बुधवार, 28 जून 2017

गुरु-पूर्णिमा / ललित वर्मा,"अंतर्जश्न",

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        संतों का गुरु के महात्म्य पर यह कहना है कि जब त्रिदेव किसी से रुष्ट हो जाये तो उनके कोप से केवल गुरु ही रक्षा कर सकते है, किंतु यदि गुरु किसी से रुष्ट हो जाय तो पूरे सृष्टि में ऐसा कोई भी नहीं जो उसे बचा सके, त्रिदेव भी नहीं| आइये गुरु-पूर्णिमा के पावन अवसर पर ऐसे महाप्रतापी गुरु की गुणों के संबंध में शास्त्र सम्मत चर्चा करें...
                   गुरु दो शब्दों से मिलकर बना है, गु + रु | यहां पर  गु = अंधकार और रु = हटाना या दूर करना होता है, इस प्रकार..व्यक्ति को मायारूपी अंधकार से हटाकर ईश्वरीय प्रकाश की ओर ले जाने वाला गुरु कहलाता है|
           शास्त्रों में गुरुओं के तीन भेद बताये गये हैं, १, प्रारम्भिक गुरु, २, सद्गुरु, ३, समर्थ गुरु|
            प्रारम्भिक गुरु वे होते हैं, जो व्यक्ति को संसार से परमार्थ की ओर झुका दे, और सत्कर्मों की ही शिक्षा दे| इनकी पहचान केवल इतनी है कि ये वाणी के द्वारा ही दूसरों को उपदेश देते हैं, आत्मा से आत्मा को उठाना, मौन उपदेश देना इन्हें नहीं आता, न ही इतनी सामर्थ्य भी इनमें होती है, इनका काम कर्मकाण्ड तक ही सीमित होता है|ये मंत्र-जाप, यज्ञ-हवन, प्राणायाम इत्यादि दूसरे यौगिक क्रिया में ही लगे रहते हैं| मुसलमान इनको 'पीर इरादी' कहते हैं अर्थात् सामने वाले का इरादा पलटनें वाला|
           सद्गुरु वे होते हैं जो उपासना कराते है, उपासना अर्थात् मन को इष्ट के पास बैठाना या मन को इष्ट में लगा देना| संतों के यहां सद्गुरु के भी चार भेद बताये गये हैं, यथा -
गुरु है चार प्रकार के अपने अपने अंग|
गुरु पारस दीपक गुरु मलयागिरि गुरु भृंग||
            अर्थात् पहले प्रकार के सद्गुरु पारस के समान होते हैं, जैसे पारस लोहे को छूकर उसे सोना बना देता है, ठीक उसी प्रकार पारस सद्गुरु साधक को उत्तम गुणों से सम्पन्न और कुछ शक्तिशाली बना देता है| इनका दर्जा निचला माना गया है, क्योंकि इनकी सामर्थ्य केवल इतनी ही होती है वह साधक को कुछ ऊंचा उठा देते हैं, परन्तु उसे अपने जैसा नहीं बना सकते, जैसे पारस लोहे को सोना तो बना सकता है किन्तु उसको पारस नहीं बना सकता| दूसरे 'दीपक सद्गुरु' है, इनका सद्ज्ञान-रूपी दिया जल रहा होता है उसमें यदि कोई साधक अपनी अनवरत सुरती-रूपी लगन के साथ सच्ची श्रद्धा व विश्वास रूपी तेल-बाती वाला दिया उसमें छुवा दे तो वह भी जल उठता है, और प्रकाश देने लगता है| पर दीपक गुरु में भी कुछ कमी होती है, कि यदि साधक में सच्ची लगन श्रद्धा व विश्वास की कमी है तो उसके दिया को वह जला नहीं सकता|तीसरा है 'मलयागिरि सद्गुरु' यथा-

मलयागिरि के निकट जो सब द्रूम चंदन होंहि
कीकर सीसम चीर तरू हुये न कबहूं होंहि||

         अर्थात् इनके सत्संग में जो भी साधक आते हैं, वह धीरे धीरे सम्हलते चले जाते हैं, और किसी न किसी दिन इन जैसे हो ही जाते हैं, लेकिन मूढ़ व अविवेकी साधक पर इनका भी कोई असर नहीं होता, जैसे राम चरित मानस में आया है -

मूरख हृदय न चेत जो गुरु मिलहि बिरंचि सम|

            चौथे सद्गुरु भृंगी सद्गुरु कहलाते है, यथा- जब कोई भृंगी किसी कीड़े को कैद कर लेता है, वह कीड़ा भय से उसकी ओर ही चित्त लगाये रहता है, जिसका परिणाम यह होता है कि कुछ दिन बाद उसके भी पंख निकल जाते हैं, और वह उसी के रूप का ही  बन जाता है, तथा उसी के तरह उड़ने की शक्ति भी उसमें आ जाती है|ठीक उसी प्रकार ऐसे गुरु के संगत में आये साधक चाहे कितना भी निचले दर्जे का हो, कभी न कभी अपने गुरु के समान हो ही जाता है|
           अब आते हैं समर्थ गुरु पर, समर्थ गुरु वे होते हैं, जिनमें ऊपर के सभी गुरुओं का सामर्थ्य होता है, दया होने पर वह साधक को, जो चाहे भक्ति मार्गी हो या कर्म मार्गी, योग मार्गी हो या ज्ञान मार्गी, या दूसरी किसी प्रकृति का हो, को दया आने पर उसे क्षण में ही अपने ध्येय तक पहुंचा देता है, ऐसे गुरु एक प्रकार से ईश्वर का ही रूप होता है| संत सहजो बाई अपने गुरु चरणदास जी के लिए कहती भी है कि

चरणदास समरथ गुरु सर्व अंग तिहि मांहि|
जैसे को तैसा मिले रीता छोड़े नाहि||

इसी प्रकार कबीर दास जी अपने गुरु रामानंद जी के लिए कहते हैं

साहेब सम समरथ नहीं गरूवा गहर गंभीर|
अवगुन मेटे गुन रहे छनिक उतारे तीर||

          वर्तमान संदर्भ में देखें तो आज थोड़े से शास्त्र ज्ञान होने के बाद लोग गुरु बनने में देर नहीं लगाते, ऐसों की आज चारों तरफ बाढ़ देखने को मिल रही है, ऐसे में बेचारा साधारण सा साधक सही गुरु की पहचान कैसे करे? बड़ी मुश्किल स्थिति होती है, ज्यादातर छले जाते हैं, और देर-सबेर अपनी यात्रा बीच में ही छोड़ देते हैं, ऐसे साधकों को सही गुरु की पहचान के लिए संत कबीर दास जी ने कहा है-

गुरु मिला तब जानिये मिटे मोह संताप|
हर्ष शोक ब्यापै नहिं तब गुरु आपै आप||
           ईश्वर सबका कल्याण करें|

साभार:- साधना के अनुभव, रामाश्रम सत्संग, मथुरा
           ललित वर्मा,"अंतर्जश्न",छुरा

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