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प्राची // जून 2017 // व्यंग्य // यहां वहां की // ऑनलाइन आशीर्वाद का प्रबंध // दिनेश बैस

यहां वहां की

ऑनलाइन आशीर्वाद का प्रबंध

दिनेश बैस

वे गुरू घंटाल के गेट-अप में थे.

सिल्क का झंगला सा पहने. आंधी में उड़े तो ब्रह्माण्ड-दर्शन का लाभ दे जाये. सिर पर पगड़ी, हाथ से बांधी हुई नहीं, रेडीमेड. फूलों तथा सलमा सितारों से जड़ी हुई. जैसे, सीधे नौटंकी कम्पनी से कूद कर चले आ रहे हों.

पैरों में मेड इन चायना, असेम्बिल्ड इन इंडिया, ब्रांडेड खड़ाऊँ हिलगाये हुये. चलें तो चर्र-चूँ-, चर्र-चूँ नहीं, धर्म-धुन निकले. हाथों में अंगुलियों से अधिक अंगूठियाँ. सोने की महंगाई को चुनौती देती हुई. ऊपर वाले से एक यह भी शिकायत कि अंगुलियों की संख्या इतनी कम क्यों होती है. आदमी की हैसियत के अनुसार देह पर अंगुलियों का आबंटन क्यों नहीं होता है. जिसकी जितनी अंगूठी धारण की क्षमता हो, उसकी उतनी अंगुलियां हों. एक अंगूठी के हिस्से में कम से कम एक अंगूठी तो आये. हाथों में अंगुली बनाने में असुविधा हो तो देह में कहीं भी फिट कर दी जायें.

गले में अनगिनत मालायें. रुद्राक्ष या फूलों की एक भी नहीं. सब मोती-माणिक की. सुर्मामयी आंखें. धूर्तता वर्षण करती हुई.

चेहरे पर आर्ट आफ चीटिंग सी मुस्कान. पूरे पाखंड स्वामी के अवतार प्रतीत हो रहे थे. अचरज हुआ. आंखें फटी की फटी रह गईं. रोक न सके. मुँह से निकल ही गया...-जमानत हो गई?

-संतन कहां जमानत से काम- वे आध्यात्म के सरोवर में कूद गये. छपाक से.

-पैरोल पर आये हैं?

-मूरख हैं...

-भाग आये?

-कैसी बातें कर रहा है. संत कभी भागते हैं?

-जमानत हुई नहीं है. पैरोल पर आये नहीं हैं. भागे हैं नहीं. फिर, बाहर कैसे. आप तो जेल प्रवास पर थे- जिज्ञासा हमारा हलक सुखा रही थी.

-भोला है...वे हम पर तरस खा रहे थे...साधारण मनुष्य की यही दुर्बलता होती है. रोटी-कपड़ा-मकान, घर-परिवार, हिंदुस्तान-पाकिस्तान, हिंदू-मुसलमान, मंदिर-मसजिद से आगे दृष्टि जाती ही नहीं है. बहुत भागेगा तो चीन की तरफ मुँह करके थूक आयेगा...उसे ज्ञान ही नहीं होता है कि

आध्यात्मिक शक्तियां कितनी प्रबल होती हैं. कितनी प्रगति कर चुकी हैं...

-कुछ कहेंगे भी या पहेली बुझाते रहेंगे?- हम खुद की जिज्ञासा रोक नहीं पा रहे थे.

-पुत्र...वे प्रवचन मोड में आ गये...जब तक मनुष्य भय और लालच से ग्रस्त रहेगा, स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ दिखाने की चिंता में लगा रहेगा, उसके चिंतन के केन्द्र में यह रहेगा कि दूसरों का मुँह उससे अधिक काला क्यों है, उसकी ऊर्जा इसी चिंतन में व्यय होती रहेगी कि भ्रष्ट आचरण निर्माण में उसे अग्रणी स्थान कैसे प्राप्त हो, तब तक धर्म को फलने-फूलने से कोई रोक नहीं पायेगा. धर्म पर किसी प्रकार का संकट नहीं आयेगा...

-धर्म तथा भ्रष्टाचार के बीच क्या सम्बंध है? हमने आपत्ति की- आप नाहक हमारी भावना को ठेस पहुँचा रहे हैं. धर्म को भ्रष्टाचार से जोड़ कर...

-मूरख- उन्होंने पूछा- धर्म-गुरू तू है या हम...

-निश्चय ही आप हैं- हमारी आंखें उनके चरणों में झुकी थीं.

-तो धर्म का ज्ञान हमें होना चाहिये या तुझे, अधर्म...

-जी, आप को- हम ग्लानि से भर रहे थे.

-अज्ञानी- वे प्रारम्भ हो गये- धर्म भ्रष्टाचारग्रस्त मनुष्य को, मोहग्रस्त मनुष्य को अपराध-बोध से मुक्त करता है...वे व्याख्या कर रहे थे- वह पाप का प्रतिदान पुण्य में खोजता है- वे बता रहे थे- तुम धर्महीन साधारण मनुष्य प्रतिशोध की ज्वाला में दहकते रहते हो. धर्म प्रतिशोध में विश्वास नहीं करता है. वह प्रतिदान का अनुगामी है. एक उदाहरण से समझ पाओगे- वे उदाहरण देकर समझाने लगे- मान ले कि तू एक साधारण मनुष्य है. बीच बाजार में कोई तुझे बीस गालियाँ दे जाये तो तू क्या करेगा?

-उस समय जो भी ठीक लगेगा वही करेंगे...

-यही भ्रम है पुत्र- वे आत्मीय हो उठे- मैं ज्ञान देता हूँ तुझे- वह कहने लगे- तू शक्तिशाली होगा तो बीस गालियाँ देने वाले की खोपड़ी फोड़ देगा. और कुछ नहीं तो उसे पचास गालियाँ दे देगा. और अगर तू दुर्बल हुआ तो क्या करेगा- उनका प्रश्न था.

उत्तर हमारे पास नहीं था. बेवकूफों की तरह उन्हें देख रहे थे.

-दुर्बल हुआ तो- वे रहस्य खोलने लगे- तू उसे कोसना आरम्भ कर देगा. कहेगा कि उसने तुझे गाली दी. जा भगवान उसे गाली देगा. इस जन्म में नहीं तो अगले जन्म में...

-हाँ, यही करेंगे- हमने स्वीकारा.

-यही प्रतिशोध है पुत्र- वे मुदित हुये कि उन्होंने हमें सहमत कर लिया- हम संत लोग प्रतिशोध में नहीं, प्रतिदान में विश्वास करते हैं. हम पाप का प्रतिदान पुण्य में खोजते हैं. यों समझ कि तुझे गाली देने वाला या भ्रष्टाचार करने वाला

अपराध-बोध की ज्वाला में धधकता है. वह धर्म की शरण में आता है. हमारी शरण में आता है. धर्म के उत्थान के लिये हम उससे दान स्वीकारते हैं. इससे वह अपराध बोध से मुक्त हो जाता है. सोचता है कि अनधिकृत कमाई का एक भाग प्रभु के चरणों में चला गया. इससे आत्मा के ऊपर चढ़ा बोझ उतर गया...

-तुम देख रहे होगे, पुत्र- वे बताने लगे- जितना भ्रष्टाचार बढ़ रहा है, उतना ही धर्म-प्रसार भी बढ़ रहा है. उतनी ही हमारी बिरादरी बढ़ रही है. अब तेरे जैसे मनुष्य को बाबा-बापू-स्वामियों की खोज में भटकना नहीं पड़ता है. एक खोजने जायेगा, दस मिल जायेंगे. आनलाइन आशीर्वाद लेना चाहेगा तो उसकी भी व्यवस्था है. जो भ्रष्टाचार के लिये नामवर हैं, वही धर्म-रक्षण की कतार में भी लगे पाये जाते हैं. तुम्हें तो ज्ञात है पुत्र कि हमारे आश्रम में कैसे-कैसे शिष्य-शिष्यायें पाये जाते हैं...उनकी आंखों से कुटिलता झांकने लगी...

हमने चाय का प्याला उनकी ओर बढ़ाया- वह आश्रम कहाँ, महल है गुरू...

-यों, कहने को तो भक्तों के मध्य वह हरम के नाम से चर्चित हैं- उन्होंने बायीं आँख दबाई. जैसे कोई गूढ़ रहस्य बता रहे हों- किन्तु हम उसे आश्रम ही कहते हैं. मर्यादा का भी तो प्रश्न. फिर, आश्रम की अनुभूति करने में जैसी सात्विकता है, महल कहने से वही विलासिता में परिवर्तित हो जाती है-

-आप जेल से कैसे छूटे- हम हम फिर मूल प्रश्न पर आ गये.

-जेलर बहुत सी जांचों में फंसा था- वे भी सीधे विषय पर आ गये- अपना वहाँ भी कैम्प आश्रम स्थापित हो गया. स्वयं जेलर ने प्राण-प्रतिष्ठा करवाई उसकी. प्रभु की महिमा कोई नहीं जान सकता है. कोई नहीं जानता है कि किससे वे क्या प्रयोजन सिद्ध करवायेंगे- उनकी आंखें बंद हो चुकी थीं. अभिभूत हो रहे थे- प्रभु की कृपा से अपना वहाँ भी ऊपर वाले से आलिंगन करवाने का धंधा चल पड़ा. कैदियों से अधिक कारिंदे भयभीत हैं वहाँ. जेलर सबसे अधिक भयभीत था. करेगा तो डरेगा ही...उन्होंने करने और डरने का सिध्दांत बताया. कुटिलता उनकी आंखों में छलकने लगी- जेलर ने हमसे गुरू-दीक्षा ले ली. अकेले में चरणों पर सिर रख दिया- गुरू-दीक्षा में क्या लोगे प्रभु?

तू तुच्छ प्राणी संतों को क्या देगा- वे बता रहे थे- गुरू का दिन आ रहा है. एक दिन के लिये जाने दे. बाहर के भक्तों को भी ज्ञान दे कर प्रतिदान लेना है. वहाँ तेरे जैसे हजारों हैं. विश्वास रख. तेरा गुरू लौट आयेगा. तू बहुत सुख दे रहा है...

--

सम्पर्कः 3-गुरुद्वारा, नगरा, झांसी-284003

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