सोमवार, 24 जुलाई 2017

कहानी // दुर्भाग्य // अर्जुन प्रसाद

केएनएस चौहान की कलाकृति

बात कई साल पुरानी है। बैताल गाँव के देवदत्‍त भट्ट बड़े ही परोपकारी, विनम्र और उज्‍ज्‍वल व्‍यक्‍तित्‍व के बहुत धनाढ्‌य पुरुष थे। उनके पास यदि किसी चीज की कमी थी तो बस यही कि संतान के नाम पर मात्र एक पुत्री कुमुद ही थी। बड़ी होने पर उन्‍होंने उसका विवाह पास के ही एक गाँव में एक अच्‍छे घराने में बालकृष्ण शर्मा के पुत्र उदयराज के साथ कर दिया। उदयराज एक अध्‍यापक थे और पास के ही इंटर कॉलेज में लेक्‍चरार थे। वह एक विद्वान और सुलझे हुए पुरुष थे।

वैसे तो इस जगत में एक जैसे स्‍वभाव वाले पति-पत्‍नी का जोड़ा बहुत कम ही बनता है वरना अक्‍सर यही देखने को मिलता है कि उनमें से एक बहुत ही गर्म मिजाज का होता है तो दूसरा बहुत ही नर्म मिजाज का होता है। यही वजह है कि पति-पत्‍नी में अक्‍सर कहासुनी और नोक-झोंक चलती रहती है। कई घरों में तो महाभारत ही मचा रहता है।

कर्कश स्‍वभाव की महिलाएँ अपने पति को एक पति नहीं बल्‍कि कमाकर लाने वाला घरेलू और पालतू नौकर तक समझती हैं। वे न तो खुद को ही समझ पाती हैं और न अपने पति को ही समझने की कोशिश करती हैं। ऐसी स्‍त्रियों का अज्ञान और गुरुर सातवें आसमान पर होता है। उनके आगे नर्म स्‍वभाव का पति जीते जी मरे के समान रहता है। वह अपना माथा पीट लेता है। जब देखिए तब वह केवल भीगी बिल्‍ली ही बना रहता है।

आपस में तालमेल न होने से पति-पत्‍नी के विचार आपस में सदैव टकराते रहते हैं और उनमें कलह मची रहती है लेकिन उदयराज और कुमुद के साथ ऐसा कुछ भी न था। दोनों का स्‍वभाव और आचार-विचार बिल्‍कुल एक जैसा ही था। दोनों ही उदार, समझदार और मृदुभाशी थे। उदयराज और कुमुद में आपस में बहुत ही प्रगाढ़ प्रेम था। उनके बीच कभी भूल से भी कोई रार-तकरार न होती थी। उनका रहन-सहन और पारस्‍परिक तालमेल देखकर उनके कुछ पड़ोसियों को जलन होने लगती थी।

वहीं कुछ लोग ऐसा भी कहने लगते थे कि अगर पति-पत्‍नी की जोड़ी हो तो ऐसी ही हो वरना अकेले ही जीना ठीक है। यह सच भी है। यदि पत्‍नी मधुर स्‍वभाव की सहनशील और बुद्धिमान हो तो पति के गर्ममिजाज होने पर भी घर में क्लेश नहीं होने पाता है। वह अपने बिगड़ैल पति को तनिक देर में ही समझाबुझाकर शांत कर देती है। वह उसका गुस्‍सा भड़कने से रोक लेती है मगर यदि पत्‍नी वास्‍तव में कुलटा या बुद्धिहीन मिल जाए तो जीवन जीते जी नर्क बनकर रह जाता है।

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उदयराज और कुमुद का विवाह होने के बाद उनके तीन पुत्र हुए। उनका नाम था राजीव, संजीव और चिरंजीव। राजीव सबसे बड़े थे और संजीव मँझले। चिरंजीव सबसे छोटे थे। राजीव और संजीव जब बड़े हो गए तो बाबू उदयराज ने आसपास के गाँवों ही रिश्ता देखकर उनका विवाह कर दिए। राजीव का विवाह मंदाग्‍नि से हुआ तो संजीव का विवाह रागिनी से हुआ। चिंरजीव सबसे छोटे थे इसलिए उनका विवाह होने में अभी समय था।

पति-पत्‍नी के रुप में बाबू उदयराज की जोड़ी एक ओर जहाँ बहुत ही लाजवाब थी वहीं उनके दोनों पुत्रों की बहुएँ एक अलग ही साँचे में ढली और पढ़ी-बढ़ी थीं। कहने का मतलब यह कि मीठे में बिल्‍कुल नमक मिल गया। वे किसी छोटी सी बात पर भी समझौता करने वाली न थीं। घर में अपना-अपना कदम रखते ही उन्‍होंने अपना मालिकाना हक जताना षुरु कर दिया।

आखिर धीरे-धीरे उन्‍होंने अपने-अपने पतियों को भरपूर कब्‍जे में कर लिया। दोनों की दोनों ही दिभर बनठनकर रहतीं और कोई कामकाज न करतीं। यह देखकर बाबू उदयराज पति-पत्‍नी को अपार कष्ट होता। वे उन्‍हें समझानेबुझाने का भरसक प्रयास भी करते मगर वे थीं कि उनके कानों पर जूँ तक भी रेगनें वाला न था। मानों दोनों एकमत फैसला करके आई थीं कि चाहें जो कुछ भी हो परंतु हम नहीं सुधरेंगे। उनके आचार-विचार से उदयराज पति-पत्‍नी दुःखी रहने लगे।

मंदाग्‍नि और रागिनी को ग्रामीण जीवन कतई पसंद न था अतएव उन्‍होंने अपने-अपने पतियों का कान भरना आरंभ कर दिया कि गाँव में क्‍या रखा है। कहीं शहर में चलकर नौकरी की जिए और हम भी वहीं रहेंगे। हमारे बस का घरेलू कामकाज नहीं है। यह सुनकर राजीव और संजीव उनका विरोध न कर सके और समय आने पर किसी न किसी शहर में जाने को हामी भर दिए। उन्‍होंने उनसे कहा कि ननिहाल की जमीन-जायदाद का बँटवारा हो जाने दो इसके बाद हम किसी शहर में ही जाकर रहेंगे। यह सुनकर वे दोनों देवरानी-जेठानी चुप हो गईं और अपना समय काटने लगीं।

इधर बाबू उदयराज के माता-पिता बिल्‍कुल वृ़द्ध और कमजोर थे ही, इसलिए वे कब अपना नेत्र बंद कर लेंगे इसका किसी को कुछ पता न था। मृत्‍यु किसी का इंतजार नहीं करती है। मृत्‍यु ही इस संसार में एक अटल सत्‍य है। उन्‍होंने अपने जीते जी सारा सुख भोग लिया था और कुछ बाकी न रह गया था। उनकी इच्‍छाएँ तृप्‍त हो चुकी थीं।

वे अपने जीवन से पूर्णतया संतुष्ट थे। आखिर जब इस दुनिया से जाने का बुलावा आया तो बुढ़ापे में पति-पत्‍नी ने बारी-बारी इस दुनिया से नजर फेर ली। उदयराज के सिर से माँ-बाप का और कुमुद कें सिर से सासु-ससुर का साया हमेशा के लिए उठ गया। इससे बाबू उदयराज पति-पत्‍नी कुछ गमगीन हो गए। यह सांसारिक रीति है कि जवान हों या वृद्ध, माता-पिता से बिछड़ने पर कष्ट होता ही है।

उधर बाबू देवदत्‍त के पास जमीन-जायदाद के साथ अकूत दौलत तो थी ही लोहे का एक ऐसा कुठला था जो चाँदी के हजारों सिक्‍कों से भरा हुआ था। मगर उसकी उस कुठले की एक बड़ी खासियत भी थी अगर कोई व्‍यक्‍ति उस कुठले से सिक्‍का निकालने के लिए उसमें अपना हाथ डालने की कोशिश करता तो वह यकायक बिल्‍कुल बेजान और अवाक रह जाता। उसका हाथ वहीं का वहीं रुक जाता।

बाद में पति-पत्‍नी के मन में यह धारणा घर कर गई कि इसमें कोई देवी या देवता जरूर है जिसे यह मंजूर नहीं कि इस कुठले से सिक्‍कों को निकालकर उसे किसी नेक काम पर खर्च किया जाए। उन्‍होंने उस धन को दान में देने का मन बना लिया। इंसान का स्‍वभाव होता है कि चमड़ी जाए पर दमड़ी न जाए। बुढ़ापे में धन बहुत प्रिय हो जाता है। अविवेकी और लोभी व्‍यक्‍ति वृद्धावस्‍था में बिल्‍कुल धनलोलुप बनकर रह जाता है। मरते दम तक लोभ उसका पीछा नहीं छोड़ता है। भलीभाँमि यह मालूम होते हुए भी कि एक रुपया भी साथ नहीं जाने वाला है, मनुष्य धन के पीछे पड़ा रहता है।

पति-पत्‍नी देवदत्‍त ने सालों से एकत्र धन को दान में देने का मन तो बनाया लेकिन किसी अपरिचित या अनभिज्ञ आदमी को नहीं। उन्‍होंने किसी संस्‍था या भिक्षुक को दान देने का मन नहीं बनाया बल्‍कि उन्‍होंने अपनी इकलौती पुत्री कुमुद के तीनों बेटों यानी अपने प्रिय नातियों को ही समान रुप से धन दान देने का फैसला किया।

पुरानी कहावत है कि धन धन में होता है और जल जल में। बाबू उदयराज के पास पुश्तैनी जायदाद और जमीन थी ही, उधर उनकी ससुराल उनके सासु-ससुर के पास जो कुछ भी था वह भी उन्‍हीं का होने वाला था। बुढ़ापे में सासु-ससुर के मरने के बाद वहाँ का सब कुछ उन्‍हीं को मिलने वाला था। इसे ही लोग सौभाग्‍य कह देते हैं। वे यह भूल जाते हैं कि हर किसी को हर किसी का धन नहीं पचता है। किसी दूसरे का धन किसी-किसी आदमी को ही पचता है। दूसरों का धन आसानी से पचाना कोई बच्‍चों का खेल नहीं है। किसी-किसी का दिया हुआ धन उसे बहुत कष्ट पहुँचाता है। वह उसका जीवन एकदम तबाह करके रख देता है।

देवदत्‍त भट्ट जी के पास कोई पुत्र तो था नहीं इसलिए बुढ़ापे में उन्‍होंने अपनी देखभाल करने की गरज से अपनी इकलौती बेटी कुमुद के तीनों पुत्रों राजीव, संजीव और चिरंजीव को अपने पास ही बुलाकर अपना सब कुछ उनके नाम कर दिया। इसके बाद तीनों भाई वहाँ भी बारी-बारी रहने लगे।

कुछ दिन बाद राजीव और संजीव की पत्‍नियों ने जब उन पर फिर से दबाव डालना शुरु कर दिया कि किसी शहर में चलकर रहिए तो दोनों बड़े भाई अपने छोटे भाई चिरंजीव से बोले-भाई! हम दोनों का मन अब गाँव में नहीं लगता है। हमारा मन यहाँ के जीवन से ऊब चुका है। दिन-रात खेतीबाड़ी में हाड़ तोड़ मेहनत करके मरते-खपते रहो और तनिक देर में बाढ़ और अकाल आकर उसे बर्बाद कर देता है। यह सब झेलना हमारे बूते की बात नहीं है। अब हम किसी शहर में जाकर नौकरी करेंगे और तुम यही पर रहकर अपनी खेतीबाड़ी सँभालो। अभी तुम्‍हारी शादी वगैरह भी नहीं हुई है इसलिए तुम्‍हें कहीं आने-जाने की कोई जरूरत नहीं है।

इसके बाद वे दोनों भाई राजीव और संजीव अपनी-अपनी पत्‍नियों को गाँव में छोड़कर रेलगाड़ी का टिकट कटाए और धनबाद चले गए। वे अपनी-अपनी देवियों से यह कह गए कि पहले हमें जाकर अपना पैर जमाने दो, इसके बाद हम तुम्‍हें बुला लेंगे। शहरी जीवन गाँवों के मुकाबले काफी जटिल है। वहाँ सब कुछ अपनी कमाई पर ही निर्भर रहमता है। अगर शहर में नौकरी बढ़िया न मिले तो जीवन गुजारना बड़ा मुश्किल हो जाता है। शहरों में हर सामान पैसा देने पर ही मिलता है। बिना पैसा दिए हवा और पानी भी नहीं मिलता है।

तत्‍पश्चात  राजीव और संजीव धनवाद जाकर कोइलरी में आराम से नौकरी करने लगे। इसे ही कहते हैं घर की मुर्गी साग बराबर। अपने घर की खेतीबाड़ी न करके उन्‍हें कोयला खोदने का काम मन भा गया। अगर वे चाहते तो गाँव में ही रहकर अपनी खेती सँभालते और जमींदार बनकर रहते। यदि सूखा और बाढ़ न सताए तो धरती सच में सोना उगलती है यह बात अभी तक सबको मालूम नहीं है इसलिए हमारे बहुत से युवक गाँव छोड़कर शहर में जाकर बसना ही बेहतर समझने लगे हैं। धनवाद में जाकर नौकरी करने के कुछ दिन बाद ही राजीव और संजीव ने अपनी-अपनी पत्‍नियों तथा बच्‍चों को भी वहीं बुला लिया। कहने का मतलब यह कि वे फिर वहीं के होकर रह गए। उन्‍होंने मुँड़कर गाँव-घर की खबर ही न ली।

इधर छोटे शर्मा चिरंजीव अपने परिश्रम के बल पर दिन दूना तो रात चौगुना अमीर होते चले गए। जवान होने पर एक गाँव में उनका भी विवाह हो गया। उनकी पत्‍नी का नाम संयुक्‍ता था। वह गृहकार्य में दक्ष और सुभाशिणी थी। वह अपनी दोनों बड़ी जेठानियों मंदाग्‍नि और रागिनी से बिल्‍कुल अलग थी। चिंरजीव के पास आते ही उसने पूरे घर को सँभाल लिया और हर काम में अपने पतिदेव का साथ देने लगी। उसका सद्‌व्‍यवहार और विचार देखकर बाबू उदयराज और उनकी पत्‍नी कुमुद को बड़ी प्रसन्‍नता हुई। अपनी दोनों बड़ी पुत्रवधुओं से दुःखी उनका कुछ गम कम हो गया। उन्‍हें बड़ी राहत मिली। उनके दिल को कुछ सुकून मिला।

कई साल के बाद राजीव और संजीव कोइलरी से सेवा निवृत्‍त होने के बाद अपनी-अपनी पत्‍नियों और बच्‍चों के साथ गाँव में वापस आ गए और वहीं रहने लगे। दोनों बड़े भाई राजीव और संजीव तब अपनी बीवी-बच्‍चों के साथ गाँव में वापस लौटे तो अपने छोटे भाई चिरंजीव की तरक्‍की देखकर उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं। उन्‍हें कोटि यकीन ही न आ रहा था कि यह वही चिरंजीव है जिसे कई साल पहले हम दोनों छोड़कर धनवाद गए थे।

उन्‍होंने चिरंजीव की पत्‍नी संयुक्‍ता को अभी तक नहीं देखा था क्‍योंकि वे दोनों विवाह में बुलाने पर भी गाँव नहीं आए थे। उन्‍होंने यह कहकर गाँव आने में अपनी असमर्थता व्‍यक्‍त कर दी थी कि क्‍या करें, कैसे आएँ काम से छुट्‌टी नहीं मिल रही है। उन्‍होंने जब संयुक्‍ता को देखा तो वे उसे देखते ही रह गए। वे आपस में एक-दूसरे से कहने लगे-कमाल है हम दोनों सुख-शांति की तलाश में धनवाद चले गए लेकिन चिरंजीव अपनी पत्‍नी के साथ यहीं मजे से जीवन गुजार रहा है। इसे कहीं कोई परेशानी नहीं है। यह तो हम दोनों से कई गुना सुखी है।

कुछ दिन बड़े उधेड़बुन के साथ जैसे-तैसे व्‍यतीत हुआ लेकिन उसके बाद वही होने लगा जैसा बर्बादी वाले अन्‍य घरों में होता है। राजीव और संजीव की पत्‍नियाँ अपने-अपने पतियों का कान फिर भरले लगीं। वे उन पर बँटवारा करने का जोर देने लगीं। वे कहने लगीं- चिरंजीव अपनी पत्‍नी संयुक्‍ता के साथ अकेला ही मौज कर रहा है और हम दर-दर की ठोकरें खाते-फिरते रहे हें। अब हम इसे अकेला मौज नहीं करने देंगे। आखिर इस घर पर हमारा भी कुछ अधिकार है। हम भी इस घर की बहुएँ हैं।

वे उनसे बोलीं-देवर से जमीन-जायदाद में अपना-अपना हिस्‍सा ले लीजिए। तीनों भाइयों कुछ दिन तक खींचतान चलती रही और अंत में खेतीबाड़ी और घरबार की सारी जमीन आपस में बराबर-बराबर बँट गई। आपस में बँटवारा होते ही उनके घर-परिवार पर मानो वज्रपात ही हो गया। देखते ही देखते कुछ ही दिनों में घर की सारी यश मारी गई। आहिस्‍ता-आहिस्‍ता उन्‍हें दरिद्रता ने घेर लिया। गरीब और निर्धन दरिद्र होते-होते वे बिल्‍कुल बार्बादी के कगार पर पहुँच गए। सब कुछ तहस-नहस हो गया। इसे ही कहते हें जहाँ सुमति होती है वहाँ संपत्‍ति भी होती है और जहाँ कुमति होती है वहाँ नाना प्रकार की विपत्‍तियाँ ही होती हैं।

अपने बड़े भाइयों के दुःखों से दुःखी होकर छोटे भाई चिरंजीव ने गाँव के बाहर एक दूसरा मकान बना लिया और फिर वहीं रहने लगे। वहीं उसकी अर्धांगिनी संयुक्‍ता ने एक पुत्र को जन्‍म दिया किन्‍तु अफसोस यह कि लड़के को जन्‍म देने के बाद ही संयुक्‍ता की अचानक मृत्‍यु हो गई। उसने भरी जवानी में ही अपनी आँखें मूँद ली। उसका नौनिहाल अभागा बेटा इस दुनिया में बिना मां के ही रह गया। उसने अभी अपनी मां का दूध भी न छुआ था कि वह दुनिया से चली गई। न जाने किसकी मनहूस नजर लग गई कि वह बेचारी असमय ही मृत्‍यु की गोंद में समा गई।

युवावस्‍था में अपनी नई-नवेली प्राणप्रिया के अकाल वियोग से चिंरजीव को बड़ा दुःख हुआ। वह अंदर से टूटकर बिखर गए। संगति का कुछ न कुछ असर होता ही है इसलिए जब तक वह अपने भाइयों और भौजाइयों से अलग रहे तब तक बहुत सुखी और प्रसन्‍न रह परंतु उनके साथ होते ही उन पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। एक ओर पत्‍नी वियोग तो दूसरी ओर नन्‍हें बच्‍चे को पालना उनके लिए दुष्कर हो गया।

उनकी यह पीड़ा उनके माता-पिता से न देखी गई अतः उनके मासूम दुधमुँहे पुत्र को उन्‍होंने अपने पास रख लिया। इससे चिरंजीव को कुछ राहत मिली। अपने उस पुत्र का नाम उन्‍होंने बड़े ही भारी मन से निर्जीव रखा। बिना मां का निर्जीव अपनी दादी कुमुद के सहारे किसी तरह बच तो गया लेकिन बड़ा होने पर भी वह हीन भावना से मुक्‍त न हुआ। वह दीन-हीन भावना का शिकार होकर रह गया। उसे अपनी मां की याद सताती रही। वह रह-रहकर अपनी जन्‍मदायिनी के लिए तड़प‍ उठता था। वह बारंबार यही सोचता रहता कि काश मेरी भी मां होती तो कैसा होता।

एक तो चिरंजीव और उनके मां-बाप निर्जीव की मां संयुक्‍ता की मौत से दुःखी थे दूसरे निर्जीव की दशा देखकर वे और भी अधिक परेशान रहने लगे। वे उसके लिए एक नई मां की खोजबीन में जुट गए। चिरंजीव इलाके के जानेमाने धनी पुरुष थे ही इसलिए उनकी दूसरी शादी होते देर न लगी। ढूँढ़ते-खोजते उन्‍हें एक घर मिल गया।

इसके बाद चिरंजीव ने निर्मक्‍ता नामक एक तरुणी के साथ अपना दूसरा विवाह कर लिया। उनके पुनर्विवाह के बाद निर्मुक्‍ता और चिरंजीव के जीवन की गाड़ी पटरी पर आराम से चलने लगी। निर्जीव को भी एक मां मिल गई। निर्मुक्‍ता उसे अपने सगे पुत्र के समान ही मानने लगी। यह देखकर सबको बड़ी खुशी हुई। इसके बावजूद उदयराज और कुमुद ने निर्जीव को उसके माता-पिता के सहारे ही छोड़ देना उचित न समझा और उसे पुनः अपने पास रख लिया।

समय गुजरता रहा और निर्जीव पलता-बढ़ता गया। अब वह लगभग 8 साल का हो गया। समयचक्र तीव्रगति से गुजरने लगा। तभी समय ने एक बार फिर ऐसी करवट ली कि चिरंजीव के हरेभरे सुखमय जीवन में अचानक तूफान आ गया। कुछ दिन बाद ही निर्मुक्‍ता गर्भवती हो गई इससे परिवार में खुशियों की बहार सी आ गई उनकी वह प्रसन्‍नता ज्‍यादा दिनों तक कायम न रह सकी। वह बहुत जल्‍दी ही उनसे छिन गई।

समय आने पर निर्मुक्‍ता भी रागिनी की तरह एक पुत्र को जन्‍म देने के साथ ही गंभीर रुप से बीमार पड़ गई। इस प्रकार एक पुत्र को जन्‍म देने के बाद चिरंजीव की दूसरी पत्‍नी भी बीमार पड़ गई। लगातार बीमार रहने से उसकी सेहत दिन-प्रतिदिन बिगड़ती चली गई। अंत में उसने खाट पकड़ ली। आपसपास के सभी वैद्य और हकीम हार गए। वे उसकी बीमारी का इलाज न कर सके।

यथानाम तथा गुण, निर्मुक्‍ता भी एक सामान्‍य स्‍त्री थी। वह कोई देवी न थी। मानवीय दुर्बलताएँ उसके अंदर भी थीं। वह भी लोभ के वषीभूत हो चुकी थी। वह अपने इकलौते मासूम नौनिहाल के लिए छटपटाकर रह गई। उसे ऐसी विचित्र स्‍थिति में देखकर यमदेव भी उससे शर्माने लगे। मौत उसे अपने आगोश में लेने को हरगिज तैयार न थी। बीमार होने पर भी उसके प्राण निकलने को कतई तैयार न थे। हालांकि दर्द और पीड़ा से तड़पती हुई हालत में वह जल्‍दी से जल्‍दी अपनी मौत आने की प्रबल इच्‍छा कर रही थी। तब उसने चिरंजीव के पहले पुत्र निर्जीव को अपने पास बुलवाया और उससे धीरे से बोली- बेटा निर्जीव! आज तुम मुझे यह वचन दो कि मेरे मरने के बाद तुम यहाँ की किसी भी जमीन-जायदाद में अपना हिस्‍सा नहीं माँगोगे।

यह सुनकर बेचारा निर्जीव एकदम ठकुआ गया। उसकी समझ में न आ रहा था कि क्‍या करुँ और क्‍या न करुँ। फिर वह सोचने लगा-लालच भी कैसी बला है कि यह मरते समय भी माया-मोह से मुक्‍त नहीं हो पा रही है। आज यह मुझे कैसे अजीबोगरीब धर्म-संकट में डाल रही है। अगर इस समय इसे यह वचन दे दूँ तो मेरे हक में हरगिज अच्‍छा न होगा और यदि ऐसा वचन नहीं देता हूँ तो लोग ताने मारते रहेंगे। मुझ पर नाहक ही जीवन भर के लिए एक बड़ा कलंक लग जाएगा। निर्जीव एक बार अपने पिता चिरंजीव के चेहरे की ओर देखता तो एक बार अपनी सौतेली मां की ओर।

फिर वह सोचने लगा-इससे मेरा जीना दूभर हो जाएगा। सब लोग यही कहेंगे कि इसने अपनी सौतेली मां को वचन न देकर उसे मार दिया। वह उधेड़बुन में पड़ा ही हुआ था कि तभी कुछ ग्रामीण बोले-अरे भइया निर्जीव! इस वक्‍त ज्‍यादा सोच-विचार मत करो। इसके प्राण अटके हुए हैं। तुम बाद में अपना हिस्‍सा ले लेना लेकिन इस समय इसके सामने हाँ कर दो। यह सुनते ही निर्जीव ने तपाक से कह दिया-ठीक है, ऐसा ही होगा। इतना सुनना था कि निर्मुक्‍ता के प्राण पखेरू उड़ गए। चिरंजीव को एक बार फिर विधुरता का मुँह देखना पड़ा। उन्‍हें पत्‍नीसुख जितना लिखा उतना ही मिला। दो-दो विवाह करके भी वह इस जग में अकेले ही रह गए।

समय का पहिया घूमता रहा और चिरंजीव के दोनों पुत्र बड़े हो गए। उनके जवान हो जाने के बाद रिश्‍तेदारों के दबाव डालने पर चिरंजीव को दानों पुत्रों के बीच जमीन-जायदाद का दो हिस्‍सों में बराबर बँटवारा करना पड़ा। निर्जीव को अपने दादा-दादी बाबू उदयराज और कुमुद की भी आधी जायदाद और खेतीबाड़ी मिल गई मगर उसके दुर्भाग्‍य ने उसे न छोड़ा। वह जानी दुश्मन की भाँति पंजे झाड़कर उसके पीछे पड़ी रही। यद्यपि बँटवारे के कुछ दिन बाद ही एक सुंदरी से उसका विवाह भी हो गया और शादी के बाद उसके दो पुत्र भी हुए परंतु मुफ्‍त में मिले हुए ननिहाल के धन ने मानो उसे तबाह और बर्बाद करने को ठान लिया था।

उसके घर का सारा यश धीरे-धीरे खत्‍म होने लगा। एक दिन तो दुर्भाग्‍य ने उसे इस तरह धर दबोच लिया कि वह छटपटाते ही रह गया लेकिन उसने उसे छोडने का नाम तक न लिया। उस दिन उसके घर में आटा न था। उसकी पत्‍नी मधु ने उससे कई बार कहा-गेहूँ पिसवाकर ले आई वरना आज रोटी न मिलेगी। वह सुनकर टालता रहा और गेहूँ पिसाने चक्‍की पर नहीं गया। वह बस, अभी-अभी करता रहा।

पुरुषों की अपेक्षा महिलाएँ कुछ कम सहनशील होती ही हैं निर्जीव की आनाकानी देखकर मधु के साहस ने जवाब दे दिया और वह एकदम आवेश में आ गई। मन संताप बढ़ते ही उसने आव देखा न ताव और अपने शरीर पर मिट्टी का तेल उड़ेलकर आग लगा ली। उसने अपने आपको आग के हवाले तो झोक दिया मगर अब दो बच्‍चों की देखभाल कौन करेगा यह सोचकर दुःखी हो गई। उसे अपने किए पर पश्चाताप होने लगा।

निंर्जीव ने किसी तरह उसकी आग बुझाई और उसे अस्‍पताल ले गया। वहाँ जाने पर जब इलाके के एस.डी.एम. ने वहाँ जाकर उसका बयान लिया तो उसने निर्जीव को साफ-साफ बचा दिया और बोली कि हुजूर! लापरवाहीवश अकस्‍मात ऐसा हो गया। मेरे जलने में मेरे पति का कोई हाथ नहीं है। यह बिल्‍कुल निर्दोश हैं। निर्जीव अपनी ओर से इस हादसे में तनिक भी दोषी न था इसलिए कुदरत ने उसे बख्श दिया वरना उसे नाहक ही जेल की हवा भी खानी पड़ती। वह बाल-बाल बच गया।

आज उस घर की सभी स्‍त्रियाँ दो वक्‍त की रोटी को तो मोहताज हैं ही वे पहनने के लिए एक वस्‍त्र को भी तरसती रहती हैं। यह सच है कि अपने परिश्रम की कमाई में बरकत होती है। किसी दूसरे का धन मनुष्य को गर्त में भी पहुँचा सकता है। दुर्भाग्‍य के सामने उदयराज के पुत्रों को ननिहाल की दौलत किसी भी तरह रास न आई। वह उनकी तबाही का एक बड़ा कारण बनकर रह गई।

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अर्जुन प्रसाद

वरिष्‍ठ अनुवादक

उत्‍तर मध्‍य रेलवे परियोजना इकाई

शिवाजी ब्रिज, नई दिल्‍ली-110001

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