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शब्द सन्धान // खुश है ज़माना // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

विपिन सिंह राजपूत की कलाकृति

खुश है ज़माना, आज पहली तारीख है। पहली तारीख को वेतन मिलता है, आप अपनी आवश्यकता की चीजें खरीद सकते हैं, थोड़ी बहुत विलासता के लिए भी छूट ले सकते हैं। खुश हो जाते हैं। एक औसत वेतन- भोगी के लिए इतना ही बहुत है।

खुश होना और खुश रहना सबका अधिकार है। एक दीन-हीन व्यक्ति को भी खुश होने और खुश रहने का उतना ही अधिकार है जितना एक संपन्न व्यक्ति को है। ऐसा सोचना कि खुशी सिर्फ पैसे से ही खरीदी जा सकती है, शायद गलत होगा। बड़े बड़े दार्शनिकों ने, चितकों ने, खुशी को परिभाषित करने के लिए काफी मगज़पच्ची की है। लेकिन आज तक कोई, खुशी क्या है, इसका संतोषजनक उत्तर नहीं खोज पाया। और मज़े की बात यह है कि न जानते हुए भी (कि खुशी क्या है) लोग खुश रहते हैं। उन्हें कभी यह ज़रूरत ही महसूस नहीं हुई कि वे खुशी की विवेचना करें। उन्होंने मानों यह काम चिंतकों पर छोड़ दिया है, सोचो और खुश रहो।

खुशी पाने के न जाने कितने सूत्र लोगों ने बताए हैं ! यदि संख्या पर ही ध्यान दें तो कोई खुश रहने के पांच मूल मन्त्र बताता है तो कोई आठ अचूक सूत्र। कोई दस नुस्खे बताता है तो कोई पच्चीस तरीके। लेकिन इस सन्दर्भ में सहमति का सदैव अभाव ही रहा। हर कोई अपनी अपनी तरह से ज़िंदगी जीता है और अपनी अपनी तरह से खुश रहता है।

प्रसन्नता, अच्छाई, नेकी, सम्पन्नता, शुभत्व, मिठास, सुन्दरता आदि सभी एक ही परिवार के शब्द हैं और ये सभी खुश और खुशी में सार्थक रूप से समाए हैं। खुश दिल, खुश दिली, खुश मिज़ाज में ‘खुश’, ज़ाहिर है, ‘प्रसन्नता’ का सूचक है। खुश दिल कहें या प्रसन्न-चित्त बात एक ही है। ‘मोगाम्बो खुश हुआ !’

इसी प्रकार, खुशअंजाम, खुशनसीब, खुश-अदा, खुश-कलम, खुश-किस्मत, खुश-बू, खुशफहमी जैसे शब्दों में खुश का अर्थ ‘अच्छा’ हो जाता है। खुश-अंजाम यदि अच्छा परिणाम है तो खुश-फहमी अच्छी-समझ है। खुश- नसीब और खुश-किस्मत अच्छा भाग्य है और खुश-बू अच्छी गंध है, इत्यादि।

खुश में ‘नेकी’ भी निहित है। खुश-अमल और खुश-सीरत नेक आचरण है। इसी तरह खुश-नियत नेक नियति है।

खुश में ‘शुभ’ का भाव भी संलग्न है। शुभ आगमन को हम खुशामदेद (खुशामदीद) कहते हैं तो शुभ समाचार को खुशखबरी या खुशखबर कहते हैं। किसी के घर आने पर यदि कोई शुभ कार्य संपन्न हो जाता है तो उसका आना ‘खुश-कदम’ हो जाता है।

खुश में ‘मधुरता’ है। मिठास है। खुश-कलाम या खुश-कलामी मीठे कथन हैं। खुश-गुलू मीठा, मधुर कंठ है। खुश-ज़बां मीठी ज़बान है, तो मीठी आवाज़, खुश-आवाज़ है।

खुश में ‘सौन्दर्य’ है, खुशनुमाई है। खुश-रू सुन्दर रूप है, सुरूप है।

खुशहाली ‘सम्पन्नता’ है। जो समृद्ध है, खुशहाल है।

खुश उर्दू का शब्द है जो हिन्दुस्तानी ज़बान में फारसी से आया है। लेकिन अब हिन्दी में रच बस गया है| अनेक ऐसे स्वतन्त्र शब्द भी हैं जिनकी व्युत्पत्ति ‘खुश’ से हुई है। ‘खुशामद’ उनमें से एक है। खुशामद चापलूसी है, चाटुकारिता है। मिथ्या प्रशंसा है, जी-हुजूरी है, ठकुर-सुहाती है। ठाकुर या नेता को वही कहो जो उसे सुहाए, खुश करे, -यही खुशामद है। प्रसिद्ध हास्य कवि गोपाल प्रसाद व्यास अपने एक व्यंग्य आलेख में कहते हैं, “मजाक नहीं, खुशामद भी एक कला है और कमबख्त ऐसी कला है कि सारी दुनिया इसमें माहिर होना चाहती है।” खुशामद हमेशा से ही एक बड़े काम की चीज़ रही है। शार्टकट से आगे बढ़ने के लिए और अपना काम निकालने के लिए इससे बढकर कोई त्वरित उपाय या रास्ता नहीं है। लेकिन सावधान। रमानाथ त्यागी कहते हैं,

व्यर्थ है करना खुशामद रास्तों की

काम अपने पाँव ही आते सफ़र में

-डा. सुरेन्द्र वर्मा (मो. ९६२१२२२७७८)

१०, एच आई जी, / १, सर्कुलर रोड.

इलाहाबाद – २११००१

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