शनिवार, 1 जुलाई 2017

एबॉर्शन / लघुकथा / सुशील शर्मा

रामचन्द्र खरातमल की कलाकृति

रात के 11 बजे थे दरवाजे पर खटखटाहट हुई शुभा ने दरवाजा खोला आनंद खड़ा था। शुभा को लगभग धकेलता हुआ अंदर आया। दोनों बेटियां सो रही थी।

"डॉ से मेरी बात हुई है कल जांच के लिए चलना है,अगर लड़की हुई तो एबॉर्शन की डेट ले लेंगे "आनंद ने लगभग निर्णय सुनाते हुए कहा।

आनंद और शुभा के दो बेटियां थी। जब तीसरी बार शुभा गर्भवती हुई तो शुभा की सास ने स्पष्ट कह दिया था"देख बेटा आनंद मुझे इस बार पोता ही चाहिए वरना मुझ से बुरा कोई नहीं होगा।"

शुभा तीसरी बार बच्चा नहीं चाहती थी किन्तु आनंद और परिवार की जिद के कारण उसे मानना पड़ा।

किन्तु वह एबॉर्शन किसी भी हालत में नहीं चाहती थी अतः उसने आनंद का प्रतिवाद किया।

"चाहे लड़का हो या लड़की मैं एबॉर्शन नहीं कराउंगी।"

पागल हो तीन तीन लड़कियों की पढ़ाई और शादी का खर्च कैसे पूरा होगा।"आनंद ने गुस्से में कहा।

क्यों लड़का होने पर क्या खर्च कम हो जाएगा क्या?  शुभा ने व्यंग करते हुए कहा।

"लड़के से हमारा वंश चलेगा"आनंद ने प्रतिवाद किया लड़कियों का क्या हैं दूसरे का वंश चलाएंगी। साथ में दहेज और देना पड़ेगा।

"अच्छा जब सुरभि दीदी को राष्ट्रपति पुरुष्कार मिला था तो किसका नाम हुआ था। मंच से किसका नाम पुकारा गया था पिताजी का न कि उनके ससुराल वालों का।

पेपर में सुरिभ दीदी के साथ पिताजी की फ़ोटो देख कर आप कितने खुश थे ।आपने ही कहा था देखो मेरी बहिन ने मेरे परिवार मेरे पिता का नाम रोशन कर दिया"शुभा ने आनंद को पुरानी बात याद दिलाई।

आनंद मैं तो अपनी दोनों बेटियों से ही खुश थी किन्तु आपकी जिद के कारण ये बच्चा आया है। अब ये लड़का हो या लड़की उसे अच्छे मन से स्वीकार करो।

शुभा ने आनंद को प्यार से समझाते हुए कहा।

"लेकिन मम्मी--मम्मी कैसे मानेगीं"

मम्मी का भय आनंद के चेहरे से स्पष्ट झलक रहा था।

शुभा ने कहा तुम उसकी चिंता मत करो मैं उनसे बात करूंगी।

रात को शुभा ने अपनी सास से कहा "मम्मी पंडित जी का फोन आया था कह रहे थे कि अगर एबॉर्शन करवाया तो आनंद की जान को खतरा है। राहु मंगल के साथ मारकेश बना है।"

इतना सुनते ही शुभा की सास सकते में आ गई।

नहीं बेटी हम एबॉर्शन नहीं कराएंगे चाहे बेटा हो या बेटी पंडित जी से कहना वो कोई पूजा बगैरा कर दें ताकि मेरे बेटे के ऊपर से ये अलह टल जाए।

लगभग कांपते हुए शुभा की सास ने शुभा से कहा।

"जी मम्मी जी मैं पंडित जी से कह दूंगी" शुभा मन ही मन मुस्करा रही थी।

"कल ये डॉ के पास जाने की कह रहे थे।"

शुभा ने डरते हुए पूछा।

नहीं कोई जरूरत नहीं है डॉ के पास जाने की। लड़का हो या लड़की हमें दोनों मंजूर हैं। सास ने अपना निर्णय सुना दिया।

शुभा सोच रही थी कि हर माँ को उसकी संतान कितनी प्रिय होती है ये उसकी सास ने साबित कर दिया।

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संपर्क - archanasharma891@gmail.com

5 blogger-facebook:

  1. सच, अपनी पीड़ा ही समझ आती हैं इन्सान को | बढ़िया लघुकथा

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  2. सुन्दर लघु कथा. जब अपने पे बीतती है तभी दर्द महसूस होता है.

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  3. सुन्दर लघु कथा. जब अपने पे बीतती है तभी दर्द महसूस होता है.

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  4. बहुत अच्छी कहानी है।

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  5. जो तन लागे सो तन जाने. अपने दर्द के केवल एहसास ने ही सास को झकझोर दिया.

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