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कहानी / इन्फ़ीरियरिटी कॉम्प्लैक्स / अविनाश कुमार झा

प्रिया आनंद प्रियानी की कलाकृति

" तो दसमी बाद वह जिद पर अड़ गया कि साइंस नहीं पढ़ेगा। ऐसा नहीं था कि उसे कम नंबर आया था या वह किसी साइंस विषय में कमजोर था या शहर के सबसे अच्छे कालेज में एडमीशन नहीं होता!सिर्फ कुछ अलग करने की चाहत थी !लीक से हटकर चलना उसकी फितरत !

"घर में सब साइंस लेकर पढ़े है तो क्या सब डाक्टर इंजीनियर ही बनेगा? मैं तो कॉमर्स ही पढ़ूंगा।
विपुल ने पापा को समझाया" उसका मैथ बहुत अच्छा नहीं था और अलजेबरा, त्रिकोणमिति तो समझ ही नहीं पाता था, रट्टा मारकर या गेस पेपर पढ़कर नंबर आ गये थे। "
"हालांकि केमिस्ट्री में नाइंटी सिक्स परसेंट मार्क्स था पर खास इंट्रेस्ट उसमें नहीं है। बाइलोजी गुरुजी कभी क्लास में ठीक से पढ़ाये ही नहीं। जब रिप्रोडक्शन का चैप्टर आता तो बोलते" अपने पढ़ लेना। लड़कियाँ भी थी क्लास में ! भला उसके सामने कैसे प्रजनन के बारे में समझाते? सर जी शर्माते रहे और बच्चे छुपकर और अधिक इंट्रेस्ट लेकर पढ़ते रहे। खैर!

भैया ने कहा " कॉमर्स का स्कोप नहीं है, इससे अच्छा है कि आर्ट्स लेकर पढ़ो।बनिया परिवार में थोड़े ही पैदा हुए हो जो कॉमर्स की पढ़ाई करोगे!
मां बोली" क्या लोग कहेंगे? पास किया फर्स्ट डिवीजन से और पढ़ेगा आर्ट्स! नाक कट जाएगी! इतने दिन बाद गांव में कोई फर्स्ट डिवीजन से पास किया है ! इससे पहले वाले सब इंजीनियर हो गये है और तुम क्या बनेगा? मास्टर!
समाज में नाक सबसे कोमल और संवेदनशील अंग है। थोड़ा भी इधर उधर हुआ कि कट जाती है।वास्तव में समाज या परिवार में स्थापित परंपरा है कि जो पढ़ने में तेज है वो साइंस लेगा और डाक्टर या इंजीनियर बनेगा। या जो साइंस लेता है वो तेज होता है, बहुत लोग इस कारण भी साइंस रखते हैं या उसके मां बाप जबरदस्ती रखवा देते हैं।


खैर ! हारकर परिवार वालों ने कालेज में आर्ट्स लेने कि इजाजत दे दी। यह लड़का तो"बुड़िया " गया।
पापा बोले " इससे कोई आशा मत रखो! ज्यादा से ज्यादा कहीं क्लर्की कर लेगा नहीं तो मास्टरगीरी!
जाहिर है राजेश ने मैट्रिक फर्स्ट डिवीजन में पास किया पर उसको साबित नहीं किया क्योंकि आर्ट्स में एडमीशन लेने वाले स्वयं सिद्ध बकलोल होते हैं।
अलग बात है कि उस साल बोर्ड परीक्षा का रिजल्ट बहुत टाइट था । हाईस्कूल से सिर्फ छ: बच्चे ही फर्स्ट डिवीजन में पास हुए, उसमें अपने गांव से राजेश अकेला था।
कहते हैं बड़े बुजुर्ग की बातों को मानना चाहिए। क्योंकि राजेश बाद में अपने डिसीजन पर पछताता रहा कि उसने आर्ट्स क्यों लिया था?
इसलिए नहीं कि लोग उसे कमजोर, बकलोल और बेकार समझने लगे बल्कि इसलिए कि इंटर का दो साल यूं ही व्यर्थ चला गया। एक तो वैसे ही कालेज की चमक दमक, वैविध्य पूर्ण माहौल और खुलेपन का अहसास पढ़ने में अरुचि उत्पन्न करता है, ऊपर से दस क्वेशचन रटकर परीक्षा देने के चलन और प्रवृत्ति ने पढ़ने का उत्साह और बाध्यता दोनों समाप्त कर दिया। दो साल सिर्फ उसने फिरंटी किया।
विपुल की एकाग्रता और पढ़ाई के प्रति सिंसयरीटी को देखकर उसे अफसोस होता था।


"यदि वह साइंस लिए होता तो लगातार क्लास करना पड़ता, ट्युशन, सख्त सिलेबस, प्रैक्टिकल एक्जाम आदि में लगकर पढ़ते रहने प्रवृत्ति बनी रहती।
डाक्टर इंजीनियर तो वैसे भी उसे बनना नहीं था, वह उसका लक्ष्य ही नहीं था।" कासिम ने भी समझाया था। पर अब हो भी क्या सकता था। " अब पछताये क्या होत ,जब चिड़िया चुग गई खेत!"
हटिया में एक दिन राजेन्द्र गुरुजी मिल गये " क्यो राजेश ! मैथ् लिये कि बायोलोजी ?
" सर ! आर्ट्स लिया हु !"
जगवीर बोला" मास्टर साहेब ! चोरी से फर्स्ट डिवीजन् आ गया है तो साइंस कैसे लेगा !'
राजेश कट कर रह गया ! कुछ बोला नहीं! खून के घूंट पीकर रह गया !


पर आर्ट्स ने उसे साहित्यिक रुचि का अवश्य बना दिया। कालेज में ही उसे वरुण अग्निहोत्री का साथ मिला जिसने राजेश को थोड़ा एक्सपोजर दिया। साहित्यिक रुचि वाले वरुण में कांफिडेंस लेवल जबरदस्त का था। दिन भर कविताएं लिखता, सैकड़ों पत्र पत्रिकाओं में छपने को भेजता, कुछ छप भी जाती। शहर की साहित्यिक गतिविधियों में खुल कर भाग लेता।
" जानते हो राजेश! आजकल के जितने भी नवसिखुआ नव हिन्दी साहित्यकार या लेखक हैं, वो अग्रेजी मीडियम से हैं। उनके विचार और प्लाट सब इंपोर्टेड है बस देशी मुलम्मा चढ़ाया और परोस दिया ,हम भुख्खड़ों के सामने। हमलोग उन्हें हाथों हाथ उठा लेते हैं क्योंकि फारेन रिटर्न हमें बहुत भाती है।!
" लेकिन आप कैसे इनमे जगह बना पाओगे? एक तो छोटे शहर का,हिन्दी मीडियम स्टूडेंट और ऊपर से आर्ट्स पढ़ने वाला भक्कू!"
तपाक से बोला" यही तो सभ्यता की लड़ाई है और हमें उनमें जगह बनानी है! जो जेएनयु और डीयु वाले कालेज में कदम रखते ही सोचने लगते हैं, हम तेईस चौबीस की उम्र में बीए करने के बाद सोचते हैं। उनके लेवल तक पहुंचने के लिए , चार पांच साल का गैप पूरा करने के लिए एक साल में ही पांच गुनी मेहनत करनी होगी"!


राजेश मां कहती " पता नहीं ये कब बड़ा होगा ! घरघुसना बना रहता है !
पर राजेश तो कब घर से निकल कर धौलपुर हाऊस के सपने देखने लगा था।
उसने राजेश के सांवलेपन से उपजे इंफीयरिटी कांप्लेक्स को भी खत्म किया। वह कहता" हम सांवले हैं काले नहीं और हमसे भी काले अफ्रीकी देशों में रहते हैं तो क्या उनको पसंद नहीं करता। विवियन रिचर्ड की नीना गुप्ता इतनी बड़ी दीवानी हुई कि बिन ब्याही मां बन गई। रजनीकांत सहित साउथ के हीरो को देखो, सब के सब पकिया रंग वाले हैं, तो क्यों घबराना कि लड़की नहीं पटेगी। अरे लड़की कलर से नहीं इंटेलिजेशिया और कांफिडेंस लेवल से पटती है।

क्या कारनामे थे उसके।अलबत्ता तो कभी क्लास करता नहीं था, यदि वह क्लास में बैठता तो लड़कियों की जस्ट पीछेवाली बेंच पर और बड़े प्यार से किसी सुंदर लड़की की बालों को अपने हाथों में उठा लेता, कभी उस पर उंगली फिराता तो कभी पेन से उसे नचाता। सब इतनी सफाई से करता कि कोई लड़की जान नहीं पाती या संभव है जानती हो तो उसे अच्छा लग रहा हो। चलते फिरते किसी को कुछ बोल देता था, डर नाम की तो चीज ही नहीं थी उसके पास !
" तुम तो बेकार ही आर्ट्स और साइंस के चक्कर में पडॆ हो ! साइंस वालो के सुर्ख़ाब के पर थोड़े ही लगा होता है !" प्रशासनिक सेवा में जाना है तो हिस्ट्री ज्योग्राफी ही काम आता है ! राजेश फूल के चौड़ा हो जाता !"
राजेश का भी शहर के साहित्यिक समाज से परिचय हो गया था! थोड़ा बहुत लिखने भी लगा था ! पढ़ने की आदत वही से पड़ी ! आर्ट्स और राजेश के कांफिडेंस लेवल में कोई संबंध है या नहीं, पता नहीं ! पर वरुण के साथ ने उसकी इंफीयरिटी कांप्लेक्स को लगभग खत्म कर दिया, जो उसके भविष्य के लिए अच्छा रहा।
बाद में" चरवाहा स्कूल" वाले राज में कि किताब खोलकर एक्जाम हुए थे। पर किताब खोलकर चोरी करने की कला सबको थोड़े ही आती है। किसी तरह राजेश भी पास कर गया ! पर कांफिडेंस लेवल इतना हाई हो गया था कि सीधे आइ ए एस बनने निकल पड़ा !

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