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प्रदीप उपाध्याय की दो लघुकथाएँ

रसना भारद्वाज की कलाकृति

लघु कथा।

(1)

चरित्र

देखिये मिसेस शर्मा,हमारे पड़ोसी चोपड़ा साहब की लड़की का केरेक्टर! नित नये लोगों की गाड़ी पर घर से जाते हुए देखा है। कैसे माता-पिता इसको अनदेखा कर देते हैं। लोग तरह तरह की बातें करते हैं परन्तु उन्हें जरा भी शर्म नहीं है।

छोड़ो न,अपने को क्या करना है। आजकल की लड़कियाँ ही ऐसी हैं। देखो न,अपना चिन्टु कितना भोला-भाला है। कितनी लड़कियाँ उसके पीछे पड़ी रहती हैं। किसी को कॉलेज छोड़ना तो किसी की शॉपिंग करवाना। अब किन-किन को वह कितना टाईम दे। फिर भी वह सम्बन्धों को निभाता  है। मोहल्ले वाले तो उसे कृष्ण कन्हैया ही कहने लगे हैं।

लघु कथा।

(2)

अन्तर

“भाई ने देखो कितना गलत किया है। मम्मी-पापा का बहुत दिल दुखाया है। वे उसे कभी माफ नहीं करेंगे। लड़की भी गैर जाति की है और उन लोगों ने भी देख लिया कि लड़का आय ए एस हो ही गया है। कोई दहेज भी नहीं देना पड़ेगा।” निशा ने भड़कते हुए कहा।

“लेकिन तुमने भी तो प्रेम विवाह किया था और तुम्हारे पति भी दहेज विरोधी रहे हैं। तुमने भी अन्तर्जातीय विवाह किया है। ऐसी स्थिति में तुम्हें तो अपने भाई का पक्ष लेना चाहिए।” मैंने कहा

“नहीं, हमारी बात अलग है। हमने सेम प्रोफेशन में होने तथा एक दूसरे को पसन्द करने के आधार पर माता-पिता की सहमति से ही शादी की थी।” निशा बोली।

--

डॉ प्रदीप उपाध्याय ,16अम्बिका भवन,बाबूजी की कोठी,उपाध्याय नगर, मेंढ़की रोड़, देवास,म.प्र.

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