शुक्रवार, 21 जुलाई 2017

आलेख // फूल, खादी का रूमाल और पुस्तकें // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

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फूलों की बड़ी पूछ है। जिसे देखिए फूलों पर आसक्त है। फूल लगा देखा नहीं तोड़ने को जी चाहता है। उनमें महक और रंग है। दूर से ही देख, सूँघ लिया जाता है। पास जाएं तो उनकी कोमल पंखुड़ियां रिझाने लगती हैं। फूलों का आकर्षण हमें मोह लेता है। स्त्रियाँ अपने जुड़े में फूल लगाती हैं। पुरुष अपने बटन-होल में उसे खोंस लेते हैं। कोई दुष्ट ही होगा जो उन्हें पैरों से कुचल दे। फूलों से गले का हार बनता है। फूलों के गुच्छे से मेहमान का स्वागत होता है। फूलों की खूबसूरती ही उनके लिए अभिशाप है। अक्सर तो बेचारे पूरा खिल भी नहीं पाते, कलियाँ ही तोड़ ली जाती हैं। यादगार के लिए किसी किसी फूल को तो किताबों के बीच दबा कर रख लिया जाता है। वहीं दबे दबे वह दम तोड़ देता है।

फूल के सामने खादी के रूमाल की भला क्या बिसात ! हाँ गांधी जी के ज़माने में पहली बार और शायद आखिरी बार, खादी का रुतबा ज़रूर बढ़ गया था। लोग खादी कातते थे, खादी पहनते थे, खादी उपहार में देते थे। खादी का कोई वस्त्र देकर, वस्त्र नहीं तो खादी का एक रूमाल ही देकर, मेहमान का स्वागत करते थे। लेकिन खादी भले ही स्वतंत्रता, समानता और भ्रातृत्व जैसे मूल्यों की वाहक रही हो, है तो आखिर खुरदरी ही। धीरे धीरे वह चुभने लगी। उसका अवमूल्यन होने लगा। वह व्यंग्य की परिभाषा बन गई। व्यंग्य सम्राट हरिशंकर परसाई ने सबसे पहले व्यंग्य को खादी की सहायता से परिभाषित करते हुए कहा था – व्यंग्य बेशक खादी की तरह चुभता तो है पर गरमी देता है। व्यंग्य जीत गया। खादी हार गई|

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कितने लोग हैं जिन्हें पुस्तकों से प्यार है ? गिने-चुने। विद्यार्थी अपने पाठ्यक्रम की पुस्तकें पढ़ लें वही बहुत है। सिर्फ पढ़ने की खातिर भला किताब कौन पढ़ता है ? बिरले ही होंगे। अमीर लोग दूसरों पर बौद्धिक होने का अपना रोब झाड़ने के लिए बड़े बड़े लेखकों की पुस्तकें अपनी अलमारियों में सजावट के लिए रखते हैं। पुस्तकें या सजाई जाती हैं या रद्दी में बेंच दी जाती हैं। एक समय था जब कुछ पुस्तक-प्रेमी पुस्तकों को अपने मित्रों को उपहार स्वरूप भेंट किया करते थे। शादी विवाह में भी उन्हें अक्सर भेंट किया जाता था। लेकिन जैसे जैसे हमारे समाज में पैसे का वर्चस्व बढ़ा है उपहार स्वरूप किताबों को भेंट करना समाप्त सा ही हो गया है। भेट के लिए किताबों की हैसियत अब फर्श पर आ गई है।

स्कूल के दिनों में मेरी गणित बहुत कमज़ोर थी। एलसीएम और जीसीएफ के सवाल कभी समझ ही में न आए। जीसीएफ – यानी ‘ग्रेटेस्ट कॉमन फेक्टर’। क्या आप बता सकते हैं कि फूल, खादी का रूमाल और पुस्तक - इन तीनों का जीसीएफ क्या है ? वो कौन सी एक बड़ी बात है जो इन तीनों में समान है ? बात गणित की नहीं है, राजनीति और समाज शास्त्र की है। ऊपरी तौर से तो ऐसा कोई समान तत्व नज़र नहीं आता। लेकिन ज़रा गहराई से देखें तो पता चलता है कि तीनों में एक बात जो समान है वह यह है कि ये तीनों ही उपहार की वस्तुएं हैं और रही हैं जिन्हें किसी के भी स्वागत हेतु भेंट किया जाता/ जा सकता है।

इस सन्दर्भ में फूलों का रुतबा आज भी सबसे अधिक है। हम आज भी अधिकतर फूलों से ही लोगों का स्वागत करते हैं, अभिनन्दन करते हैं, फूलों की माला और उन्हें पुष्प गुच्छ भेंट करते हैं। खादी के रूमाल की यह हैसियत कभी नहीं रही। इसकी पूछ तो बस गांधी जी के समय ही थी। इस मामले में तो खादी का रूमाल आज बेकवर्ड क्लास में आ गया है। किताबें अलबत्ता कभी कभी उपहार स्वरूप भेंट की तो जाती हैं, लेकिन भेंट करने वाला हमेशा एक अहसास ए कमतर से ग्रस्त हो जाता है।

क्या आप इस भेदभाव को हमेशा के लिए जारी रखना चाहेंगे ? हमारे प्रधान मंत्री तो यह कतई नहीं चाहते। वे फूलों को भी, सुन्दरता के कारण जो उनकी दुर्दशा हो रही है, उससे बचाना चाहते हैं और खादी के रूमाल को भी वही सम्मान देना चाहते हैं जो कभी भारत के स्वतंत्रता-संग्राम के समय उसका रहा था। वे पुस्तक प्रेमी होने के नाते पुस्तकों का उपहार भी अनदेखा नहीं कर पाते हैं। अत: उनका आदेशात्मक निवेदन है कि उनका स्वागत ‘बुके’ से न किया जाए ‘बुक’ से किया जाए। फूलों को रौंधा न जाए और पुस्तकों का सम्मान किया जाए। वैसे स्वागत और सम्मान के लिए तो खादी का एक रूमाल ही भेंट में काफी है जो हमें स्वतंत्रता, समानता, और भ्रातृत्व के मूल्यों की कद्र का अहसास कराता है। उसी को भेंट कर स्वागत किया जा सकता है। करना भी चाहिए। लेकिन हमारी भी जिद तो देखिए। इतनी मशक्कत के बाद भी प्रधान मंत्री जी के एक मित्र ने उनका अभिनन्दन एक ‘बुके’ से ही किया। बेचारे क्या करते ? उन्हें उसे विनम्रता-पूर्वक स्वीकार करना ही पडा ! लेकिन क्या हम अपनी जिद पर काबू नहीं पा सकते ?


- डा. सुरेन्द्र वर्मा ( मो. ९६२१२२७७८)

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड. इलाहाबाद – २११००१

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