गुरुवार, 27 जुलाई 2017

माह की कविताएँ

आनंद पांचाल की कलाकृति

सुशील शर्मा


चंद्रशेखर आज़ाद (जन्मतिथि पर विशेष )

तुम आज़ाद थे आज़ाद हो आज़ाद रहोगे ।
भारत की जवानियों के तुम खून में बहोगे ।
मौत से आँखें मिला कर वह बात करता था।
अंगदी व्यक्तित्व पर जमाना नाज करता था।
असहयोग आंदोलन का वो प्रणेता था।
भारत की स्वतंत्रता का वो चितेरा था।
बापू से था प्रभावित पर रास्ता अलग था।
खौलता था खून अहिंसा से वो विलग था।
बचपन के पंद्रह कोड़े जो उसको पड़े थे।
आज उसके खून में वो शौर्य बन खड़े थे।
आज़ाद के तन पर कोड़े तड़ातड़ पड़ रहे थे।
जय भारती का उद्घोष चंदशेखर कर रहे थे।
हर एक घाव कोड़े का देता माँ भारती की दुहाई।
रक्तरंजित तन पर बलिदान की मेहँदी रचाई।
अहिंसा का पाठ उसको कभी न भाया।
खून के ही पथ पर उसने सुकून पाया।
उसकी शिराओं में दमकती थी जोशो जवानी।
युद्ध के भीषण कहर से लिखी थी उसने कहानी।
  उसकी फितरत में नहीं थी प्रार्थनाएं।
उसके शब्दकोशों में नहीं थीं याचनाएं।
नहीं मंजूर था उसको गिड़गिड़ाना।
और शत्रु के पैर के नीचे तड़फड़ाना।
मन्त्र बलिदान का उसने चुना था।
गर्व से मस्तक उसका तना था।
क्रांति की ललकार को उसने आवाज़ दी थी।
स्वतंत्रता की आग को परवाज़ दी थी।
माँ भारती की लाज को वो पहरेदार था ।
भारत की स्वतंत्रता का वो पैरोकार था।
अल्फर्ड पार्क में लगी थी आज़ाद की मीटिंग।
किसी मुखबिर ने कर दी देश से चीटिंग।
नॉट बाबर ने घेरा और पूछा कौन हो तुम।
गोली से दिया जबाब तुम्हारे बाप हैं हम।
सभी साथियों को भगा कर रह गया अकेला।
उस तरफ लगा था बन्दूक लिए शत्रुओं का मेला।
सिर्फ एक गोली बची थी भाग किसने था मेटा ।
आखरी दम तक लड़ा वो माँ भारती का था बेटा।
रखी कनपटी पर पिस्तौल और दाग दी गोली।
माँ भारती के लाल ने खेल ली खुद खून की होली।
तुम आज़ाद थे आज़ाद हो आज़ाद रहोगे ।
भारत की जवानियों के तुम खून में बहोगे ।

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(गुरुपूर्णिमा पर विशेष)
गुरु पर दोहे

गुरु अमृत है जगत में ,बांकी सब विषबेल
सतगुरु संत अनंत हैं ,प्रभु से करदें मेल।

गीली मिट्टी अनगढ़ी ,हम को गुरुवर जान।
ज्ञान प्रकाशित कीजिये ,आप समर्थ बलवान।

गुरु बिन ज्ञान न होत है ,गुरु बिन दिशा अजान।
गुरु बिन इन्द्रिय न सधें ,गुरु बिन बढे न शान।

गुरु मन में बैठत सदा ,गुरु है भ्रम का काल।
गुरु अवगुण को मेटता,मिटें सभी भ्रम जाल।

शिष्य वही जो सीख ले ,गुरु का ज्ञान अगाध।
भक्ति भाव मन में रखे ,चलता चले अबाध।

गुरु ग्रंथन का सार है ,गुरु है प्रभु का नाम।
गुरु अध्यात्म की ज्योति है ,गुरु हैं चरों धाम।

अन्धकार से खींच कर मन में भरे प्रकाश।
ज्यों मैली चुनरी धुले ,सोहत तन के पास।

गुरु की कृपा हो शिष्य पर ,पूरन हों सब काम
गुरु की सेवा करत ही ,मिले ब्रह्म का धाम।

गुरु अनंत तक जानिए ,गुरु की ओर न छोर।
गुरु प्रकाश का पुंज है ,निशा बाद का भोर।

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गुरुपूर्णिमा पर
हाइकु-100


गुरु की कृपा
अनंत आशीर्वाद
जीवन धन।

गुरु का ज्ञान
अनमोल संपत्ति
कभी न घटे।

गुरु का मान
जीवन से अमूल्य
शिष्य का धर्म।

जीवन ज्योति
गुरु से प्रकाशित
चमके सदा।

तमस दूर
जगमग जीवन
गुरु की कृपा।

शिष्य की शान
गुरुवर महान
ब्रह्म समान

गुरु वरण
तेजोमय संस्कार
आत्म प्रदीप्त।

गुरु शरण
आत्मोन्नति चरित्र
ऊंचा व्यक्तित्व।

शिष्य संस्कार
मूलाधार है गुरु
पुण्य उदय।

गुरु का स्पर्श
चरित्र उत्कृष्टता
शिष्य समग्र।

प्रखर बुद्धि
गुरु मार्गदर्शन
जिज्ञासा शांत।

गुरु संयुक्त
सा विद्या या विमुक्त
अहम रिक्त।


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रुचि प जैन


ख़्याल
 
हज़ूर इतनी सी खवाइश है  कि ख़्याल का भी ख़्याल रखना,
न शिकवा करना गिला करना ख़्याल में ही ख़्याल रखना।

जो न हो मुलाक़ात हक़ीक़त में ख़्याल में ही मुलाक़ात रखना,
वतन के लिए निकला है क़ाफ़िला ख़्याल में भी दुआ करना।

ज़ख़्म हो या बहती हो खूं की धारा ख़्याल में भी यह ख़्याल न करना,
इतना हसीन हो ख़्याल खुदा से उसे हक़ीक़त बनाने का ख़्याल करना।

ख़्याल ही ख़्याल में जो गुफ़्तगू हुई उसे ख़्याल में रखना,
वतन से वफ़ा का ख़्याल उस ख़्याल की तुम हिफ़ाज़त करना।

ग़म न करना ख़्याल में बस ख़ुशियों का ख़्याल करना,
गुमराह न हो ख़्याल इसका ख़्याल रखना।

अलविदा न कहा हमने यह ख़्याल करना,
रहेंगे साथ ख़्याल में यह ख़्याल रखना।

छोड़ जाते है अपनों को उनका तुम ख़्याल रखना,
सबकी मुस्कराहट के ख़्याल में अपनी मुस्कराहट का भी ख़्याल रखना।


                      रुचि प जैन
Email id ruchipjain@yahoo.com

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प्रदीप उपाध्याय

कभी था बरगद का पेड़ वहाँ
कभी था बरगद का पेड़ वहाँ
लगता जैसे काँपती सूरज की तपन
बच्चें-बुढ़े और युवाओंकी मण्डली
जमाये रहती थीं चौपाल वहाँ
सुबह हो या फिर शाम
और देर रात तक
जमे रहते थे लोग जहाँ
करते गपशप और वार्तालाप
कभी था बरगद का पेड़ वहाँ
जिसके नीचे मौसी की दुकान
चाय पीते खाते चने परमल
आते हैं याद वे दिन
समय के क्रूर हाथों
दे दी गई बरगद की बलि
और तन  गया वहाँ कांक्रीट का जंगल
अब नहीं वहां बरगद की छांव
सूरज करता अट्टहास वहाँ
कैसे   बचेंगे उसकी तपन से
आते हैं याद वे दिन जब
कभी था बरगद का पेड़ वहाँ।
छूट गये हैं कई संगी-साथी
बिछुड़ गये हैं अपने सारे
लगता है भला था अपना बचपन
और बेफिक्री की वह जिन्दगी
अब तो रह गई हैं यादे ही शेष
और हम भी रह जायेंगे यादों में
ठीक उस बरगद की तरह।।

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श्रद्धा मिश्रा


    *मछलियाँ*
मछलियाँ अनगिनत तैर रहीं है जल में
उसी एक जल में इधर से उधर घूमती हुई
दाने खाने में लगी हुई,
जैसे औरतें टहलती है एक ही घर मे,
दाने पानी के इंतजाम में लगी हुई।
एक औरत दूसरी लड़की को
औरत बनते ही दे देती है
वो सब ज्ञान जो उसने पाया है।
किसी और औरत से औरत बनने के लिए,
ये ठीक वैसा ही नहीं लगता जैसे
निगल जाती है
बड़ी मछली छोटी मछली को।।

---------.
*सैनिक की पत्नी*
कभी आसमां
कभी चांद
कभी तारो को
तकती रही
रात भर,
बस जिसका इंतजार था
वो ही नहीं आया
रात भर,
मौसम कुछ गर्म था,
फिर भी
आंखों में सीलन थी,
एक आग में मैं
जलती रही
रात भर,
सोचती हूँ
कैसा होगा वो दृश्य
जब तुम जानते होंगे
कि
मरना ही है जी के
रात भर,
जब गूंजती होगी चीत्कार
मच जाता होगा हाहाकार,
जो जिंदा रह जाये
वो कैसे जीते है
रात भर,
लाल नदिया
मरुस्थल में बहा सकते हो
तुम ही हो जो
दो माँ के लाल
कहा सकते हो,
एक तुम्हें पालती है
एक को तुम सम्भालते हो
एक रात से अगली
रात भर,
कभी सोचा था तुमने
जो होती रहीं
हममें
बातें
रात भर,
कहा था बच्चों के
लिए
खिलौने लाओगे
माँ को चारों धाम घुमाओगे,
बहन को उसका प्यार मिलेगा
भाई को पसंद की गाड़ी
पर ये क्या अगले ही दिन
भूल गए सब
हम ये कैसे सम्भालेंगे अब,
तुम सोये रहे
हम जागे रहे
रात भर,
गर्व है तुमपे देश को
ये कौन समझता है कि
गर्व के गर्त में भी
सुलगता है कुछ,
रात भर,
हकीकत होंगे
तुम्हारे सपने
अपना मनमौजी
फौजी ही होगा,
जबकि वो बेपरवाह था,
अब बुन रहा है
तुम्हारा ही ख़्वाब
रात भर,
हमारे सपने
तुमने नहीं समझे
फिर भी
होगा वही
मैंने सोचा है यही,
जो तुम्हें लगता था सही,
रात भर...
--------.
*नारी*
तुम्हारे रूप की एक झलक का
दरवेश हूँ,
तुम हो जिसमें शामिल हर क्षण ऐसा
परिवेश हूँ
हाँ हूँ मैं
हाँ मैं अविवेक हूँ।
प्रेम अगर विवेक शून्य
कर देता है,
तो क्या मैं द्वेष हूँ,
जिस रूप राशि से
इतना मैं प्रभावित हूँ,
क्या उसमें अब भी मैं शेष हूँ।
जहाँ आकर तुम अपना
सब शोक भूल जाते थे,
हाँ मैं हूँ
मैं ही वो देश हूँ।
तुम ही खुशबू,तुम ही वृक्ष,
तुम ही हरियाली थे
अब क्या
अब तो मात्र अवशेष हूँ।
मगर अवशेषों का
अपना महत्त्व है
धरा की धरोहर तो हूँ
सबला की मोहर तो हूँ।
कृपा की पात्र बन सकती थी,
मगर अब सबल हूँ,
स्वतंत्र हूँ, सशक्त हूँ,
हाँ मैं हूँ
मैं भी अभिव्यक्त हूँ
काया से कोमल
विचारो से सख्त हूँ,
अब मैं बेकार नहीं
बेशकीमती वक़्त हूँ।

------------.
एक छोटी सी कागज की
हमारे बीच में दीवार है
और लोग कहते हैं
तकरार में भी प्यार है,
रूठने का मजा तब है
जब मनाने वाला हो,
जिसे कोई मनाने वाला न हो
उसके लिए सब बेकार है।
मुझे वो चाहत भी स्वीकार थी,
ये नफरत भी शिरोधार्य है।
मैं अपराधी हूँ
अक्ष्म्य अपराध की,
बँधी हूँ कुटिल काल के
हाथों में,
या जूझ रही हूं किसी
श्राप से,
मुक्ति कही दिखती नहीं
स्त्री होने के पाप की,
इतनी निर्मम है दुनिया
की कोई साथ नहीं देता,
जैसा दिखता है सब
वैसा नहीं होता।।
------------.
उसका था...
मैं अच्छा था या बुरा था ये फैसला उसका था,
मजबूरियां मेरी थी और फ़ासला उसका था,
उड़ती रही पंख फैला बेपरवाह आकाश में,
चोट खाई थी मगर ये हौसला उसका था।
देखते देखते अपने भी पराये हो गए,
महफिलें किसकी थी वीराना उसका था,
आज आये हैं बरसो बाद तो पराया है,
अब मेहमान है कभी आशियाना उसका था।
बहुत मिलती है उसकी सूरत से सीरत,
आदमी अच्छा है दीवाना उसका था।
खेलते रहे दिल-ए-नादान से वो बार-बार
ये बहकना मेरा था और बहाना उसका था।
---------------.
*निष्कर्तव्य *
जब भी रोना
समंदर के पास रोना,
वो तुम्हारा दर्द
खुद में समा लेगा,
क्योंकि दुनिया का बस चले
तो तुम्हारे
दर्द का भी सौदा कर देगी,
माफी मांगने से अगर
पाप कम होते तो
स्वर्ग और नर्क का
प्रपंच नहीं होता,
ये सहारा भी बुजदिलों का है
जिनसे कुछ नहीं होता
वो ही कहते है हाथ में हाथ धरकर
ईश्वर है अब वही न्याय करेगा।
-----------.
*कुछ नहीं*
जीवन थम सा गया है वक़्त की तरह,
वक़्त? ये तो रफ्तार है,
जी हाँ
जीवन ऐसी ही रफ्तार में है
बस  सांसे चलती जा रही है,
अलसाये से
थके हुए
निरर्थक
एक तारतम्य में
बीतते ही जा रहे है,
जीवन के पल,
उत्साह
उमंग
साहस
सब दूर हो गए हैं,
एक ही धुन में सुईयों से चलते हुए
हर एक कि पसंद को
अपनी पसंद बनाने में,
रोज वही घर
उस घर को करीने से सजाने में,
सुबह की पूजा शाम की आरती
आज तक नहीं समझी
सवारी हूँ या सारथी,
और तुम कहते हो
कुछ करती ही नहीं,
सच तो ये है
करती तो हूँ बहुत कुछ
या शायद
सब कुछ,
मगर उसे मैंने नियति
और समाज ने कर्तव्य
समझ लिया है,
और
परिवार ने समझा
कुछ नहीं...

10/05/2017 श्रद्धा मिश्रा
mishrashraddha135@gmail.com
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कुमारी अर्चना


"चमेली के फूल"
जब मैं छोटी थी फूलों की खुशबू
मुझे इत्र से ज्यादा भाती थी
उन दिनों पापा के साथ पुलिस थाना के कैंपस में ही
टाली के बने दो छोटे कमरे रहते थे
थाना के चारों ओर बाग बगीचे थे
आम, कटहल, केला, जामुन, शरीफा के फल थे
क्यारियों में चमेली के फूल लगे थे
मैं यही सोचती थी ये फूल ही यहाँ क्यों लगें है
बाद पता चला इन पौधों को अल्प जल ही चाहिए
जैसे मुझे तुम्हारा थोड़ा प्यार!
इनकी खुशबू भी बहुत देर तक टिकी रहती है
थाने का वातावरण संध्या में गमगम करता था
चौकीदारों द्वारा सबेरे संध्या पौधों में जल छिड़काव किया जाता था
मैं और मेरे भाई भी चमेली के पौधों को खुब पानी देते थे
ताकि ज्यादा से ज्यादा फूल खिले
सफेद सफेद व  बड़े बड़े!
संध्या को जब चमेली के फूल
अधखिले होते थे हम उन्हें तोड़ सिरहाने रख लेती थी
सुबह जब पलक खुलती फूलों को पूर्ण खिला देख
खुशी से आँखें चमक जाती थी मेरी
उसको बार बार चूमती बार बार सूंघती
जा जा कर मम्मी पापा को बताती थी
मम्मी कहते क्यों सूँघा  लिया
भगवान को अब ये फूल नहीं चढ़ सकते!
पर मुझे तो किसी ने सूँघा नहीं
स्पर्श भी नहीं किया
ना ही मैं बासी हूँ
फिर मेरे भगवान ने मुझे
अपने चरणों में जगह क्यों नहीं दी
मैं इसी गम़ में घुलती हूँ
आसुँओं को उसका दिया प्यार
समझ दिन-रात पीती हूँ
मैं चमेली का फूल क्यों ना बनी!
------.
"मैं तेरी मीरा"
मैं तेरी मीरा
ओ मेरे धनश्याम
जग तो पहचाने मुझको
अब तू भी मोहे जान
मैं अनजान नहीं
तेरी परिचित हूँ!
मैं ना तेरे बचपन का सखा सुदामा हूँ
ना प्रेयसी राधा व गोपी हूँ
बस अपनी बंद अंखियन को खोल
और मुझे अपने दिलद्वार में
जाने का प्रवेश दें!
सबका दिल जीती हूँ
एक दिन तुम्हारा भी जीत लूँगी
ना जीती तो
तू मुझको जीत लेना
अपनी पटरानी के लिए!

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"तेरे लिए मैं अल्पना बनना चाहती"
वैसे तो मुझे उत्सवों में रंगोली जैसा
नाजुक नाजुक हाथों से बनाया जाता!
पर मैं तेरे सख्त़ हाथों से बनना चाहती
चावल की तरह तेरे प्यार में मिटकर
तेरे जीवन में आनंदरस भरना चाहती!
तेरे लिए मैं अल्पना बनना चाहती
मेंहदी सी घिसकर तेरे हाथों पर
प्रेमरंग भर देना चाहती हूँ !
तेरे लिए मैं अल्पना बनना चाहती
तेरे आँगन की तुलसी सी बनकर
बुरी हवाओं से तुझे बचाना चाहती !
तेरे चौखट पर काला टिका सा बनकर
तेरे हर बलाओं को अपने ऊपर लेना चाहती!
तेरे कोहबर घर की दीवारों पर सजकर
तुझपर समर्पण और अर्पण होना चाहती!
तेरे  लिए मैं अल्पना बनना चाहती
फूलों की खुशबू सी बिखर जाना चाहती!
-----------.
"तितली हूँ मैं"
तितली हूँ मैं
अपने चमकीलें परों को संभालते हुऐ
उर चली गगन छूने
टिड्डे जैसे हो तुम
भँवरे के रूप में बहुरूपीय हो
झूठा प्यार दिखाकर
मुझ तितली का कली जैसी रस चूसना चाहते हो !
अपना रेन बसेरा कहीं ओर बसाकर
तितली का धरौंदा ना बनने देना चाहते
बिन घोसले की चिडिया का क्या होता है मुझे पता नहीं !
अपना जीवन चक्र कितने समय का
सब जानती हूँ इसलिए
उड़ चली मैं
जहाँ अनंत खुला आकाश होगा
सच्चा प्यार होगा
और मेरा तितला होगा
वहीं तितले के संग
नया घर बनाउँगी!
-----------.
"ओ मृगनयनी आ तुझे प्यार कर लूँ"
ओ मृगनयनी आ तुझे प्यार कर लूँ
मेरी मृगनयनी आ तेरा दीदार कर लूँ
भरके तुझे बाँहों में मैं गंगा स्नान कर लूँ
चूमकर तेरे लब्बों को मैं
जिन्दग़ी की भवबाधा को पार कर लूँ
जाने अगले जन्म मेरा शरीर किस रूप में आये
फिर ना मैं तुझे जानूँ ना तू
आ इसी जन्म में जानपहचान कर लूँ
ओ मृगनयनी आ तुझे प्यार कर लूँ !
-------------.
"रात और दिन"
मेरे हिस्से में रात आई
रात का रंग काला है
इसमें कोई दूजा रंग नहीं मिला
इसलिए सदा सच्चा है
मेरी ज़िन्दगी भी अकेली है
कोई दूजा ना मिला!
फिर दिन का हिस्सा
सफेद रंग का है
जो दूजे रंग से मिल बना
झूठा सा दिखता है
फिर भी जीवन में
विविध रंगों को भरता है
वो कहाँ गया
जो मेरे दिल को भाता था
शायद गुम हो गया
रात के काले में!
---------------.
"कतरन सी हो गई हूँ मैं"
कागज की कतरन सी हो गई हूँ
जो कल तक तुम्हारे पहरन में थी!
बासी सी हो गई हूँ मैं
कल तक ताजी थी तुम्हारे लिये
आज बुढ़िया सी हो गई हूँ !
घर का पुराना समान सी हो गई हूँ मैं
जो कल तक नयी थी तुम्हारे लिए
बंद कोठरी में पड़े पड़े धूल
कब्र सी बन गई हूँ!

कुमारी अर्चना
पूर्णियाँ,बिहार

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सत्येंद्र अग्रवाल


आज सुबह ईश्वर को देखा है मैंने-

गीत गाते उमंगों से भरे परिंदों की चहचहाट में,
नव जीवन का संचार करती सूरज की रश्मियों में,
हँसते फूलो पर मँडराते भंवरों की गुंजन में,
शीतल मंद मंद पवन की संगीत मैं गाते पत्तों की सरसराहट में,
बहती नदी की कल-कल ध्वनि में,

आज सायं फिर देखूंगा ईश्वर को,
डूबते सूरज की लालिमा में,
धवल चंद्रमा की फैली चांदनी में,
नन्हें नन्हें टिमटिमाते तारों के विस्तृत आकाश में,
अस्तित्व में समाहित प्राकृतिक रहस्यों में
थके नींद की आगोश में समाये मानव में ,
धन्यवाद ,कृतज्ञता ज्ञापित करते मनुष्य में,

सत्येंद्र अग्रवाल

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पूजा डालमिया


समर्पण

बेटी
बहन
बहू
पत्नी
माँ
और न जाने
कितने ही रिश्तों को
जीवन भर बखूबी
निभाया है मैंने
हर एक रिश्ते में
पूर्ण समर्पण
दिखाया है मैंने
जीवन भर
सबके लिए
सब कुछ
सोचती आई हूँ मैं
लेकिन
वो दिन कब आएगा
जब
कोई सोचेगा
मेरी खातिर
क्या मुझे
जीवन भर
बस
कर्तव्यों को ही
निभाना पड़ेगा
या मुझे
मिलेंगे कभी
अधिकार भी मेरे
क्या मुझे ही
हमेशा
समर्पण दिखाना होगा
या कभी कोई
होगा समर्पित
मेरे प्रति भी??

पूजा डालमिया
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  पुखराज यादव"पुक्कू"


        नर्क
हे मानव..! कहाँ पहुंच गया है।
काला अंधकार हो जैसे गागर में।
नर्क द्वार है खड़ा,देख सही,
पाप भरा पड़ा हो जैसे सागर में।
लुट लालच लोभ भर मन है ।
पाँव पसार न तू फटे चादर में।
मनु-मनुज का है ना अनुज का,
टकराते जैसे द्वंद हो बादर में।
रोता होगा जन्मदाता देख हमें,
हमने नर्क बना दिया भवसागर में।
भ्रष्ट भटकाव भ्रमित करना काज,
मति मनचला मनुज है भ्रमाकर में।
रहते समय सार समझले समझाऊँ,
पृथ्वी परम देवस्थल आओ बताऊँ।
ना निर्मित करो इसे नर्क द्वार तुम,
पुक्कू पाठ पढ़ फिर आओ बताऊँ।

               
         पुखराज यादव"पुक्कू"
            सोनासिल्ली, फिंगेश्वर
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स्वराज सेनानी


ऐसा स्वर्ग हमें नहीं चाहिए
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पढ़ लिख कर भी जहां भटक रहे नौजवान
जहां मुमकिन नहीं है अमन ओ ईमान
मजबूर हैं आवाम और मुश्किल में है जान
ऐसा स्वर्ग हमें नहीं चाहिए .....
जहां आदमी की घात में हर पल है शैतान
जहाँ दहशत में जीते हों हरदम इंसान
कानून है बुजदिल और मुजरिम बलवान
ऐसा स्वर्ग हमें नहीं चाहिए .....
शान्ति और सुरक्षा का नहीं दिखता कोई निशान
जहां मुश्किल में इस्लाम और बेबस है कुरान
यह हालात जिसने बनाये हो उन्हें ही मुबारक
ऐसा स्वर्ग हमें नहीं चाहिए .........
ठिठुर रही घाटी उर सुलग रहा इंसान
सत्तर साल से ये भू भाग बना है श्मशान
मुसीबत में है रियाया और मज़े में सियासतदान
ऐसा स्वर्ग हमें नहीं चाहिए .....

On 4 July 2017 at 03:47, Swaraj Senani

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विशाल गर्ग


रिश्ते
आसमान से हरदम ऊँचे सागर से गहरे रिश्ते
खून के रिश्तों से भी बढकर गहरे होते दिल के रिश्ते।
रिश्ते होते हैं बेहद अनमोल
बस अपनों की खुशियाँ ही होती हैं इनका मोल।
एक बार जो टूटे रिश्ते दोबारा नहीं जुड पाते हैं
अगर दोबारा जुड भी जाये दर्द गांठ का सह नहीं पाते हैं।
रिश्ते होते हैं इंसान की जीवनभर की पूँजी
रिश्ते होते हैं इंसान की सफलता की कुँजी।
दुनिया क्या है रिश्तों का एक जाल है
इस जाल को जोडकर न रखने वाला मनुष्य कंगाल है।
पैसे होते जेब में तो चार लोग रिश्ता बनाते हैं
जरा गरीबी आ जाये तो वहीं लोग साथ छोड जाते हैं।
हम सब अपनों का रखे ख्याल
अपने-अपने रिश्तों को रखे संभाल।
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सर्वेश कुमार मारुत


सुंदर पंखों वाली तितली
       रंग रंगीली प्यारी तितली।
पंखों को तू है फड़काती।
       फूल-फूल पर है मंड़राती।
फूलों को तू बहुत चाहती।
       फूल बिना प्यासी रह जाती।
फूलों से तू रस है भरती।
       और ना जाने क्या-क्या करती?
कठिन परिश्रम तू है करती।
       मानव से तू बहुत है डरती
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कुछ तो बोलो,कुछ तो बोलो।
                       बेटा अपना मुँह तो खोलो।
                                मेरा नन्हा राजा बेटा अब,
                                उठो अभी डोलो रे डोलो।
                       मम्मी मुझको भूख लगी है,
                       पहले मुझको खाना दे दो।
                                 मम्मी बोली चल हठ शैतान,
                                 पहले अपने हाथ तो धोलो।
                       बेटा बोला हाथ न धोयें तो,
                       क्या होगा कुछ तो कह दो?
                                  कुछ तो बोलो,कुछ तो बोलो।
                                  मम्मी अपना मुँह तो खोलो।
                       मम्मी बोली तब बेटे से,
                       बात ध्यान लगाकर तुम सुन लो।
                                   इन हाथों में कुछ कीटाणु,
                                   बस जाते हैं यह सुन लो।
                       खाना खाएंगे इन गंदे हाँथों,
                       बीमार पड़ जायेंगे हम सब तो।
                                    कुछ तो बोलो, कुछ तो बोलो।

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  नभ खुली आंखों से देखे,
               दुःखी दिख रहे हैं सारे।
दूषित बसन यह कैसे छाय?,
               भीड़ लगाए पर सब हारे।
शून्य का मन क्यों व्याकुल?,
               और आंखों में छाय आंसू रे।
क्यों अश्रु गिराए ऐसे उसने?,
               धरा पर टप-टप, टप-टप रे।
धरा व्याकुल विचलित सी फ़िरती,
               भीग क्षीण तन-वसन-दामन रे।
तुषार आपतित पुञ्जित  है ऐसे,
               खंडित दर्पण-अर्पण सा रे।
रवि उठकर इठलाता शनैः- शनैः,
               भोर हो चली अब तो रे।
इठलाता बिलखता प्यासित है देखो,
               अब कुछ ना तो उसे फरे।
धरती सहमे दामन बचाये शर्माये,
               होंठों पर होंठों को रखते हुए।
भानु भी अति मस्ती से पीता ही रहा,
               लव-तन-केश-कपोल सारे।
धरा के उज्ज्वलित होंठों से,
               तृप्त हो चला अब तो धीरे -धीरे।
तीनों पहर गुज़ारे हमदम ने,
               इठलाते-फड़फड़ाते उमंगित मन में रे।
क्षण होता, ना बातूनी और अलसाया;
               नन्हें-नन्हें पैरों पर चला जाता रे।
धरा रवि का भी क्षण आया,
               दुःखित करुणामय युगल तब से रे।
पोटली बाँधती धरा क्यों है?,
               अधर मुरझाये लालित भास्कर अब रे।
चला-चला,चला-चला दिग् परिवहन,
               चढ़ चला बैठ पश्चिम गाड़ी से रे।
हाथ हिलाए होंठ छिपाए,
               उसकी लालिमा भू को लख ना पाई रे।
अंश छोड़ा, कालित पहर और शांत निशा;
               व्यथित आँखों में मोती से रे।

-------------------.
मस्त पवन का झोंका देखो, वह इतना क्यों इतराता?
तरु भी इसके आने से डोले, और इन्हें है लचकाता।
कली खिलीं, मंगल में खग, और पत्तियों को खनकाता।  
कृषक खेतों में रमें , सियारों का शोर उधर से आता।
  इसके आने से यह जग सारा, देखो कैसे इठलाता?
मस्त पवन के झोंके के बल, शिशु घुटबन चल जाता।
उठता-गिरता बस इसी तरह से, है देखो चल पाता।
मां देखे उसे दूर खड़ी, और उससे रहा ना जाता।
पकड़ उसे हाथों से, उसे अपने हृदय पर ले जाता।
कुछ खुशी-कुछ गम भी, क्या उसका हृदय सह पाता?
उधर मस्त पवन का झोंका, धीरे-धीरे बढ़ता चला जाता।
गया वह नदी पोखरों-सागरों से, देखो कैसे लड़खाता?
माना रोया हो आकाश, और आँसू नीचे आता-जाता।
मस्त पवन का झोंका, देखो लोगों को कैसे तड़पाता? 
जैसे निकले हो प्राण वदन से, ऐसे शरीर बलखाता।
धीरे-धीरे मस्त पवन का झोंका, आगे बढ़ता ही जाता।
उसे मिले जब खेत खलिहान,फ़िर देखो कैसे लहराता?
मानो पी मदिरा झूमे मस्ती में, अपने कदमों को लड़खाता। 
उसे मिली पीली सरसों, समझ आमतरु फिर उसे हिलाता।
मैं अचरज में पड़ा हूं ऐसे , सरसों पीली या धान हों पीले।
पर अनजान हूँ क्यों?, पर जो भी हो मस्त पवन इतराता।
छाई धूप पीली सरसों, फड़की बाली हर तिनका-तिनका।
पर कुछ ना कुछ तो, धरा पर भी है छिड़काता जाता।
पर कृषक की कृषि पर, मेला लगाता ही चला जाता।
मानो कर ली लीला इसने, इस तरह से खेतों को गिराता।
मस्त पवन का झोंका मिला, वन उपवन मंदिर धाम से।
तीव्र चाल तीव्र वाक से ,इनको कैसे नृत्य कराता?
मानो आकाश  गरज-गरज कर, और गुज़र जब जाता।
याद नहीं पर लोगों को,  बस याद यही रह जाता।
क्या गरजा था-क्या गुज़रा?, बस सहम हृदय तक रह जाता।
हाथ लगाओ इसको तो बस,  छूकर एहसास कराता।
लहू पड़ा था ऐसे मानों, आकाश पड़ा हो लाल निरा।
इसे देख बह-बह कर, सुखा के आगे बढ़ता ही जाता।
चटके पेड़ पड़े थे ऐसे, मानों टूट चुका था तारा।
पर इठलाता- बलखाता, इस जग में बहता ही जाता।
कुछ आशियाने क्षतिग्रस्त किए, और कुछ को किया वेगाना।
इसे दुःख नहीं अफसोस नहीं, इसे तो बस है बढ़ते जाना।
मिलाप किया इसने शीतलता से, तब उससे रहा नहीं जाता।
लवों पर खुशी छाई है ऐसे, मानो पूर्णिमा का चांद निकल आता।
पर मानव शीत ऋतु में तड़पता,  और इसको सह ना  पाता।
ठिठुर चुका वह पूरा  है, और दांतों को है किट- किटकाता।
मानव ग्रीष्म ऋतु में तड़पा इसके बिन, याद तभी कर पाता।
पर यह बवंडर लाया ऐसे, मानो आसमान भू पर हो आता।
पेड़ों के झड़ चुके पात्र अब, फिर वसंत में है चिलकाता।
इसको देख मस्त पवन ने भी, मानो इन्हें अपना दर्पण बनाया।
इसे देख अति मस्ती में, इठलाता-बलखाता कुछ दीदार किया।
इस पर भी इसका वश कहां?, प्रतिबिंब स्वयं साथ-साथ बिलखाता।
पर कुछ गम है-कुछ हताशा भी, जब होली की दहकी ज़्वाला।
अपने तीव्र वेग से ज्वाला की गति, और बढ़ाता ही चला जाता।
मस्त पवन का झोंका अरि मस्ती में, बहता-बहता-बहता जाता। 
दहक उठी होली की ज्वाला, लपटें अंबर तक ले जाता।
धूम्र-धाम जा पहुँचा शिखर पर, मानो कोई बवंडर आया।
मस्त पवन का झोंका इसमें, फ़िर नहीं बिल्कुल दिखलाता।
पड़ी होली की अग्नि ठंडी, इसकी राख़ धीमे-धीमे ले जाता।
पड़ चुके थे पेड़ पके, पके थे सारे गली चौबारे और सरिता।
कलियां सूखीं- खुशबू फ़ूटीं, सूने पड़े खेत-खलिहान और धरा।
चकाचौंध आसमान पड़ा था, उधर सूर्य बन चला था राजा।
पर मस्त पवन के झोंके को डर था, पर साहस था बांधा।
हुई न वर्षा सूखे कृषि अम्बर. सम्पूर्ण धरा का जन सारा।
मस्त पवन के झोंके ने भी, साथ दिया भास्कर राजा का।
अदृश्य करवा दिया, नदी-पोखर-गड्ढों का सलिल सब सारा।
पर मस्त पवन का झोंका देखो, बढ़ता- बढ़ता-बढ़ता जाता।

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                सर्वेश कुमार मारुत
नाम-  सर्वेश कुमार मारुत
जन्म तिथि:- 15-07-1988
पिता-  श्री रामेश्वर दयाल
माता- श्रीमती माया देवी
पता:- ग्राम व डाo - अंगदपुर खमरिया, थाना-भुता, तहसील-फरीदपुर ,ज़िला:- बरेली (उo प्रo)
पिन नo:-243503
शिक्षा:- बीo ए o, एमo एo ( अर्थशास्त्र )  और  बीo एडo
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शंकर परगाई


 
1 .मौसमी बरसात
 
बादलो के
झुंड के झुंड
उतर रहे है
ऊंचे पहाड़ों से
बेहद पास जमी के
बांध लेते है
फिज़ाओं को
भर आते है पहाड़ों के
गाढ़ गधेरे जब
शहरों में छ्तों पर 
नाली सड़कें चढ़ आयी है
सब उफान पर है
बरसाती मौसम में
दूर घाटियों से
निकलता पानी
दून की सड़कों पर
बह रहा है
अपने ही अहम में
अपने ही गुमान में
हैरान वो भी है
बारिश के इस तरह होने से
हैरान लोग भी है
कि अब
बारिशों ने धूप को
जकड़ लिया है
मजबूत पकड़ से
आखिर डर है उन्हें
कहीं मौसम
फिर से न बदल जाये
क्योंकि धीमे धीमे
जमी घूम रही है
पहाड़ खिसक रहा है
बादल उड़ रहे है ।

 
 
2.  शब्द चलते हैं
 
शब्द चलते हैं
जन्म लेते हैं
जीवन से
जीवन चलता है
अनवरत क्रिया से
क्रियाओं का बल तुमसे
जितना गहरा मन है
जुड़ा तुमसे
उतनी ही गहरी
शब्दों की सीमा
नापना पड़ता है
फिर भी मुझको
गोता लगाते हुये
शब्दों की गहराई का परिमाप
  चुनने पड़ते है शब्द
फिर भी मुझको
जब बिंधे हुए है
गहरे तुमसे
जब छिपी हुयी है
अनगिनत छबियाँ तेरी
गोया
खयाल रखता हूँ मैं 
लिखे जाने पर शब्दों का
कि उनमें जीवन का ही गीत हो
आखिरकार
शब्द जन्म लेते है
शब्द चलते है
बढ़ते है आगे
जीवन से
जीवन चलता है
अनवरत क्रिया से ।
.......शंकर परगाई

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-सागर यादव 'जख्मी'

(नजर ना आ सकूँ खुद को मैं इतनी दूर जाऊँगा)

1.
नजर ना आ सकूँ खुद को मैं इतनी दूर जाऊँगा
मैं शीशे की तरह बेशक किसी दिन टूट जाऊँगा
अभी इक दूसरे के हम बहुत नजदीक हैँ पर कल
मुझे तुम भूल जाओगी तुम्हेँ मैं भूल जाऊँगा

2.
लगाकर पंख साहस का फलक पे पाँव रखना है
सुना है अब पतंगे को शमाँ की माँग भरना है
हमेँ इक दूसरे से दूर मत करना जहाँ वालोँ
हमेँ इक साथ जीना है हमेँ इक साथ मरना है

3.
तुम्हेँ विस्की नहीँ मिलती हमेँ भी रम नहीँ मिलता
मुहब्बत के परिँदोँ को अगर जंगल नहीँ मिलता
जमाने मेँ दवा की सैकड़ोँ दुकानेँ हैँ लेकिन
हमारे दिल के जख्मोँ का कहीँ मरहम नहीँ मिलता

4.
पहरेदार गहरी ,निद्रा मेँ सो रहे हैँ
धन के लोभी धरम ,से विमुख हो रहे हैँ
सरकार की गंदी ,नीतियोँ के चलते 'जख्मी'
गरीब और गरीब,धनी-धनी हो रहे हैँ

5.
कोई पिता अपने,बेटे से जुदा ना हो
मेरे मौला वक्त,इतना बेवफा ना हो
मुझको ऐसा सफर,सनम अच्छा लगता है
मेरे साथ मेँ तुम हो,मंजिल का पता ना हो
----
(मुझे अधिकारी बनाने का,पापा का सपना टूट गया)

1.
मुझे अधिकारी बनाने का,पापा का सपना टूट गया
इक जरा सी भूल के कारण,मेरा घुटना टूट गया
इश्क-विश्क करने वालोँ का,होता है अंजाम यही
पल दो पल प्यार किया फिर,उनका रिश्ता टूट गया

2.
अमीरोँ के महल मेँ प्रीति की चादर नहीँ शायद
जमाने मेँ मुहब्बत की कोई कीमत नहीँ शायद
जिसे देखो वही हमको घृणा से देखता है अब
हमारा दिल किसी के प्यार के लायक नहीँ शायद

3.
मुझे मुझसे चुराने की शरारत कौन करता है
अँधेरी रात मेँ मेरी इबादत कौन करता है
वो मेरी खूबसूरत शायरी पर मर मिटी होगी
नहीँ तो हम गरीबोँ से मुहब्बत कौन करता है

4.
खुदा के सामने हमसे कभी सजदा नहीँ होता
फकत मजबूरियाँ हैँ इसलिए ऐसा नहीँ होता
हमारी मुफलिसी पर तुम अगर हँसते नहीँ 'सागर'
मै सबके सामने यूँ फूटकर रोया नहीँ होता

5.
घिनौना कर्म करने से मना कोई नहीँ करता
अमीरोँ की कड़ी आलोचना कोई नहीँ करता
हमारा दिल दुखाने की खता सब लोग करते हैँ
हमेँ दिल से लगाने की खता कोई नहीँ करता

------------.
(तुम्हेँ दिल्ली बना देगी हमेँ गोवा बना देगी)


तुम्हेँ दिल्ली बना देगी हमेँ गोवा बना देगी
सियासत एक दिन सबको कोई कस्बा बना देगी

तुम्हेँ जब देखता हूँ मै जमाना भूल जाता हूँ
तुम्हारी ये हँसी मुझको कभी राँझा बना देगी

मै अपना हर इरादा आसमाँ से ऊँचा रखता हूँ
मुझे मालूम है किस्मत मुझे राजा बना देगी

बुजुर्गोँ की दुआ 'जख्मी'कभी जाया नहीँ जाती
बुजुर्गोँ की दुआ तुमको खरा सोना बना देगी

-----------.
(गरीबोँ को कभी सुख चैन से रहने नहीँ देते)

गरीबोँ को कभी सुख चैन से रहने नहीँ देते
हमारे देश के नेता सुमन खिलने नहीँ देते

कोई कायर नहीँ हैँ हम जो विपदा देखकर रोए
हमारे हौसले हमको कभी झुकने नहीँ देते

हमारे रोने से कुछ उनको भी तकलीफ होती है
मगर वो आँख से आँसू कभी बहने नहीँ देते

हमेँ भी गाँधी के जैसा सरल इंसान बनना है
मगर कुछ लोग ऐसे हैँ जो सरल बनने नहीँ देते
------.
(अगर हो सके तो)

सदा मुस्कुराना अगर हो सके तो
न आँसू बहाना अगर हो सके तो

मेरी तिश्नगी अब तुम्हीँ से बुझेगी
जरा पास आना अगर हो सके तो

कहीँ कट न जाएँ मेरे सोच के पर
खुदा से मनाना अगर हो सके तो

मेरे प्यार को तुम भुला ही चुके हो
मुझे भी भुलाना अगर हो सके तो

तुम्हेँ जब सताये कभी याद मेरी
गजल गुनगुनाना अगर हो सके तो

कहीँ प्यार का दीप जलता नहीँ अब
बदल दो जमाना अगर हो सके तो



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प्रदीप उपाध्याय


कभी था बरगद का पेड़ वहाँ

कभी था बरगद का पेड़ वहाँ
लगता जैसे काँपती सूरज की तपन
बच्चें-बूढ़े और युवाओं की मण्डली
जमाये रहती थीं चौपाल वहाँ
सुबह हो या फिर शाम
और देर रात तक
जमे रहते थे लोग जहाँ
करते गपशप और वार्तालाप
कभी था बरगद का पेड़ वहाँ
जिसके नीचे मौसी की दुकान
चाय पीते खाते चने परमल
आते हैं याद वे दिन
समय के क्रूर हाथों
दे दी गई बरगद की बलि
और तन  गया वहाँ कांक्रीट का जंगल
अब नहीं वहां बरगद की छांव
सूरज करता अट्टहास वहाँ
कैसे   बचेंगे उसकी तपन से
आते हैं याद वे दिन जब
कभी था बरगद का पेड़ वहाँ।
छूट गये हैं कई संगी-साथी
बिछुड़ गये हैं अपने सारे
लगता है भला था अपना बचपन
और बेफिक्री की वह जिन्दगी
अब तो रह गई हैं यादें ही शेष
और हम भी रह जायेंगे यादों में
ठीक उस बरगद की तरह।।
000000000000000

सूर्य करण सोनी

"अग्निवृष्टि"


शीर्षक :- बंग प्रदेश

कटुता द्वेष
मिटती मानवता
बंग प्रदेश
***********
अस्मतें लूटी
मरघट पसरा
बंग प्रदेश
***********
खंडित देश
तुष्टिकरण राज
बंग प्रदेश
***********
जलती झुग्गी
अदृश्य सेकुलर
बंग प्रदेश
**********
सत्ता का मद
चुभता जनादेश
बंग प्रदेश
***********
शिक्षित नारी
हद तोड़ती सारी
जाति विशेष
***********
धर्म विशेष
कुंठित परिवेश
बंग प्रदेश
***********
दुर्गा पूजा
मुहर्रम से ऊँचा
बंग प्रदेश
***********
वीरों की भूमि
संस्कृति अशेष
बंग प्रदेश
***********
मैला आँचल
स्मृतियाँ विशेष
टेरेसा वेश
***********
केंद्र भी मौन
उलझे अब कौन
बंग प्रदेश
************
घुटते प्राण
है पाश्विक इंसान
बंग महान
***********
अथक श्रम
करें शोषित जन
भादो सावन
**********
  पपीहा बोला
मचला तन मन
भीगा सावन
**********
  गुरु चरण
पड़े घर आँगन
हर्षित मन
***********
बंजारापन
  ले जायेगा मुझको
  तुमसे दूर
*************

जल मछली
तड़पे बिन पानी
मेरी कहानी
*************

उषा किरण
इठलाती पवन
मानो बसंत
*************
आया सावन
जलती बिरहन
चाहे साजन
*************
दूर क्षितिज
सविता वसुधा का
प्रेम मिलन
**************
नदी तट-सा
जीवन तेरा-मेरा
अमृत धारा
**************


सूर्य करण सोनी
"अग्निवृष्टि"
0000000000000000000

- बृजमोहन स्वामी 'बैरागी'


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शीर्षक - हैरानी सारी हमें ही होनी थी
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हैरानी कुछ यूँ हुई
कि उन्होंने हमें सर खुजाने का
वक़्त भी नहीं दिया,
जबकि वक़्त उनकी मुट्ठियों में भी नहीं देखा गया,
लब पर जलती हुई
सारी बात हमने फूँक दी
सिवाय इस सिद्धांत के
कि हमने सपनों की तरह
आदमी देखे,
जबकि 'सपने' किसी गर्भाशय में पल रहे होते तो
सारे अल्ट्रासाउंड
घड़ियों की तरह बिकते
और हम वक़्त देखने के लिए सर फोड़ते,
मेहँदी की तरह लांछन लगाते,
सिगरेटों की तरह घर फूंकते,
कुत्तों की तरह बच्चे पालते,
रक्तदान की तरह सुझाव देते,
एक हाथ से ताली बजाते,
औरतें चूड़ियों में छुपाती 'सुहाग'
आदमी बटुओं में 'सुहागरात' छुपाते
और भाट पूरी रात गाते विरुदावलियाँ
सच बताऊँ तो हुआ यूँ था कि
जब हमने आज़ादी के लिए आवाज़ उठाई
तो हमारी अंगुलियां बर्फ की तरह जमी हुई मिली, हमारे गलों में
और हमने तकलीफों को
मुद्दों की तरह उठाया
जबकि 'रोना' कॉलेजों के शौचालयों में ही घुटाकर मरा
बाहर हमारे बनाये पोस्टर दम तोड़ते गए।
हमने हयात फूंकने की ज़हमत उठाई
और हड्डियों के बुरादे को
रोटियों में मिलाकर खाया
ताकि एक पीढ़ी बचा सकें।
प्यार के दरवाज़े हमारे लिए सिर्फ
स्कूलों की उबासियों में टिफिन की तरह ही खुलते थे
और चीन के साथ लड़ाई की
खबरों के साथ हमने नींद के केप्सूल खाये,
जबकि बीच रात पालने में खेलते
हमारे छोटे बहन-भाइयों का बदन
दैनिक जागरण और भास्कर नामक अखबारों से पोंछा जाता रहा
उनमें इसी दुनिया के लोगों के मौत की खबरें थी
हमने बिस्तरों की चादरें खींच कर
अपने बदन और चेहरे को ढक लिया था
समझदार प्रेमिकाओं की तरह।
अपनी महानता के नियमों में
मुहल्लेदारी से रिश्तेदारी तक
सान्त्वना देने के बहाने
हमने धरती रोककर
उनका मांस सहलाया,
पावरोटी सी फूली बाजुएँ लिए फिरे,
आपत्तिजनक टिप्पणियाँ
कागजों में ही सोई रही।
संयोग से
आदमी ही हथियार बनाया गया
नौकरी सिर्फ विज्ञापनों में रही,
क्रन्तिकारी तस्वीरों में चले गए,
अंगूरों पर मौत लिखी गई,
टीवी, रेडियो और मोबाइलों पर जिंदगी
अब जाकर नशा टूटा
आज़ादी का असली मतलब देखा
हमने उन्ही रास्तों में पिरोये दस्तखत
उन्हीं सपनों को जिया
जो हमारे सर काटना चाहते थे
जबकि रेलगाड़ियों के आगे कटकर मरना सस्ता था।
सबकुछ छीनने के बाद भी
उन्हीं सांसों में सहारा लिया गया
जो सिर्फ 'सांसें' थी
और गुनाह सिर्फ इतना था
की हमने
घटनाओं का विरोध करना अपने बच्चों को सौंपा !!
बेज़ुबां दास्ताँ ये...
कितने दर्द छुपाएगी?
----------------------------------------

(1)घर लौटना और सौ बरस जीना
---------------------------
ख़ुशी के कुछ मायने
बोलकर नही बताये जाते
जैसे
आप चाय या पैसे के लिए बोलते हैं
और ख़ुशी
किसी भी वक़्त टपक सकती है
बिना बताये, खबर दिए
पर आपका स्वागत है...
ये महज़ एक शब्द नहीं
फूल है
जो खिलता है यूँ नागफनी...
ख़ुशी तब भी झलककर आयेगी
जब आपका फोन चार्जर के अभाव में
दम तोड़ देता है
उस मौके पर यह
पड़ोसी के लैंडलाइन तार से होकर आती है, जबकि
इसके लिए आपके बेटे को
किसी सरकारी नौकरी या
तनख्वाह मिलने की देर होती है।
ख़ुशी के मायने
अलग अलग होते है
वे हथेली पर धरे होते हैं
उनमें आपकी बाकी बची जान होती है
ख़ुशी, खबर है, यह कानों कान होती है
आपके दिल का टुकड़ा ही
मुझको छलता है !
यह आपकी ख़ुशी हो सकती है
जबकि मेरा रोना सर्वनाम शब्द है
ख़ुशी बदलती रहती
जैसे कोई  मौसम है ,
एक बुलेटिन में है
जो रोज़  बदलता है !
एक ख़ुशी को 'ख़ुशी' बनाने की जद में
सौ गुनाह  माफ़ करते हैं
जैसे तौलिये से बाल झटककर
अभिनेता को रिझाती अभिनेत्रियाँ,
ख़ुशी एक कद्दूकस जैसी
आदमी के लिए बहुत कीमती है।
तमाम झुटे गवाहों और बयानों को
मध्यनजर रखते हुए,
घबराई सांसों और कजलाई आँखों को लेकर जब हम
अपने अपने घरों को लौटाना चाहते हैं
तो खुशियाँ  माओं की तरह
कहती हैं
कि सौ बरस और..
तुम्हें जीना ही चाहिए।


(2) दम तोड़ती विडम्बनाएं और आज़ादी
---------------------
हमारे लिए मरने वाले
सबसे बहादुर लोगों ने
अपने जन्मदिन
रूठी हुई प्रेमिकाओं  की तरह
नही मनाये
या किसी दूसरी तरह भी नही मनाये
इस इंतज़ार में कि
हम सबका मत एक होगा,
पर हमारी सीमाओं तक
पहुंचते पहुंचते
विडम्बना इस कदर दम तोड़ गई
कि उन्होंने जो कहा
वह मैंने और आपने नहीं सुना।
मिसेल फोको समेत तमाम लोगों ने
अपने मोम जैसे हाथों से
कागजों पर खून से लिखे
मलाई की तरह बिलोये हुए शब्द
उससे बहुत अलग हमने पढा
या ज्यादा कहें
तो हमें ज़बर्दस्ती पढ़वाया गया
ताकि हम क्लास की सबसे आगे वाली बेंच पर बैठ सकें
और हर महीने हमारे गार्ज़ियन
ऑफिस में अकड़ अकड़ कर
प्रिंसिपल को महानताएं बता सकें।
आज़ादी कैसे मिली
किसको मिली
और कितनी मिली
ये बातें हमारे भीतर जाकर
बिलकुल भिन्न अर्थों में खिलखिलाई और यह आखरी से आखिरी बात
आप मेरे ऊपर थोपेंगे
कि मैंने कहा है।
ठीक इसी तरह
उन खून से भी लाल दस्तखतों
और इतिहास में दी गई
सबसे सफेद गवाहियों को
नहीं समझा हमने,
इसके बाद
चाय पीकर
उपनिषद के ऊपर कप रखे
गाने सुनकर
बाइबिल पर इयरफोन रखे
और दुनियां को बताना चाहते हैं
कि
हमने
आज़ादी का मतलब सीख लिया।


(3)
इंसाफ मांगती लड़की
------------------------
"आफरीन" नाम की लड़की ने
अगर इंसाफ माँगा होता
तो क्या उसे मिलता?
शायद हज़ारों बेज़ुबान लड़कियों के मामलों की तरह फाइलों में दम तोड़ देती।
यह बात किसी न्यूज़ में नहीं आई।
अँधेरे ही में रोल कट करना
और फ़िर अख़बार में छपना
ऊपर से जो पारिश्रमिक मिला
वो लेकर हम घर आए
ताकि हमारे बच्चे इंग्लिश मीडियम में पढ़ें।
ज़िंदगी यूँ ही !रिश्तों में लूटी।
लेकिन
इंसाफ मांगती लड़की की आँखों में किसी ने नहीं देखा।
हम सब दोबारा से बौने होते गए,
हमारी आत्माएं मिट्टी हो गई
आत्माएं उपकरण भी बनी
इसलिए हमारी आत्माओं ने
खुद को ही बताया
कि
बंदिश तोड़ ही देती हूँ सब ,
हाव - भाव  पर  जब  हो !
-------------------------------------
लेखक परिचय
कवि बृजमोहन स्वामी 'बैरागी'
(उपनाम - कवि बैरागी)
पता -
बरवाळी, नोहर
हनुमानगढ़ जिला
राजस्थान (335504)
नागरिकता - भारतीय
शिक्षा-  बी एस सी , जीव् विज्ञान
             स्कूल अध्यापक कोर्स
कार्य क्षेत्र-  कहानीकार, नाटककार
फ़िल्म राइटर, रंगमंच कर्मी
और राजस्थानी भाषा मान्यता आंदोलन में सक्रिय योगदान
वर्तमान -  स्कूल अध्यापक,
और
जिला अध्यक्ष,
राजस्थानी भाषा संगर्ष सेना
(हनुमानगढ़ इकाई)

© बृजमोहन स्वामी 'बैरागी'
     (हिंदी प्रगतिवादी लेखक)
सम्पर्क सूत्र - birjosyami@gmail.com
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  सोम पिनाकी पटेल


कौन हूं मैं
1ः-
कौन हूं मैं
एक आत्मा या एक शरीर
या हूं मिट्टी, जो है नम
जिसे सब अपने हिसाब से
रूप देने को हैं आतुर
जैसे शराबी अपनी तरह
अपने साथी को बदलना चाहता
जब भी सोचता हूं है एक शरीर
बंध जाता है रिश्तों के डोर
प्रेम औ अहसानों के बंधन में बंध जाता
सामाजिक भय धर दबोजता
हंसी के पात्र बनने का डर लगता
और हो जाता पिंजरे में कैद
एक पंछी की तरह मजबूर
जिसकी प्रवृत्ति है
उन्मुक्त गगन में उड़ना
पर लोग उसकी जान के डर से
उसे बाहर निकलने नहीं देते
क्यों नहीं देख पाता
स्वयं को आत्मा के रूप में
जिसे न गिरने की परवाह
न सामाजिक बेईज्जती का डर
जिसे न कोई जकड़ सकते
न कोई कैद कर सकते
जो अपने मनमाफिक
उड़ सकता है उन्मुक्त गगन में
2ः-
कौन हूं मैं
एक पुत्र, एक पुत्री
एक भाई, एक बहन
एक पिता, एक माता
एक पति, एक पत्नी
एक मित्र, एक शत्रु
या सामाजिक प्राणी
बिना उधार लिए
बनाया जाता है ऋणी
और बिना लिए कर्ज के लिए
आपके तरफ घृणा से देखते
चीखते चिल्लाते आदमी
रिश्तों में होने चाहिए
पूर्ण समर्पण और प्यार
जो हमारा है ही नहीं
उस पर भी हमारा लोभ
एक दिन छोड़ छाड़ के
चला जाएगा रोक सके तो रोक
3ः-
ईमानदारी से करना चाहिए
हमें अपना हर काम
क्योंकि इसी से बदलता है
नजरिया दुनिया को देखने का
सुनो सबका
पर किसी को तब तक न कहो
बन जाओ जब तक कहने लायक
समरथ को नहीं दोष गोसाईं
कह गए हैं रामभक्त तुलसीदास भी
अपने महाकाव्य रामचरितमानस में
शक्तिशाली का वचन सर्वमान्य
ज्ञान की बातें भी व्यर्थ है सामान्य
अपने विचारों का आदान प्रदान
अपने समान लोगों से करें
खग ही खग की भाषा जानता है
ज्ञानी के लिए बेमतलब
अज्ञानी के सामने बनेंगे हंसी का पात्र
मन चांद की तरह हैं चंचल
हर रात्रि बदलता है अपना आकार
इसे बनाएं हम
सूर्य की तरह स्थिर और ज्योतिर्मय
हम दूसरों की तरह नहीं बन सकते
हमें अपने ही तरह बनना है
               


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प्रवीण


   "Guru Kripa "
एक  शील    अश्लील रूप में,
मिला राह में      राही को ।
देख उस पत्थर को यूं -
आई  दया  उस  राही  को ।
सोचा, करूं उद्धार मैं,
इस निराकार पत्थर का,
दे रूप इसे   मूरत   का ।
चोट-चोट से, खोट - खोट के ,
खोट दूर पत्थर का करके,
रूप हृदय का उसमें उतार,
किया शील का उद्धार ।।
रहता यूं ही पड़ा हुआ,
पैरों की ठोकर खा-खा,
जीने पर शरमिंदा होता,
जो शिल्पी ने न चुना होता।।
ऐसे तो, था, शील  मात्र,
पूर्ण   उपेक्षा  का   पात्र !
आई महत्व उसमें तब, जब -
गुरु ने बनाया अपना छात्र ।।।
                 
                                            प्रवीण
-----#----#----##---#-#----$$-
       "Nimitt "
यूं जिज्ञासा होती सबमें आजन्म ,
होती चलने-बढ़ने-उड़ने की शक्ति , 
पर  न  होती  दिशा  की      सख्ती  ,
जिसका    देते   गुरु    ही   ज्ञान,
जिनको  अपना  निमित्त  मात्र
बनाते हैं                   भगवान ।।।।।
                                              प्रवीण
Pravin Kumar Sharma from Panjwara, Dist :- Banka, Bihar ,pin :- 813110

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मंजरी गर्ग


जिंदगी!!!....????

ये जिंदगी बड़ी ही हसीन है...
सच में कुछ ज्यादा ही रंगीन है।

पहले आसमां में उड़ाती है...
फिर जमी पर लाती है।

पहले ख्वाब दिखाती है...
फिर नींद से जगाती है।

पहले उम्मीदें बढाती है...
फिर सच्चाई दिखाती है।

पहले बदलाव लाती है...
फिर उन्हीं में ढलना सिखाती है।

पहले इतराना सिखाती है...
फिर आईना दिखाती है।

पहले हालात बनाती है...
फिर उनसे लड़ना सिखाती है।

पहले सहना सिखाती है...
फिर बोलने पर मजबूर कराती है।

इस जिंदगी के बहकावे में ना आना यारों,
ये पहले तो हमें हमारे डर से भगाती है...
फिर भगा भगा कर उस डर के करीब लाके,
उसी का सामना कराती है।
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मोहम्मद अली अहमद अंसारी 


कहना है तुमसे
पर अल्फाज नहीं है
फ़िर भी चंद शब्द है कहने को......
तुम साथ होती तो कैसा होता
साथ चलती तो कैसा होता
तुम रूठती तो कैसा होता
मैं मनाता ,
वो मनाना कैसा होता
चाँदनी रात में
अँधेरी गली में फिसल जाना कैसा होता
मैं और मेरा अकेलापन
ये सवाल करते हैं
तुम होती तो कैसा होता........?
प्रेम हो या सड़क
यूँ गुज़र जाना कैसा होता
कांटों के रस्ते पर
कोमल हृदय लिए लथपथ  चले जाना कैसा होता
कैसा होता अगर साथ होती
कैसा होता आज़ाद पंख लगाए  चले आती तो
बागीचे में बैठ कर
यूँ तुम्हें तकना कैसा होता
मैं और मेरा अकेलापन
ये सवाल करते  है
तुम होती तो कैसा होता........?
बाबूजी को देख कर
छुप जाना कैसा होता
कैसा होता
जब भावी पूछती कहाँ थे    तब से
वो खामोश खड़ा होना कैसा होता....
तुम्हारे छत पर आने के इन्तेज़ार में ,
गली में टकटकी लगाना कैसा होता
कैसा होता जब दोस्त तुम्हारे नाम से हँसी ठिठोली करते
कैसा होता जब तुम्हें घुमाने
चोरी छुपे भईया की गाड़ी ले आता
कैसा होता जब एक आइसक्रीम में
दोनों मिलकर खाते
मैं और मेरा अकेलापन
ये सवाल करते हैं
तुम होती तो कैसा होता...........?

मोहम्मद अली अहमद अंसारी 
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नन्दलाल भारती


।। राजा की चिन्ता।।
राजा किसी सल्तनत का नवाब नहीं है
एक मामूली सा गाय का बछड़ा है
नाम है राजा,
एक वक्त था जब ऐसे राजा
खेत, खलिहान और दरवाजे की
शान हुआ करते थे
जिनके श्रम से उपजे अन्न पर
पलता था देश
लोग राजाओं की पीठ थपथपा कर
अपनी मूंछ तक ऐंठते थे
मशीनों की घुसपैठ क्या हो गई
राजाओं का जीवन खतरे में पड़ गया
राजाओं की एक पूरी पीढ़ी की
बोटी बोटी हो चुकी है
नई पीढ़ी पर चोर निगाहें टिकी हुई हैं
कम उम्र के राजा भेलख पड़ते ही
गायब हो जाते है रात के अंधेरे में
जिनका सुराग फिर कभी नहीं मिलता
लगेगा भी कैसे ?
बना दी जाती है उनकी मनचाही बोटियां
मेरे राजा यानि गाय के बछड़े पर भी
चोर निगाहें बिछी रहती है
शरीर से अक्षम पिता
रात के अंधेरे के खौफ़ से
पीटते रहते है लाठी
राजा की पहरेदारी में
ऐसे ही राजाओं के बल पर
खड़ा हुआ था कुटुंब
घर के दूसरे सदस्य भी करते है
राजा की चौकीदारी
  राजा न बन पाए
किसी चोर का शिकार
राजा कुटुम्ब का है रुआब
  कुटुम्ब बचाने में जुटा रहता है
राजा को बनने से बिरयानी, मसाला मटन,
टिक्का या कबाब।।।।।
------.

।।मरते घर ।।

गांव वीरान हो रहे हैं
धरती बंजर सी लगने लगी है
वो घर जहां पनपती थी यादें
पीढ़ियों पुराने पुरखों की
संवरते थे खून के रिश्ते
गूंजा करती थी विरासतें
गांव के घरों से उठा करती थी
लोरी किस्से सोहर की
मधुर स्वर लहरियां
तीज त्यौहार के दिन
गांव के घरों से तितलियों सी गीत गाती
तालाब पोखर की ओर बढ़ती थी
गांव की आन मान शान लड़कियां
पवित्र स्नान के लिए
वही पोखर तालाब अपवित्र हो चुके हैं
गांव के घर रोज रोज मर रहे है
गाँव विस्थापित हो चुका है
आकी बाकी भी हो रहा है
शहरों की भीड़ में
गांव में बचे है तो बार बार
चश्मे साफ करते हुए लोग
इंतजार में ताला जड़े मरते हुए घर
जातिवाद चट कर रहा सर्वस्व
सरकारें और जातिवाद के ठेकेदार
हो चुके है बेखबर
गांवों का देश खतरे में है
सरकारें व्यस्त है दिन साल का
जश्न मनाने में और कागजी घोड़े दौड़ाने में
काश सरकारें और जातिवाद के ठेकेदार
उबर जाते अपने गुमान से
बच जाते नित मरते घर
विकास की बयार जुड़ जाती
वीरान होते गांव से।।।।
----------.
गाँव -एक विरह।।
ये वही चौकी (खैरा)आज़मगढ़ का
गांव है जो मेरी जन्मभूमि है
मुझे अपनी जन्मभूमि पर गर्व है
चौकी से
लालगंज तक जाने के लिए
खेतों की मेड़ों और पगडंडियों से जाना पड़ता था
हॉट से सामान की गठरी सिर पर
साइकिल वाले साइकिल पर लाते थे
मैं सिर पर और साइकिल पर भी लाया हूँ
अब हाईवे है मोटरें भी
इतनी तरक़्क़ी हुई है
इसके अलावा चौकी
तुम्हारी और कोई है पहचान
ग़रीबी और अमीरी के बीच कोई
जंग नहीं हुआ,
क्या  दमन कहें या शान
तुम्हारी साख और गिर गयी
हल खूंटी पर टंग गए
बैल कसाई घर पहुंच रहे हैं
बची है  तो सिसकती ज़िन्दगी
और गांव के दो टुकड़े
पूरब की तरफ सवर्ण और
पश्चिम की तरफ संघंर्षरत
झंखते श्रम के सिपाही दलित
ना जाने क्यों दलितों की बस्ती में
ना सरकारी अफसर, ना नेता
न अभिनेता  पैदा होते है
पैदावार रुकी नहीं है
पैदा हो रहे है अभावग्रस्त
दारू, गांजा, बीड़ी,कैंसर की दुकान सुर्ती की
लत से लैस  मजदूर
  चौकी गांव के शोषितों की
यही तेरी दर्द भरी कहानी है
जहां नहीं बनती कोई सुनहरी निशानी है
हाशिये के आदमी के अरमानों पर
गिर रहा ओला पानी है
चौकी गांव तुम आज भी
रुके पानी की तरह क्यों हो
भूमि आवंटन से वंचित
लहूलुहान,दर्द रंजित हो
चौकी  तुम्हारी पहचान क्या है ?
तुमने आग में मूतने वालों
आकाश पर थूकने वालों को देखा होगा
दलितों की बस्ती से उठी
कराह को भी सुना होगा
जाने क्यों समता की क्रांति का
बिगुल नहीं बजाया तुमने
चौकी अब तो करवट बदलो
तरक़्क़ी की बयार आने दो
शिक्षा -अर्थ की राह पर
हाशिये के लोगों को पांव जमाने दो
चौकी गांव ना तुम कोलकाता हो
ना मुम्बई हो
हाशिये के आदमी की तरक़्क़ी के बिना
कुछ नहीं हो तुम
चौकी तुम हमारी जन्मभूमि हो
तुम्हारी मांटी हमारे लिए चन्दन है
चौकी गांव तुम्हारा अभिनंदन है।।।।।
-----------
बीमार हैं क्या ?

आप बीमार  हैं क्या?
नहीं हैं बड़ी अच्छी बात है
गर है तो सुनहरा मौका
कुछ दिन सकूँ से बिता लीजिये
मौका और दस्तूर भी है
हाड़ मांस की काया को थोड़ा
विश्राम दीजिये।
विश्राम के दिन को जश्न मान लीजिए
बदन की जरूरत है
आराम कर लीजिए
बीमार होना अच्छी बात तो नहीं है
बीमार होना आपके हाथ में नहीं है
व्याधि के कई कारण भी सकते है
जनाब बीमारी तो ठीक हो जाएगी
हिम्मत और खुश रहना,चिंतामुक्त रहना हैं
डॉ के बताये अनुसार दवा लीजिये
बीमारी का मज़ा लीजिए
बीमारी बरसात के पानी की तरह निकल जायेगी
रहिमन बाबा ने पहले ही कह दिया था
रहिमन विपदा हूँ भली जो थोड़े दिन होय
हित अनहित या जगत  में जानि परत सब कोय
जनाब यकीन मानिये बीमारी
बीमारी कतई नहीं रहेगी
पारखी नज़र रखिये
बरसाती मेढकों की बारात विदा हो जाएगी
ए परजीवी भी बड़ी बीमारी है
कहते है बस आदेश कीजिए
आसमान से तारे तोड़ लाएंगे
बीमारी में,दुःख की बेला में
कही दूर तक नज़र नहीं आएंगे
सगे होगे या बेगाने पहचान लीजिये
लिखते पढ़ते, हंसते गाते
समय पर दवाई लेते रहिये।
पानी अधिक पीया कीजिये
बीमारी का चटकारे मर कर  मज़ा लीजिये
बीमारी को दूर भगा ही  सकते नहीं
बीमारी को आनंद से भी कबमक़लेना सीख लीजिए
निरोगी काया निरोगी काया रटते रहिये
रटना ही नहीं, शारीरिक व्यायाम करिये
बीमारी को जश्न की तरह समझिए
कबीर साहब ने तो  मौत को
उत्सव के रूप में देखते थे
हम तो आम आदमी है
कम से कम बीमारी का जश्न तो मना ही सकते है
बीमार हूँ बीमार हूँ रट लगाना
बीमारी को बढ़ाना है
ज़िन्दगी सकूं से जीना है
हौशले कि ताकत से बीमारियों को पछाड़ दें
ज़िन्दगी है विष तो जीवन की सांस बना दें
दुख या कहे बीमारी बस आनंद उठा लीजिये
दुख ,बीमारी जीवन की पाठशाला
इस पाठशाला से सच्ची ज़िंदगी
अच्छी तरह से जीना सीख लीजिये।

डॉ नन्दलाल भारती

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लोकनाथ साहू ललकार


मैं ढूंढता वो हिन्‍दुस्‍तान

अपनी माटी, अपना देश
कितना बदल गया परिवेश
कबीर का दीया जलता था
फूले-नानक पीर पिघलता था
वो न्‍यारा हिन्‍दुस्‍तान था
गोविन्‍द से प्‍यारा गुरू महान्‌ था
मैं ढूंढता वो हिन्‍दुस्‍तान, बंदे !
जिसकी अमर है दास्‍तान


माटी सोना उगलती थी
सोने की चिड़िया कहलाती थी
शास्‍त्री के किसान मिट रहे
उनके खेतों को गिद्ध लूट रहे
वो न्‍यारा हिन्‍दुस्‍तान था
शास्‍त्री दुलारा जवान-किसान था
मैं ढूंढता वो हिन्‍दुस्‍तान, बंदे !
जिसकी अमर है दास्‍तान


सीते-राधे की जयकार यहाँ
पर लज्‍जा रेखा पार यहाँ
फिल्‍मी गानों में नारी बदनाम
जिसमें नाचते-गाते आम आवाम
वो न्‍यारा हिन्‍दुस्‍तान था
झाँसी का प्‍यारा स्‍वाभिमान था
मैं ढूंढता वो हिन्‍दुस्‍तान, बंदे !
जिसकी अमर है दास्‍तान


कर्णावती की राखी थी
हुमायूं को वो बांधी थी
अब मज़हब की गलियाँ तंग हुईं
अक़ीदत बेनूर ओ बेरंग हुईं
वो न्‍यारा हिन्‍दुस्‍तान था
कृष्‍ण का प्‍यारा सैयद रसखान था
मैं ढूंढता वो हिन्‍दुस्‍तान, बंदे !
जिसकी अमर है दास्‍तान

बचपन मस्‍ताना होता था
हर ग़म से बेगाना होता था
गिल्‍ली-डंडे-पतंगें उड़तीं थीं
टोली प्रभात फेरी मचलती थी
वो न्‍यारा हिन्‍दुस्‍तान था
तिरंगा प्‍यारा गली मुस्‍कान था
मैं ढूंढता वो हिन्‍दुस्‍तान, बंदे !
जिसकी अमर है दास्‍तान
---
लोकनाथ साहू ललकार
बालकोनगर, कोरबा, (छ.ग.)

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सार्थक देवांगन


तुम पेड़ हो
छाया देते हो
भोजन देते हो
पक्षियों को घर बनाने
दिल के भीतर
जगह देते हो
स्वयं तपकर
ठंडक पहुंचाते हो ।

परवाह
नहीं करता कोई तुम्हारी
फिर भी
बिना किसी आशा के
तुम
सबका साथ देते हो
घबराओ नहीं
तुम्हारे जैसे
और भी हैं वो सब
तुम्हारा
साथ देंगे
क्योंकि
तुम पेड़ हो ।

सार्थक देवांगन
छठवीं
के वि रायपुर
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