शनिवार, 3 जून 2017

समरसता संधान डा. सुरेन्द्र वर्मा

समता, एकता, भ्रातृत्व, सद्भाव, मैत्री, सुसंगतता, समरसता – इन सभी शब्दों में एक पारिवारिक साम्य है। ये इतने मिलते-जुलते हैं जैसे सगे भाई बहन आपस में मिलते जुलते हैं। इनके अर्थ में थोड़ा थोड़ा अंतर होने के बावजूद ये एक दूसरे के लिए इस्तेमाल किए जा सकते हैं। हम सद्भाव कहें या मैत्री, भ्रातृत्व कहें या एकता, समरसता कहें या सुसंगतता, बात लगभग एक ही है।

इनमें ‘समरस’ और ‘समरसता’ शब्द ज़रा कम ही प्रयोग में आते हैं। कई हिन्दी कोशों में ये शायद मिले ही नहीं। लेकिन जब से माननीय नरेन्द्र मोदी जी की “समरसता” शीर्षक से पुस्तक प्रकाशित हुई है, यह शब्द खूब चलन में आ गया है। मोदी जी ने समरसता को सामाजिक सन्दर्भ में मुख्यत: भ्रातृत्व और एकता के लिए प्रयोग किया है।

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यदि हम प्रकृति और उसके नियमों को ध्यान से देखें तो हमें वहां ज़बरदस्त वैविध्य दिखाई देगा। बहुत सी प्राकृतिक संघटनाओं में हमें विरोधाभास भी नज़र आ सकता है। लेकिन प्रकृति के नियम और संघटनाएं कभी भी वस्तुत: एक दूसरे की विरोधी नहीं होतीं। प्राकृतिक नियम एक दूसरे के पूरक होते हैं। उनमें एक सुसंगतता है, समरसता है। प्राकृतिक नियमों में हमें एक प्रकार का पदानुक्रम मिलता है। एक नियम के अंतर्गत कई नियम समाहित हो जाते हैं। वैविध्य है, लेकिन यह वैविध्य कभी विरोध में नहीं बदलता।

लेकिन मनुष्य एक स्वतन्त्र प्राणी है। वह स्वयं को प्राकृतिक नियमों से बंधा नहीं रखना चाहता। प्राकृतिक नियमों को तोड़ने में उसे आनंद आता है। उसके अहम की इससे पुष्टि होती है। यही कारण है कि मानव समाज में परस्पर विरोध की स्थितियां उत्पन्न हो जाती हैं। अपने समाज में मनुष्य ने जो वैविध्य और अनेकताएं निर्मित की हैं वे सहज ही एक-दूसरे से टकराने लगती हैं। धर्मगत, जातिगत वर्चस्व हावी होने लगते हैं। वे स्थितियां सामाजिक व्यवस्था को बनाए रख पाने में कठिनाइयां पैदा करती हैं। भेदभाव घर करने लगता है। भेद भाव की जितनी भी स्थितियां हैं वे सभी सामाजिक समरसता के लिए खतरनाक होती हैं।

समाज में गरीबी और अमीरी के बीच की खाई जब बढ़ने लगती है, तो सामाजिक संतुलन भी बिगड़ने लगता ही। गांधी जी ने एक बार कहा था की प्रकृति के पास इतना कुछ है कि वह हमारी सभी आवश्यक- आवश्यकताओं (नीड्स) की पूर्ति कर सकती है। लेकिन वह हमारे लालच (ग्रीड्स) को संतुष्ट नहीं कर सकती। लेकिन मनुष्य ठहरा एक अत्यंत लालची व्यक्ति, वह अपने लालच की पूर्ति के लिए प्रकृति के नियमों को तोड़ कर उसका दोहन तो करता ही है, कमजोर व्यक्तियों का शोषण भी करता है और इस प्रकार गरीब और अमीर के बीच दूरी बढ़ती जाती है। सामाजिक समरसता के लिए यह खतरे की घंटी होती है।

हर व्यक्ति का रंग-रूप, शारीरिक गठन इत्यादि, अलग अलग होता है। कोई काला है तो कोई गोरा है। लेकिन हम भूल जाते हैं कि सभी का एक ही रंग है भूरा। कोई अधिक भूरा है तो कोई कम भूरा है। अत: रंग को लेकर हम भेद-भाव नहीं कर सकते। इसी प्रकार शारीरिक बल की दृष्टि से महिलाएं पुरुषों से कमज़ोर होती हैं। इसका लाभ उठाकर पुरुष सदैव ही स्त्रियों के ऊपर एक नाजायज़ वर्चस्व कायम करने की कोशिश करता रहा है। अपने वर्चस्व के मद में वह भूल जाता है कि पुरुष और स्त्री एक-दूसरे के पूरक हैं। एक दूसरे के बिना अधूरे हैं। हालात दिन ब दिन इतने खराब होते जा रहे हैं कि पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों की संख्या घटती जा रही है, और समाज दिन ब दिन स्त्रियों के प्रति अधिक से अधिक असहिष्णु होता जा रहा है। सामाजिक विकास और व्यवस्था के लिए यह स्थिति बिलकुल संतोषजनक नहीं कही जा सकती। एक बड़ी कठिनाई यह भी है कि समाज का अधिकतर हिस्सा इस ओर से बिलकुल बेखबर है और वह इस तरह के सभी भेद-भावों को स्वाभाविक मान कर उनकी तरफ से बेफ़िक्र बना हुआ है।

अत: एक बड़ी आवश्यकता यह है कि समाज में समरसता की आवश्यकता के प्रति हम सजग हों और किसी भी भेद-भाव को उस सीमा तक पनपने की इजाज़त न दें जो सामाजिक व्यवस्था के लिए खतरा बन सके। फ्रांस की क्रान्ति समरसता की भावना को स्थापित करने हेतु ही हुई थी। भले ही तब ‘समरसता’ शब्द का प्रयोग न हुआ हो किन्तु भ्रातृत्व, समानता और स्वतंत्रता का लक्ष्य अंतत:, एक शब्द में, समरसता का ही लक्ष्य है। समरसता के लिए ये तीनों ही आवश्यक हैं।

जब हम समरसता की बात करते हैं तो यह जान लेना भी आवश्यक है कि समरसता का आधार वैविध्य है, जहां वैविध्य नहीं है वहां समरसता की आवश्यकता भी नहीं है। इसी प्रकार वैविध्य की कीमत पर समरसता बेमानी है। समरसता में रस है और यदि एक ही रस है तो समरसता बेमजा है, अरोचक है। आपको हिन्दी के किसी कोष में समरसता का एक अर्थ अरोचक भी मिल जाएगा। खाने का स्वाद तभी होता है जब उसमे शठ-रस हों। एक ही रस का खाना, उसे आप समरस भले कहें, अरोचक ही होता है। यही बात समाज में भी है। एक ही तरह के लोग, एक ही धर्म के लोग, एक ही जाति के लोगों का यदि समाज हो तो ज़ाहिर है यह एक अर्थ में समरस तो होगा लेकिन बेमजा होगा। सच्ची समरसता के लिए विविधता बहुत ज़रूरी है। बस विविधता में सामंजस्य होना चाहिए, सुसंगतता होना चाहिए। वास्तविक समरसता इसी में है।

मनोविज्ञान के अनुसार किसी भी स्थिति के तीन पक्ष होते हैं। संज्ञानात्मक पक्ष, क्रियात्मक पक्ष और भावपक्ष। समरसता का भी प्रथम पक्ष संज्ञानात्मक है। सामाजिक कल्याण के लिए समरसता आवश्यक है, इसका संज्ञान लेना ज़रूरी है। जबतक हम समरसता का संज्ञान नहीं लेंगे हम इस दिशा में आगे नहीं बढ़ सकते। युद्ध नहीं, शान्ति; समर नहीं, समरसता – जब तक समाज के मन में इसे दृढ़ता से प्रतिष्ठित नहीं किया जाता तब तक समरसता एक हवा-हवाई अवधारणा ही बनी रहेगी। समरसता का दूसरा पक्ष है क्रियात्मक। समरसता का प्रचार समरसता के संज्ञान के लिए ज़रूरी है, पर यह काफी नहीं है। इसे हमें जीवन में उतारना होगा। और जीवन में उतारने के लिए पर-उपदेश से काम नहीं चलेगा। पर-उपदेश-कुशल तो बहुतेरे हैं। स्वयं से ही समरस व्यवहार आरम्भ करें। हर व्यक्ति जब समरसता का अपनी तईं सेवन करने लगेगा तभी यह समाज में प्रतिष्ठित हो सकेगी। और तीसरे, समरसता का भाव-पक्ष। भावात्मक रूप से समरसता का अर्थ है भ्रातृत्व। जब हमारे मन में हर छोटे-बड़े, अमीर-गरीब, स्त्री-पुरुष, काले-गोरे, के प्रति भ्रातृत्व भाव जाग्रत होगा तो भेद-भाव की समस्याएँ अपने आप ही तिरोहित हो जावेंगीं। वस्तुत: समरसता के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए समरसता का मार्ग ही अपनाना होगा। समरसता आदर्श भी है और उसतक पहुँचाने का मार्ग भी समरसता ही है – एक पंथ औ’ एक संधाना।

--डा. सुरेन्द्र वर्मा (९६२१२२२७७८)

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड / इलाहाबाद -२११००१

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