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व्यंग्य- एक ही उल्लू काफी था.../ दीनदयाल शर्मा

Deendayal Sharma Looks Studio 22 (1)

किसी ने सच ही कहा है कि मूर्ख की दोस्ती, जी का जंजाल। और किसी महापुरुष ने भी कहा है कि -मूर्ख की दोस्ती से समझदार दुश्मन ज्यादा अच्छा है। मूर्ख चाहे घर में जन्म ले ले या फिर किसी से फेरे या निकाह करके घर आ जाए। घर की इज्जत हमेशा दांव पर ही रहती है। आप सोच भी नहीं सकेंगे कि वह किस समय कौनसा कदम उठा ले। और तो और हमारे यहां की युवा पीढ़ी बुजुर्गों को मूर्ख समझती है और बुजुर्ग युवा पीढ़ी को मूर्ख समझते हैं। मूर्खों के बारे में एक लोकोक्ति भी है कि यदि वह मौन रहे तो बुद्धिमानों की श्रेणी में आ जाता है। मूर्खों के बारे में ‘महाभारत’ में तो बहुत सटीक टिप्पणी की गई है कि- ‘मूर्ख आदमी बिना बुलाए भीतर घुस आता है और बिना पूछे ही बोलने लगता है, जिस पर विश्वास नहीं करना चाहिए, लेकिन फिर भी उसका विश्वास करता है।’ एक विद्वान ने तो यहां तक कहा है कि -‘जो व्यक्ति मूर्खों के सम्मुख विद्वान दिखलाई पडऩे का प्रयास करते हैं, वे विद्वानों के सम्मुख मूर्ख दिखलाई देंगे।’

किसी के घर बहूरानी आ गई। आते ही उसके दिमाग के बारे में पता चल गया कि वह दो रग ज्यादा ही रखती है। बेटा-बहूरानी पहली मंजिल पर रहने लग गए। एक दिन बहूरानी बर्तन साफ कर रही थी, और जैसे ही वह गंदा पानी ऊपर से नीचे फेंकने लगी कि ससुर जी ने अपनी समझदारी दिखा दी। वे बोले-बेटा, यह गंदा पानी किसी आदमी को देखकर नीचे फेंकना। बहूरानी बहुत ही आज्ञाकारिणी साबित हुई। उसके द्वारा गंदा पानी नीचे फेंकते ही पांच सज्जन घर की पहली मंजिल पर बड़बड़ाते हुए पधारे। एक सज्जन बहूरानी के ससुर जी की ओर मुखातिब होकर बोला-‘यह क्या कर दिया जनाब! हम अपने रास्ते जा रहे थे कि आपकी बहूरानी ने हम पर गंदा पानी डाल दिया। सारे कपड़े गंदे हो गए! अब हम क्या करें? किसी शुभ काम के लिए रिश्तेदारी में जा रहे थे। एक तो हमारे कपड़े खराब हो गए और ऊपर से देरी हो रही है वह अलग।’

बहूरानी के ससुर जी बोले-कोई बात नहीं। गलती हो गई। आप तौलिया लपेट कर एक बार बैठक में पधारें। तब तक बहूरानी कपड़े धोकर साफ कर देंगी। पांचों सज्जनों को तौलिए दे दिए गए। अब बहूरानी कपड़े धोने लगी।

ससुर जी बहूरानी से बोले- बेटा, कपड़े जल्दी से धोकर सुखा दो। इन्हें देरी हो रही है। बहूरानी ने कपड़े धोकर सुखा दिए।

लगभग आधे घंटे बाद पांचों सज्जनों ने अपने धुले - सूखे कपड़े वापस मांगे तो पता चला कि बहूरानी ने उनके कपड़े गली में घूम रहे गधों पर सुखा दिए थे, ताकि कपड़े जल्दी सूख जाएं। बहूरानी कपड़े लेने गई तो पता चला कि वहां गली में घूम रहे गधे गायब हो चुके थे। अब वे पांचों सज्जन गधों की तलाश में गलियों में धूल फांक रहे हैं।

एक कहावत यह भी प्रचलित है कि मूर्ख मूर्ख से राजी। मूर्ख एक दूसरे से बातें करके खुश रहते हैं। एक दिन एक मूर्ख ने दूसरे मूर्ख से पूछा कि - यदि तुम बता दो कि मेरे थैले में क्या है, तो सारे अंडे तुम्हारे!

दूसरा मूर्ख बोला- भई, बिना देखे कैसे बताऊं? मैं कोई भगवान थोड़े ही हूं!

फिर पहले मूर्ख ने उससे पूछा कि- यदि बता दो कि कितने हैं तो दसों के दसों तुम्हारे!

दूसरा मूर्ख बोला- भई, बिना गिने कैसे बता सकता हूं, मैं कोई भगवान थोड़े ही हूं!

मूर्ख व्यक्ति की एक खास विशेषता यह है कि वह अपने आपको कभी भी मूर्ख नहीं समझता। यानी वह अपने आपको सबसे ज्यादा बुद्धिमान ही समझता है। अमेरिका में भले ही उल्लू को बुद्धिमान समझे, लेकिन हमारे यहां तो उल्लू को मूर्ख ही मानते हैं। तभी तो किसी शायर ने कहा है कि-

     बर्बाद-ए-गुलिस्तां करने को बस

एक ही उल्लू काफी था

हर शाख पे उल्लू बैठा है

अंजाम-ए-गुलिस्तां क्या होगा?

-दीनदयाल शर्मा

‘टाबर टोल़ी’, 10/22 आर. एच. बी. कॉलोनी,

हनुमानगढ़ जं. 335512, राजस्थान

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