सोमवार, 5 जून 2017

लघुकथा " पांच से ज्यादा" / राजेंद्र ओझा

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        सुबह जब उठा तो घडी पांच बजकर चालीस मिनट का समय बता रही थी। आसमान से अंधेरा छंट चुका था और घर के पिछवाड़े का आम का पेड़ अब केवल आकार में ही नहीं, पत्तियों, टहनियों और तने में दिखाई देने लगा था।

     चीजों की पहचान उसके मूल रूप में ही होती है। आकार भ्रम भी पैदा करता है।

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    उठने के समय को मैंने पांच बजकर चालीस मिनट कहा, उसे छः बजने में बीस मिनट कम भी तो कहा जा सकता था। समय तो वही होता, कहने का तरीका बदल जाता। ये केवल कहने का बदल जाना है या कुछ और भी छिपा है इसके भीतर। मैं विचार करने लगा। विचार करना हमेशा उडना होता है। पतंग की तरह डोलना- कभी इधर तो कभी उधर। कहने के उस बदल जाने में छिपे को खोज रहा था मैं।

   "पांच बजकर चालीस मिनट कहना" पांच से आगे बल्कि बहुत आगे बढ़ जाना है। आगे बढ़ते जाने का यह अहसास, यह सुख मनुष्य के लिए 'गुब्बारे के भीतर भरी हवा' की तरह है, जो उसे उडाती है ऊपर और ऊपर।

    " छः बजने में बीस मिनट कम"। यह एक हताशा है, जहाँ पहुंचना था वहाँ अभी पहुँच नहीं पाये, अभी और चलना है। 'कम' ही चाहे चलना बचा हो, लेकिन यह " बचा रहना " एक बोझ की तरह पीठ पर टिका होता है, और हमारे आगे बढ़ने की गति धीमी होती चली जाती है।

     चोटी पर पहूंचने के आनंद का बखान शब्द से परे है, श्वांस की तरह यह आनंद भी जीवन को जीने लायक बनाता है। आगे की पहली चोटी        " छः" बजे की थी। मैं तेजी से आगे बढ़ना दिखाने वाले सेकंड के काटे पर सवार हो गया।

    छः बजे वाली चोटी सामने ही थी, छलांग लगाकर उस पर लटक जाने का जी कर रहा था।

राजेंद्र ओझा

9575467733

8770391717

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