखी, पठानों की टर”। शेख अगर अपनी शेखी बघारने के लिए मशहूर हैं तो पठान अपनी ‘टर’ (अनर्गल बातों ) के लिए जाने जाते हैं।

बहरहाल कहावतें तो कहावतें हैं। उनका सच कभी पूरा सच नहीं होता। लेकिन यह सच है कि ‘टर’ हिदी में मुख्यत: मेढक की आवाज़ के लिए प्रयुक्त होने वाला एक शब्द है। टर्राना, टर टर करना, टरटराना,- सभी एक ही परिवार के शब्द हैं।

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- डा. सुरेन्द्र वर्मा (मो. ९६२१२२२७७८)

१०. एच आई जी / १, सर्कुलर रोड / इलाहाबाद- २११००१

3 टिप्पणियाँ "शब्द संधान / टर का मेला / डा. सुरेन्द्र वर्मा"

  1. अच्छी जानकारी मिली, क्या स-टर (प-टर ) में टर का यही अर्थ ठीक रुप से बैठता है? और गटर की बात अनुपयुक्त है। यूं ही...

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