370010869858007
नीचे टैक्स्ट बॉक्स से रचनाएँ अथवा रचनाकार खोजें -
 नाका संपर्क : rachanakar@gmail.com अधिक जानकारी यहाँ [लिंक] देखें.

****

Loading...

पुस्तक समीक्षा- पुस्तक- कुर्सी बिन सब सून

image

पुस्तक समीक्षा-

पुस्तक- कुर्सी बिन सब सून ,

व्यंग्यकार- डॉ0गोपाल बाबू शर्मा ,

पृष्ठ-64, मूल्य-70रु प्रकाशन वर्ष-2013ई0

समीक्षक- डॉ.दिनेश पाठक'शशि'

निरन्तर गिरते जा रहे सामाजिक मूल्यों तथा बढ़ती महत्वाकांक्षाओं के इस दौर में व्यंग्य लेखन एक चुनौती से कम नहीं। व्यंग्य स्वयं नहीं जन्मता बल्कि विरोधाभासों का तांडव, व्यंग्य को जन्म देता है। व्यंग्यकार के मन में किसी व्यक्ति की भावनाओं को आहत करने का विचार नहीं होता किन्तु सामाजिक बुराइयों पर भरपूर चोट करने की छटपटाहट उस लेखन को प्रेरित करती है ऐसे में अभिधा व लक्षणा से बात नहीं बनती तो वह व्यंजना का सहारा लेता है।

़व्यंग्य विधा की मुख्य विशेषता, परोक्ष रूप से मीठी मार के द्वारा समाज को सजगता प्रदान करना होता है जिसका निर्वाह व्यंग्यकार को चुनौतीपूर्ण होता है। हिन्दी साहित्य में व्यंग्य लेखन की एक सुदीर्घ परम्परा रही है। भारतेन्दु काल से ही हास्य-व्यंग्य की रचनाएँ होने लगी थीं। द्विवेदी काल में व्यंग्यपूर्ण लेखों की परम्परा का खूब विकास हुआ जो उत्तरोत्तर उन्नयन की ओर बढ़ते हुए आज पूर्ण विकास कर चुका है।

आज का व्यंग्यकार समाज में व्याप्त विसंगतियों के प्रति चौकन्ना है। ऐसे ही सजग रचनाकारों में से एक हैं प्रख्यात व्यंग्यकार डॉ0गोपाल बाबू शर्मा जिन्होंने केवल व्यंग्य ही नहीं लिखे बल्कि अनेक चुनौती पूर्ण विविध विषयों पर अपनी लेखनी चलाकर चमत्कृत किया है। चाहे लघुकथा हो,कविता हो लोक साहित्य हो या निबन्ध या फिर व्यंग्य या शोध हों,डॉ0गोपाल बाबू शर्मा की रचनाओं में कुछ खास होता है कहने का आशय ये कि डॉ0गोपाल बाबू शर्मा की लेखनी ने हिन्दी साहित्य की जिस विधा जिस रूप की ओर अपना रुख किया है उसी को अद्भुत और विशिष्ट रूप प्रदान किया है। इनकी 27वीं पुस्तक-''कुर्सी बिन सब सून'' भी इसी बात की पुष्टि करती है। 64पृष्ठीय

इस पुस्तक में हास्य-व्यंग्य से भरपूर 77 काव्य रचनाएँ समाहित हैं जो पाठक को खिलखिलाने व गुदगुदाने एवं चिंतन करने के लिए बाध्य करने में पूर्ण सक्षम हैं। राजनीति की गन्दगी एवं स्वार्थपरता पर तीखा व्यंग्य करती हुई रचनाएँ -'हैप्पी न्यू ईयर',जन्मदिन,नेता चिंतन,हर हर गंगे,आम और खास,क्यों?,एवं 'ऊँची चीज,मंत्री जी का तर्क,सूखी घास का डर, आदि कई व्यंग्य कविता हैं जो पाठक को सोचने पर मजबूर करती हैं। वर्तमान शिक्षा व्यवस्था की स्थिति का खुलासा 'गधे की चाह' व 'स्कूल चलो' रचनाओं में हुआ है तो सरकारी अस्पतालों की स्थिति पर चोट करती रचना है-''ये अस्पताल है'' क्रिकेट खेल के दौरान होने वाले सरकारी काम की हानि का कच्चा चिट्ठा है रचना-''वाह क्रिकेट वाह''तो लड़की होने की मार्मिक व्यथा प्रकट करती हुई संग्रह- कुर्सी बिन सब सून की रचना है-''हम लड़कियाँ है'' 'डॉ0गोपाल बाबू शर्मा ने अपनी अनुभवी आँखों से जीवन को हर कोण से देखा और परखा है फिर उसके विविध रूपों का यथार्थ चित्रण इस संग्रह की रचनाओं में प्रस्तुत किया है।

''यह जिला जेल है''-जेल के अन्दर की राजनीति एवं भ्रष्टाचार का कच्चा चिट्ठा है । रचनाकार ने हर क्षेत्र की तरह ही साहित्य के क्षेत्र में भी हो रहे भ्रष्ट आचरण को उजागर करने में कोई संकोच नहीं किया है वे अपनी रचना ''अवरुद्ध न होने देंगे'' में कहते हैं-

''मैं पहले भी कवि था/

पर अत्यन्त साधारण/

मुझे कोई जानता तक न था/

कारण/-

मैं किसी ओहदे पर न था।

अब मेरी/जीर्ण-शीर्ण कविताएँ भी/

विशेष साज-सज्जा के साथ/

पुस्तकाकार छप रही हैं। अन्य भाषाओं में उनके/

हो रहे हैं तड़ातड़ अनुवाद/

और वे सरकारी खरीद में /

धड़ाधड़ बिक रही हैं।


जगह-जगह कुकुरमुत्तों की भाँति खुल गये साधु/स्वामी आश्रमों पर भी डॉ0गोपाल बाबू शर्मा ने अपनी बेबाक लेखनी चलाई है।

बानगी देखें-

''ये स्वामी हैं.......जगह-जगह इनके आश्रम हैं/

आश्रमों में/

आलीशान कमरे हैं/

कमरे /

आधुनिक सुख सुविधाओं से भरे हैं/

यहाँ वन यौवनाएँ/

वातावरण को महकाती हैं/

उसको खूबसूरत बनाती हैं।


इस प्रकार इस पुस्तक की प्रत्येक रचना पाठक को गुदगुदाने,खिलखिलाने और वर्तमान विसंगतियों पर सोचने पर मजबूर करने वाली हैं। हिन्दी साहित्य जगत में पुस्तक का भरपूर स्वागत होगा ऐसी आशा है।

डॉ.दिनेश पाठक'शशि' 28 सारंग विहार,मथुरा-281006 मेाबा.-09760535755 ईमेल-drdinesh57@gmail.com

समीक्षा 7286690435666908992

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

emo-but-icon

मुख्यपृष्ठ item

रचनाकार में छपें. लाखों पाठकों तक पहुँचें, तुरंत!

प्रकाशनार्थ रचनाएँ आमंत्रित हैं.

   प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 14,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही रचनाकार से जुड़ें.

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है. किसी भी फ़ॉन्ट में रचनाएं इस पते पर ईमेल करें :

rachanakar@gmail.com
कॉपीराइट@लेखकाधीन. सर्वाधिकार सुरक्षित. बिना अनुमति किसी भी सामग्री का अन्यत्र किसी भी रूप में उपयोग व पुनर्प्रकाशन वर्जित है.
उद्धरण स्वरूप संक्षेप या शुरूआती पैरा देकर मूल रचनाकार में प्रकाशित रचना का साभार लिंक दिया जा सकता है.

इस साइट का उपयोग कर आप इस साइट की गोपनीयता नीति से सहमत होते हैं.

नाका में प्रकाशनार्थ रचनाएँ भेजने संबंधी अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

आवश्यक सूचना : कृपया ध्यान दें -

कविता / ग़ज़ल स्तम्भ के लिए, कृपया न्यूनतम 10 रचनाएँ एक साथ भेजें, छिट-पुट एकल कविताएँ कृपया न भेजें, बल्कि उन्हें एकत्र कर व संकलित कर भेजें. एकल व छिट-पुट कविताओं को अलग से प्रकाशित किया जाना संभव नहीं हो पाता है. अतः उन्हें समय समय पर संकलित कर प्रकाशित किया जाएगा. आपके सहयोग के लिए धन्यवाद.

*******


कुछ और दिलचस्प रचनाएँ

फ़ेसबुक में पसंद करें

---प्रायोजक---

---***---

ब्लॉग आर्काइव