शनिवार, 1 जुलाई 2017

सोनू हंस की कविताएँ

सरयू फरकंदे की कलाकृति

1- मिलन, मुलाकात*
*विधा- मुक्त*

देखो.....
तुम चले आना..
थोड़ा सा समय निकालकर
बहुत सी बातों को बाँटना हैं तुमसे
और बहुत सी यादों को
सहेजकर रखना है
तुम्हें याद है न
जब हम पहली बार मिले थे..
तुम्हारी आँखों में
एक नूर उतर आया था
चेहरे पर सिमट आई लाली से
सुबह के सूरज की
कल्पना सी हो आई थी
तुम्हारे अधरों के लरजते कंपन ने
वीणा के झंकृत होते तारों को भी
हतप्रभ कर दिया था
और हमारे मिलन की वो प्रथम बेला
कभी न भूलने वाली
एक याद जो बन गई थी
हमारी मुस्कराहटें
और विस्तृत हो जाती हैं
जब अनायास ही
आपके नाम की हवाएँ
होठों से टकरा जाती हैं
मई की गर्म लूएँ भी
सावन की फुहारों में बदल जाती हैं
सुनो... अब समय को और
बरबाद न करना
मुलाकात का वक्त
जल्दी मुकम्मल करना
क्योंकि....
बहुत सी बातों को बाँटना हैं तुमसे
और बहुत सी यादों को
सहेजकर रखना है.....
*सोनू हंस*✍✍✍

2-    - नारी

क्यूँ हवस का सामान समझी जाती हैं नारियाँ!
क्यूँ भोग्या की दृष्टि से देखी जाती हैं नारियाँ!
क्यूँ दाग ये लगता है पुरुष समाज पर!
क्यूँ पुरुष प्रधान समाज का दंश झेलती हैँ नारियाँ!
क्यूँ दरिंदगी दिखा जाता है कोई नारी पर!
क्यूँ निर्दोष हो ऐसा दंड झेलती हैँ नारियाँ!
क्यूँ सिसकती है कोई नारी बंद घरों के कोनों में!
क्यूँ दबा देते हैं अपने ही आवाज उसकी!
क्यूँ जन्म से पहले ही मार दी जाती हैं बेटियाँ!
क्यूँ अभागन सा जीवन बिताती हैं नारियाँ!
कर लेती है अगर प्रेम किसी से कभी अभागन वो!
सुला देते हैँ नींद मौत की कोई उसके अपने ही!
गूँजती थी किलकारियाँ कभी जिस आँगन में उसकी!
उसी आँगन को शवगाह बना देते हैं उसके अपने ही,
है वही देश ये होते थे जहाँ नारी स्वयंवर!
है वही देश ये जहाँ पैदा हुई थी एक सावित्री भी!
जिसने चुना था सत्यवान सा अपने लिए वर कोई!
मानते हैं जो रूढ़िवादी परंपराओं को!
क्यूँ दोगलापन दिखाते हैं फिर उन्हें निभाने में;
नहीं नहीं अब नहीं स्त्रियाँ सह पाएँगी;
गर मैला करेगा दामन उसका कोई आततायी तो,
भूल पाएगा न वो सबक ऐसा सिखाएँगी!
ले हाथ में आत्मविश्वास को बढो़ आगे नारियाँ!
इस पुरुष समाज की अब मत सहो नादानियाँ!
आग को सीने में रख तूफान को जज्बात में;
कर लो दुनिया मुट्ठी में बिजली सी भड़का जवानियाँ।
भूल मत सावित्री तो दुर्गा भी तो है तू!
कस्तूरबा छुपी तुझमें लक्ष्मीबाई भी तो है तू!
मत सहन कर तू अब किसी अत्याचार को;
हाथ में और सीने में भड़का तू अब प्रतिकार को।
नीचता की हद अगर पार कोई कर जाए तो!
देर न कर रोक उसके अब हर वार को।
प्रेम तुझमें समुद्र सा तो क्रोध भी धधकता ज्वाल सा!
मोम है हृदय अगर तो द्वंद्व भी करवाल सा।
अपना लिया रूप काली का तो संसार सहम जाएगा!
प्रकोप के तेरे आगे ये समस्त संसार झुक जाएगा।
                     *सोनू हंस*✍✍

3-  आरजू
*विधा-* छंद मुक्त, एक गीत

बड़ी आरजू थी तुम्हें देखने की,
मगर हसरतों ने इशारा न समझा।
हो जाती तुमसे दो बातें दिल की,
मगर चाहतों ने गँवारा न समझा।

बड़ी मुद्दतों के बाद वो शमां था आया,
वो ख्वाब पुराना फिर याद आया;
वो इक बार मिलकर तेरा लौट जाना,
मिलना फिर तुमने दोबारा न समझा।

जरूरी तो न था खता थी हमारी,
क्या कोई गलतफहमी थी तुम्हारी;
यूँ मिटने की चाहत दिल में लिए थे,
होके अकेला भी सहारा न समझा।

है सफर आज भी तन्हा जिंदगी का,
वही है मकां आज भी जिंदगी का;
करो  एतबार इक बार तो हम पर,
जो तुमने कभी भी हमारा न समझा।
        *सोनू हंस*✍✍✍

4-  देख यायावर!
तुझे दरिया बुलाते हैं,
बूँदों के हार लेकर।
तुझे अडिग पर्वत बुलाते हैं,
हिम कणों का भार लेकर।
देख यायावर!  तू ठहरना नहीं,
जब तलक वादियाँ मिल जाए न।
देख यायावर! तू ठहरना नहीं,
जब तलक आँखें अनिमेष ठहर जाए न।
देख छूती नभ में जलद को,
देवदारु की पंक्तियाँ।
देख होती घाटियों में परिवर्तित,
इन श्रृंखलाओं की विभक्तियाँ।
हो रही है निछावर,
जहाँ प्रकृति जी जान से।
तृप्त हो जाता है हृदय,
सुन निर्झर की मधु तान से।
देख यायावर! ये वही महान् हैं,
हिमालय की ये श्रृंखलाएँ,
विश्व में बढा़ती शान हैं।

देख यायावर! ये दनुज सी लहरें,
जाने तुझसे क्या कह रहीं।
अथाह जलराशि इन दरियाओं में,
चिरकाल से है बह रहीं।
है समेटे हुए एक पूरा ही विश्व,
यह अपने आप में।
रहस्यों की विविध गर्तें,
ले रहा है अपने साथ में।
बैठकर इसके तट पर हे यायावर!
करना मनन उस रचनाकार का।
किया अद्भुत ये ब्रह्मांड साकार,
धन्यवाद देना उस निराकार का।
    *सोनू हंस*✍✍✍

5- सीमाएँ
मैं गगन का स्वच्छंद प्रहरी हूँ
मुझे... नहीं बाँध सकते तुम
इन लकीरों की सीमाओं में
मैं उड़ सकता हूँ नबी के कूचे से
मैं ठहर सकता हूँ मंदिर के ध्वज-स्तंभ पर

नहीं हूँ बाध्य मैं विहंग
दूर परकोटों तक जाने में
नहीं मैं बाध्य उन हिमशिखरों को छूने से
कोई श्रृंखला नहीं मेरा अवरोध बन सकती,
ये बलखाती स्त्रोतस्विनी
नहीं मेरा पथ बदल सकती
ये उभरे ठूठ से बूढ़े द्वीप भी
मुझे डिगा सकते नहीं
ये अँधेरे घने दानव कानन भी
मुझे भय दिखा सकते नहीं

अनंत नभ तो मुझ खग का
मानों अनिकेत है
फैलाऊँ कितना ही परों को
टोक सकता कोई नहीं
उन्मुक्तता ही मेरे इस जीवन का
सत्व अनोखा है भला
बँध कर सीमाओं में
मैं नभचर कब रहा

हैं अर्पित सीमाएँ तो इस नर के ही लिए
बाँधना जंजीरों से जमीं को
भाता केवल मनुज के लिए
हास होता है मुझे आदमी इतना डरता क्यों है
और इससे भी बात है बडी़ अद्भुत
डरता है आदमी क्यूँ आदमी ही से

पर बुद्धिजीवी है ये प्राणी
मुझको इन बातों से क्या
शायद इसमें भी कोई भेद हो
ये तो जानता होगा ये मनु संतति ही
चलता हूँ आज उन शीतकालीन प्रदेश में
इन उष्ण प्रदेशों की बचना है जो
ज्वाल उगलती हवाओं से
वहाँ तक जाने में मुझे
शायद लगें कुछ दिन ज्यादा
पर कोई सरहद मेरे आडे़ नहीं आएगी
नहीं कोई बँधी जमीं
मुझको मुँह चिढ़ाएगी.....
*सोनू हंस*✍✍✍

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संपर्क -
सोनू हंस(संदीप कुमार)
609/4,  कृष्णापुरी,  मुजफ्फरनगर, उत्तर प्रदेश
पिन कोड- 251001
ईमेल - kar56526@gmail.com

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