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सोशल मीडिया पर सुमधुर संवाद ॥ शैलेन्द्र चौहान

सम्प्रति सोशल मीडिया पर दो तरह के लोग सक्रिय हैं। एक वे जो लिखते हैं और दूसरे जो बकते हैं।
लिखने वाले लोग अच्छा भी लिखते हैं और बुरा भी।  लेकिन बकने वाले लोग बस बकते हैं। और जो वे बकते हैं, वे अपने से असहमत लोगों से बड़ी  मधुरता से संवाद करते हैं। उनमें सबसे ज्यादा स्थान मां और बहन को दिया जाता है। अब कोई कहे कि जिस देश में महिलाओं को संसद में सिर्फ 30 फीसदी आरक्षण दिलाने के लिए दो दशक से लड़ाई हो रही है और अब तक इस मुद्दे पर सहमति हासिल कर पाने में नाकाम रही है, वहां क्या ये अजब संयोग नहीं है कि ये बकने वाले मां और बहनों को इतना स्थान दे रहे हैं। लेकिन महिलाएं इस बात को लेकर कतई खुश नहीं हैं, शर्मशार हैं। उन्हें यह स्थान कतई नहीं चाहिए। इधर दो तीन वर्षों से यह प्रवृत्ति उफान पर है। इन महिलाओं के लिए पहली बार एक आधिकारिक आवाज उठी जिसे उसी वक्त आधिकारिक तौर पर दबा दिया गया।  केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी ने इन बकने वालों पर जिन्हें सोशल मीडिया ट्रॉल्स कहते हैं, नियंत्रण की जरूरत की बात कही लेकिन एक अन्य और ज्यादा ताकतवर केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली ने कहा है कि सहन करना सीखो। भावनाओं और आस्था का मामला है! ये बकने वाले भी काफी लोकतांत्रिक और समदर्शी हैं। ये गाली बकते वक्त नहीं देखते कि सामने पुरुष है या महिला, वृद्ध है या बालक। अब पुरुष तो अक्सर पलट कर गाली दे देते हैं लेकिन महिलाएं सिर्फ खून का घूंट पीकर रह जाती हैं। क्योंकि मां-बहन का जिक्र आएगा तो उन पर खुद पर ही बुरी बीतेगी। और ऐसा सबसे ज्यादा महिला पत्रकारों के साथ होता है क्योंकि वे ही सार्वजनिक तौर पर जनता के सामने आती हैं। 

किसी समाज में प्रचलित गालियां ये बताती हैं कि सबसे बुरा अपमान कैसे हो सकता है। सामाजिक व्यवहार की सीमा क्या है। इनमें छुपी हुई लैंगिक हिंसा यह दिखाती है कि कैसे हम किसी को नीचा दिखा सकते हैं। स्त्री-शरीर ही इन गालियों का केंद्र होता है। इसी कारण युद्ध या सांप्रदायिक दंगों में सबसे पहले महिलाओं को निशाना बनाया जाता है। भारतीय समाज में प्रचलित अधिकतर गालियाँ स्त्री के यौन-अंगों से सम्बंधित हैं। समाज जब आदिम समय में जी रहा था उस समय ऐसी अपशब्दों की भाषा नहीं होती थी क्योंकि वहां स्त्री को बराबर मान दिया जाता था। जैसे-जैसे समाज ने निजी संपत्ति का विकास किया महिलाएं घर में बंद होती गई। स्त्री, एक पुरुष के अधीन बना दी गई। घर में बंद स्त्री के साथ परिवार की इज्ज़त को जोड़ा गया। आदिम समाज में स्त्री को न केवल शारीरिक संबंधों की आज़ादी थी वरन वह अपने सभी कार्यों में आत्मनिर्भर थी। अब सभ्यता ने उसे परिवार पर निर्भर रहना सिखाया। स्त्री एक ही दिन में गुलाम बन गई हो ऐसा भी नहीं था। यह कई हजार वर्ष चलने वाला सिलसिला था। खैर अब स्त्री, परिवार की मान मर्यादा की रक्षिता मानी गई। इसलिए जब भी किसी समुदाय को अपने अधीन करना होता तो वह वीर पुरुष उसकी स्त्रियों को उठा लेता, बलात्कृत करता, बंदी बनाता जिससे उस स्त्री' के किसी और के साथ शारीरिक सम्बन्ध हैं इस बात को कहा जा सके। क्योंकि समाज में ऐसी मनाही थी। जो समुदाय या परिवार जन (पुरुष) कुछ कमजोर होते थे वे यह सब कह कर ही अपना काम चला लेते थे मैं कि तेरी माँ या बहन के साथ सम्बन्ध बना लूंगा और सभी बातें। अब इन गालियों को जरा देखिए - ‘चू.... तिया’ एक आम गाली जो स्त्री की योनि से ही जुड़ी है। इसका गोबर पट्टी में अक्सर प्रयोग होता है। योनि के नाम पर बनी यह गाली व्यक्ति के मूर्ख होने का संकेत देती है। और यह बनी है स्त्री के उस अंग से जो पुरुष से उसे भिन्न करता है। यानि स्त्री मूर्ख होती हैं। इस बात को यह शब्द हमें बताता है। पूरे स्त्री समाज पर प्रहार करता यह शब्द कितना पितृसत्तात्मक है यह कोई सोचता भी नहीं।

ऐसी ही गालियां हैं 'माचो....  , और ‘बहनचो.... ’ हैं। स्साला.. तो बहुत सामान्य रूप में बातचीत में प्रयुक्त होने वाली गाली है। कितनी अजीब बात है कि एक तरफ हमारे समाज में खाप पंचायत है। शिव सेना है जो बात-बात पर धर्म संस्कृति का हवाला देती है। स्त्री को पार्क में किसी के साथ यदि यह देख ले तो डंडा लेकर पीटने लगते हैं। यही लोग जो स्त्री को देवी मानकर उसके पूजने की बात करते हैं माँ और बहनचोद कहने में शर्म महसूस नहीं करते। ऐसे लोगों को यदि आप टोक दें तो उनका अहम जाग जाता है। उल्टा आपको सुना देंगे। तर्क करेंगे कि यह हमारे समाज की भाषा है ऐसा ही बोलते हैं हम। यह सही है कि आप ऐसा ही बोलते हैं पर आप कैसे  हैं यह भी हम अच्छे से जानते हैं। आपने कभी गौर किया है कि हमारे किसी भी प्राचीन ग्रंथ और महाकाव्यों में गाली का एक शब्द भी मौजूद है, नहीं है। महाभारत में इतनी मारकाट और रक्तपात है पर कोई किसी को गाली नहीं देता। यहां तक कि ग्रीक गंथ्रों, जैसे होमर के महाकाव्य ‘इलियड और ओडिसी’ में भी गाली नहीं मिलती। बिहारी, कालिदास जैसे महान कवि, नायिका के अंग-अंग का मादक वर्णन तो करते हैं पर किसी गाली का कोई सन्दर्भ नहीं देते। कुछ अपशब्द जरूर हैं। ध्यान दीजिये कि अपशब्द पुल्लिंग है जबकि गाली स्त्रीलिंग शब्द है। प्राचीन भारतीय-संहिता मनुस्मृति जो शरीर के अंग-विशेषों का नाम लेकर अपराधों की सजा मुकर्रर करती है वह भी किसी गाली का नाम नहीं लेती। भारतीय साहित्य में अगर बुरी गाली/अपशब्द मिलते हैं तो वह पिछड़ी जातियों और औरतों को लेकर ही मिलते हैं।यह दिलचस्प है कि अलग-अलग संस्कृतियों में बुरी गालियों का मापदंड अलग-अलग है। किन्हीं समाजों में सगे-सम्बन्धियों के साथ यौन-संपर्क को सबसे बुरी गाली (मां, बहन से जुड़ी गालियां) माना जाता है तो किन्हीं समाजों में शरीर के खास अंगों/उत्पादों से तुलना (अंगविशेष या मल आदि के नाम पर दी जाने वाली गालियां) को बहुत बुरा माना जाता है। कुछ समाजों में जानवरों या कीड़े-मकोड़ों से तुलना सबसे बुरी मानी जाती है तो कुछ समाजों में नस्ल और जाति से जुड़ी गालियां सुनने वाले के शरीर में आग लगा देती है। हां, लिंग से जुड़ी गालियां अमूमन हर जगह पाई जाती हैं।

गालियों का भी लिंग होता है। मसलन पुर्तगाली और स्पैनिश की गालियां हैं- ‘वाका’ और ‘ज़ोर्रा’। जिसका मतलब लोमड़ी और गाय होता है। जब किसी महिला को ये गालियां दी जाती हैं तो इसका मतलब ‘ख़राब चरित्र की महिला’ होता है। पर जब यही गालियां पुरुषों को दी जाती है तो इसका अर्थ ‘चालाक’ और ‘ताकतवर सांड’ हो जाता है। यह लिंग विभाजन ज्यादातर हर भाषा-संस्कृति में है। अब विदेशी तो होते ही अनैतिक हैं ! पर हमारी यह महान संस्कृति महिलाओं की कितनी पूजक और रक्षक है? उन्हें घर में बंद किया जाता है। प्रेम करने की छूट तो क्या यहाँ तो मीरा को भक्ति का भी अधिकार नहीं दिया गया। इसी महान संस्कृति में महिलाओं को ज़िंदा जलाया जाता है। लड़की है यह जानते ही मार दिया जाता है। आश्चर्य कि यह महान सभ्यता और संस्कृति महिलाओं के शोषण पर टिकी हुई है। मुँह से औरतों के लिए अपशब्द निकालते लोग कतई शर्म महसूस नहीं करते। क्या ये महान संस्कृति के वाहक हैं? 
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