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प्राची - जून 2017 - पाठकीय // आपने कहा है

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आपने कहा है

प्राची से परिचय हुआ
वरिष्ठ साहित्यकार गुरुवर रामदरश मिश्र जी के यहाँ मई माह में जाना हुआ तो प्राची का अप्रैल 2017 अंक प्राप्त हुआ. हिंदी साहित्य में प्राची जैसी एक और स्तरीय पत्रिका से परिचय हुआ.
‘सम्पादकीय’ के अंतर्गत डॉ रमेश तिवारी जी ने सही ही कहा है कि पठनीयता कम होती जा रही है. पुरानी पीढ़ी के रचनाकारों सा पुरुषार्थ आज के रचनाकारों में कम ही देखने को मिलता है. अनूप मणि त्रिपाठी, शशिकांत सिंह ‘शशि’, वीरेन्द्र ‘सरल’, अर्चना चतुर्वेदी, हरि जोशी, निर्मल गुप्त, संतोष त्रिवेदी, महेश चन्द्र द्विवेदी सहित अनेक लेखकों की हास्य-व्यंग्य रचनाएं मनोहारी होने के साथ-साथ विचारोत्तेजक भी हैं. इन सबके बावजूद विशेषांक में हास्य-व्यंग्य की दशा-दिशा पर शोधपरक आलेख की कमी अखरती है.
सामान्य खण्ड में भारत यायावर पर प्रस्तुत आलेख, सुमित्र जी के दोहे, आचार्य भगवत दुबे का बुन्देली गीत, रघुबीर ‘अम्बर’ की ग़ज़ल, साक्षात्कार स्तम्भ के अंतर्गत ग फू फिड. से बातचीत एवं राजेन्द्र कुमार व अनूप शुक्ल की समीक्षाएं पूरी पत्रिका को सार्थक व समग्रता प्रदान कर देने वाली सामग्रियाँ रहीं. इन्हें पढ़कर कोई भी पाठक तरोताजा अनुभव कर सकता है. धारावाहिक के रूप में प्रकाशित ‘अनचाहा सफर’ भी रुचिकर है.
आवरण पृष्ठ आकर्षक लगा. पर, उसका स्रोत व उसको बनाने वाले का परिचय पत्रिका में न होना खलता है. पत्रिका के प्राप्ति स्थान के पते भी दिए जाएं तो पाठकों के लिए आसानी से पत्रिका उपलब्ध हो सकेगी.
•डॉ वेद मित्र शुक्ल, नई दिल्ली 

रचनाओं में परिपक्वता एवं स्तरीयता
सर्वप्रथम आपको एवं आपकी पूरी टीम को साहित्य सेवा के लिए बहुत-बहुत साधुवाद एवं बधाई. सितम्बर 16 माह के अंक से अब तक मैंने ‘प्राची’ के सभी अंकों को पढ़ा है. ज्ञात हो कि सभी अंक मुझे भारत यायावर जी से मिलते हैं. सम्पादकीय के गंभीर चिंतन के साथ ही सभी रचनाओं में परिपक्वता एवं स्तरीयता दिखती है. हर अंक में एक से बढ़कर एक कविता, कहानी, व्यंग्य एवं अन्य सभी रचनाएं प्रशंसनीय हैं. मैं प्राची की नियमित पाठक बन चुकी हूं. वर्तमान में मैं हजारीबाग के संत कोलम्बस महाविद्यालय में हिन्दी की प्राध्यापिका हूं एवं रचनाकर्म से जुड़ी हूं. मूल रूप से कविता लिखती हूं. साथ ही क्षणिकाएं, हायकू, व्यंग्य, आलेख, लघुकथा एवं कहानी भी लिखती हूं. आपकी विशिष्ट प्राची पत्रिका में प्रकाशन हेतु मैं कुछ कविताएं भेज रही हूं. यह मेरी मौलिक और अप्रकाशित रचनाएं हैं. आपकी पत्रिका में मेरी रचनाओं को स्थान मिलने से मैं आपकी आभारी एवं आपके प्रति कृतज्ञ रहूंगी. हजारीबाग के रचनाकार रतन वर्मा, भारत यायावर, विवेक प्रियदर्शी, विजय केसरी एवं ख्यात कथाकार पंकज मित्र की रचनाएं नियमित आ रही हैं, जिन्हें पढ़कर अत्यन्त प्रसन्नता होती है.
•प्रमिला कुमारी गुप्ता, हजारीबाग

हास्य-व्यंग्य को तवज्जो नहीं दी जा रही
‘प्राची’ का अप्रैल, 2017 अंक देखा. आज, जैसा कि अन्य पत्र-पत्रिकाओं को देखने के बाद मुझे लगता है कि लेखकों में हास्य-व्यंग्य लेखन के प्रति रुझान कम हो गया है. ऐसे में प्राची का यह हास्य-व्यंग्य विशेषांक आशान्वित करता है कि हास्य-व्यंग्य लेखक तो हैं, किन्तु उन्हें तवज्जो नहीं दी जा रही. कहां है टोबा टेकसिंह, गधा बिरादरी की एक चिंतन बैठक, हमारी पार्टी ही देश को बचाएगी, कवयित्री बनने का चस्का, सेल्फी का भूत, आदि कई सारी व्यंग्य रचनायें आज के समय तथा राजनीति पर अच्छा खासा प्रहार हैं. हालांकि कई सारी रचनायें पाठकों पर निष्प्रभावी भी हैं. दोहे, गज़लें एवं हम इंसान हैं, कविता प्रभावित करती हैं.
इस अंक में ‘भारत यायावर का साहित्यिक व्यक्तित्व जिसे गणेशचंद्र राही ने प्रस्तुत किया है, उसे पढ़कर यायावर जी को समग्रता से जानने का अवसर तो मिला, चूंकि यायावर जी प्राची के प्रधान संपादक हैं, इसलिए यह आलेख प्राची की जगह कहीं अन्यत्र प्रकाशित हुआ होता तो बेहतर होता.
अतुल मोहन जी की तीनों लघुकथाएँ अच्छी लगीं. दिनेश बैस की उपस्थिति प्राची के प्रत्येक अंक को विशिष्ट बनाती है. रतन वर्मा जी अपने आत्म-संदर्भ के कारण प्राची के हर अंक में आगे के अंक के लिए उत्सुकता बनाये रखते हैं.
प्राची मई 2017 अंक का संपादकीय पतन के लाभ’, मुझे लगता कि अप्रैल के व्यंग्य अंक के लिए अधिक प्रासंगिक होता. न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण के सिद्धान्त को आधार बनाकर आपने जो मानव की प्रस्तुति की है, वह न सिर्फ सराहनीय बल्कि विचारणीय भी है. संपादकीय के लिए आपको बधाई! इस अंक में भी ‘आहत होने की चाहत’ तथा ‘पेट पुराण’ शीर्षक से दो हास्य-व्यंग्य की रचनायें प्रकाशित हैं. ये रचनायें प्रभावित करती हैं. डॉ. अमिताभ शंकर राय चौधरी की कहानी ‘वन्य’ पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से एक महत्त्वपूर्ण कहानी बन पड़ी है. नाहर ने वन्य प्राणियों के प्रति जो समर्पण भाव दिखाया है, वह सभी के लिए अनुकरणीय है. यह कहानी मर्म को स्पर्श करती है.
इसके अतिरिक्त ‘मिसेज सचान’ तथा ‘अपना घर’ कहानी भी अच्छी बन पड़ी हैं. दिनेश बैस जी ‘देने लायक होना भी...’ के माध्यम से एक आत्मीय संदेश देते हैं.
अंक की अन्य रचनायें भी प्रभावित करती हैं. ‘प्राची’ निरंतर अपनी उत्कृष्ट रचनाओं के साथ पाठकों की अनिवार्य बनती रहे, इसी कामना के साथ!
•विकास कुमार, अमगावां, चतरा ‘

प्राची को खेमेबाजी से बचाना जरूरी
प्राची का फरवरी अंक मिला है. आदरणीय श्री यायावर जी के आने के बाद का मेरा पहला पत्र शायद प्रकाशित हुआ था...उसे समय मिले तो एक नजर पढ़ लीजियेगा. भारत जी बड़ा नाम है, बहुत सीनियर  हैं...पर इधर के कुछ अंकों में और इस बार भी आप खुद देखें कि बिहार/झारखंड के ही कितने लोग प्राची में एक मुश्त प्रकाशित हो रहे हैं. यह आपसे छिपा नहीं होगा...और यही मेरी मधुर नज्मी जी से बात...उन्होंने भी यही कहा...मुद्दा सिर्फ मेरी रचनाओं का छपना नहीं और मेरा झारखंड या बिहार से कोई दुराग्रह भी नहीं. खुद मेरी पढ़ाई और अखबारी नौकरी जमशेदपुर में ही हुई. मैं वहीं पला-बढ़ा हूं, पर मुझे इसका डर था, वहीं हो रहा. प्राची को ग्रुप और खेमे से बचाना भी जरूरी है. और स्वयं आपका भी नाम-काम कुछ कम नहीं. पत्रिका पहले ही अधिक सुरुचिपूर्ण हुआ करती थी. यह मेरी निजी राय है. संपादक को आत्म प्रशस्ति से बचना चाहिए. लेखन का उद्देश्य प्रचार-प्रसार मनोरंजन नहीं मेरे लिए...ये जरूर है कि आज के जमाने में कवि मुजरा कर रहा, ऑर्केस्ट्रा जैसा गा बजा रहा, पर अपनी-अपनी सोच...
•अभिनव अरुण, वाराणसी


प्रूफ-अशुद्धि से मुंह कसैला हुआ
सामाजिक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक विचारों का मासिक ‘प्राची’ का चित्ताकर्षक आवरण से सजा मई अंक प्राप्त हुआ. अपने संपादकीय लेख में संपादकजी ने पतन के लाभों को विभिन्न रूपों में विश्लेषित किया है, गिरना सुखद है तो दुखद भी; इतना ही नहीं, गिरना ही पतन की पराकाष्ठा है. पैने, धारदार और तीखे संपादकीय के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद. ‘धरोहर’ के अंतर्गत कीर्तिशेष कथाकार श्री गोपालराम गहमरी की ‘लंगड़े की सैर’ कहानी को भारत यायावरजी ने पढ़ने का अवसर दिया, उनको बार-बार धन्यवाद. कहानियां ‘मिसेज सचान’, ‘और टूटी नहीं रही’ ‘वन्य’, ‘अपना घर’ भी खूब पसन्द आईं. अमित शर्मा का व्यंग्य ‘आहत होने की चाहत’ तथा सनातन कुमार का ‘पेट पुराण’ चुटीले एवं मनोरंजक हैं. कविताओं में ‘अच्छे-बुरे दिन’ ‘बदलाव’ अंजुम की गजलें पठनीय लगीं. ‘यहां वहां की’ स्तम्भ में दिनेश बैस का आलेख मजेदार लगा. अन्य सभी आलेख भी ज्ञानवर्धक हैं. पुस्तक समीक्षा तथा साहित्यिक गतिविधियां पाठकों को लिए उपयोगी हैं. कुल मिलाकर पूरे अंक का कलेवर-संयोजन उत्तम एवं स्वादु है, कहीं-कहीं प्रूफ-अशुद्धि के कंकड़ से मुंह कसैला जरूर हुआ, पर एक उत्तम अंक के लिए संपादक मंडल को बधाई.
पुनश्चः पत्रिका में मेरे यात्रा-संस्मरण को उदारतापूर्वक स्थान दिया, इसके लिए आपका आभारी हूं.
•पे्रमपाल शर्मा, ‘साहित्य अमृत, नई दिल्ली

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