सोमवार, 5 जून 2017

रमेशराज के प्रेमपरक दोहे


तुमसे अभिधा व्यंजना तुम रति-लक्षण-सार
हर उपमान प्रतीक में प्रिये तुम्हारा प्यार |
  

+मंद-मंद मुसकान में सहमति का अनुप्रास
जीवन-भर यूं ही मिले यह रति का अनुप्रास |
  


तुमसे कविता में यमक तुमसे आता श्लेष
तुमसे उपमाएं मधुर तुम रति का परिवेश |
  

तुमसे मिलकर यूं लगे एक नहीं हर बार
सूरज की पहली किरण प्रिये तुम्हारा प्यार |
  

गहरे तम के बीच में तुम प्रातः का ओज
तुमसे ही खिलता प्रिये मन के बीच सरोज |
  

नयन कमल से किन्तु हैं उनके वाण अचूक
बोल तुम्हारे यूं लगें ज्यों कोयल की कूक |
  

और चलाओ मत प्रिये यूं नैनों के वाण
होने को है ये हृदय अब मानो निष्प्राण |
  

तुम प्रत्यय-उपसर्ग-सी तुम ही संधि-समास
शब्द-शब्द वक्रोक्ति की तुमसे बढ़े मिठास |
  

तुम लोकोक्ति-मुहावरा तुम शब्दों की शक्ति
तुमसे गूंगी वेदना पा जाती अभिव्यक्ति |
 

चन्दन बीच सुगंध तुम पुष्पों में बहुरंग
हर पल चंदा से दिपें प्रिये तुम्हारे अंग |
 

छा जाता आलोक-सा मन के चारों ओर
गहरे तम के बीच प्रिय तुम करती हो भोर |
 

कमल खिलें, कलियाँ हंसें तुम वो सुखद प्रभात
तुम्हें देख जल से भरें सूखे हुए प्रपात |
 

तन में कम्पन की लहर प्रिये उठे हर बार
तुमको छूकर ये लगे तुम बिजली का तार |
 

तुम सावन का गीत हो झूला और मल्हार
रिमझिम-रिमझिम बरसता प्रिये तुम्हारा प्यार |
 
     

प्रिये तुम्हें लखि मन खिला, मौन हुआ वाचाल
कुंदन-काया कामिनी कल दो करो निहाल |
   

तू ही तो रति-भाव है, यति गति लय तुक छंद
प्रिय तेरे कारण बसा कविता में मकरंद |
 
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रमेशराज, 15/109, ईसानगर, अलीगढ़-202001
Mo.-9634551630

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