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शब्द संधान // बाजूबंद खुल खुल जाय // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

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शायद ठीक से बंधा न होगा इसीलिए लोक-गीत की इस नायिका का बाजूबंद खुल खुल जाता है। वैसे भी जो बंद है कभी न कभी तो खुलता ही है, फिर वह ‘भारत-बंद’ जैसा ही बंद क्यों न हो !

जो खुला न हो वह बंद है। जो बंद है वह रुका हुआ है, कसा हुआ है। जकड़ा हुआ है, बंधा हुआ है। बंद गाँठ या गिरह को खोल पाना कभी कभी कितना कठिन हो जाता है। कुश्ती का एक पेंच हो जाता है – बंद। दरवाज़ा भेड़ कर या कुंडी लगा कर दरवाज़े को बंद कर दिया जाता है। लेकिन बाइबिल कहती है, खटखटाओ तो तुम्हारे लिए खोला जाएगा। खटखटाओ तो ! कोशिश करने से क्या नहीं हो सकता ?

लाख की चपटी चूड़ी ‘बंद’ कहलाती है। तनियों को बाँध कर, तान कर, स्त्रियाँ अपनी चोली बाँध लेती हैं। तनी भी तो ‘बंद’ ही हैं। किसी को थका मारने का अर्थ है, उसके बंद ढीले कर देना। जो कैद में बंद है, वह बंदी है। और तो और, कविता के भी बंद होते हैं। उर्दू या फारसी शायरी के जो चार-पांच मिसरे होते हैं वे शायरी के बंद ही तो हैं। बंद वस्तुत: फारसी का ही शब्द है। लेकिन हमारी हिन्दी में यह रच-बस गया है। हमें अब यह ‘अपना’ ही लगता है। हिन्दी कविता के चरण भी तो अक्सर कविता के बंद ही कहे गए हैं।

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बंद से ‘बंदगी’ बना है। बंदगी प्रणाम है, आराधना है। सेवा करना है, चाकरी करना है। जो बंदगी करता है, ‘बंदना’ करता है, वह ‘बंदक’ है। पूजा पाठ के लिए निर्धारित स्थान पर हम ‘बंदन-वार’ लगाते हैं।

अब इन शब्दों की हिन्दी/संस्कृत के समानार्थी शब्दों से ज़रा तुलना कीजिए। उर्दू/हिन्दुस्तानी में जो बंदगी है, वही हिन्दी में “वन्दगी” है। “बंदना” ‘वन्दना’ है। “बंदनवार” ‘वन्दनवार’ है। केवल ‘ब’ और ‘व’ का अंतर है। संभावना यही है कि ‘बंदगी’ आदि शब्द हिन्दी/संस्कृत के ‘वन्दगी’ आदि शब्दों से ही आए हों।

अच्छा-खासा आदान प्रदान है। हम हिन्दी में ‘बंदी’ को ‘वंदी’ नही बोलते। ‘बंदी’ ही कहते हैं। इसी तरह हम बंधे हुए को ‘बंद’ ही बोलते हैं, ‘वंद’ नहीं बोलते। बंद मुट्ठी हज़ार की।

‘बंद’ से ही मिलता-जुलता एक और शब्द है, ‘बंध’। बंध बंधन है, ज़ंजीर है, बेड़ी है, कैद है। जो कसा हुआ है, बंधा हुआ है, बंध है। बंधक रखी हुई वस्तु, बंध है। जो मुक्त नहीं है, बंध है। दार्शनिकों के अनुसार तो हमारा शरीर, हम खुद भी, मुक्त नहीं है। मुक्ति के लिए हमें प्रयत्न करना होगा। बंध, बंधे होने की अवस्था है। यह गुलामी की अवस्था है। गुलाम देशों को भी अपनी स्वतंत्रता की लिए संघर्ष करना होता है।

उर्दू/फारसी में जिसे शायरी का ‘मिसरा’ या ‘बंद’ कहते हैं, वही हिन्दी कविता में ‘बंध’ हो जाता है। बंध कविता का अनुच्छेद (स्टेंज़ा) है जिसमें चार या छ: पंक्तियाँ या चरण होते हैं। संभावना यही लगती है कि यह ‘बंध’ ही फारसी/उर्दू तक पहुंचते पहुंचते ‘बंद’ हो गया हो।

लोग वादा करते हैं और ‘वचन-बद्ध’ हो जाते हैं। अपने वचन से बंध जाते हैं। लेकिन जैसा कि हम जानते ही हैं वादे अधिकतर पूरे नहीं होते, खासकर नेताओं के किए गए राजनीतिक वादे। ‘बंध-पत्र’ एक लिखित प्रतिज्ञा है। सरकार बंध-पत्र या (बौंड्स) जारी करती है जिसमें वादा किया जाता है कि एक समयावधि के बाद आपकी निर्धारित जमा की हुई राशि निश्चित ब्याज सहित वापस मिल जाएगी। ये कोई राजनैतिक वादा नहीं होता !

बंद, वन्द और बंध – तीनों भिन्न भिन्न शब्द होने के बावजूद, अर्थ की अपेक्षा से इनमें परस्पर काफी व्याप्ति (ओवर्लेपिंग) है। लेकिन हमने अपने आलेख की शुरूआत बाजूबंद से की थी और यह बाजूबंद हमेशा बाजू ’बंद’ ही रहता है, ‘बंध’ या ‘वन्ध’ नहीं होता - भले ही खुल खुल ही क्यों न जाए !

डा. सुरेन्द्र वर्मा (९६२१२२२७७८)

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड, इलाहाबाद -२११००१

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बंद और बंध परिस्थिति के अनुसार कैसे बदलते हैं पढ़कर मज़ा आया।बन्द है तो खुलेगा ही सही बात।

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