बुधवार, 26 जुलाई 2017

प्राची // जून 2017 // धारावाहिक आत्मकथा (छठीं किस्त) // अनचाहा सफर // रतन वर्मा

आत्म संदर्भ

धारावाहिक आत्मकथा (छठीं किस्त)

अनचाहा सफर

रतन वर्मा

सोचा था कहां जाने के लिए

गतांक से आगे...

न में एक खटका तो था ही कि पहले यह जान लूं कि मामी या भाभी ने तो मौसाजी से कुछ नहीं कहा है. इसी सोच के तहत बातों-बातों में मैंने मामी से कहा था, ‘‘मंजू की डिलेवरी तो देहरादून में भी हो ही सकती थी. बेकार ही आप लोगों को परेशान करने आ गया...’’ भाभी भी वहीं बैठी थीं.

मेरी बात सुनकर मामी की त्योरियां बुरी तरह चढ़ गयी थीं. भाभी की ओर देखकर बोली थीं, ‘‘सुन रही हो न दुलहिन, कैसी बड़ी-बड़ी बातें कर रहा है. क्या समझता है यह? बाप बन गया है तो क्या मैं इसे पीट नहीं सकती? कह दो इससे, इसे जहां जाना है चला जाय. पर खबरदार कि दुलहिन और बच्चा को ले जाने की बात मुंह से निकाली. अब दुलहिन और बच्चा कहीं नहीं जायेंगे. इसे जहां जाना हो, जाय...’’ मामी देर तक गुस्से में बड़बड़ाती रही थीं.

उनकी बड़बड़ाहट ने मेरी शंका का समाधान कर दिया था. यानी मामी या भाभी ने मौसा जी को कुछ नहीं कहा होगा तथा मौसा जी की हिदायत उनकी अपनी ही सोच रही होगी. या फिर हमारे अभिभावकनुमां तो वे भी थे ही, इसलिए हमारे भविष्य की चिंता के तहत ही उन्होंने यह हिदायत दी होगी.

सोचा था कहां जाने के लिए

3 अगस्त 1977 को मैं एक पुत्री का भी पिता बन गया था. उसका नाम ज्योति रखा गया था. कामेश भैया ने ही उसका नामकरण किया था.

अब तक, जब से मैं देहरादून से आया था, भैया के स्वास्थ्य में थोड़ा भी सुधार नहीं आया था. बल्कि इस बीच उनकी छाती में छेद करके उनके फेफड़े की पर्तों से कई बार हवा निकाली जा चुकी थी. लगभग दो महीने तक अस्पताल में भर्ती रहे थे वे. जब अस्पताल से घर आये थे, तब चिकित्सक ने पूर्ण विश्राम की हिदायत देते हुए कहा था कि कवि जी को आजीवन दवा खाते रहना होगा.

मसलन, भैया अब बिछावन पर ही पड़े रहते. हालांकि पड़े-पड़े भी कवितायें वगैरह भी लिखते रहते थे.

मैंने मन तो बना लिया था, देहरादून लौट जाने का. पर असमंजस में भी था कि भैया का वैसी हालत में छोड़कर जाना कदापि उचित नहीं होगा. लेकिन न जाना भी एक तरह से अन्याय ही होगा उनके साथ. इसलिए कि उनके अपने परिवार का दायित्व तो ऊपर था, ऊपर से हमारा बोझ भी उन्हें ही वहन करना पड़ता. ऐसा नहीं कि मामा-मामी को हमारा खयाल ही नहीं था. पर जबकि हमने घर अलग कर लिया था, तो भैया का स्वाभिमान उन्हें शायद इस बात की इजाजत नहीं दे पा रहा था कि वे फिर से मामा-मामी की कोई मदद लें.

मेरे मझले भैया धनेश कुमार वर्मा की भी शादी हो चुकी थी. पर वे हमारे साथ न रहकर हमसे थोड़ी दूरी पर एक किराये के मकान में रहने लगे थे. फिर भी ऐसा नहीं कि उन्हें भैया-भाभी की चिंता ही नहीं थी. रोजाना वे और मझली भाभी घर आकर भैया की तीमारदारी करते रहते. भैया से छुप-छुपाकर भाभी को कुछ पैसे भी दिया करते. छुपकर इसलिए भी कि वे जानते थे कि भैया किसी का सहयोग स्वीकार करने वालों में से नहीं थे.

समय के अंतराल में भैया धीरे-धीरे चलने-फिरने लगे थे. अब मुझे लगने लगा था कि भैया को अपने निजी परिवार के दायित्व से मुक्त कर देहरादून लौट ही जाना चाहिए. इसकी भूमिका भी तैयार कर ली थी मैंने, जिसके लिए मामी का सहयोग लेना मुझे उचित लगा था.

पहले तो मामी नाराज हुई थीं, पर समझाया था मैंने उन्हें, ‘‘अब मुझे भी अपना दायित्व संभालने दीजिए मामी. मैं जानता हूं कि जबतक आप लोग हैं, तबतक हमें कोई दिक्कत नहीं होगी. पर कुछ तो करना ही होगा. इसीलिए अभी से मैं खुद को व्यवस्थित कर लेना चाहता हूं. अब तो मेरा परिवार भी बढ़ रहा है...’’

मामी को मेरा तर्क शायद अनुचित नहीं लगा था. जब मैंने लोहा ‘गरम’ देखा, तब भैया से सिफारिश करने के लिए उन्हें राजी कर लिया था.

बहुत मुश्किल से भैया-भाभी राजी हुए थे. मैंने तैयारी शुरू कर दी थी. इस आशय की सूचना मंजू (पत्नी) के पिताजी को भी पत्र द्वारा दे दी थी. हम जनवरी 1988 के प्रथम सप्ताह में प्रस्थान करने वाले थे. तभी तीन जनवरी को मेरी सासु मां का हमारे घर आगमन हुआ था. हमने ज्योति की छठी में भी निमंत्रण भेजा था वहां, पर डाक व्यवस्था की त्रुटियों के कारण उन्हें विलम्ब से पत्र मिला था. फिर बाद में विभिन्न पारिवारिक कारणों से उनका हमारे यहां आना संभव नहीं हो पाया था. लेकिन जैसे ही मौका मिला, मेरी सासु मां हमसे मिलने आ गयी थीं. या फिर जब उन्हें पता चला कि हम लोग फिर से देहरादून लौटने वाले हैं, तो जाने के पूर्व शायद मां हमसे मिल लेना चाहती थीं.

मेरे सबसे बड़े साले, जो अपने आठ भाइयों और तीन बहनों में सबसे बड़े थे, वे हजारीबाग जिले में कुजू के समीप तोपा कोलियरी में कार्यरत थे.

मेरी सासु मां ने एक दिन मुझसे कहा, ‘‘मेहमान, देहरादून तो जा ही रहे हैं आप! पता नहीं, फिर कब आप लोगों से भेंट हो. पिछली बार जब आप और मंजू हमारे घर आये थे; तब बाकी सबों से तो आपकी भेंट हो गयी थी, पर मेरे सबसे बड़े बेटे ने आपको नहीं देखा है. उसकी बहुत इच्छा है आपसे मिलने की. और मंजू के पापा का मन है कि आप लोग कुछ दिन हमारे पास भी रहें. क्या ऐसा नहीं हो सकता कि आप लोग हजारीबाग जाकर मेरे बड़े बेटे से मिल लें, फिर वहां से लौटकर बाल्मीकि नगर आ जायें और वहीं से कुछ दिन हमारे पास रहकर देहरादून चले जायें?’’

मेरी ससुराल, वैसे तो बेतिया में है, पर उन दिनों मेरे ससुर जी बाल्मीकि नगर में रहकर गंडक प्रोजेक्ट में काम करते थे और सपरिवार वहीं रहा करते थे.

अब सासु मां के अनुनय को टाल तो सकता नहीं था, पर इसमें खर्च बहुत था. वैसे भैया या मामा के समक्ष समस्या रखता, तो समाधान निकल सकता था, पर उन पर और बोझ मैं नहीं डालना चाहता था. मैंने कहा था, ‘‘अभी सभी को ले जा पाना तो संभव नहीं है, बच्चे छोटे हैं और ठंड भी काफी है.’’

कुछ पल सासु मां कुछ सोचती रही थीं, फिर बोली थीं, ‘‘अगर आपको एतराज न हो तो आप अकेले तोपा हो आइये. और मंजू तथा बच्चों को लेकर मैं बाल्मीकि नगर चली जाती हूं. देहरादून जाने के पहले कुछ दिन हमारे पास भी रह लेगी. और आप तोपा चले जाएंगे तो मेरे बेटे का भी मन रह जायेगा.’’

मैंने जवाब दिया था, ‘‘इसमें मुझे क्या आपत्ति हो सकती है, पर इसके लिए भैया और मामी से इजाजत लेनी होगी.’’

उल्लसित होकर बोल पड़ी थीं सासु मां, ‘‘तो ठीक है, मैं ही बात कर लेती हूं.’’

भैया और मामी से इजाजत मिल गयी थी और वह दूसरे ही दिन मंजू और बच्चों को साथ लेकर निकल गयी थीं.

मैं भी उसी रात की बस से हजारीबाग के लिए प्रस्थान कर गया था. तोपा कोलियरी हजारीबाग से लगभग चालीस किलोमीटर की दूरी पर है. उन दिनों जारीबाग से कुजू तक की यातायात व्यवस्था तो ठीक थी, पर कुजू से तोपा कोलियरी तक के लिए, किराए की कोई गाड़ी नहीं चलती थी. डटवां मोड़ से एक टूटी-फूटी सड़क तोपा के लिए जाती थी. जिसकी दूरी लगभग आठ कि.मी. थी. डटवां मोड़ से ही निजी ट्रक कोलियरी तक जाया करती थीं. किसी को यदि कोलियरी तक जाना है, तो या तो वह पैदल यात्रा करता था फिर ट्रक के चालक ने कृपा कर दी, तभी...

मुझे भी ट्रक चालक की कृपा का लाभ मिला था और मैं तोपा कोलियरी, अपने साले साहब के पास पहुंच गया था. मन में एक ही खटका था कि चूंकि हमने अपनी मर्जी से शादी की थी, सो पता नहीं मंजू के बड़े भैया का व्यवहार जाने कैसा हो मेरे साथ, पर साले साहब और उनकी पत्नी ने परिचय के साथ ही बड़ी ही आत्मीयता और आह्लाद के साथ मेरा स्वागत किया था. शिकायत सिर्फ इतनी रही उनकी कि मैं मंजू और बच्चों को साथ लेकर क्यों नहीं आया.

खैर, इतनी-सी शिकायत बनती भी थी उनकी. उसी दिन रात में साथ खाते हुए मेरे साले साहब ने, जिन्हें मैं भैया संबोधित करने लगा था, पूछा था मुझसे, ‘‘तो यहां से लौटकर आप सभी फिर से देहरादून चले जायेंगे?’’

‘‘हां! नौकरी तो करनी ही है न?’’

पुनः पूछा था उन्होंने, ‘‘अच्छा, वहां कितना वेतन मिलता है आपको?’’

उनके इस प्रश्न पर थोड़ा गड़बड़ाया था मैं, जिसे भैया शायद भांप गये थे, बोले थे, ‘‘नहीं....नहीं, नहीं बताना चाहते हैं, तो कोई बात नहीं. मैंने तो वैसे ही...’’

‘‘नहीं भैया, बताना क्यों नहीं चाहूंगा. वहां चार सौ रुपये प्रतिमाह मिलते हैं.’’

उस जमाने में चार सौ रुपये प्रतिमाह कम नहीं हुआ करते थे. फिर भी भैया के मुंह से अनायास ही निकल पड़ा था, ‘‘ठीक है.’’ लेकिन पुनः कुछ सोचते हुए बोले थे, ‘‘एक बात बताइए, उतने की नौकरी तो इधर भी मिल सकती है. अगर इधर मिल जाय, तब?’’

मुझे पता नहीं था कि भैया का परिचय बड़े-बड़े उद्योगपतियों से भी था. मुझे लगा था कि शायद वे मेरी नौकरी के लिए इसलिए परेशान थे, क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि मैं बिहार से दूर देहरादून जाकर रहूं. मैं उन्हें परेशान नहीं करना चाहता था, बोला था, ‘‘क्या फर्क पड़ता है भैया, मैं यहां नौकरी करूं या वहां. आप झूठ-मूठ परेशान हो रहे हैं.’’

‘‘नहीं-नहीं, परेशानी कैसी.’’ बोले थे भैया, ‘‘दरअसल आपके लिए मैंने एक नौकरी तलाश कर रखी है. वहां भी चार सौ ही मिलेंगे. लेकिन आप सब हमारे नजदीक रहें, बस यही चाहता हूं मैं. मेरी मां भी यही चाहती है कि आप इधर ही कहीं नौकरी करें.’’

मैं समझ गया था कि मां ने पहले से ही भैया से मेरे संदर्भ में बात कर रखी होगी. तभी तो उन्होंने मेरे पहुंचने के पूर्व ही मेरी नौकरी के संदर्भ में कहीं बात कर रखी थी. शायद मां नहीं चाहती थीं कि उनकी बेटी अपनों से दूर रहे.

पुनः भैया बोले थे, ‘‘यहां जगेसर स्टेशन के पास एक कोलियरी है. उसका नाम भी जगेसर कोलियरी है. है तो वह प्राइवेट कोलियरी, लेकिन उसके मालिक नरेश देव बिहार के पूर्व डिप्टी एक्साइज मिनिस्टर के छोटे भाई हैं. उनसे मेरा बहुत ही अच्छा संबंध है. उन्हीं से बात की है मैंने. आपको कोलियरी पर ही रहना होगा. कोलियरी की दूरी यहां से लगभग डेढ़ घंटे की है. मंजू और बच्चों को आप मेरे पास छोड़ दीजिएगा और वहां ज्वाइन कर लीजिए. फिर वहां रहने की व्यवस्था हो जाय तो सभी को ले जाइएगा. बोलिये, मंजूर है?’’

मुझे भला क्या आपत्ति हो सकती थी?

तीन दिन भैया के पास रहकर चौथे दिन मैं बाल्मीकि नगर के लिए प्रस्थान कर गया था, फिर दो-तीन दिन वहां रहकर पत्नी और बच्चों के साथ तोपा लौट आया था. उसके बाद एक-दो-दिनों में ही मेरी नौकरी पक्की हो गयी थी और मैंने जगेसर कोलियरी में योगदान दे दिया था.

भैया ने एक काम और भी किया था- अखबार में आरक्षी प्रशिक्षण महाविद्यालय में क्लर्क की नौकरी के लिए रिक्तियां निकली थीं. जो सिर्फ महिलाओं के लिए आरक्षित थीं. भैया ने मंजू से भी आवेदन करवा दिया था. लेकिन वह आवेदन, महज आवेदन भर के लिए था. इसलिए कि मैं जानता था कि किसी को सरकारी नौकरी आसानी से तो मिल नहीं सकती, सो, हम भूल भी गये थे कि मंजू ने कोई आवेदन किया था.

कुछ ही दिनों में मुझे जगेसर स्टेशन पर एक चतुर्थ वर्गीय रेलवे कर्मचारी का क्वार्टर महज पंद्रह रुपये प्रतिमाह के किराये पर मिल गया था. एक रविवार को मैं तोपा जाकर मंजू और अपने दोनों बच्चे रितेश और ज्योति को साथ ले आया था.

जगेसर आकर मैं पूरी तरह अपनी नौकरी और परिवार को समर्पित हो गया था. मुझे लगने लगा था कि अब मेरा जीवन व्यवस्थित हो गया है. जबकि जहां मैं रहता था, वह क्वार्टर जगेसर गांव के अन्तर्गत आता था और जहां बच्चों के लिए किसी भी तरह की शिक्षा की व्यवस्था नहीं थी. लेकिन अभी मेरे बच्चे छोटे ही थे, इसलिए उनकी शिक्षा की चिंता करनी भी बेमानी थी.

मैं पूरी लगन के साथ अपने कार्य में संलग्न हो गया था. इस सोच के साथ कि अब अपना पूरा जीवन उसी नौकरी के सहारे काट लूंगा. पर मुझे कहां पता था कि वह कोलियरी पुलिस महकमे और राजनेताओं को मैनेज करके अवैध ढंग से संचालित था. सो, अभी नौकरी करते हुए मुझे तीन माह ही बीते थे कि अकस्मात एक दिन कोलियरी के कार्यालय को पुलिस के एक बड़े जत्थे ने घेर लिया था. फिर कार्यालय में कार्यरत अंकेक्षक तथा बड़ा बाबू को गिरफ्तार कर लिया था. कार्यालय के कागजात भी जब्त कर लिये थे. यहां तक कि कंपनी की एक जीप भी कार्यालय के बाहर लगी थी, उसे भी कब्जा में ले लिया था.

मेरी किस्मत अच्छी थी कि चूंकि मैं फील्ड वर्कर था, इसलिए कार्यालय से कोई दो किलोमीटर दूर की खदान का निरीक्षण कर मैं अपने क्वार्टर पर वापस लौट आया था. फिर दोपहर के भोजन के उपरांत थोड़ा विश्राम करने के बाद मैं कार्यालय में उस दिन की निरीक्षण रपट जमा करने के लिए बाहर निकला ही था कि स्टेशन मास्टर मुखर्जी साहब ने मुझे टोकते हुए पूछा था, ‘‘ऑफिस जा रहे हैं वर्मा जी?’’

मेरी, सहमति में सिर हिलाने के बाद बोले थे वे, ‘‘चुपचाप घर में जाइए, नहीं तो आप भी फंस जाएंगे.’’

मैंने विस्मित आंखों से उनकी ओर देखा था.

‘‘आपके ऑफिस को चारों तरफ से पुलिस ने घेर रखा है. आपके एकाउंटेंट और बड़ा बाबू को गिरफ्तार भी कर लिया है. आप जाइएगा तो कहीं आपको भी...’’

वे बोलते गये थे और मुझे लगता रहा था, जैसे मेरे सामने मुखर्जी साहब नहीं, बल्कि साक्षात यमराज आ खड़े हुए हों, जो मेरे प्राण ही निकाल लेने को आमादा हों. मेरे मुंह से हकलाहट भरी आवाज निकली थी, ‘‘ये...ये आप क्या कह रहे हैं मुखर्जी साहब! ऐसा भला कैसे हो सकता है?’’

‘‘लगता है, आपको कुछ पाता नहीं. ई कोलियरी गैर कानूनी तोरीके से चाल राहा है, ये ही वास्ते इ सब हुआ है. ऐसा पहले भी...’’

बाकी की बातें सुनने का धैर्य नहीं रहा था मुझमें. मैंने भागकर घर में रजिस्टर रखा था और तेजी से कार्यालय की ओर निकल गया था, ताकि दूर से ही वहां के हालात का जायजा ले सकूं.

मुखर्जी साहब ने ठीक ही कहा था. कार्यालय के सामने अफरा-तफरी मची थी.

इस प्रकार सरकार द्वारा कोलियरी को अवैध घोषित करके उसे बंद कर दिया गया था और वहां पर पुलिस की एक टुकड़ी बिठा दी गयी थी.

मैं लगभग एक सप्ताह तक इंतजार करता रहा था कि शायद हजारीबाग में अवस्थित हमारे हेड-ऑफिस, अर्थात कोलियरी मालिक की ओर से कोई सूचना आ जाय. पर वैसा कुछ नहीं हुआ था. हार कर मैं खुद हेड ऑफिस के लिए प्रस्थान कर गया था. मालिक नरेश देव ने मेरी परेशानी को सहजता से लिया था. बोले थे, ‘‘आप चिंता क्यों करते हैं? जाइए, वहीं जाकर रहिये. जब तक कोलियरी खुलती नहीं है, आपको वेतन मिलता रहेगा. दरअसल सरकार कोलियरी को टेकओवर करना चाहती है. वहां के मजदूर भी घबरा रहे होंगे. उन्हें भी समझा दीजिएगा कि कोलियरी जल्द ही खुलेगी. वह भी नेशनलाइज होकर. और अगर मजदूर वहां से चले गये, तो सरकारी नौकरी से वंचित रह जायेंगे.’’ फिर उस महीने के वेतन के चार सौ रुपये मुझे थमाते हुए वे पुनः बोले थे, ‘‘मजदूरों पर खास ध्यान रखियेगा कि वे वहीं बने रहें.’’

जैसा, नरेश देव ने कहा था, मैंने वैसा ही किया था. सारे मजदूरों को विश्वास दिला दिया था कि दोबारा कोलियरी जब खुलेगी तो नेशनलाइज होकर ही. उन्हें मेरी बातों पर तो कम, लेकिन चूंकि मैंने भी वहीं अड्डा जमा रखा था, इस कारण

अधिक विश्वास हो गया था कि मैं सच बोल रहा था. उनके चेहरे पर भविष्य की एक स्वर्णिम सपने सरीखाी आभा झिलमिला उठी थी.

लेकिन कोलियरी को न खुलना था, न खुली ही. महीने दर महीने बीतते चले गये. देखते ही देखते चार महीनों का लम्बा अंतराल बीत गया. मजदूर मेरे पास आते, मुझसे पूछते कि कोलियरी कब नेशनलाइज होगा बाबू. और मैं रटा-रटाया एक जुमला उनकी ओर उछाल देता, ‘‘जल्दी ही होगा.’’ पर अब मैं भी निराश होने लग गया था. निराशा का कारण यह था कि दो महीनों तक तो नरेश देव मेरे पास वेतन भिजवाते रहे थे, पर तीसरे महीने से उन्होंने मेरी सुध लेनी बंद कर दी थी. इसके बाद तो लम्बे संघर्ष का दौर गुजरा था मेरे साथ. ऐसी-ऐसी नौबत आयी थी कि कई-कई शाम भोजन पर भी आफत. लेकिन ऐसा नहीं कि नियति को मेरी सुध ही नहीं थी.

अचानक एक दिन मेरी सरहज और सासु मां का आगमन मेरे निवास पर हुआ- एक खुशखबरी के साथ. साले साहब के घर तोपा में रहते हुए, जो मेरी पत्नी ने आरक्षी प्रशिक्षण महाविद्यालय में नियुक्ति के लिए आवेदन दिया था, उस नौकरी के लिए उसकी शैक्षिक योग्यता के आधार पर नियुक्ति हो गयी थी. उसी नियुक्ति पत्र के साथ मेरी सरहज और सासु मां का आगमन हुआ था.

दूसरे ही दिन हम अपने बोरिया-बिस्तर के साथ हजारीबाग आ गये थे. आर्थिक संकट तो था, हमारे साथ, पर शुरुआती खर्च के लिए मेरे साले साहब श्री जार्ज लुक्स ने ही व्यवस्था कर दी थी. आरक्षी प्रशिक्षण महाविद्यालय के परिसर में ही मेरी पत्नी को आवास भी आबंटित कर दिया गया था.

इस प्रकार देखते ही देखते हमारे जीवन की सारी समस्याओं का समाधान हो गया था. वह भी असालतन (परमानेंट). बाद में चलकर कोलियरी के प्रकरण पर मैंने ‘कठपुतली’ शीर्षक एक कहानी भी लिखी थी, जिसे सदानंद सुमन ने अपने द्वारा संपादित पत्रिका ‘सरोकार’ में प्रकाशित की थी.

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क्रमशः....

सम्पर्क : क्वा. नं. के-10, सी.टी.एस. कॉलोनी,

पुलिस लाइन के पास, हजारीबाग-825301

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