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॥कविताएँ॥ अशोक गुजराती

॥कविताएँ॥

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निश्‍छल

       
1

नैनीताल गये थे
दादाजी परिवार के संग
पहाड़ी पर बैठी थी
उनके पास उनकी पोती
सवा दो साल की माहू
फ़ोटो खींच रही थी बहू उनकी
अचानक आ गयी बदली
बोली माहू-दादाजी, देखो
लाइट चली गयी...

2

माहू से साढ़े छह वर्ष बड़ा
पोता उनका सार्थ
देख रहा था बूंदें दवा की
दादाजी ने टपकायीं आंखों में
पलकें मिची थीं पर उन्‍होंने
दवाई की शीशी का ढक्‍कन लगा
यथावत्‌ उसे डिब्‍बी में रख भी दिया
पूछा सार्थ ने-मूंदी आंखों से कैसे आपने
शीशी बंद कर उसे पैक भी कर दिया...?

3

अति तो सार्थ ने तब की
जब पैदा हुई थी माहू
दो-चार दिन रहा उसे दूर से निहारता
फिर जताया एक अटपटा आश्‍चर्य-
दादाजी, इसको तो सू-सू है ही नहीं!

4

आयी दौड़ती माहू और बोली-
दादाजी, सार्थ भैया ने मुझे मारा...
अरे..अरे.. -दादाजी ने लेकर गोद में
उसे पुचकारा, सहलाया-
हम उसको मारेंगे!
दूसरे कमरे में बैठे सार्थ को डांटा-
क्‍यों रे! क्‍यों मारा माहू को?
सार्थ वहीं से चिल्‍लाया-
नहीं तो, मैं क्‍यों मारूंगा उसको...
अब बारी थी माहू की
दादाजी ने तरेरी आंखें
सहमी-सी बोली वह-
मैं कब से आ रही थी आपके पास
आप सुन ही नहीं रहे थे मेरी बात...

0

घुटने

रहती है जिज्ञासा
बच्‍चा कब चलेगा घुटने के बल
बढ़ चला है यह चलन
घुटने टेकना हो गया है आम
बैठा है कोई घुटनों में दिये सर
कहीं उदासी है या कोई सोच करती परेशान
मर रहे घुट-घुट कर सीमा पर कई फ़ौजी
कुछेक आतंकियों का घुटता जो दम
होते हम संतुष्‍ट
सुन घुटे हुए राजनेताओं के बड़बोले वक्‍तव्‍य
मोड़ कर घुटने सम्‍पन्‍न कई क्रियाएं
प्रेम निवेदन हो, चाहे प्रार्थना
प्रातःकालीन ज़रूरत अथवा सर्वव्‍यापी समागम
योग हो या फिर नमाज़
तकलीफ़ होती है किसी भी आयु में
जब घुटने नहीं दे पाते साथ युवा मन के
0


कोहनी

वह आ रही थी, ये जा रहे थे
आई पलटकर वह, बोली ग़ुस्‍से में
कोहनी क्‍यों मारी आपने?
पल भर बने रहे उजबक ये, फिर कहा
बहन जी, आपको हुई है ग़लतफ़हमी
दाहिने कंधे पर लटके झोले को
फिसलने से रोकने के चक्‍कर में
ऊपर उठी बाईं कोहनी शायद लगी हो आपको
क्षमा चाहता हूं...
इनकी प्रौढ़ता को तौलते हुए वह चली गयी
कोहनी जानती थी- सच्‍चाई क्‍या है!
बचपन में स्‍कूल छूटने के पश्‍चात
ये खेलते रहते थे कबड्‌डी
अपने सहपाठी रमेश गोटीराम पिंपळे के साथ
हां, वे ही दोनों
शरद जोशी के दो हॉकी खिलाड़ियों की तर्ज़ पर
जब देर शाम लौटते थे घर
होती थीं उनकी कोहनियां छिली हुईं
बहरहाल, अगले दिन फिर वही रमेश गोटीराम पिंपळे...
युवा हुए तो चल पड़े डगर पर प्रेम की
साधारण-सी थी उनकी प्रेमिका
लेकिन जिस दिन देखा इन्‍होंने
उसे टेबिल पर टिकाकर कोहनियां
दोनों हथेलियों में सम्‍भाले अपना चेहरा
उसकी सुंदरता ने अभिभूत कर दिया इन्‍हें...
अब भी थाम लेते हैं बार-बार दिल अपना
पुरानी यादों में खोये हुए
इस क्रिया को नहीं दे पाते पूर्णता
यदि साथ न दे पाती
उनके दाहिने हाथ की कोहनी...
इस तरह लड़ा रहे थे वे पंजा
काल से- अपनी कोहनियों के बल पर!
0


ठोड़ी

प्रायः आप करते रहते हैं प्रशंसा
नैनों, होंठों, भौंहों, बरौनियों, बालों की
नासिका, कर्ण, कपाल, कपोल, ग्रीवा
का भी करते रहते हैं उल्‍लेख
सुंदरता के संदर्भ में
भुला देते हैं मुझ नाचीज़ ठोड़ी को
वैसे तो रखकर उंगली मुझ पर
अपना आश्‍चर्य छुपा नहीं पाते
हथेलियों पर टिकाकर मुझे
डूब जाते हैं सोच-विचार में
पकड़ी ही होगी कभी आपने
चाहें उसे मिन्‍नत ना कबूलें
था तो पहले से ही
बढ़ गया है इन दिनों महत्‍व मेरा
जब हो जाती हूं दाढ़ी से शोभायमान मैं
चाहे वह सफ़ेद हो
दार्शनिक, अभिनेता, चित्रकार, लेखक, वैज्ञानिक
यूं करते रहे रक्षा मेरे अस्‍तित्‍व की
कितने भी कंजूस हों आप
नहीं न रोक पायेंगे स्‍वयं को
जब चिबुक-तारा का गोदना
याकि एक छोटा-सा तिल मुझ पर
मोह लेगा बरबस
सब पर भारी पड़ जाऊंगी मैं !
0


डूब

सुबह उठता हूं तो
नाचता रहता है वह नंगा टीवी स्‍क्रीन पर
जांघें दिखाती धोती लपेटे
कुछ देर बाद आ जाता है दूसरा
पुराने ग्रंथों से चुराये अन्‍यान्‍य वनस्‍पतियों के
अति गुणकारी, लाभप्रद, दिव्‍य प्रयोग लेकर
मैं देखता नहीं पर चुप रहता हूं
दोपहर को टूटे-फूटे खण्‍डहर हो चुके
मंदिरों की अविश्‍वसनीय तलाश की दास्‍तानें
मैं कान नहीं देता
रात में सोचता हूं देख लूं समाचार
दो मिनट का कोई ख्‍़ात्‍म होते ही
पन्‍द्रह मिनट तक विज्ञापन
दीखती एक सेकण्‍ड के लिए हेड लाइन्‍स
पढ़ने से पहले प्रकट हो जाती वही धोती
अपने प्रॉडक्‍टस्‌ बेचते हुए
चैनेल बदलता हूं
यहां धर्म, वहां ईश्‍वर
कहीं अंधविश्‍वास, कहीं भक्‍ति गीत
मुझे तब लगता है
अकेली मेरी पत्‍नी ही नहीं
समूचा हिन्‍दुस्‍तान
डूब गया है आस्‍तिकता में
या... डुबोया जा रहा है...
0


अभियोग

उत्‍तर आधुनिक
स्‍त्री का पक्षपाती
लगा लगाने इल्‍ज़ाम
बट्‌टे पर कि
तुम सिल पर करते हो अत्‍याचार
लगातार उसे दबा-दबा
घिस-घिस कर...

उसके समर्थन में
आ खड़े हुए
खल-बत्‍ता, ओखली-मूसल और चक्‍की
ओखली-मूसल थोड़ा शर्माए
थे वे भी नर-मादा
खल-बत्‍ता और चक्‍की के दोनों पाट
थे समलिंगी
  
लगे कहने-
इनसान, हम नहीं तुम-से मतलबी
जो करे अत्‍याचार कमज़ोर पर
सिल तो चौड़ी-बड़ी-वज़नी बट्‌टे से
ओखली भी
खल या निचला पाट चक्‍की का

हम तो करते रहते हैं
आपस में प्‍यार
देते रहते हैं
मनुष्‍य को तैयार
पीसा, कूटा, मिला-मिलाया
स्‍वादिष्‍ट अन्‍न-अनाज़
ये तो तुम्‍हारी स्‍वार्थी दुनिया की
बातें-रिवायतें हैं
करते हो शोषण अपनों का ही
और हम जैसे निर्जीव लेकिन
समझदार पर भी
करते हो दोषारोपण!
0

अशोक गुजराती, बी-40, एफ़-1, दिलशाद कालोनी, दिल्‍ली- 110 095.
  ई मेल % ashokgujarati07@gmail.com

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