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ज़िंदगी // कविताएँ // संजीव ठाकुर

1

बिजली के तारों पर

ऊंचे अटकी, फड़फड़ाती

फटी पतंग होती है

ज़िंदगी

शीत,घाम ,मेह सहती

खत्म हो जाती है ।


2

चक्रवर्ती गणित का

सबसे कठिन सवाल

होती है ज़िंदगी

हल करने में ही

निकल जाती है

पूरी ज़िंदगी ।


3

आकाश में

घर बनाने की कोशिश

ही तो है यह ज़िंदगी

मुर्दा सम्बन्धों की ईंटों को

ढोकर

वहाँ तक पहुँचाना

आसान भी तो नहीं ?


4

बिना दीवारों वाला घर

नफरत की आँधी में

भूल न जाए अपनी चौहद्दी

तो इसे

ज़िंदगी समझ लीजिए ।


5

हवा को सोखने की ताकत

बादल को पी जाने का जज्बा

बिजली को मुट्ठी में बंद करने की कूबत

पछाड़ सकती है

ज़िंदगी के दैत्य को ।


6

टूटी पड़ी है ज़िंदगी

खंडहर के किसी कोने में

कौन इसे उठाएगा ?

श्मशान पहुँचाएगा ?


7

ज़िंदगी की कहानी से

कविता निकल गई देखो ,

आलोचक खड़ा है पास

लुकाठी लेकर

तुम भी चढ़ाओ शूल पाठकगण

इसकी मज़ार पर !


8

मिटाना होता आसान ,

मिटा देता

रबर से

पेंसिल के निशान की तरह

ज़िंदगी !


9

शायद किसी मोड़ पर

मिल जाए

मेरी खोई हुई ज़िंदगी

चिपका हूँ इसीलिए

तुमसे ,

ऐ ! ज़िंदगी ।


10

कुत्ते की दुम होती है

ज़िंदगी

सीधी नहीं होती

हिलती –डुलती रहती है

फिर भी ।


11

एक नाव

अचानक

फँस गई हो दलदल में

कह सकते हैं इसे परिभाषा

ज़िंदगी की !


12

जुआ है ज़िंदगी

खेलना नहीं आया जिसे

हार जाएगा

युधिष्ठिर की तरह !

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