रचनाकार

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका

डॉ. रामकुमार बेहार की पुस्तक - बस्तर : प्रकृति व संस्कृति -समीक्षा कार्यक्रम

image

*डॉ. रामकुमार बेहार बस्तर के साथ करते हैं सार्थक संवाद*

       डॉ. रामकुमार बेहार की समीक्षित पुस्तक "बस्तर : प्रकृति व संस्कृति" पर अपना समीक्षात्मक आलेख प्रस्तुत करते  हुए डॉ.श्रीमती मृणालिका ओझा ने कहा कि आज का आधुनिक समाज आदिवासियों को असभ्य की दृष्टि से समझने की कोशिश करता है, किन्तु सच यह है कि उनके अनेक रीति-रिवाज हमें बहुत कुछ सीखने को प्रेरित करते हैं ।हमें भी शहीद जवानों की स्मृतियों को "मेनहिर" की तरह  सहेजने का संदेश देते हैं। पुस्तक में प्रकाशित 15 लेख एवं 6 कविताओं में वे बस्तर के साथ संवाद करते हुए प्रतीत होते हैं एवं यह बस्तर को जाने बिना संभव नहीं है।"

        संस्कृति विभाग के सभागार में आयोजित एक गरिमामय कार्यक्रम में छत्तीसगढ शोध संस्थान के अध्यक्ष एवं प्रख्यात साहित्यकार - इतिहासकार डॉ. रामकुमार बेहार के खंड काव्य "दसमत कैना" का विमोचन उपस्थित अतिथि सर्वश्री पद्मश्री डॉ. अरूण शर्मा, श्री बी. के. एस.रे, सेवानिवृत्त आई ए एस, श्री शशांक शर्मा, संचालक, ग्रंथ अकादमी, श्री राजाराम त्रिपाठी, किसान नेता एवं संपादक- ककसाड, श्री बालचंद्र कछवाहा, सेवानिवृत्त प्रोफेसर के द्वारा किया गया।

     इस कृति की कथा पर श्री के. पी. सक्सेना 'दूसरे' ने अपने विचार व्यक्त किये। श्री अनिल झा ने "बस्तर: प्रकृति व संस्कृति" पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि डॉ. रामकुमार बेहार के पास बस्तर पर कहने के लिए बहुत कुछ है, यह पुस्तक एक अंश मात्र है। डॉ. सुधीर शर्मा ने कहा कि पुस्तक का हर आलेख वास्तव में स्वयं में एक अलग पुस्तक की मांग करता है और "बस्तर" को इस पुस्तक के माध्यम से समझने पर भी उन्होंने जोर दिया।

   कार्यक्रम के अतिथि श्री बी के एस रे, ने कहा कि बस्तर पर बहुत कुछ लिखा जा रहा है, लेकिन बस्तर में रहकर और बस्तर को जान-समझ कर जो लिखा जाए वह ही वास्तव में प्रामाणिक है। डॉ. रामकुमार बेहार का लेखन इस श्रेणी का ही लेखन है। श्री राजाराम त्रिपाठी ने कहा कि श्री बेहार का अथक श्रम,  स्तुति योग्य एवं प्रेरणादायक भी है।

       कृतिकारडॉ. रामकुमार बेहार ने कहा कि उनका उद्देश्य बस्तर की प्रकृति, परंपरा, संस्कृति आदि को वहीं की खुशबू और सुन्दरताके साथ प्रस्तुत करना रहा है। 'दसमत कैना' खण्ड काव्य की लगभग विलुप्त होती विधा को पूर्नजिवीत करने का एक प्रयास है।

    कार्यक्रम के प्रारंभ में सरस्वती पूजन के अतिरिक्त छत्तीसगढ शोध संस्थान की सचिव श्रीमती निर्मला बेहार द्वारा संस्थान की गतिविधियों से अवगत कराया। कार्यक्रम के अंत में अतिथियों एवं समीक्षकों का अभिनंदन पत्र एवं शाल देकर सम्मान भी किया गया। कार्यक्रम का संचालन श्री नर्मदा प्रसाद नरम द्वारा किया गया।

    शहर के बुद्धिजीवियों एवं साहित्यकारों की उपस्थिति में कार्यक्रम संपन्न हुआ।

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

रचनाकार में ढूंढें...

आपकी रूचि की और रचनाएँ -

randompost

कहानियाँ

[कहानी][column1]

हास्य-व्यंग्य

[व्यंग्य][column1]

लघुकथाएँ

[लघुकथा][column1]

कविताएँ

[कविता][column1]

बाल कथाएँ

[बाल कथा][column1]

लोककथाएँ

[लोककथा][column1]

उपन्यास

[उपन्यास][column1]

तकनीकी

[तकनीकी][column1][http://raviratlami.blogspot.com]

वर्ग पहेलियाँ

[आसान][column1][http://vargapaheli.blogspot.com]
[blogger][facebook]

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget