बुधवार, 21 जून 2017

पुस्तक समीक्षा- पुस्तक- कुर्सी बिन सब सून

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पुस्तक समीक्षा-

पुस्तक- कुर्सी बिन सब सून ,

व्यंग्यकार- डॉ0गोपाल बाबू शर्मा ,

पृष्ठ-64, मूल्य-70रु प्रकाशन वर्ष-2013ई0

समीक्षक- डॉ.दिनेश पाठक'शशि'

निरन्तर गिरते जा रहे सामाजिक मूल्यों तथा बढ़ती महत्वाकांक्षाओं के इस दौर में व्यंग्य लेखन एक चुनौती से कम नहीं। व्यंग्य स्वयं नहीं जन्मता बल्कि विरोधाभासों का तांडव, व्यंग्य को जन्म देता है। व्यंग्यकार के मन में किसी व्यक्ति की भावनाओं को आहत करने का विचार नहीं होता किन्तु सामाजिक बुराइयों पर भरपूर चोट करने की छटपटाहट उस लेखन को प्रेरित करती है ऐसे में अभिधा व लक्षणा से बात नहीं बनती तो वह व्यंजना का सहारा लेता है।

़व्यंग्य विधा की मुख्य विशेषता, परोक्ष रूप से मीठी मार के द्वारा समाज को सजगता प्रदान करना होता है जिसका निर्वाह व्यंग्यकार को चुनौतीपूर्ण होता है। हिन्दी साहित्य में व्यंग्य लेखन की एक सुदीर्घ परम्परा रही है। भारतेन्दु काल से ही हास्य-व्यंग्य की रचनाएँ होने लगी थीं। द्विवेदी काल में व्यंग्यपूर्ण लेखों की परम्परा का खूब विकास हुआ जो उत्तरोत्तर उन्नयन की ओर बढ़ते हुए आज पूर्ण विकास कर चुका है।

आज का व्यंग्यकार समाज में व्याप्त विसंगतियों के प्रति चौकन्ना है। ऐसे ही सजग रचनाकारों में से एक हैं प्रख्यात व्यंग्यकार डॉ0गोपाल बाबू शर्मा जिन्होंने केवल व्यंग्य ही नहीं लिखे बल्कि अनेक चुनौती पूर्ण विविध विषयों पर अपनी लेखनी चलाकर चमत्कृत किया है। चाहे लघुकथा हो,कविता हो लोक साहित्य हो या निबन्ध या फिर व्यंग्य या शोध हों,डॉ0गोपाल बाबू शर्मा की रचनाओं में कुछ खास होता है कहने का आशय ये कि डॉ0गोपाल बाबू शर्मा की लेखनी ने हिन्दी साहित्य की जिस विधा जिस रूप की ओर अपना रुख किया है उसी को अद्भुत और विशिष्ट रूप प्रदान किया है। इनकी 27वीं पुस्तक-''कुर्सी बिन सब सून'' भी इसी बात की पुष्टि करती है। 64पृष्ठीय

इस पुस्तक में हास्य-व्यंग्य से भरपूर 77 काव्य रचनाएँ समाहित हैं जो पाठक को खिलखिलाने व गुदगुदाने एवं चिंतन करने के लिए बाध्य करने में पूर्ण सक्षम हैं। राजनीति की गन्दगी एवं स्वार्थपरता पर तीखा व्यंग्य करती हुई रचनाएँ -'हैप्पी न्यू ईयर',जन्मदिन,नेता चिंतन,हर हर गंगे,आम और खास,क्यों?,एवं 'ऊँची चीज,मंत्री जी का तर्क,सूखी घास का डर, आदि कई व्यंग्य कविता हैं जो पाठक को सोचने पर मजबूर करती हैं। वर्तमान शिक्षा व्यवस्था की स्थिति का खुलासा 'गधे की चाह' व 'स्कूल चलो' रचनाओं में हुआ है तो सरकारी अस्पतालों की स्थिति पर चोट करती रचना है-''ये अस्पताल है'' क्रिकेट खेल के दौरान होने वाले सरकारी काम की हानि का कच्चा चिट्ठा है रचना-''वाह क्रिकेट वाह''तो लड़की होने की मार्मिक व्यथा प्रकट करती हुई संग्रह- कुर्सी बिन सब सून की रचना है-''हम लड़कियाँ है'' 'डॉ0गोपाल बाबू शर्मा ने अपनी अनुभवी आँखों से जीवन को हर कोण से देखा और परखा है फिर उसके विविध रूपों का यथार्थ चित्रण इस संग्रह की रचनाओं में प्रस्तुत किया है।

''यह जिला जेल है''-जेल के अन्दर की राजनीति एवं भ्रष्टाचार का कच्चा चिट्ठा है । रचनाकार ने हर क्षेत्र की तरह ही साहित्य के क्षेत्र में भी हो रहे भ्रष्ट आचरण को उजागर करने में कोई संकोच नहीं किया है वे अपनी रचना ''अवरुद्ध न होने देंगे'' में कहते हैं-

''मैं पहले भी कवि था/

पर अत्यन्त साधारण/

मुझे कोई जानता तक न था/

कारण/-

मैं किसी ओहदे पर न था।

अब मेरी/जीर्ण-शीर्ण कविताएँ भी/

विशेष साज-सज्जा के साथ/

पुस्तकाकार छप रही हैं। अन्य भाषाओं में उनके/

हो रहे हैं तड़ातड़ अनुवाद/

और वे सरकारी खरीद में /

धड़ाधड़ बिक रही हैं।


जगह-जगह कुकुरमुत्तों की भाँति खुल गये साधु/स्वामी आश्रमों पर भी डॉ0गोपाल बाबू शर्मा ने अपनी बेबाक लेखनी चलाई है।

बानगी देखें-

''ये स्वामी हैं.......जगह-जगह इनके आश्रम हैं/

आश्रमों में/

आलीशान कमरे हैं/

कमरे /

आधुनिक सुख सुविधाओं से भरे हैं/

यहाँ वन यौवनाएँ/

वातावरण को महकाती हैं/

उसको खूबसूरत बनाती हैं।


इस प्रकार इस पुस्तक की प्रत्येक रचना पाठक को गुदगुदाने,खिलखिलाने और वर्तमान विसंगतियों पर सोचने पर मजबूर करने वाली हैं। हिन्दी साहित्य जगत में पुस्तक का भरपूर स्वागत होगा ऐसी आशा है।

डॉ.दिनेश पाठक'शशि' 28 सारंग विहार,मथुरा-281006 मेाबा.-09760535755 ईमेल-drdinesh57@gmail.com

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