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सिर्फ़ डेढ़ सौ रू० (कहानी) / डॉ० आसिफ़ सईद

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करवट बदलते-बदलते आधी रात से ज़्यादा का वक़्त हो गया था लेकिन नींद थी कि आने का नाम ही नहीं ले रही थी। बेचैन हो सुबह उठ खड़ा हुआ और एक गिलास म...

हेमराज की कलाकृति

करवट बदलते-बदलते आधी रात से ज़्यादा का वक़्त हो गया था लेकिन नींद थी कि आने का नाम ही नहीं ले रही थी। बेचैन हो सुबह उठ खड़ा हुआ और एक गिलास में पानी निकाल कर वह बाहर बॉलकनी में आया, तभी सामने खिड़की में उसे बहुत ही हल्की रोशनी में समद भाई नमाज़ पढ़ते नज़र आये, उसने अन्दर आकर घड़ी देखी तो तीन बजे थे. वह समद भाई के बारे में सोचता हुआ लेट गया, जब सुबह आँख खुली तो घड़ी में दस बज रहे थे, वह जल्दी से तैयार हो कॉलेज पहुँच गया। सुबह ग्रेजुएशन कर रहा था और गाँव का रहने वाला था दूसरे माँ बाप की तरह सुबह के माँ-बाप का भी सपना था कि उनका बेटा पढ़-लिखकर बहुत बड़ा आदमी बने. और अपने गाँव का नाम ख़ूब रोशन करे. उसे शहर आए तीसरा साल चल रहा था।

ख़्वाब और ख़्वाहिश ज़रूरी नहीं कि यह पूरी हों, पर इन्सान ज़िन्दगी में न जाने कैसे-कैसे ख़्वाब देख लेता है, ऐसा ही एक ख़्वाब सुबह ने देखा है अन्जुम के लिए, अन्जुम क़ुदरत का एक रंगीन शाहकार जिसका नाम सुनते ही सुबह के दिल की धड़कने तेज़ हो जाती हैं, जिसकी एक झलक के लिए वह घण्टों कहीं भी एक टांग पर खड़ा रह सकता है, जिसकी ख़ातिर वह दुनिया का कोई भी मुश्किल से मुश्किल काम कर सकता है, अपनी हर दुआ में वह ख़ुदा से रो-रो कर सिर्फ़ और सिर्फ़ अन्जुम को ही माँगता है, लेकिन वह है कि उसकी तरफ़ कभी निगाह उठा कर भी नहीं देखती। बहुत पहले ही उसके माँ बाप ने उसकी पढ़ाई भी बन्द करा दी थी, अब तो बस वह सुबह को कभी-कभी ही नज़र आती थी उसके दीदार का केवल एक ही रास्ता रह गया था उसकी गली के अनगिनत चक्कर लगाना, और उसके मकान के सामने वाली दुकान पर घण्टों यह देखना कि वह कब अपनी खिड़की से झाँकती है और उसकी तरफ़ कब एक अनचाही और बेरूख़ी निगाह से देखती है, सुबह के लिए उसका इतना देखना ही बहुत था इस देखने के लिए ही उसने एक दुकान वाले से दोस्ती की थी, और न चाहते हुए भी उसकी दुकान से बेहद ग़ैर ज़रूरी सामान ख़रीदता था, ताकि वह अपनी दुकान पर उसे ज़्यादा से ज़्यादा रूकने और टिकने का मौक़ा दे।इस तरह आते हुए उसे तक़रीबन एक साल हो रहा था, लेकिन अन्जुम से बात करने का उसे ठीक से मौक़ा ही नहीं मिल पा रहा था, सुबह समद भाई की बहुत इज़्ज़त करता था, और समद भाई भी उसको बिल्कुल अपने छोटे भाई की तरह ही मानते थे। कुछ दिन से वो कमज़ोर होता जा रहा था। उसको देखकर साफ़ लगता था कि वह परेशान है उसको इस तरह परेशान देखकर समद भाई से रहा न गया और एक दिन उन्होंने उससे सवाल कर डाला, कि वह क्या परेशानी है जो तुम्हारे चेहरे से साफ़ नज़र आती है, तुम क्यों खोए-खोए रहते हो, मैं काफ़ी दिन से देख रहा हूँ कि तुम मुझसे कुछ छुपा रहे हो। अगर तुम मुझे अपना भाई मानते हो तो मुझे सच-सच बताना कि क्या बात है तुम्हें मेरी क़सम है। समद भाई की बात सुन वह सोच में पढ़ गया कि वह उन्हें कैसे बताए, पर समद भाई ने उसे अपनी क़सम दे दी थी इसलिए बताना ज़रूरी था। वह बोला समद भाई बात कहाँ से शुरू करूँ समझ में नहीं आ रहा। वह बोले, तुम मुझे अपना एक अच्छा दोस्त समझ कर सब कुछ बता सकते हो, शायद मैं तुम्हारी कुछ मदद कर सकूँ। वह बोला, समद भाई मैं अन्जुम नाम की एक लड़की से बेतहाशा प्यार करता हूँ, मैं उसके बिना ज़िन्दा नहीं रह सकता, अब तो किसी भी बात में मेरा दिल नहीं लगता, हर वक़्त निगाहों में वो ही बसी रहती है, मैं जो भी काम करता हूँ भाई मुझे बस वो ही नज़र आती है, उसके बिना मैं ज़िन्दा नहीं रह सकता, समझ में नहीं आता मैं क्या करूँ। उसकी बात सुन समद भाई बोले कि क्या वह जानती है कि तुम उसे इतना चाहते हो, वह बोला हाँ भाई। लेकिन वह तुम्हें नहीं चाहती, हैं न, हाँ भाई! मैं तुम्हारी पूरी बात समझ चुका हूँ, सुबह अब रात ज़्यादा हो रही है कल कुछ प्लानिंग करते हैं। अब मैं चलता हूँ सुबह स्कूल में पढ़ाने की भी तैयारी करनी है।

वह कमरे पर आकर नमाज़ पढ़ते हैं और फिर कुछ देर किताबें पढ़ने के बाद वह लेट जाते हैं और सोचते हैं कि फिर वही एक तरफ़ा प्यार? उन्हें अपने दिन याद आ जाते हैं कि क्या नहीं किया था उन्होंने सबा का प्यार पाने के लिए वह कब हवा के ठंडे झोंके की तरह उनकी ज़िन्दगी में आई, और कभी न ख़त्म होने वाला इन्तेज़ार छोड़ गई, तक़रीबन दस साल हो जाएँगे उसको देखे हुए, उसका वह क़ातिल मुस्कराना उनके लिए दुनिया में ही जन्नत के नज़ारे ला देता था, उसकी वह दिलकश मासूम बातें जिनको सुनकर उन्हें लगता था कि उसके दिल में भी उतनी ही मोहब्बत है जितनी कि उनके दिल में। पर डरते थे और उनके पसंदीदा शायर की यह पंक्तियाँ भी उन्हें सबा से कुछ कहने को रोक देती थीं............

''तेरी साँसों की थकन तेरी निगाहों का सुकूत,

दर हक़ीकत कोई रंगीन शरारत ही न हो।

मैं जिसे प्यार का अन्दाज़ समझ बैठा हूँ ,

वो तबस्सुम वो तक़ल्लुम तेरी आदत ही न हो।।

मशहूर शायर साहिर लुधियानवी ने अपने इस गीत में शायद ठीक ही कहा था, और बिजली तो उस दिन गिरी जिस दिन सबा ने एक ही झटके में उनके प्यार को ठुकरा दिया, दो साल के लम्बे इन्तेज़ार के बाद बड़ी हिम्मत करके तो उन्होंने उसे प्रपोज़ किया था, पर उसे मना करने में ज़र्रे बराबर भी अफ़सोस नहीं था, शायद उसकी ज़िन्दगी में उनके जैसे न जाने कितने और लोग होंगे, जिनके प्यार को सबा ने ठुकराया होगा, जज़्बातों से खेलना शायद उसका पुराना शौक था, लेकिन दिल था कि इस हक़ीकत का सामना करने को तैयार ही न था और छोटे बच्चे की मानिन्द उस सबा रूपी खिलौने को पाने की ज़िद पर अड़ा रहा। दिल और दिमाग़ के बीच बरसों बरस कशमकश चलती रही, दिल कहता था कि कुछ तो उसके दिल में भी है, लेकिन दिमाग़ कहता था कि यह सब तेरे दिल का वहम है। और धीरे-धीरे वक़्त के साथ दिल पर दिमाग़ की फ़तह हो ही गई, सचमुच नादान दिल ने बड़े धोखे दिए और साथ ही दीं, यादों की वो सौग़ात जो रहती ज़िन्दगी तक साथ रहेंगी। और आज वही धोका और वही यादें सुबह की ज़िन्दगी में साथ देने के लिए तैयार खड़े हैं, यह सब सोचते-सोचते सुबह हो गई और फ़ज्र की अज़ान उन्हें ख़्यालों की दुनिया से हक़ीकत की दुनिया में ले आई, कब रात बीत गई पता ही नहीं चला, लेकिन यह उनके लिए कोई नई बात नहीं थी? उन्होंने व़ुज़ू कर नमाज़ पढ़ी और दुआ माँगी, कि या ख़ुदा जो ख़ुशी और प्यार मुझे नहीं मिल पाया वो सुबह को दे दे, तेरा नेक और मासूम बन्दा है।

समद भाई स्कूल में पढ़ाते थे पर आज स्कूल में उनका ध्यान पूरी तरह सुबह की तरफ़ ही था कि क्या तरक़ीब निकाली जाए कि अन्जुम भी सुबह को चाहने लगे। पर वो क्या तरक़ीब निकालते वो तो खुद नाक़ाम आशिक थे, उन्होंने तो सबा की नफ़रत से मुहब्बत की थी और इसी लिए आज तक शादी भी नहीं की। अचानक उन्हें शाहिद का ख़्याल आया जो अपने हुनर का मास्टर था। उसके पास न जाने क्या कला थी, एक से बढ़कर एक लड़की उस पर फ़िदा हो जाती थी। वह स्कूल से छुट्टी के बाद शाहिद की दुकान पर पहुँचे, वह समद भाई को बहुत मानता था, दुकान के ऊपर ही उसका घर भी था। समद भाई को अचानक आया देखकर वह बहुत ख़ुश हुआ और बड़ी गर्म जोशी से एक शेर सुनाने लगा-'' किसी के ज़र्फ़ से बढ़कर न कर महरो वफ़ा हरगिज़, कि इस बेजाँ शराफ़त से बड़े नुकसान होते हैं।'' समद भाई शाहिद को ग़ौर से देखने लगे, उसने उन्हें फिर पुराने दिनों की याद ताज़ा करा दी थी और इस शेर के ज़रिए उसने बहुत गहरी बात कह दी थी। शाहिद बोला, भाई जान कहाँ खो गए। तुम्हारे शेर की गहराई में खो गया था, और तुम्हारा इशारा भी समझ चुका हूँ, पर किसी के क़रीब जाये बग़ैर उसके ज़र्फ़ की पहचान कहाँ होती है मेरे दोस्त। अगर सबा ने मुझे बेवकूफ़ समझ कर फ़ायदा उठाया तो यह उसका ज़र्फ़ था, और मैंने उसे मुहब्बत ठुकराने के बाद भी फ़ायदा पहुँचाया तो यह मेरा ज़र्फ़ है। फिर ऊपर वाले ने भी तो सब कुछ देखा, वो किसलिए है? पुरानी सब बातों को भूल जाओ शाहिद मैं भी भूल चुका हूँ। भाई जान आप ग़लत समझ रहे हैं मेरा इशारा सबा की तरफ़ नहीं था, मैं तो बस यह कह रहा था कि कब तक आप दुनिया को फ़ायदा पहुँचाते रहेंगे, शादी करके घर बसा लीजिए। समद भाई को ख़ामोश देख शाहिद नौकर से बोला भाईजान आये हैं जा ऊपर जाकर अपनी भाभी से खाने की बोल आ, समद भाई ने मना किया पर वह न माना। थोड़ी देर बाद ऊपर खाना लगा दिया गया और फिर खाना खाने के बाद समद भाई ने शाहिद को सुबह की कहानी सुनाई, पूरी बात सुन कर शाहिद ने उससे मिलने की ख़्वाहिश ज़ाहिर की।

उन्होंने कहा, ठीक है रात को घर आना मैं तुम्हें उससे मिलवा दूगाँ। रात को शाहिद के आने के बाद सुबह को बुलाया गया, और उसकी पूरी दास्ताँ शाहिद ने बड़े ग़ौर से सुनी कि किस तरह ग्रेजुएशन में दाख़िले के बाद वह अन्जुम का दीवाना हो गया, और एक साल तक वह उसके पीछे पागलों की तरह लगा रहा, पर उसकी पाक मुहब्बत अन्जुम के पत्थर दिल को ज़रा भी न पिघला सकी, और उस पर सितम यह हुआ कि अन्जुम ने पढ़ाई छोड़ घर की चारदिवारी पकड़ ली। शाहिद सुबह से बोला कि तुम मुझे उस लड़की से एक बार मिलवा सकते हो। मिलवा तो नहीं सकता बड़े भाई पर दिखा दूगाँ कि यह अन्जुम है, शाहिद बोला ठीक है किसी दिन तुम मुझे अपने साथ ले चलना। बड़े भाई किसी दिन क्यों कल शाम को चलिए। शाहिद बोला ठीक है मैं कल वक़्त पर आ जाऊगाँ पर तुम तैयार मिलना।

दूसरे दिन शाम को सुबह शाहिद को लेकर अन्जुम की गली में पहुँच गया और जनरल स्टोर वाले की दुकान पर पहुँच दो कोल्ड ड्रिंक्स का आर्डर दिया, पर शाहिद ने कोल्ड ड्रिंक्स पीने से पहले ही कह दिया कि पेय-मेन्ट मैं करूंगा, मैं तुमसे बड़ा हूँ और कमा भी रहा हूँ। इतना सुनने के बाद सुबह शाहिद से कुछ न बोल पाया। उसने अन्जुम के बारे में बताया कि भाई वह करीब छः महीने से नौकरी कर रही है सुबह कहीं जाती है और तक़रीबन इसी टाईम रोज़ आती है। दोनों उसके दीदार के लिए एक घण्टे तक बैठे रहे, अचानक सुबह बोला, भाई वह देखो अन्जुम आ रही है, शाहिद ने अन्जुम को बड़े ग़ौर से देखा और चेहरा फेर लिया। अन्जुम अपनी किसी दोस्त के साथ थी और सुबह को हिकारत भरी हल्की निग़ाह से देखते हुए घर में दाख़िल हो गयी, सुबह ने शाहिद भाई को देखा जो सिगरेट के कश लगाते हुए छल्ले बना बनाकर धुआँ उड़ा रहे थे और उनके चेहरे के तास्सुरात भी कुछ बदले हुए थे सचमुच शाहिद के चेहरे पर एक अजीब सी शैतानी मुस्कान थी। सुबह बोला बड़े भाई आपने उसको देख तो लिया न, शाहिद बोला ठीक है कल 11 बजे सुबह तुम तैयार रहना तुम्हें मेरे साथ एक जगह चलना है। सुबह सोचने लगा पता नहीं यह मुझे कहाँ ले जाना चाहते हैं, लेकिन उसने कहा ठीक है बड़े भाई मैं आपको तैयार मिलूंगा। दूसरे दिन 11 बजे वह शाहिद भाई की गाड़ी पर बैठ उनके साथ अनजान जगह के लिए चल दिया। रास्ते में शाहिद ने सुबह से सवाल किया कि तुम अन्जुम को कितना चाहते हो। सुबह बोला अपनी जान से ज़्यादा। तुमने आज तक उसके लिए क्या किया है कुछ गिफ़्ट वगैराह दिया है उसे, सुबह बोला नहीं बड़े भाई। फ़िर तुम यह कैसे सोचते हो कि वह भी तुम्हें चाहे, तुमसे प्यार करे? सुबह के पास इस बात का कोई जवाब न था। शाहिद बोला तुम्हें पता है समद भाई भी एक लड़की को चाहते थे, और मेरी नज़र में तुमसे सौ गुना ज़्यादा चाहते होंगे, और हर तरह से उसका दिल जीतने की कोशिश भी की, और पता है बदले में उन्हें क्या मिला। उस लड़की ने समद भाई से पचासों बार काम लिया और एक बार भी कभी शुक्रिया नहीं कहा, अगर कोई उस लड़की के सामने समद भाई का ज़िक्र भी करता तो वह कहती कि मैं तो उन्हें जानती भी नहीं हूँ, लेकिन समद भाई ने सब कुछ जानते हुए भी कि वह उनकी मुहब्बत का नाजायज़ फ़ायदा उठा रही है उस कमज़र्फ़ लड़की की मदद की। और उस ज़लील लड़की ने एक दिन उनपर झूठा इल्ज़ाम लगाकर कि तुम मुझे जगह-जगह बदनाम कर रहे हो, कहकर हमेशा के लिए ताल्लुक़ात ख़त्म कर लिए। मुहब्बत और मदद का उस कमबख़्त लड़की ने समद भाई को यह सिला दिया। और एक बात बता दूँ सुबह, मुहब्बत अब सिर्फ़ किताबों में रह गई है हक़ीकत में नहीं। आज मुहब्बत रण्डी के कोठे पर सिर्फ़ डेढ़ सौ रू० में मिलती है। तुम सोच रहे होगे कि मैं तुमसे कैसी घटिया बातें कर रहा हूँ लेकिन आज के बाद तुम भी मेरी यह बात मानोंगे, और हक़ीकत का सामना करना सीखोगे। सुबह बोला, नहीं शाहिद भाई आज भी दुनिया मंे अच्छे लोग हैं सच्चे लोग हैं, फिर अपने समद भाई को ही देख लो। शाहिद बोला, बरसों से उन्हें ही तो देख रहा हूँ, कि कितने बड़े बेवकूफ़ हैं। बेवकूफ़ नहीं हैं समद भाईजान, वो एक शरीफ़ और नेक दिल इन्सान हैं अगर किसी ने उनके साथ बुरा किया या शराफ़त का नाजायज़ फ़ायदा उठाया है, तो आप देख लेना शाहिद भाई ऊपर वाला उसको कभी भी चैन से नहीं रहने देगा, वो शक्स भी हमेशा परेशान रहेगा, उसके यहाँ देर है अन्धेर नहीं। शाहिद बोला चलो देखेंगे।

कुछ लोग दुनिया में ऐसे होते हैं जिन्हें न इज़्ज़त ही रास आती है और न ही मुहब्बत, और जो लड़की समद भाई की नहीं हो सकी, तुम देखना शाहिद भाई वो दुनिया में किसी की भी सगी नहीं हो सकती, चाहे उसका शौहर की क्यों न हो। 40 मिनट के बाद गाड़ी एक सुनसान कॉलोनी में जाकर रूकी, शाहिद बोला जाओ सामने वाले मकान की बैल बजा दो, शाहिद ख़ुद गाड़ी पर बैठा रहा। सामने दरवाज़ा खुला और एक 50 साल की औरत बाहर आई, पहले उसने सुबह की ओर देखा, लेकिन शाहिद को देख वह मुस्कराई और बोली। आइये जनाब काफ़ी दिन बाद तशरीफ़ लाए, और फिर दोनों उस औरत के साथ अन्दर चले गये, शाहिद बोला मैडम माल कहाँ है। वह औरत बोली, छः सात हैं, ऊपर जाकर देख लो? शाहिद ऊपर चला गया, सुबह की समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि यह सब क्या हो रहा है, इतने में शाहिद ऊपर से एक लड़की का हाथ पकड़े नीचे आ रहा था, नीचे आकर उसने उस मैडम को एक सौ पचास रू० निकाल कर दिये, सुबह भौंचक्का सा यह सब देख रहा था। उसकी तो दुनिया लुट चुकी थी, जीने का मकसद ही ख़त्म हो चला था, लगता था धड़कन बन्द हो गई हो। सामने और कोई नहीं उसके ख़्वाबों की मासूम मलिका अन्जुम थी जिसको कि वह अपने रब से भी ज़्यादा पूजता था, हर वक़्त जिसका चेहरा उसकी निगाहों में बसा रहता था चाहे वह नमाज़ ही क्यों न पढ़ रहा हो। लेकिन आज वही अन्जुम शर्म से अपनी गर्दन झुकाए सज़ाए आफ़्ता मुजरिम की तरह खड़ी थी। शाहिद ने सुबह की तरफ़ देखा जो बिल्कुल पत्थर लग रहा था, उसके कन्धे पर हाथ रखते हुए शाहिद बोला, इसे सामने वाले कमरे में ले जाओ और इसके साथ जो करना चाहते हो कर लो।

अचानक सुबह की आँखों से आँसूओं की गंगा, यमुना बहने लगी, और वह रोता हुआ अन्जुम के पास जाकर बोला, बस सिर्फ़ डेढ़ सौ रू0? और इतना कहकर दरवाज़े के बाहर पहुँच सड़क पर रोता हुआ बेतहाशा भागता गया। शाहिद ने जल्दी से मैडम से पैसे वापस माँगे और गाड़ी स्टार्ट कर सुबह के पीछे गया, पर वह उसे कहीं नहीं मिला, समद भाई के घर पहुँचा तो वहाँ भी ताला लगा था, फोन दोनों में से किसी के पास नहीं था और आख़िर शाहिद दूसरे दिन मिलने की सोच अपने घर की तरफ़ चल दिया। दूसरे दिन छुट्टी होने पर शाहिद ने समद भाई को स्कूल के बाहर पकड़ा और सारी कहानी सुनाई। सारी बात सुनने के बाद उन्हें शाहिद की नासमझी और सुबह की हालत के बारे में सोच फ़िक्र हुई, वह बोले शाहिद तुमने ठीक नहीं किया, जल्दी चलो उसके कमरे की तरफ़। पन्द्रह मिनट में ही उसने गाड़ी सुबह के कमरे के बाहर लगा दी। पर कमरे में ताला लगा था, दोनों सोचने लगे कहाँ गया होगा, तभी अचानक सामने मकान मालिक नज़र आया, समद भाई ने भागकर उससे पूछा, आपने सुबह को कहीं देखा है। वह बोला कि सुबह तो सुबह अपना सारा सामान लेकर स्टेशन की तरफ़ चला गया, पता नहीं वह बड़ा परेशान लग रहा था। मेरे मकान का किराया और डेढ़ सौ रू० आपके लिए दे गया है कह रहा था यह शाहिद भाई को पहुँचा दें। समद भाई की आँखों से आँसू की दो बूंदे लुड़क गयीं, शाहिद को अब अपनी ग़लती का अहसास हुआ कि उसने मौके की नज़ाकत को नहीं समझा। वह बोला, भाई जान मैंने शायद कुछ ग़लत कर दिया, पर मैंने तो अन्जुम को उसके हवाले कर दिया था कि जो चाहे उसके साथ कर ले? समद भाई बोले शाहिद तुम नहीं समझोगे, क्यों कि तुमने कभी किसी से पाक और सच्ची मुहब्बत नहीं की, अगर की होती तो तुम्हें इस बात का अहसास होता कि अचानक दिल टूटने पर क्या बीतती है, तुमने तो बस?

यह सुबह का आख़िरी साल था उसके कैरियर के साथ-साथ उसके माँ-बाप के ख़्वाब भी अधूरे रह गए। समद भाई के पास उसके घर का कोई पता भी तो न था, वह तो बस इतना जानते थे कि वह इलाहाबाद के किसी गाँव से यहाँ पढ़ने आया है पता नहीं अब किस हाल में होगा। शाहिद की तरफ़ देख वह बोले, ठीक है शाहिद तुम अपनी दुकान को देखो फिर मुलाकात करते हैं, और वह सुकून की तलाश में मस्ज़िद की तरफ चल देते हैं, यहाँ से बेहतर जगह उनकी नज़र में दूसरी कहीं नहीं थी, उन्हें ऐसा लग रहा था जैसे सीने से उनका दिल निकला जा रहा हो, जैसे सब कुछ उनके साथ हुआ हो, एक अजीब सा दर्द था, दिल रोना चाहता था, पर भीड़ की वजह से वह दिल ही दिल में ख़ून के आँसू रो रहा था।

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डॉ आसिफ़ सईद

मोब न0- 9359499216

G4, रिज़वी अपार्टमेन्ट . II

मेडिकल रोड, अलीगढ़

(उ.प्र) 202002

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नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,90,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,22,पाठकीय,61,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,329,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी 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कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,648,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,688,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,14,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,55,साहित्यिक गतिविधियाँ,184,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,58,हास्य-व्यंग्य,68,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
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रचनाकार: सिर्फ़ डेढ़ सौ रू० (कहानी) / डॉ० आसिफ़ सईद
सिर्फ़ डेढ़ सौ रू० (कहानी) / डॉ० आसिफ़ सईद
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