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प्रदेश के प्रथम योग गुरु : गजानंद प्रसाद देवांगन

21 जून योग दिवस पर विशेष                 

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                      योग केवल शारीरिक क्रिया नहीं है । यह सिर्फ अंगों को नहीं बल्कि मन को भी साधने की एक प्रक्रिया है । योग का व्यावहारिक और परमार्थिक अर्थ है – स्वार्थ का परमार्थ से , मैं का तू से , व्यष्टि का समष्टि से , अहम का परम से , इड़ा का पिंगला से , शक्ति  का शिव से , विज्ञान का धर्म से और आत्मा का परमात्मा से मिलना । अर्थात एक - दूसरे को आपस में जोड़ते हुये परमात्मा तक जोड़ को सुदृढ़ बनाने की क्रिया योग है – यह कथन है प्रदेश के प्रथम योग गुरु स्व.श्री गजानंद प्रसाद देवांगन जी का ।

                    स्वामी धीरेंद्र ब्रह्मचारी के विश्वायतन योगाश्रम से सन 1971 में योग में डिप्लोमा प्राप्त श्री देवांगन जी  , छत्तीसगढ़ साहित्य का एक जाना पहचाना नाम है  । 1972-1973 से अध्यापनरत स्कूल में , योग की विधिवत शिक्षा देने वाले प्रथम योग गुरु के योगदान को  , प्रत्येक वर्ष मनाये जा रहे अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस 21 जून को स्मरण किया जाना समीचीन होगा , साथ ही  प्रदेश वासियों को बताना और जताना  , उतना जरूरी कि , वर्तमान युग का पहला प्रादेशिक योग गुरु बाहरी नहीं , वरन पूर्ण छत्तीसगढ़िया व्यक्ति है ।

                    1972 में शासकीय शाला धौराभाठा जिला धमतरी में पहली बार योग की शिक्षा स्कूल में इन्हीं के द्वारा दी गई थी । सितम्बर 1973 से शासकीय पूर्व माध्यमिक शाला छुरा , वर्तमान जिला गरियाबंद में स्कूली बच्चों को योगासन की विधिवत जानकारी दी जाती रही थी । गरियाबंद जिले के बीहड़ आदिवासी अंचल में किसी नई विधा का प्रचार प्रसार  , दुरूह कार्य से कम नहीं था । वैसे भी उनका मानना था कि किसी मेहनतकश मजदूर किसान के लिये यह शिक्षा वैसे ही व्यर्थ है , क्योंकि शरीर को कैसे तंदुरुस्त रखना है , मन को कैसे प्रफुल्लित रखना है , एक दूसरे के साथ कैसे मेल मिलाप रखना है – ये सभी इनसे बेहतर कोई नहीं जान सकता । फिर भी  , अनेकों पढ़े लिखे , शारीरिक श्रम से दूर रहने वाले , आधुनिक सोच वाले , जाने कितने लोगों को इनके योग ने लाभ पहुंचाया है । पहले पहल , पढ़े लिखे लोगों ने , योग का खूब मजाक बनाया था । वे  इसे गुरूजी के ढमढम से अधिक कुछ नहीं समझते थे इसे । धीरे धीरे गुरूजी को जानने लगे लोग । उनके शारीरिक बनावट और आंतरिक सौंदर्य का राज लोगों की समझ में आता गया , तब लोगों का झुकाव योग की ओर होता चला गया । पारिवारिक – सामाजिक व्यस्तता तथा  प्रचार प्रसार के अभावों ने इनके योगदान को विस्मृत सा कर दिया था । अन्यथा , इनके बाजू वाले कमरे में रहकर , योग की शिक्षा लेने वाले  ब्रितानी मिस्टर पीटर की तरह , ये भी प्रसिद्ध योग गुरुओं में शुमार होते । फिर भी अवसर मिलने पर , एवं जरूरतमंदों को , जब - तब योग की विधा सिखाते रहे । प्रदेश शासन के  कुछेक योग शिविरों में इनने अपनी उपस्थिति दर्ज करायी थी । स्कूली बच्चों के लिये योग की किताब इन्हीं के नेतृत्व में लिखा गया था -  जो आज भी पढ़े पढ़ाये जा रहे हैं ।

                       गणेश चतुर्थी 1940 को  रायपुर ब्राम्हाणपारा  में जन्मे , श्री रामाधीन देवांगन के मंझले सुपुत्र गजानंद प्रसाद देवांगन का पूरा बचपन धमतरी जनपद के छोटे से गांव धौराभाठा में अभावों के बीच बीता । पिता ने रायपुर के वन विभाग की नौकरी छोड़ , स्वतंत्रता संग्राम में  समय लगाना उचित समझा । धमतरी के सेनानी डा. शोभाराम देवांगन के दामाद श्री रामाधीन देवांगन  ने सुंदरलाल शर्मा के आह्वान पर शहर छोड़ गांव को अपना बसेरा बना लिया । जेल नहीं जाने के कारण इनके पिता को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का दर्जा नहीं मिल सका । इनके परिवार ने बाद के दिनों में दर्जा प्राप्त करने की कोशिश भी नहीं की । आर्थिक अभावों के बीच पढ़ लिखकर शिक्षकीय नौकरी से भरण पोषण करने वाले देवांगन जी ने योग का सिर्फ अभ्यास नहीं किया  , बल्कि जी कर दिखाया है योग को । वे प्रदेश में , इस दिशा में पहचान नहीं बना पाये , परंतु एक अच्छे शिक्षक , समाजसेवी , साहित्यकार के  रूप में आज भी पूजे जा रहें हैं । लोग श्री देवांगन को व्यक्ति नहीं संस्था समझते थे ।       योग को स्थापित होते देखना उनके भाग्य में नहीं था , इसलिये ईश्वर ने 9 दिसम्बर 1911 को अपने समीप बुला लिया इन्हें । 21 जून को मनाये जा रहे अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर  प्रथम प्रादेशिक योग गुरु श्री गजानंद प्रसाद देवांगन का पुण्य स्मरण करते हुये उन्हें श्रद्धांजलि ।

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