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शब्द संधान // गोबरधन बनाम गोवर्धन // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

गोधन, गजधन, वाजिधन और रतनधन खान

जब आवे संतोष धन सब धन धूरि समान

लेकिन आज के ज़माने में संतोष-धन भला किसके पास है। दिल मांगे मोर। तो संतोष धन को तो अलग ही कर दिया जाए तो अच्छा है। अब शेष जो धन बचे उनमें प्रथम है – गोधन। हम उसी की बात करेंगे। गाय हमें दूध दही मख्खन मट्ठा आदि, मूल्यवान वस्तुएं प्रदान करती है। इतना ही नहीं गाय का मल और मूत्र भी बहुत उपयोगी माना गया है।

गोबर आखिर ठहरा तो गाय का मल ही। और क्या मल का भी कोई सम्मान होता है ? वह तो बस फेंकने की चीज़ है। लेकिन कुछ को गोबर फेंकने का ढंग भी नहीं आता। ऐसे निकम्मे लोगों से क्या उम्मीद रखी जा सकती है ? बच्चों को अक्सर डांट लगाई जाती है, पढो-लिखोगे नहीं तो क्या गोबर फेंकोगे? यूं तो गणेश हिन्दुओं के बड़े मान्य देवता हैं किन्तु उनका रूप बड़ा बेडौल है। बेचारे सीधे-सादे भी हैं। शायद इसीलिए एक बेडौल और मूर्ख आदमी को गोबर-गणेश कह दिया जाता है। आदमी जो किसी मसरफ का नहीं होता, भी ‘गोबर का चोथ’ होता है। बेवकूफ, कूढमगज़ लोगों से पूछा जाता है, तुम्हारे दिमाग में गोबर भरा है क्या ?

इतनी दुत्कार के बावजूद भी गोबर की महत्ता कम नहीं है। उसे ‘गोबर-धन’ कहा गया है। इसका अंदाज़ हम इसी से लगा सकते हैं कि कम से कम तीज-त्योहारों के दिन मांगलिक कार्यों में भारत में आज भी हम घर-द्वार और पूजा के स्थान को साफ़ करके, लीपने के लिए गोबर का ही इस्तेमाल करते हैं। किसी ज़माने में गोबर के कंडे बनते थे। गाँवों में आज भी बनते हैं और उनकी आंच पर भोजन पकाया जाता था। कंडों की मंद-मंद आंच में दूध बहुत अच्छा, धीरे धीरे, पकता था। बैंगन का भरता बनाने के लिए, बैगन ऊपलों में ही भूना जाता था। आलू भूनने के लिए भी कंडे की आग की ही दरकार रहती थी। लेकिन अब वे दिन केवल याद किए जा सकते हैं।

गोबर की उपलब्धता, ख़ास तौर पर शहरों में अब लगभग नहीं के बराबर है लेकिन हमारी मानसिकता में गोबर आज भी एक बड़ी पवित्र वस्तु है। मांगलिक कार्यों में लीपने पोतने के लिए गोबर की मांग आज भी बर- करार है। अर्थशास्त्र का नियम है, जो चीज़ दुर्लभ हो जाती है, उसकी कीमत बढ़ जाती है। इसी का लाभ उठा कर, आपको अब ताज्जुब नहीं करना चाहिए कि ‘गोक्रान्ति डाट ऑर्ग’ जैसी कंपनियों ने घर बैठे सुन्दर पैक में ई-मेल द्वारा मांग के अनुसार गोबर की ऑन लाइन बिक्री का काम शुरू कर दिया है। यह धन कमाने का एक ज़रिया हो गया है। गोबर से कमाया गया धन ‘गोबर-धन’ ही तो कहलाएगा। गोबर की उपयोगिता भी अब दिन ब दिन बढ़ती ही जा रही है। वैज्ञानिक गोबर गैस बनाने में जुटे हैं। रासायनिक उर्वरकों की जगह लाभप्रद गोबर खाद बनाने के प्रयत्न हो रहे हैं। यहाँ तक कि कलाकार आज गोबर से कला कृतियाँ तक बना रहे हैं और धन कमा रहे हैं। गोबर लक्ष्मी-स्वरूप हो गया है। हमने आरम्भ में जिस संतोष धन की बात की थी उसमें अन्य गिनाए हुए धनों में प्रथम गोधन था और, ज़ाहिर है इस गोधन में ‘गोबरधन’ भी सम्मिलित है। बस ज़रुरत केवल इस बात की है कि हम गोबरधन को कहीं गोवर्धन से कन्फ्यूज़ न कर बैठें जैसा कि प्राय: कर लिया जाता है।

अनेक कृष्ण-कथाओं में से एक यह भी है कि कृष्ण ने ब्रजवासियों को समझाया कि वे इंद्र ही पूजा बेकार ही करते हैं। इंद्र का काम तो बस पानी बरसाने का है सो वे बरसाते रहेंगे। इससे तो गोवर्धन की उपासना की जाए तो ज्यादह अच्छा है। गोवर्धन पर्वत पर घास खाकर हमारी गायें पलती हैं, उनकी संवृद्धि होती है। कृष्ण का कहना मान कर ब्रजवासियों ने इंद्र की पूजा करना बंद कर दिया। गोवर्धन पर्वत पूजने लगे। इंद्र को यह बात खल गई। नाराज़ होकर इंद्र ने ब्रज-भूमि पर बेतहाशा वर्षा कर डाली। हर जगह त्राहि त्राहि मच गई। तब कृष्ण ने अपनी छंगुली पर गोवर्धन उठा लिया और उसके नीचे ब्रजवासियों को शरण दी।

पौराणिक कथाएँ तो कथाएँ ठहरीं। वे अधिकतर यथार्थ के धरातल पर खरी नहीं उतरतीं। उनमें कोई न कोई सांकेतिक अर्थ छिपा होता है। गोवर्धन की सांकेतिक व्याख्या हम कुछ इस प्रकार कर सकते हैं – कृष्ण के समय में भोजन के लिए हमें पौष्टिक पदार्थ – दूध, दही, मक्खन, मट्ठा – आदि गायों से ही मिलते थे। अत: गायों की संवृद्धि और रक्षा के लिए वे चिंतित रहते थे। ये काम बहुत कठिन नहीं था। इसे बहुत आसानी से उठाया जा सकता था। बस हमें अनावश्यक कामों को, जैसे इंद्र की पूजा पाठ आदि को, छोड़ कर गायों की तरफ ध्यान देने भर की ज़रूरत है। हमें एकाग्र होकर गायों की रक्षा और संवृद्धि का काम, “गो-वर्धन” का काम, उठा लेना है। इसमें कोई कठिनाई नहीं है। गोवर्धन के इस काम को यदि सच्ची लगन हो तो हम अपनी छिंगुली पर उठा सकते हैं। गोवर्धन पर्वत नहीं, गोवेर्धन के काम को हमें उठाना है। बस ईमानदारी से एक बार निर्णय भर लेना है। सब बाधाएं अपने आप रास्ते से हट जाएंगीं।

आज हमारे भारत में गायों के वर्धन (गोवर्धन) के लिए फिर से चेतना जगाई जा रही है। हम गोवर्धन करें गोबरधन तो हमें मिल ही जाएगा।

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डा. सुरेन्द्र वर्मा (मो. ९६२१२२२७७८)

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड / इलाहाबाद -२११००१

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गोवर्धन से गोबर धन की प्राप्ति वाह बहुत बढ़िया, बहुत अच्छा लगा सामयिक तो है ही।

बहुत बढ़िया।गोबर धन बनाम गोवर्धन।सार्थक रचना

बहुत बढ़िया।गोबरधन बनाम गोधन ,समकालीन परिस्थिति पर खरी।

बहुत सूंदर और सही रचना

गोवर्धन पर्वत और गौवर्धन को एक करना नयी बात।उपयोगी रचना।

शब्दस्वामी डो.सुरेन्द्रजी ने बहुत ही बढ़िया लेख प्रस्तुत किया है। बधाई हो।

गोबर-धन पर शानदार व्यंग्यात्मक विश्लेषण.

गोबर धन शब्द की कई प्रकार से सुंदर व्यंग्यात्मक व्याख्या ।

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