शुक्रवार, 9 जून 2017

मनीष कुमार सिंह की ग़ज़लें

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1. नफ़रत के ख़यालात न रहे

कह दो सब तुम मुझसे, दिल में तुम्हारे कोई बात न रहे
मिल जाओं मुझमें सहर सा तुम, फ़िर जीवन में कोई रात न रहे

यह सांसो के बंधन तुमसे, लगने लगे है मुझको छोटे
तुम मोक्ष बनो मैं पा लूँ तुम्हें, फ़िर आँखों में कोई बरसात न रहे

कुछ न कहना फ़िर चुप रहना, पर्वत सी जो चुप है तू
मैं राग बनूं तुम गा लो जी भर, फ़िर अधूरे कोई ज़ज्बात न रहे

तू धरती सी बन मै उगूँ तुझमे, हमारा इश्क़ बढ़े जैसे पारिजात
खुशबू बहे चहुओर यही, फ़िर नफ़रत के ख़यालात न रहे

मैं ले चलूँ तुझको दूर तलक, इस जंगल से उस ओर कहीं
तू हवा सी बन बह चल मुझमें, फ़िर जहाँ को कुछ ज्ञात न रहे

2. कोई रिश्ता जला सा है

शहर में हर तरफ़ धुँआ धुँआ सा है
ऐसा लगता कोई रिश्ता जला सा है

मैं सोचता हूँ उठूँ मुहारा साफ़ करूँ
सूरज नहीं निकलने पर आमादा सा है

कश्तियाँ मजबूत है इरादा भी फ़ौलादी
साहिल ही मुझे डूबोने को लहरों से मिला सा है

ये कैसे मैं अचानक खुशबुओं से भर गया
लगता है तेरा पल्लू मुझसे छुआ सा है

हर याद तेरी दिल में चुभी है खंजर सी
चेहरा तुझे पाने को फ़िर से रुआं’सा है

3. ज़िन्दगी यूँ ही रह चली

एक ग़जल आँखों से निकली
फ़िर से आज बह चली

याद तेरी फ़िर मुझमें पिघली
साँसों से सब कह चली

देख न पाई बेटे को जी भर
माँ यह दुःख भी सह चली

तुझको पाने की उम्मीदें
ख़ुद ही जुडी फ़िर ढह चली

मै बिखरा हर साल ज्यादा
ज़िन्दगी यूँ ही रह चली

4. गिरवी परात देखिये

इस दौर के बदलते हालात देखिये
अपने लिए भी सबके ख्यालात देखिये

कहने को जो रहते थे हमारे साथ सुबहोशाम
दूरियाँ उनसे हुयी कितनी दिन रात देखिये

दुनिया ज़रा से वक़्त में कितनी बेमानी हो गयी
ग़रीब के घर अब भी गिरवी परात देखिये

ऐसे भी लोग है जो लिखते बेटियों के दाम
बिगड़े हुए अमीरों की यह जात देखिये

बढ़ गया है सबमें बहुत बोलने का हुनर
‘मनीष’ चुप है क्यूँ यह बात देखिये

5. सितम की इन्तिहाँ न कर

मैं ख़ुद ही मर जाऊँगा
तू सितम की इन्तिहाँ न कर

जब जा रहा है तो मत देख मुझे
फ़िर कोई हसरतें जवाँ न कर

कितना बोलेगा झूठ अपनों से ही तू
यह घर है इसे अभी बंजर मकाँ न कर

जो डूब गया है किसी और के इश्क़ में
उसको पाने की फ़िर से दुआ न कर

जो चाहता है तुझको ख़ुद से कही ज्यादा
कैसे भी करके बस उसको ख़फ़ा न कर

6. ज़िन्दगी में कोई मिठास न रही

अब पहले वाली कोई बात न रही
ज़िन्दगी में कोई मिठास न रही

धरती पर हर तरफ़ जलन औ’ घुटन है
बादलों में भी पहली सी बरसात न रही

तू पास आते – आते इतना दूर हो गया
तेरे जहन में मेरी कोई याद न रही

अपना दर्द अब कैसे कहे किसको सुनाये
रिश्ते तो ऐसे जले की राख़ न रही

इतना इल्म कर लो अँधेरे के रहनुमाओं
आफ़ताब के आने पर कोई रात न रही

7. बहारों तक ले चलो

भंवर से मुझे किनारों तक ले चलो
ख़िजा से दूर कही बहारों तक ले चलो

मैं इतना अकेला हूँ इस जंगल में
मुझे अपनी हँसी और इशारों तक ले चलो

वो चला गया है बहुत दूर मुझसे
मुझको भी उसके पास सितारों तक ले चलो

मैं चाहता हूँ सब दुरुस्त हो हमारे दरमियाँ
जो टूट गए है मुझे उन तारों तक ले चलो

बिक जायेंगे इश्क़ में हम भी अभी – अभी
बस मुनासिब ख़रीद के बाजारों तक ले चलो

उसे सुनूँ तो मुझे लगे जैसे मैं ही हूँ बोल रहा
मुझको भी ऐसी किन्हीं पुकारों तक ले चलो

8. वक़्त उसे एक दिन सजा देगा ही

इश्क़ गाढ़ा हो तो रुला देगा ही
धोखा रिश्ते को मिटा देगा ही

महबूब का किसी और से मिलना
आशिक के दिल में आग लगा देगा ही

मोहब्बत का फ़रेब जो तूने मुझसे किया
कोई तुझे भी तेरी तरह दगा देगा ही

उसका जुल्म सदियों तक नहीं रहेगा
वक़्त उसे एक दिन सजा देगा ही

‘मनीष’ इतना लाज़वाब है अपनी सीरत में
तू जरा सा तो दे वो ख़ुद को लुटा देगा ही

लेख़क –

मनीष कुमार सिंह

संपर्क – 8115343011

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