रचनाकार

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका

अचल कर्तव्य-निष्ठा (लघुकथा) // प्रदीप कुमार साह

कृष्ण दास की कलाकृति

मिस्टर शर्मा का मेहनत रंग लाया और अंततः उसकी नियुक्ति खाद्य संरक्षण विभाग में बतौर निरीक्षक के पद पर हुआ. भली-भाँति विभागीय प्रशिक्षण प्राप्त कर ओहदा संभालते ही अत्मविश्वास, कर्तव्य-निष्ठा और कुछ अच्छा कर गुजरने की ख्वाहिश से लबरेज उसकी आँखें अनायास ही चमक उठी. परंतु पता नहीं यह संसार प्रत्येक की परीक्षा लेने हेतु सदैव इतना आतुर क्यों रहता है?

अपना कार्यभार संभालने के पश्चात अगले ही दिन अचल कर्तव्य-निष्ठा से भरपूर उस नव-नियुक्त अफसर के समक्ष उसे बगैर दो घड़ी चैन की साँस लेने दिए ही उसकी परीक्षा की घड़ी आ चुकी थी. शायद जन सामान्य में किसी नव-युक्ति प्राप्त अफसर से मुनासिब सहायता प्राप्त हो सकने की आशा अब भी शेष थी. यह मामला बड़े पैमाना में दूध में मिलावट होने से संबंधित था.

शिकायत प्राप्ति के अगले ही दिन अपने कार्यालय में पहुँचकर उसने सामनेवाली चाय की दुकान से गर्मागर्म कड़क चाय मंगवाकर पिया. फिर अपने विभागीय दल-बल को इकट्ठा किया और शिकायत-निस्तारण हेतु दूध में मिलावट करने वाले छोटे-बड़े, फुटकर-थोक मिलावटखोर दूध विक्रेता की खोज में पूरे मनोयोग से निकल पड़ा. उस दिन खाद्य-संरक्षण विभाग का जगह-जगह छापेमारी पड़ा.

विभाग की तरफ से वह सदल-बल जगह-जगह छापेमारी कर देर शाम तक वापस कार्यालय पहुँचा. यद्यपि छापेमारी में कुछ भी गलत व्यक्ति चिन्हित नहीं हो सका, तथापि बेशक ताबड़तोड़ विभागीय छापेमारी से जन सामान्य में उस नव-नियुक्त अफसर की छवि साफ-सुथड़ी और बेहद ईमानदार एक कड़क अफसर के रूप में होने से संबंधित चर्चा जोर-शोर से चल पड़ी.

अब तो क्षेत्र में मानो वह सिलसिला ही चल पड़ा और उसके नेतृत्व में विभागीय छापेमारी नियमित रूप से चलने लगा. किंतु विभाग को दोषी को पकड़ने में संभवतः कभी सफलता प्राप्त न हुई. अतः कुछ समय पश्चात तो जन सामान्य की विभाग से अपेक्षा भी पुनः लुप्तप्राय हो गया. किंतु मिस्टर शर्मा भी लंबे समय तक अपने पद पर यथास्थिति बने रहे और अपनी कर्तव्य का निर्वहन करते हुए सेवानिवृत्ति के कगार तक पहुँच गए.

[ads-post]

उनकी सेवानिवृत्ति में कुछेक महीना ही शेष रह गई थी. तभी एक दिन उनको विभागीय प्रोन्नति प्राप्ति की सूचना प्राप्त हुई. सुसमाचार से मिस्टर शर्मा बहुत उत्साहित हुये और उस खुशनुमा उपलक्ष्य में अपने कार्यालय ही में टी-पार्टी आयोजित किये. आज चाय पहुंचाने उसका पुराना दुकानदार स्वयं ही आया, जो अब बिलकुल बूढ़ा हो चूका था. चाय पहुँचते ही सब जमकर टी-पार्टी मनाये.

जश्न मनाते हुये मिस्टर शर्मा बारंबार इस तथ्य का जिक्र करते रहे कि उनकी कर्तव्य-निष्ठा से उनका कार्यक्षेत्र मिलावटखोर से सदैव मुक्त रहा. बूढ़ा दुकानदार एक कोना में खड़ा होकर सब कुछ देखता-सुनता रहा. जब पार्टी का समापन हुआ तो वह निरीक्षक मिस्टर शर्मा के समक्ष हाथ जोड़कर खड़ा हो गया. मिस्टर शर्मा के पूछने पर उसने दूध में मिलावट करनेवालों की खोज और उसके विरुद्ध उचित कार्यवाही करने हेतु मौखिक गुहार लगाया.

दुकानदार की बात सुनकर मिस्टर शर्मा चौंक गए," तुम्हारा चाय भी तो दूध ही से बनता है न? फिर चाय पीकर तो कभी वैसा महसूस नहीं हुआ कि वह कृत्रिम रसायनयुक्त पानी के मिलावटवाली दूध से बना हो?"

"श्रीमान, आपके विभागीय कार्यवाही से डरकर आपको परोसा जाने वाला चाय में सदैव ज्यादा उबाल लगाता जिससे पीते समय उसमें मौजूद कृत्रिम रसायनयुक्त पानी की गंध और मात्रा का मालूम न चल सके. फिर डर उस बात की थी कि मिलावटखोर दूध विक्रेता की कारगुजारी का दंड मुफ़्त में एक निर्दोष चाय विक्रेता को प्राप्त न हो." दुकानदार बोला.

"किंतु आप उस बात की शिकायत स्वयं किसी से कभी क्यों नहीं की?"

"श्रीमान, आपके कर्तव्य-निष्ठा से बारंबार प्रतीत होता कि दोषी व्यक्ति एक दिन जरूर शिकंजा में आयेगा. फिर प्रत्येक खाद्य सामग्री शिकायत निवारण हेतु आप ही विभागीय टीम का नेतृत्व सदैव करते रहे. आप सदैव चाय के शौक़ीनों में एक रहे. तथापि कभी एक बार सोच लेते कि चाय में भी दूध का इस्तेमाल होता है तो आपको दूध के मिलावटखोर के कार्यसमय का सही अंदाजा हो जाता और दोषियों पर उचित कार्यवाही भी हो पाता."

"अर्थात आपने यह समझ लिया कि मेरे जीवन का प्रत्येक क्षण और संपूर्ण घर गृहस्थी विभाग के पास गिरवी है? जबकि आप स्वयं ही मिलावटखोर को उस तरह बेजा सहायता पहुँचाते रहे...?" वैसा कहते हुये मिस्टर शर्मा की न केवल भृकुटि तन गई, अपितु उसने बूढ़े दुकानदार पर खाद्य संरक्षण अधिनियम के तहत कठोरतम क़ानूनी कार्यवाही करते हुये उसे पुलिसिया हिरासत में भी ले लिया. अगले दिन उसके मामला को अदालत में विचारार्थ भेज दिया गया.

यह मिस्टर शर्मा द्वारा उसके कार्यकाल में संभवतः प्रथम दर्ज एफ. आई. आर. था, जिसे दर्ज करने पर उसे आत्मिक संतुष्टि और अपना अचल कर्तव्य-निष्ठा निभाने का गंभीर आनंद प्राप्त हो रहा था. उधर कुछ प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक्स मिडिया को उस आशय का एक सनसनीखेज खबर मिल चूका था कि "एक मिलावटखोर अंततः कानून के शिकंजा में आया" और वह एक पक्षीय रूप से उसे प्रसारित कर टी.आर.पी. भुनाने में पूरे जी-जान से लग गया. इस तरह उस लाचार बूढ़े दुकानदार के पक्ष को छोड़कर अधिकांश पक्ष अपने-अपने अचल कर्तव्य-निष्ठा के शक्ति परीक्षण और प्रदर्शन में लग गए.(सर्वाधिकार लेखकाधीन)

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

रचनाकार में ढूंढें...

आपकी रूचि की और रचनाएँ -

randompost

कहानियाँ

[कहानी][column1]

हास्य-व्यंग्य

[व्यंग्य][column1]

लघुकथाएँ

[लघुकथा][column1]

कविताएँ

[कविता][column1]

बाल कथाएँ

[बाल कथा][column1]

लोककथाएँ

[लोककथा][column1]

उपन्यास

[उपन्यास][column1]

तकनीकी

[तकनीकी][column1][http://raviratlami.blogspot.com]

वर्ग पहेलियाँ

[आसान][column1][http://vargapaheli.blogspot.com]
[blogger][facebook]

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget