बुधवार, 7 जून 2017

रमेशराज के याथार्थपरक दोहे


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फूल उगाने के लिए खुशबू के जल्लाद
बना रहे हैं आजकल जनता को ही खाद |
 

जनरक्षा की ओर अब तू कविता को मोड़,
आयी जो रुखसार पर लट का झंझट छोड़ |

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जाति-धर्म का चढ़ गया सब पर आज जुनून
चाहे जिसका देख लो , अब सफेद है खून |
 

महक विदेशी अब लिए देशभक्ति के फूल
भगत लाजपत की गये हम क़ुरबानी भूल |
 

धनुष कहे हर तरफ कर वाणों की बौछार
यह विकास का मन्त्र है, देशभक्त का प्यार |
 

भरी सड़क पर चीखती द्रौपदी दीनानाथ
बंधे हुए हैं किसलिए आज तुम्हारे हाथ ?
 

कुर्सी पाकर बोलते सारे आदमखोर
हमें अहिन्सामन्त्र को पहुँचाना हर ओर|
 

जकड़ पाँव को बेड़ियाँ देतीं यह पैग़ाम
अपने शासन में नहीं कोई रहे ग़ुलाम|
 


इधर फंसे नेता अगर, उधर बरी झट होय
दीपक लेकर ढूंढ लो दागी मिले न कोय |
  


अब चाकू के पास है उत्तर यही सटीक
मेरे शासन में रहें सब खरबूजे ठीक |
 


गयी गरीबी देश से सब हैं खातेदार
अब भारत सम्पन्न है कौन करे तकरार |
 


झंडे पाकिस्तान के लहरें चारों ओर
नाच रहा मदमस्त  हो गठबंधन का मोर |
 
 

क्योंकर संकट मोल लें कौन कटाए हाथ
क़लम सम्हाले आज हम राजाजी के साथ |
 


चोर पकड़वा चोर को क्यों ले संकट मोल
आज सियासत है यही जय हो जय हो बोल |
 


कुर्सी पाकर हो गये नेता मस्त-मलंद
लगे गले में डालने जनता के अब फंद |
 


पूरी दुनिया खोज लो हमसे बड़ा न वीर
हमने खुद ही डाल लीं पांवों में जंजीर |
 


जिसके भीतर था कभी नैतिकता का दम्भ
आज बिकाऊ चीज है वह चौथा स्तम्भ |
 


मातम के माहौल में मत खुश हो यूं यार
तेरी भी गर्दन कटे कल रहना तैयार |
 


न्यूज़ चैनलों हो मगन अब तुम जिसके साथ
काटेगा कल को वही सुनो तुम्हारे हाथ |
 


डूब गया कुछ इस तरह सूरज खाकर मात
नहीं सुबह इस रात की अब जो आयी रात |
 


हाथ-पांव को बांधकर कहती है जंजीर
आज़ादी असली यही सह ले थोड़ी पीर |
 


मरे हुए जनतंत्र की लाश नोचते गिद्ध
विगत साल उपलब्धि का सिद्ध हुआ लो सिद्ध |
 
 

कैसा है ये आजकल नीच दौर हे राम !
पत्रकार भी चाहता जनता बने गुलाम |
 


तीर वक्ष को चीरकर कहता- ‘बन खुशहाल’
खेल सियासी कर रहा जन के बीच कमाल|
 
 


अर्थवीर के कर दिए हाथ पांव बेकार
नयी आर्थिक नीति से गया सिकंदर हार |
 


कथित आर्थिक प्रगति में हमसे थे इक्कीस
देख लिया ‘सोमालिया ‘, देख रहे अब ‘ग्रीस ‘|
 


नई आर्थिक नीति से सूखी सुख की झील
मति के मारे कर रहे फिर भी गुड ही फील |
 


नयी आर्थिक नीति से दूर नहीं पच्चीस
मार कुल्हाड़ी पांव हम बन जायेंगे ‘ग्रीस ‘|
 


खम्बों पर बिजली नहीं मिले न पानी शुद्ध
क्या विकास आखिर हुआ कुछ तो बोल प्रबुद्ध ?
 


चाकू बोले आजकल जा गर्दन के पास
अच्छे दिन ही लायगा मेरा हर एहसास |
 


कैंची कहे कपोत के पंखों पर कर वार
इस सुराज में चीखना तेरा है बेकार |
 


भ्रष्टाचार विरुद्ध नित राजाजी का शोर
जेल न पहुंचा एक भी भ्रष्टाचारी चोर |
 


भू-प्राक्रतिक रूप से छेड़ न तू इन्सान
वर्ना झेल सुनामियां धरा-कम्प तूफ़ान |
 


अमिट तृप्ति दूँगा उसे आये मेरे पास
मरुथल सबसे पूछता किस-किस को है प्यास ?
 


कृषक करें नित ख़ुदकुशी देख फसल पर मार
भूमि-अधिग्रहण के लिए चिंता में सरकार |
 


हो जाता जब भी खड़ा कोई राम-समान
रावण का टूटे सदा अहंकार-अभिमान |
 


ऐसा ही कुछ देश में घटित हुआ इस बार
गिरता सूरज देख ज्यों औंधे मुँह अंधियार |
 


देश-भक्ति पर दे रहे अति झूठे व्याख्यान
पुजते अब गद्दार भी , कर माँ का गुणगान |
 


जिसके भीतर हैं कई सदविचार के फूल
उस पुस्तक पर अब जमी सिर्फ धुल ही धूल |
 


दिखे व्यवस्था चोर के अब भी अति अनुकूल
काले धन की फ़ाइलें फांक रही हैं धूल |
 


एक बूँद पानी नहीं जिस बादल के पास
बाँट रहा है आजकल वह जल का विश्वास |
 


जन के सूखे पेट को लगा भूख का रोग
ठीक करेगा अब इसे राजाजी का ‘योग ’ |
 


जिसके सँग में ‘रेप ’ नित , जो निर्धन-लाचार
उस बेटी को ‘गोद ‘ कब, लेगी ये सरकार ??
  


जन की गर्दन पर रखी नेता ने तलवार
तुरत बना इस खेल में कवि भी हिस्सेदार |
 


सब ने जिसको कल कहा देश-भक्त इन्सान
कुर्सी पाकर आ गया असल रूप शैतान |
 


ऐ ज्ञानी इस बात पर है कुछ पश्चाताप?
राजनीति में फल रहे तेरे सारे पाप |
 


कवि क्या फिर बौना हुआ तेरे मन का जोश ?
एक बार फिर कह अरे खल को वतनफरोश |
 


राजनीति के दीप में कहीं न बाती तेल
अंधकार की मार को यूं ही प्यारे झेल |
 
 

भौंडी रीति-रिवाज को क्यों कहता है धर्म
जन-पीड़ा करुणा दया समझ अरे बेशर्म |
 


जन को पहले चाहिए बिजली पानी अन्न
हाईरोड बुलेट से फिर करना संपन्न |
  


जब-जब मंहगाई करे जन के गहरे घाव
बोले पिट्ठू मीडिया गिरे थोक में भाव |
 


यदि ये कम होती नहीं महँगाई की मार
तो फिर सच ये मानिए हर विकास बेकार |
 


अंधकार अब कह रहा मुझ में धवल प्रकाश
मेरा जल्वा देख लो, आलोकित आकाश |
 


काँटे को ही हर समय बोल रहे जो फूल
आज नहीं तो कल उन्हें पता चलेगी भूल |
 


शोले की इस बात पर लोगों को विश्वास
जलन नहीं हर एक को देगा राहत खास |
 


यारों इस उपलब्धि का क्या है मतलब खास
गड्ढा आज पहाड़ का देता है आभास |
 


अमिट तृप्ति दूँगा उसे आये मेरे पास
मरुथल अब कहता फिरे किस-किस को है प्यास ?
 


भूखे पेटों के लिए जुटा दीजिये अन्न
मेरे भारतवर्ष को तब कहना सम्पन्न |
 


बेमतलब देता नहीं सुविधा साहूकार
हम सब की कल देखना लेगा मींग निकार |
 


जाल कहे बुलबुल जरा आ तू मेरे पास
तेरी खातिर है यहाँ प्यारी दाना खास |
 


बादल बन छाया धुआँ नभ पर चारों ओर
'अब होनी बरसात है' सत्ता करती शोर |
 


बगुला मछली से कहे - कर जल-बीच किलोल
राम-राम में जप रहा , तू भी श्रीहरि बोल |
   


राजाजी के राज में देश-भक्त वह यार
अपनों पर ही जो करे घूम-घूम कर वार |
  


राजनीति के मोर का इतना-सा है सत्य
जब भारी सूखा पड़े तब करता है नृत्य |
   


दागे गोले-गोलियां आज 'पाक ' जल्लाद
लाल बहादुर की हमें रह-रह आती याद |
   


अंधकार अब कह रहा 'दूंगा अमिट प्रकाश '
हैरत की है बात पर लोगों को विश्वास !!
   


इतना जनता मान ले कहती है तलवार
करूँ क़सम खाकर करूँ अब गर्दन से प्यार |
   


सीने पर सटकर कहे जनता से बंदूक
मेरे आज सुराज में कोयल जैसा कूक |
   


भाले भाषण दे रहे लायें हमीं सुराज
असरदार है आजकल बस ये ही आवाज़ |
   


प्रणय-निवेदन बावरी करले तू स्वीकार
चाबुक चमड़ी से कहे मेरा सच्चा प्यार |
   


चाकू बोले पेट के अति आकर नज़दीक
तेरी-मेरी मित्रता सदा रहेगी ठीक |
   


हम इस खूनी खेल को देखें बारम्बार
गुब्बारों से आलपिन जता रही है प्यार |
   


गर्दन तक आकर छुरी बनती गांधी-भक्त
हंसकर बोले आजकल नहीं बहाऊँ रक्त |


अंधकार अब कह रहा दूंगा अमिट प्रकाश
पर हैरत की बात यह जनता को विश्वास |
  


नेता कहता भाइयो सत्ता भले त्रिशूल
युग-युग से महफूज हैं काटों में ही फूल |


अब हम नया विकास कर उगा रहे वो घास
जिसे चरेंगे देश में आकर घोड़े खास |
   


राजनीति इस देश को ले आयी किस ओर
यारो थानेदार को धमकाता है चोर |
  
 

जिनके सर पर बाल हैं उन्हें मिले फटकार
कंघे सारे बँट रहे गंजों में इस बार |
  


अंधकार जिद पर अड़ा ' सूरज करे सलाम '
कल को यदि ऐसा हुआ क्या होगा हे राम !
  
  

राजनीति का देखकर आज रूप-आकार
नहीं पता चलता हमें मुँह है या मलद्वार |
   


दोष न दे सैयाद को भावुक मन इस बार
चिड़ियाएँ करने लगीं अब पिंजरे से प्यार |
  


हो निर्भय घूमें-फिरें भेड़-बकरियां गाय
मंच-मंच से आजकल हर चीता समझाय |
  


सर पर गांधीवाद का गुंडे के है ताज
चाकू गौतमबुद्ध पर भाषण देता आज |
  


यारो अब मकरंद के विष रचता है छंद
देश-भक्त कहता फिरे अपने को ' जयचंद ' |
  


राखी बंधवाकर कहो कब राखी है लाज ?
बना हुमायूं-सा फिरे हर दुर्योधन आज |
   


प्यारे जो है मान ले राजनीति का फूल
कुर्सी तक जब जायगा तुरत बनेगा शूल |
   


जन की गर्दन पर रखी नेता ने तलवार
तुरत बना इस खेल में कवि भी हिस्सेदार |
   


कवि ने जिसको कल कहा देशभक्त इन्सान
कुर्सी पाकर आ गया असल रूप शैतान |
   


कवि तुझको इस बात पर है कुछ पश्चाताप ?
राजनीति में फल रहे तेरे कारण पाप |
   


कवि क्यों अब बौना हुआ तेरे मन का जोश
एक बार तो कह जरा खल को वतनफरोश |
   


अंधकार की मार को यूं ही प्यारे झेल
राजनीति के दीप में मिले न बाती-तेल |
   

 
कायर रच सकते नहीं , विद्रोहों के छंद
देख बिलौटे को करे , आँख कबूतर बंद |
 


पहले से ही सोच ले , तू जवाब माकूल
वधिक तुझे हर बात पर ,  भेंट करेगा फूल | 
    


राजा का दरबार है, सोच-समझकर बोल
चीख यहाँ बेकार है, सोच-समझकर बोल |


अति उन्मादी लोग हैं, फिर से चारों ओर
एक यही उपचार है, सोच-समझकर बोल | 
    


दुःख की तीखी धूप में जब गुम हो मुस्कान
ममता की छतरी तुरत माँ देती है तान |
 


कुटिल चाल के खेल में माँ थी बेहद दक्ष
दो बेटों के बीच झट लिया धींग का पक्ष | 
    


क़ातिल के दिल में कहाँ , थोड़ा भी संवेद 
केवल जानें छैनियाँ  , सुम्मी करना छेद |   
 


पिंजरे का जीवन जिए ,पंछी बन मजबूर
खग किलोल से बोल से , हुआ टोल से दूर |
     


देख भेड़िया मस्त है , आज बकरियां - भेड़
चाबुक से चमड़ी कहे, ' मुझको पिया उधेड़ ' |
 


तूफां के आगे झुकें , अपने सभी कयास
शुतुरमुर्ग- सी गर्दनें , सिर्फ हमारे पास |
     


एक लड़ाई को भले आज गये हम हार
इस सिस्टम को बींधने फिर से हैं तैयार |
     


हे भावुक मन बोल अब , किसका लेगा पक्ष
देख कुल्हाड़ी खुश हुए , जंगल में जब वृक्ष |
 


विक्रम ने जब मेज तक , कुछ खिसकाया माल
थाने के वैताल ने ,  पूछे नहीं सवाल |
  
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+ रमेशराज , 15/109, ईसानगर, अलीगढ़-202001
मो.-9634551630    

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