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संत कबीर / ललित वर्मा"अंतर्जश्न"

कबीर जयंती 9 जून पर विशेष


परमसंत कबीर दास जी का आज जन्मदिवस है, अतः आइये भारतीय समाज, धर्म व जनमानस के उत्थान के लिए उनके द्वारा किये गये योगदान को याद करें ।


कबीर दास जी का जन्म ऐसे समय में हुआ था, जब भारतीय समाज में जातिवाद, कुरीति, पाखण्ड, आडंबर, बलिप्रथा..... आदि का बोलबाला था, समस्त भारतीय समाज धर्मांधता की बेड़ी में जकड़ा हुआ था। हिंदू समाज एक तरफ तो मुस्लिम राजाओं की धर्मांधता की शिकार थी, तो दूसरी तरफ पंडित-पुरोहितों के कर्मकाण्ड व पाखण्ड में उलझी हुई थी, परेशान थी। अतः: पूरा जनमानस धर्म से दूर होता जा रहा था। ऐसे समय में मानव जाति के कल्याण के लिये कबीर दास जी का अवतरण हुआ। उन्होंने अपना पूरा जीवन भारतीय समाज में समता लाने में लगा दिया।

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कबीर दास जी के जन्म के संबंध में कई बातें पढ़ने-सुनने को मिलती है, जैसे कबीर दास जी एक विधवा ब्राम्हणी के पुत्र थे, जो रामानंद जी के आशीर्वाद जो कि विधवा को सधवा समझकर दिया गया था, के फलस्वरूप हुआ था। जिसे विधवा ब्राम्हणी ने लोक लाज के भय से एक गांव लहरतारा के तालाब के किनारे में छोड़ दिया था, जिसे एक जुलाहा दंपत्ति ने पाला। कुछ लोग कबीर दास जी को मुसलमान समझते हैं। कबीर पंथ के अनुसार कबीर दास जी का अवतरण गांव लहरतारा के तालाब में उगे कमल के पुष्प में हुआ था, जो कि एक प्रकाश-पुंज के रूप में आसमान से उतरा था। इसी प्रकार कबीर दास जी के जन्मकाल के संबंध में अलग अलग बातें कही सुनी जाती है। कोई संवत् १४५५ बताता है तो कोई १४५१ से १४५२ के बीच बताता है। कबीर दास जी स्वयं को जुलाहा मानते थे, उन्होंने एक जगह कहा है -
जाति जुलाहा नाम कबीरा
बनि बनि फिरै उदासी।


कबीर दास जी अनपढ़ थे, उन्होंने जो भी कहा उन्हें उनके शिष्य लिख कर रख लिया करते थे, वही आज हमारे लिए उनका धरोहर है। कबीर दास जी ने समर्थ गुरु रामानंद जी को अपना गुरु माना और गुरु के द्वारा दिये गये राम नाम के मंत्र का निरंतर जाप किया और निरंतर राम नाम के नशे में धुत्त रहा, उन्होंने एक जगह कहा भी है - "पीवत राम रस लगी खुमारी"


कबीर दास जी जब ज्ञान को उपलब्ध हो गये, तब उन्होंने भारतीय समाज में व्याप्त पाखण्ड, कर्मकाण्ड के विरूद्ध एक प्रकार से मोर्चा ही खोल दिया, जैसे
पाहन पूजै हरि मिले तो मैं पूजूं पहाड़।।
कांकर पाथर जोड़ के, मस्जिद लिया बनाय।
ता चढ़ि मुल्ला बाग दे, क्या बहरा हुआ खुदाय।।
मोको कहां ढ़ूंढ़े बंदे, मैं तो तेरे पास में।
न मैं बकरी न में भेंड़ी, न छुरी गंडास में।।
ना मैं देवल ना मैं मस्जिद ना काबे-कैलाश में।
न तो कौनों क्रियाकर्म में, नहिं जोग बैराग में।।
माला फेरत जुग गया, गया न मन का फेर।
करका मनका डार दे, मनका मनका फेर।।


कबीर दास जी ने अपने विरोधी पंडितों व मौलियों को खूब लताड़ा, जैसे
पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआं, पंडित भया न कोय।
ढाई अक्षर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।।
तेरा मेरा मनवा कैसे एक होई रे।
मैं कहता हौं आंखन देखि,तू कहता कागद की लेखी रे ।।...


कबीर ने साधु समाज को सच्चा ज्ञान प्राप्त करने का तरीका सुझाया, जैसे-
पीछे लागा जाई था, लोक बेद के सांथ।
आगे थे सतगुरू मिला, दीपक दिया हांथ।।
मन रे जागत रहिये भाई।
गाफिल होई बसत मति खोवै, चोर मुसे घर जाई।।
हम तो एक एक कर जाना।
दोई कहै तिनही को दोजख, जिन नाहिन पहिचाना।।
करत बिचार मन ही मन उपजी, न कहीं गया न आया।
कहै कबीर संसा सब छुटा, राम रतन धन पाया।।
कबीर मन मृतक भया,दुर्बल भया सरीर।
पाछे पाछे हरि चले, कहत कबीर कबीर।।…


यानी सबसे पहले गुरु की तलाश करो, फिर गुरु के कहे अनुसार चलो। गुरु की परख के लिए भी उन्होंने सूत्र दिया-
गुरु मिला तब जानिये, मिटे मोह संताप।
हर्ष शोक ब्यापै नहीं, जब गुरु आप ही आप।।
धर्म के नाम पर लड़ने वालों को संदेश देते हुए कहा-
एकै पवन एक ही पानी, एक जोति संसारा।
एक ही खाक धड़े सब भांडे, एक ही सिरजनहारा।।…
संसार की असारता को समझाते हुए कहा-
रहना नहीं देस बिराना है
यह संसार कागद की पुड़िया, बूंद परे घुल जाना है।
यह संसार काट की बाड़ी, उलझ उलझ मरि जाना है।
यह संसार झार और झाखर, आग लगे बरि जाना है।…


कबीर दास जी की उलटबांसियां भी बहुत प्रसिद्ध है जो बुद्धिवादियों को विस्मित कर देती है,जैसे-
एक अचंभा मैंने देखा, नदिया लागी आग।।
अंबर बरसै धरती भींजै, यह जाने सब कोई।
धरती बरसै अंबर भींजै, बूझे बिरला कोई।।
गावनहारा कदे न गावै, अनबोल्या नित गावै।
नटवर पेखि पेखना पेखै, अनहद बेन बजावै।।


कबीर दास जी ने अपना पूरा जीवन काशी में बिताया, और जब संसार छोड़ने का समय आया तो मगहर चले गये, क्योंकि उस समय यह बात कही जाती थी कि काशी में जो शरीर त्यागता है, वह सीधा मुक्ति पा जाता है, और मगहर में मरने वालों को नर्क जाना पड़ता है। जनमानस में व्याप्त इस भ्रम को तोड़ने के लिये उन्होंने मगहर में अपना शरीर छोड़ना पसंद किया।
अंत में, कबीर दास जी को हिंदू और मुसलमान दोनों अपना मानते थे, यह कहा जाता है कि कबीर दास जी जब अपना शरीर छोड़े तब लोगों को उनके शरीर के स्थान पर बहुत सारे फूल मिले, जिसे हिंदू व मुसलमान दोनों ने आधा आधा बांट कर अपने अपने रीति अनुसार माटी दी।


कबीर दास जी की महिमा को बखान नहीं किया जा सकता, उन्होंने अपना पूरा जीवन समाज में समता लाने और धर्म के नाम पर चल रहे पाखण्ड व आडंबर से मुक्ति में लगा दिया। आइये हम आज उनके जन्मदिन पर यह शपथ लें कि समाज में समता लायेंगे एवं


बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय।
जो दिल खोजा आपना, मुझसा बुरा न कोय।।


इसी भाव के साथ अपना बचा हुआ जीवन बितायेंगे, यही हमारी उनको सच्ची श्रद्धांजलि होगी।


ललित वर्मा"अंतर्जश्न", छुरा

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