सोमवार, 17 जुलाई 2017

अनुज कुमार आचार्य के युवाओं के लिए प्रेरक आलेख

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गरिमामय युवा नेतृत्‍व का निर्माण

भारतवर्ष युवाओं का देश है और युवाओं में असीम शक्‍ति होती है, लिहाजा यह अत्‍यन्‍त आवश्‍यक है कि हमारे युवाओं में विद्यमान ताकत से न केवल उन्‍हें परिचित करवाया जाए अपितु उनकी शक्‍ति को रचनात्‍मक एवं राष्‍ट्र उत्‍थान में नियोजित करने के प्रयास भी हों। कुछ स्‍वार्थी लोग अपने फायदे के लिए हमारी युवाशक्‍ति को बहला फुसलाकर उन्‍हें पथभ्रष्‍ट करने से भी नहीं चूकते हैं। इसलिए यह अत्‍यावश्‍यक है कि बाल्‍यावस्‍था से ही बालकों को सुसंस्‍कारित बनाकर उनमें आध्‍यात्‍मिक एवं सृजनात्‍मक शक्‍ति को जागृत करके उन्‍हें समाज तथा राष्‍ट्रहित में कार्यशील होने के लिए प्रेरित किया जाए। यह किसी एक व्‍यक्‍ति का दायित्‍व न होकर हमारे देश के समस्‍त माता-पिताओं, गुरूओं एव गुणीजनों की जिम्‍मेवारी है कि वे इस बात को यकीनी बनाएं की हमारी युवापीढ़ी पथभ्रष्‍ट न होने पाए।

युवाओं को यह भी समझना होगा कि मनुष्‍य का वर्तमान जीवन भौतिकतावाद के कारण भागदौड़ से भरा हुआ है। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह है हमारी महत्‍वाकांक्षाओं में वृद्धि। हमारी इच्‍छाओं की पूर्ति के चक्कर में कई बार हमारा मन खिन्‍न, उचाट और उद्विग्‍न हो जाता है। ऐसे समय में हमें मानसिक शांति और मनोबल बढ़ाने के लिए आस्‍तिकता पर भरोसा रखते हुए परमपिता परमात्‍मा की शरणागति होकर अपने अंदर सकारात्‍मक भावना का संचार करते रहना चाहिये। वैसे भी मानवीय जीवन में प्रायः नकारात्‍मक और सकारात्‍मक भावनाओं के बीच द्वन्‍द्व की स्‍थिति बनी रहती है। सकारात्‍मक सोच जहां हमें उत्‍थान की ओर ले जाती है तो वहीं नकारात्‍मक सोच ईर्ष्‍या, द्वेष भावना के साथ अधोगति की तरफ धकेलती है। अतएव यह भी जरूरी है कि हम अपना बहुमूल्‍य समय तथा ऊर्जा दूसरों के प्रति ईर्ष्‍या, डाह और जलन में व्‍यर्थ न गवाएं बल्‍कि सदैव, सकारात्‍मक रहकर अपने आपको इतना व्‍यस्‍त कर लें की दूसरों की निंदा इत्‍यादि के लिए हमारे पास फालतू समय ही न बचे।

हमारी युवा पीढ़ी को चाहिये कि वह अपने उद्देश्‍य की प्राप्‍ति के लिए पूर्णतया एक लक्ष्‍य पर ध्‍यान केन्‍द्रित करे और समय रहते उन्‍हें यह भी तय कर लेना चाहिए कि उनके जीवन का ध्‍येय क्‍या होगा ? इसके अलावा स्‍वयं पर भरोसा रखना ही सफलता की कुंजी माना गया है। इसलिए पूर्ण आत्‍मविश्‍वास से ओतप्रोत होकर अपने कार्यों को अंजाम तक पहुंचाएं। केवल अपनी उन्‍नति के पीछे न पड़े रहकर गांव-समाज की निस्‍वार्थ सेवा हेतु भी समय निकालें। हमेशा आत्‍मकल्‍याण के साथ-साथ समाज एवं राष्‍ट्रकल्‍याण हेतु प्रयत्‍नशील रहें। वर्तमान समय में जीवन पथ पर आगे बढ़ने और सफलता पाने के लिए मनुष्‍य में एक अनिवार्य गुण और होना चाहिए और वह गुण है उसका व्‍यवहार कुशल होना। खासकर निजी क्षेत्र में लोगों को उनकी शैक्षणिक योग्‍यताओं के साथ साथ व्‍यवहार कुशलता के पैमाने पर भी जांचा परखा जाता है।

वर्तमान जीवन भाग दौड़ से परिपूर्ण है और मनुष्‍य हर पल तनाव, चिंता, परेशानियों के कारण मुस्‍कुराना ही भूल बैठा है। इसलिए मुस्‍कुराहट और अपने जीवन में खुशियां लाईये क्‍योंकि मुस्‍कुराहट से जीवन निखरता भी है और हमारा व्‍यक्‍तित्‍व चमकता भी है। अपने जीवन को नित्‍यप्रति महोत्‍सव बनाने के लिए और अपने जीवन की बगीया को सजाने संवारने के लिए हमें अपने अंदर ज्ञानरूपी ज्‍योति से उजाला करने की आवश्‍यकता हमेशा रहती है। स्‍वाध्‍याय, सत्‍संग से हम अपनी भावनाओं को नियंत्रित करके अपने साथ-साथ अपने परिवार और समाज का भी भला एवं उत्‍थान करने में अपना बहुमूल्‍य योगदान कर सकते हैं। इसके साथ ही, जिस तरह से आज हमारे युवाओं को उच्‍च शिक्षा प्राप्‍त करने के बाद भी नौकरियों के पीछे भागना पड़ रहा है ऐसी परिस्‍थितियों में कई बार वे हार मानकर बैठ जाते हैं और अपने आप को निराशा की गर्त में धकेल देते हैं। ऐसे हालात में निरन्‍तर प्रयत्‍न करते रहना, हौंसला बनाए रखना और जीतने की उम्‍मीदें जिंदा रखना ही उन्‍हें उनकी मंजिल तक पहुंचाने में मददगार साबित होता है। हमेशा याद रखें, कामयाबी आपको आपके ‘कम्‍फर्ट जोन‘ के बाहर जाकर अर्थात्‌ घर की दहलीज छोड़कर निकल जाने पर ही हासिल होती है।

जीवन दिशा बदलने वाले सुभाषित

प्रायः विद्यालयों के भीतर-बाहर की दीवारों पर कम शब्‍दों में लिखी जीवन उपयोगी सुन्‍दर बातें हमारा ध्‍यान अपनी ओर आकृष्‍ट कर लेती हैं और एक बारगी तो हमारा हृदय परिवर्तन हो जाता है और हम तदनुसार आचरण करने के लिए प्रेरित हो उठते हैं। यही वजह भी है कि इन बातों को अनमोल वचन अथवा सुभाषित भी कहते हैं। यह बातें जीवन रूपी सागर में हमारे पूर्वजों, बड़े-बुजुर्गों के अनुभवों का सार होती हैं। जो कम शब्‍दों में हमारा पथ प्रदर्शन कर देती हैं। इन पर आचरण करके हम अपनी जीवन दिशा को भी बदल सकते है। बुद्धिमत्ता से परिपूर्ण इन अनमोल वचनों का प्रतिदिन स्‍मरण करना इनका श्रवण-मनन करना और पढ़ना उतना ही आवश्‍यक है जैसे प्रतिदिन स्‍नान करना और अपनी दिनचर्या की शुरूआत करना।

कहते हैं कि, अध्‍यापक राष्‍ट्र की संस्‍कृति के चतुर माली होते हैं वे संस्‍कारों की जड़ों में खाद देते हैं और अपने श्रम से उन्‍हें सींच-सींच कर महाप्राण शक्‍तियां बनाते हैं। इस अकेली सूक्‍ति में गुरूमहिमा का विशद्‌ वर्णन कर दिया गया है। लिहाज़ा समस्‍त अध्‍ययनरत्त विद्यार्थियों एवं युवाओं को सर्वप्रथम गुरू भक्‍ति एवं गुरू पर आस्‍था का संकल्‍प लेना चाहिए ताकि समर्थ गुरू की उन पर कृपा बनी रहे। हमारी वाणी न केवल मीठी होनी चाहिए अपितु हमारे कर्म भी सुन्‍दर होने चाहिए और इसके लिए जरूरी है कि हताशा हमारे निकट भी फटकनी नहीं चाहिए क्‍योंकि उत्‍साह हमेशा मनुष्‍य को कर्म करने के लिए प्रेरित करता रहता है और उत्‍साह ही कर्म को सफल बनाता है। मेहनत, लगन, हिम्‍मत से भरपूर नेक इरादों वाले लोग अपनी कल्‍पनाओं को साकार कर दूसरों के लिए उदाहरण प्रस्‍तुत करते हैं। जिनको अपनी क्षमताओं और शक्‍तियों पर अटूट विश्‍वास होता है वे कभी भी असफलता का मुख नहीं देखते हैं।

हमारे शास्‍त्रों में और अनेक महापुरूषों ने शताब्‍दियों से विद्याग्रहण एवं ज्ञान प्राप्‍ति को सर्वोच्‍च प्राथमिकता दी है। शास्‍त्रों में तो यहां तक कहा गया है कि ज्ञानेन हीनाः पशुभिः सामानाः अर्थात्‌ ज्ञान विहीन मनुष्‍य पशु के समान है। उसमें भी अल्‍पविद्या और अल्‍प ज्ञान को विषतुल्‍य भयंकर माना गया है। जोसेफ एडिशन के अनुसार, अध्‍ययन हमें आनंद प्रदान करता है और योग्‍य बनाकर अलंकृत करता है। मस्‍तिष्‍क की उन्‍नति के लिए अध्‍ययन उतना ही आवश्‍यक है जितना शरीर के लिए व्‍यायाम करना। यदि हम पुस्‍तकों, पत्र पत्रिकाओं की ही चर्चा करें तो पठन-पाठन को सबसे सस्‍ता मनोरंजन माना गया है और पुस्‍तकों की तुलना एक सुन्‍दर बागीचे से की गई है। यदि आप महान व्‍यक्‍यिों की रूचियों को जानने का प्रयत्‍न करेंगे तो आप पायेंगे की उनमें सुन्‍दर ज्ञानवर्धक पुस्‍तकों को पढ़ने के प्रति जबर्दस्‍त रूचि पाई जाती है। कहा भी गया है कि, किताबें ऐसी शिक्षक हैं जो बिना कष्‍ट दिए, बिना आलोचना किए और बिना परीक्षा लिए हमें शिक्षा देती हैं, सुसंस्‍कृत बनाती हैं। ज्ञानार्जन से मनुष्‍य का विवेक जागृत होता है और कल्‍पनाशीलता उसकी मिठास को बढ़ाती है। विवेक जहां मानवीय जीवन को सुरक्षित रखता है तो वहीं कल्‍पनाशीलता जीवन की मधुरता को बढ़ाती है। पुस्‍तकों का मूल्‍य रत्‍नों से भी अधिक आंका गया है क्‍योंकि पुस्‍तकें अन्‍तःकरण को उज्‍जवल करती हैं। पुस्‍तकें ही हमारी सच्‍ची मित्र और शुभचिन्‍तक होती हैं।

मनुष्‍य जीवन में हम निठल्‍ले बैठे नहीं रह सकते हैं इसलिए हमें प्रतिक्षण कर्मशील बने रहना पड़ता है। जब हम जीवन पथ पर आगे बढ़ते हैं तो हर समय मात्र कामयाबी ही हमारा स्‍वागत नहीं करती है, अनेकों बार असफलताओं-विफलताओं का सामना भी हमें करना पड़ता है। कष्‍ट और विपत्तियां हमें सीख देती हैं और जो इनका सामना साहस के साथ करते हैं सफलता उनके कदम चूमती है। इसके लिए जरूरी यह भी है कि हम सबसे पहले अपने ऊपर विजय प्राप्‍त करें। हमेशा अपने हौंसले बुलन्‍द रखें। आपके जीवन की खुशी आपके विचारों की गुणवत्ता पर निर्भर करती है। महात्‍मा बुद्ध के अनुसार, पुष्‍प की सुगंध वायु के विपरीत कभी नहीं जाती है लेकिन मानव के सद्‌गुणों की महक सब ओर फैल जाती है। लिहाज़ा हमेशा मधुर वचनों का श्रवण, मनन और अध्‍ययन करते रहें तथा उन पर आचरण कर अपने उच्‍च कोटि के चरित्र का निर्माण करें। जीवन में सफल हों - सफल कहलवाएं।

सफलता आपके अंदर ही है !

वर्तमान प्रगतिशील दुनिया में प्रत्‍येक मानवमात्र की यह हार्दिक इच्‍छा होती है कि वह एक सफल इंसान बने, सफल कहलाए अथवा समाज के अन्‍य नागरिक उसकी सफलता का उदाहरण दें। क्‍या वास्‍तव में सफलता पाने की डगर इतनी ही आसान है ? हमें यह भी नहीं भूलना है कि जिस समाज, पास-पड़ोस एवम्‌ कार्यक्षेत्र में हम रहते हैं वहां के लोगों के आचरण, व्‍यवहार एवं कार्यशैली से हम प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकते हैं। लिहाजा सफलता प्राप्‍ति से जुड़े सूत्रों पर प्रतिदिन अध्‍ययन, चिंतन, मनन एवम्‌ आचरण करने से ही हम अपना एक अलग उच्‍च चारित्रिक व्‍यक्‍तित्‍व का निर्माण कर सकते हैं एवम्‌ दूसरों के लिए आदर्श उदाहरण बन सकते हैं। हमें अपने दिन की शुरूआत हंसी, मेल-मिलाप और आत्‍मीयता से परिपूर्ण होकर करनी चाहिए। निश्‍चित रूप से इससे हमारा सारा दिन भी प्रसन्‍नतापूर्वक व्‍यतीत होगा। वस्‍तुतः प्रसन्‍नता रेडीमेड नहीं मिलती है, इसे हम अपने अच्‍छे कार्यों एवं अच्‍छी सोच से प्राप्‍त कर सकते हैं।

किसी भी कार्य में सफलता पाने के लिए जरूरी है कि हमारे मन में उसको पाने के प्रति अदम्‍य इच्‍छा हो। इसलिए सपने को सच करने से पहले सपना देखना निहायत ही जरूरी है। इसके लिए हमारा लक्ष्‍य पहले से ही निर्धारित होना चाहिए वर्ना लक्ष्‍यविहीन होकर हम यहां-वहां भटककर अपनी ऊर्जा बर्बाद करते रहेंगे। अपने मिशन में कामयाब होने के लिए हमारी एकमात्र साधना अपने लक्ष्‍य को पाने की होनी चाहिए। लेकिन हमें यह भी याद रखना होगा कि हम अच्‍छा निर्णय अच्‍छे ज्ञान एवम्‌ विवेक के आधार पर ही ले सकते हैं। ज्ञान एक ऐसा शक्‍तिशाली हथियार है जिसके द्वारा हम स्‍वयं के साथ-साथ विश्‍व को भी बदल सकते हैं और ज्ञान ही आपको आपका हक दिलाता है। शास्‍त्रों में तो यहां तक वर्णित है कि, ‘‘यदि लक्ष्‍य की सिद्धि न हो तो वह विद्या व्‍यर्थ है।’’ अर्थात्‌ दोष विद्या, ज्ञानार्जन में नहीं है बल्‍कि दोष उस प्राणी मात्र का है जो विद्या के होते हुए भी सफलता प्राप्‍त नहीं कर पाया। इसलिए हमेशा सही मार्ग पर चलते हुए हम प्रगति पथ पर अग्रसर होना चाहिए। एक कामयाबी मिलने के बाद आप ठहरें नहीं, तत्‍काल दूसरे लक्ष्‍य की प्राप्‍ति में जुट जाएं। कहते हैं कि हम जैसा सोचते हैं हम वैसा ही बन जाते हैं, इसलिए अपनी सोच ऊंची एवं सकारात्‍मक रखें। यह भी याद रखें कि, जीवन में आप रूपया-पैसा कमाकर वह प्रभाव नहीं पैदा कर सकते हैं, जैसा प्रभाव जीवन मूल्‍यों एवम्‌ नैतिकता से परिपूर्ण जीवन द्वारा छोड़ सकते हैं। अमूमन आपकी कामयाबी ही आपके दुश्‍मनों एवम्‌ आपका अहित चाहने वालों के लिए एक करारा सबक होती है। इसलिए सफलता के सुपथ पर आने वाली प्रत्‍येक बाधा और रूकावट से कभी भी अपना मनोबल कमजोर न होने दें और कठोर परिश्रम करने से कभी जी न चुरायें। सफलता पाने का एक प्रमुख सूत्र जो कि हेनरी फोर्ड ने दिया था के शब्‍दों में, ‘‘यदि आप यह सोचते हैं कि आप कर सकते हैं और यदि आप सोचते हैं कि आप नहीं कर सकते हैं, तो दोनों ही परिस्‍थितियों में आप सही होते हैं।’’ इसका अभिप्राय यह भी हो सकता है कि सफलता तथा विफलता और कहीं नहीं हमारे ही अंदर विचारों, भावनाओं और सोच में छिपी होती है लिहाजा हमेशा सकारात्‍मक सोचें और ऊर्जावान बने रहें। वैसे भी हम जैसा सोचते हैं, विश्‍वास करते हैं, वैसा ही हासिल कर भी लेते हैं। शायद इसलिए कहा गया है कि, ‘‘मन के जीते जीत है मन के हारे हार।’’ सफलता के मार्ग का एक अन्‍य प्रमुख कारण है समय की कीमत को पहचानना। चूंकि मानवीय जीवन बेहद संक्षिप्‍त है इसलिए एक-एक क्षण को अहमियत दें।

जिन्‍दगी में खुशियों से ज्‍यादा तनाव, कमियां, दुःख, अकेलापन और तकलीफें हैं। हमें हमेशा इन पर ही ध्‍यान केन्‍द्रित करके अपनी तकलीफों में और इज़ाफा नहीं करना चाहिए। महर्षि वेदव्‍यास जी ने कहा था कि, ‘‘नर्हि मनुस्‍यात श्रेष्‍ठतरः ही किंचित।’’ अर्थात्‌ मनुष्‍य से श्रेष्‍ठ इस सृष्‍टि में और कुछ भी नहीं है। मनुष्‍य जीवन दुर्लभ एवम्‌ अनमोल है इसकी कद्र करें, इसकी कीमत पहचानें और ईश्‍वर प्रदत्त इस मानवीय जीवनरूपी उपहार को ठीक से इस्‍तेमाल करें। जिस इंसान ने जीवनरूपी यात्रा में कोई कठिन परीक्षा ही नहीं दी तो उसने कुछ सीखा ही नहीं। जीवन के उतार-चढ़ाव ही हमें मानसिक रूप से सबल बनाते हैं। यह हमारा दृढ़ संकल्‍प और हौंसला ही होता है जो जीवनरूपी परीक्षाओं में खरा उतरने में हमारी मदद करता है। हमेशा याद रखें, अपने सपनों को चुराने न दें।

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अनुज कुमार आचार्य

बैजनाथ

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Anuj Kumar Acharya

Vill. Nagan, P.O. Kharanal

Teh. Baijnath, Distt. Kangra

(H.P.) 176115

E-mail :- rmpanuj@gmail.com

Mob.:- 97364-43070

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