बुधवार, 26 जुलाई 2017

प्राची // जून 2017 // साक्षात्कार // ‘‘घटाटोप अँधेरे में रोशनी की लकीर है साहित्य’’ (डॉ. अशोक मैत्रेय जी से डॉ. भावना शुक्ल की बातचीत)

वरिष्ठ साहित्यकार, पत्रकार, चिन्तक, कवि 27 मार्च 1942 को जन्में डॉ. अशोक मैत्रेय जी पूर्व अनुसन्धान अधिकारी (उ.प्र.), होमियोपैथिक मेडिकल कॉलेज (बिजनौर) पूर्व लेक्चरर (पैथोलाजी), ‘तारेश’ हिंदी मासिक पत्रिका के सलाहकार संपादक, सन् 2010 में मुसान चो-ओह ह्यून इंटरनेशनल लिटररी अवार्ड, सन 2012 में ग्लोबल इंटलेक्चुअल अवार्ड, एवं देश की अनेक संस्थाओं से सम्मानित, अनेक राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में भागीदारी, आपकी छन्दमुक्त कविताओं का संग्रह ‘मन के आखर’ प्रकाशित, ‘पकड़ो हाथ कबीर’ दोहा संग्रह शीघ्र प्रकाश्य,

शोध आलेखों का संग्रह प्रकाशन प्रक्रिया में अनेक प्रतिभाओं के धनी मैत्रेय जी वर्तमान में साहित्य, समाज और पत्रकारिता की सेवा गंभीरता के साथ कर रहे हैं. आज मैं अभिभूत हूँ ऐसे प्रतिभा संपन्न साहित्यकार का साक्षात्कार लेकर. आपको नमन. प्रस्तुत है साक्षात्कार के अंश...

डॉ. भावना शुक्ल : साहित्य की परिभाषा क्या है?

डॉ. अशोक मैत्रेय : घटाटोप अँधेरे में रोशनी की लकीर है साहित्य. साहित्य बदलाव के बीच उथल पुथल भी है और संक्रांति काल का पहरेदार भी है. साहित्य वह उपकरण है जो पाठकों के मस्तिष्क में छाए कुहांसे को छांटने और उनकी चेतना को निखारने का काम करता है.

डॉ. भावना शुक्ल : आपने चिकित्सा जगत से साहित्य में कैसे कदम रखा?

डॉ. अशोक मैत्रेय : अरे नहीं-नहीं, साहित्य तो बचपन में ही अंकुरित हो चुका था. 12-13 वर्ष की आयु में विद्यालय की पत्रिका में दो गद्य गीत प्रकाशित हुए थे. हाँ मेरी दिशा भटक गई और मैं साहित्य के स्थान पर विज्ञान का विद्यार्थी बन गया. लेकिन साहित्य ने मुझे वह सब दिया जो शायद मैं उसे न दे सका. उस दौर में कैरियर परामर्श जैसी सुविधाएँ उपलब्ध नहीं थीं. पूज्य पिताजी प्राणाचार्य वैद्यराज पं. लक्ष्मी नारायण शर्मा तत्कालीन मेरठ जनपद के प्रख्यात चिकित्सक थे. इसके चलते मुझे भी चिकित्सा व्यवसाय ने आकर्षित किया. यूँ समझिये कि विज्ञान मेरा जीवन और साहित्य मेरा प्राण बनकर मेरे साथ रहे.

डॉ. भावना शुक्ल : साहित्य की प्रतिबद्धता किसके प्रति होनी चाहिए?

डॉ. अशोक मैत्रेय : सीधी सी बात है जन के प्रति होनी चाहिये, किसी राजनैतिक और धार्मिक विचारधारा अथवा खेमे के प्रति नहीं. साहित्य में रचनात्मकता को समाज की नियति से जोड़ते हुए ‘मनुष्य’ को महत्व देने का सफल प्रयास किया जाना चाहिए. साहित्य के माध्यम से ही अनुभव के यथार्थ के जीवन की अभिव्यक्ति की जा सकती है. विसंगतियों और विद्रूपताओं में हस्तक्षेप किया जा सकता है.

डॉ. भावना शुक्ल : साहित्य और साहित्यकार का प्रयत्न क्या हो?

डॉ. अशोक मैत्रेय : ‘सच’ को जानना और उसे ईमानदारी से अभिव्यक्त करने की कोशिश करना ही साहित्य और साहित्यकार का समूचा प्रयत्न होना चाहिए. सत्ता और मुकुट, थैली और गद्दी को ठेंगे पर रख कर ही चुनौतियों का सामना किया जा सकता है. एक बात और...साहित्यकार के सृजन कर्म और उसके जीवन मै कोई फांक नहीं होनी चाहिए.

डॉ. भावना शुक्ल : वर्तमान समय में हिंदी लेखक की स्थिति क्या है?

डॉ. अशोक मैत्रेय : इतनी सारी चुनौतियों के बीच ये हिंदी लेखक की जिजीविषा का ही प्रमाण है कि सारे अवरोधों को फांदकर वह अपनी रचनात्मकता को धर देने में लगातार लगा हुआ है. लेकिन सोचना यह है कि उसकी सामाजिक प्रासंगिकता कितनी रह गयी है? समाज में व्याप्त जड़ता को क्या अकेला लेखक तोड़ पायेगा या पाठक, आलोचक, समाज और सरकार को भी इसके प्रति अपना दायित्व समझना होगा.

डॉ. भावना शुक्ल : अच्छे साहित्य का पाठक पर क्या प्रभाव पड़ता है?

डॉ. अशोक मैत्रेय : आज प्रत्येक व्यक्ति कहीं न कहीं व्यक्तिगत और सामाजिक सरोकारों से जूझ रहा है. एक महाभारत है जो उसके भीतर निरंतर चल रहा है. ऐसे में पाठक की पीड़ा उस समय छितरा जाती है, जब वह उन्हीं सरोकारों से जूझते हुए, दो-दो हाथ करते हुए रचनाकार और उसके चरित्रों को देखता है. पाठक को लगता है कि वह अकेला नहीं है, कुछ और भी है जो उसकी पीड़ा और उसकी चुनौतियों को शेयर कर कर रहे हैं. तब उसमे जिजीविषा जागती है. उसकी इच्छा शक्ति प्रबल होती है. उसमें परिस्तिथियों और चुनौतियों से जूझने की उमंग पैदा होती है. अच्छा साहित्य पाठक को नई उर्जा देता है. नई स्फूर्ति देता है. नई चेतना देता है.

डॉ. भावना शुक्ल : अच्छे साहित्य से आपका अभिप्राय क्या है?

डॉ. अशोक मैत्रेय : अच्छा साहित्य वह है जो हताशा और टूटन के क्षणों में मनुष्य को ताकत देता है. चेतन और

अर्धचेतन मस्तिष्क में छाए कुहासे को छांटता है. समकालीन परिवेश की चुनौतियों से रू-ब-रू करता है. पाठकों की सामजिक और सांस्कृतिक चेतना निखारता है. उनके ‘स्व’ को झकझोरता आलोड़ित करता रहता है. अच्छा साहित्य समाज को संस्कारित करता है. लेखक और पाठक दोनों की आत्म चेतना का विस्तार करता है. इस विस्तार में सम्पूर्ण मानव व्यक्तित्व के निर्माण की क्षमता होती है. इसी से एक स्वस्थ और अखंड समाज की स्थापना की जा सकती है. निष्कर्ष यह है कि साहित्य समाज को जीवन जीने की दृष्टि देता है.

डॉ. भावना शुक्ल : जब साहित्य दिग्भ्रमित हो जाये या समाज और साहित्य के बीच संवादहीनता की स्थिति आ जाये तब...?

डॉ. अशोक मैत्रेय जी : तब समूचा समाज एक भीड़ में बदल जायेगा. अराजकता ही अराजकता का ही बोलबाला होगा. कमोबेश यह स्थिति आज है. वर्तमान जीवन में राष्ट्रीय भावों के क्षरण, भ्रष्टाचार, बेईमानी, समाज में फैली अमानवीयता, अराजकता, बदहाली और स्वार्थपरता से हमारी आजादी अर्थहीन हो कर रह गयी है. आर्थिक शोषण भी बदस्तूर जारी है. किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं. इसलिए समकालीन साहित्य को अपने युग की गहराई से जुड़कर अपने समय की सच्चाइयों को प्रकट करना चाहिए. हाँ रचना ऐसी हो जो पाठक से संवाद स्थापित करे. मर्म तक पहुंचकर पाठक को आत्म निरीक्षण की स्थिति तक पहुंचा सके.

डॉ. भावना शुक्ल : पाठकों का साहित्य से वांछित जुड़ाव कैसे हो?

डॉ. अशोक मैत्रेय : कृत्रिम जटिलता, अबूझ कथ्य और नकली भाषा से साहित्य को मुक्ति मिलनी चाहिए. सीधी-सच्ची बातें ही पाठकों तक ज्यादा देर और ज्यादा दूर तक चल सकती हैं. इसके लिए पाठकों की अभिरुचि और रचनाकार के दृष्टिकोण का एक वेवलेंथ पर होना जरूरी है. इसके बगैर पाठकों का साहित्य से वांछित जुड़ाव मुमकिन दिखाई नहीं पड़ता.

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सम्पर्क : /21 हरि सिंह पार्क,

मुल्तान नगर, पश्चिम विहार (पूर्व)

नई दिल्ली-110056

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