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हास्य व्यंग्य ॥ अब कहाँ लाखों का सावन ॥ प्रदीप उपाध्याय


एक फिल्म बनी थी सावन को आने दो। जब यह फिल्म बनी थी तब तो मैंने विचार नहीं किया, पर अब मेरे जेहन में यह बात आती है कि सावन के आने का क्यों इंतज़ार किया जा रहा है. ठीक है , सावन को तो आना ही चाहिए, उसे आने से भला कौन रोक सकता है! इसी फिल्म में गीतकार गौहर कानपुरी ने एक गीत लिखा था –“तुम्हें गीतों में ढालूंगा, सावन को आने दो, अपना बना लूंगा, दिल में बसा लूंगा , सीने से लगा लूंगा, सावन को आने दो. ”लेकिन भाई मेरे, इन सब बातों के लिए सावन के आने का

इन्तजार क्यों! क्या किसी का मन बहला रहे हो . किसी जमाने में सावन की बात करना ठीक था , आज सावन का कौन इन्तजार करता है. अब तो बारहों मास बसंत है, बारहों मास सावन . आप हर समय गा सकते हो , गुनगुना सकते हो-मेरे नैना सावन भादों, फिर भी मेरा मन प्यासा.

किसी समय नायक इस  गीत के बोल  नायिका के श्रीमुख से अपने हिसाब से गवा सकता था-“सावन का महीना, पवन करे सोर,” लेकिन आज के शोर भरे माहौल में कहाँ तो सावन का इन्तजार और कहाँ सावन के सोर करने की बात. आज तो स्थिति यह है कि सावन हरे न भादों सूखे .

कभी नायिका यह गीत पानी में भीगते हुए गाती फिरती थी-“अरे, हाय-हाय ये मजबूरी, ये मौसम और ये दूरी, मुझे पल-पल है तड़पाये , तेरी दो टकिया दी नौकरी , वे मेरा लाखों का सावन जाए,”। गीतकार वर्मा मालिक के जमाने में इस गीत की सार्थकता रही होगी लेकिन आजकल भले ही नौकरी दो टकिया की हो, प्रियतमा के लिए सावन लाखों का नहीं हो सकता , उसके लिए तो प्रेमी की दो टके की नौकरी भी लाखों की होगी और लाखों का सावन दो टके का हो सकता है क्योंकि आजकल की नायिकाएं भी इतनी फुरसती नहीं होती कि वह सावन का इंतज़ार करें. आजकल तो लाखों के पैकेज का ज़माना है, दो टके की नौकरी वालों के लिए क्या तो सावन और क्या भादों. वह तो नून-तेल-मिर्च के चक्कर में अपनी जिन्दगी, किसी शायर के शब्दों में –“सुबह होती है, शाम होती है,जिन्दगी यूं हीं तमाम होती है”.

अब जब उसकी जिन्दगी रोटी –कपड़ा-मकान के चक्कर में कब पूरी हो जाती है, उसे ही पता नहीं चलता, वह तो मरघट में उसके लिए होने वाली शोकसभा में ही उसे पता चलता है कि उसके बारे में कहने के लिए उसकी उपलब्धियाँ गिनाने हेतु शब्द खोजे जा रहे हैं. यानी वह आम आदमी है और उसे कुछ क्षणों के लिए ख़ास बनाया जा रहा है. बहरहाल घुम-फिरकर बात वही आम आदमी पर ही आकर टिक गई.

आम आदमी सावन भादों का इन्तजार नहीं करता , वह तो मानसून के आने का और अपनी तैयारियों का इन्तजार करता है. अपने घर की छत को टपकने से कैसे बचाया जाए, घर तक पहुँचने का रास्ता कैसे ठीक किया जाए, घर के अन्दर पानी न घुसे , इस संकट से कैसे निजात पाई जाए. यह स्थिति प्रेमी-प्रेमिका दोनों की ही हो सकती है..हाँ यह बात अलग है कि जो बाप कमाई पर चल रहें हैं, उनके लिए नौकरी दो टकिया की हो सकती है और सावन लाखों का.

खैर, इन सब बातों को छोड़ें, अब आषढ़ विदा हो गया है, श्रावण मास आ गया है , बागीचों में झूले तन जायेंगे, भोले बाबा के मंदिर में पुजारियों की पौ बारह हो जाएगी , प्रेमी –प्रेमिकाओं के मिलने के अवसर उज्जवल हो जायेंगे. स्कूल-कॉलेज के अलावा मंदिर का एक्स्ट्रा ठिकाना/बेनिफिट भी. वैसे भी कोई कहाँ मानने वाला , किसी का किसी पर जोर भी नहीं रहा, तब सबको अपने-अपने हिसाब का गीत गाने दिया जाए, चाहे वह दो टके की बात करे या लाख टके की.

डॉ प्रदीप उपाध्याय, १६,अम्बिका भवन, बाबुजी की कोठी, उपाध्याय नगर, मेंढकी रोड़, देवास, म.प्र.
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