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हास्य-व्यंग्य // फेसबुक टैगिंग या फिर डिजिटल रैगिंग // अमित शर्मा

 शिब्दास सेन गुप्ता की कलाकृति

सभी राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय समस्याओ के बीच फेसबुक पर टैगिंग की समस्या भी बिना किसी मीडिया कवरेज के विकराल रूप धारण करती जा रही है। ना तो फेसबुक और ना ही भारत सरकार इस गंभीर समस्या की रोकथाम के लिए गंभीर दिखने का अभिनय करती नज़र आ रही है। रैगिंग को रोकने के लिए कड़े कानून बनाए गए है लेकिन टैगिंग की प्रताड़ना रोकने के लिए मजाक भी ठीक से नहीं बन पा रहे हैं।

पिछले साल जब प्रधानमंत्री मोदी ने फेसबुक के संस्थापक ज़ुकरबर्ग से मुलाकात की थी तो आशा की जा रही थी इस समस्या को वो अपने कद की तरह जोर-शोर से उठाएंगे लेकिन उनके एजेंडे में टैगिंग की समस्या राम-मंदिर मुद्दे की तरह ही नदारद मिली जो भारत सरकार की विदेश नीति और कूटनीति दोनों पर चार चाँद लगाने के बजाय प्रश्नचिन्ह लगाती है।

फेसबुक को अगर आभासी दुनिया माना जाता है तो फेसबुक पर टैग करने वाले गिरोह को इस दुनिया की शांति भंग करने वाले असामाजिक तत्व मान लेने में कोई मानहानि नहीं है। दरअसल फेसबुक पर टैग करने वाले "एकला चालो रे" की विचारधारा के घोर विरोधी है। वे हर कार्य को समूह में  करके सामूहिकता का नेतृत्व कर इस आभासी दुनिया में असामाजिकता को वायरल करना चाहते हैं। फेसबुक ने लोगों को इतना एकाकी बना दिया है कि वे अपने आसपास की दुनिया से बेखबर रह कर केवल अपने न्यूज़फिड से खबरे लेते है। इसी एकाकीपन को टैग गिरोह अपनी "टैगान्धता" से भंग करता है।

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मौसी की ननद के साले की शादी हो या बुआ की चाची के भतीजे का मुंडन या फिर और कोई लाइक/कमेंट टपकातुर प्रयोजन, टैग गिरोह हर मौके पर तब तक हैप्पी और प्राऊड़ नहीं "फील" पाता है जब तक अपनी टाइमलाइन पर 15-20 फ़ोटो पोस्ट कर थोक के भाव में लोगों को टांग ना दे, मतलब टैग ना कर दे। किसी पोस्ट में टैगीत व्यक्ति ठीक उसी तरह से महसूस करता है जैसे किसी हेंगर में टंगा हुआ शर्ट। टैग की हुई पोस्ट पर आने वाला हर लाइक और कमेंट आपको ऐसे चिढ़ाते है मानों आपके ज़ख्मों पर आयोडीन युक्त नमक छिड़क रहे हों। टैग कर करके टैग माफिया आपकी वाल की हालत गुप्तरोग के निवारण के विज्ञापनों से सजी सार्वजनिक दीवार की तरह कर देते हैं।

उस समय स्थिति दयनीय रूप से हास्यास्पद हो जाती जब आप अपनी 507 वी बार फ़िल्टर की गई प्रोफाइल पिक अपलोड करके पथरीली आँखों से लाइक के इंतज़ार में बैठे हो और नोटिफिकेशन आते ही नंगे पैर दौड़कर जाने पर, आपको पता चले कि वो तो आपको टैग किए गए फ़ोटो पर कमेंट की नोटिफिकेशन थी। टैग रिमूव करने पर आप उसी तरह से राहत महसूस करते हैं जैसा तीव्र लघुशंका के निवारण पर करते हैं।

डिजिटल आपाधापी के इस घोर कलयुग में भी इंसानियत समाप्त नहीं हुई है, अभी भी कई लोग टैग की गई सभी पोस्ट अपनी वाल पर दिखने के लिए allow कर देते हैं। दया और करुणा का एक्स्ट्रा रिचार्ज करवा कर धरती पर डिलीवर किये गए लोग तो टैग किए जाने पर इतने भावविभोर हो जाते हैं कि टैग किये जाने को ही अपना सम्मान समारोह समझ लेते हैं और कमेंट बॉक्स में "थैंक्स फॉर द टैग" लिखकर टैगीत होने के ऋण से उऋण होते हैं।

पहले के ज़माने में रिश्ते प्रेम के कच्चे धागे से बंधे होते थे लेकिन समय ने करवट के साथ जब जम्हाई भी ली तो रिश्ते धागों की गांठे खोलकर डिजिटल होकर फेसबुक की वाल्स पर टांग दिए गए।

टैग गिरोह उस  किराएदार की तरह है जो आपकी वाल पर अनाधिकृत रूप से कब्ज़ा कर लेते हैं लेकिन कभी आपकी पोस्ट्स पर लाइक-कमेंट्स रूपी किराया नहीं देते। चाहे कितना भी मना कर दो कुछ लोग पैग लगाकर फिर टैग करना शुरू कर देते हैं। परिवार और करीबी मित्रों द्वारा दिए गए टैग ना तो उगलते बनता है और ना ही निगलते। उसे केवल दिखावे के लिए अपनी वाल पर दिखाकर नोटिफिकेशन शांत कर रिश्ते निभाए जा सकते हैं।

ईसा मसीह को जब सूली पर लटकाया गया था तब उनके मुँह से निकला था, हे प्रभु, "इन्हें माफ़ करना ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं।" लेकिन जब किसी टैगान्ध व्यक्ति द्वारा मुझे उसकी पोस्ट में लटकाया जाता है मतलब टैग किया जाता है तो मेरे मुँह के साथ साथ हर रोम कूप से यही निकलता है, "हे प्रभु इन्हें कभी माफ़ मत करना, ये जानते है कि ये क्या कर रहे हैं।"

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